Sufiyana 212

सबका ख़ुदा एक है…

यहां हम सूफ़ी मख़्दूम यहया मुनीरीؓ के उन तालीमात का ज़िक्र करेंगे, जो आपने अपने खास मुरीद क़ाज़ी शम्सुद्दीनؓ को ख़त की शक्ल में अता की। दरअस्ल क़ाज़ी साहब आपकी खि़दमत में हाज़िर नहीं हो सकते थे, इसलिए आपसे इस तरह से (यानी ख़तो किताबत के ज़रिए) तालिम की दरख़्वास्त की थी। ये भी बुजूर्गों का एक हिकमत भरा अंदाज़ ही है कि क़ाज़ी साहब के साथ.साथ हम लोगों को भी तालीम हासिल हो रही है। शुक्र है उन सूफ़ीयों, आलिमों और जांनिसारों का जिनके ज़रिए ये सूफ़ीयाना बातें हम तक पहुंच रही है और दुआ है कि ताक़यामत इससे लोग फ़ैज़याब होते रहें।

 

ऐ मेरे प्यारे शम्सुद्दीन! अल्लाह तुम्हें दोनों जहान की इज़्ज़त दे। मालूम होना चाहिए कि बुजूर्गों के नज़दीक शरीअ़त-तरीक़त-हक़ीक़त-मारफे़त की तरह तौहीद के भी चार दर्जे हैं और हर दर्जे में अलग अलग हालत व असरात हैं।

पहला दर्जा

इसमें वो लोग आते हैं जो जुबान से तो ‘लाईलाहा इल्लल्लाह’ (अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं) का इक़रार करते हैं, लेकिन दिल से हुजूरﷺ  की रिसालत और तौहीद (एक ईश्वर) को नहीं मानते। ऐसे लोगों को मुनाफि़क़ कहा गया और ऐसों से बचने सख्त हिदायत है।

दूसरा दर्जा

इसकी दो शाखें हैं, एक गिरोह वो जो ज़बान से भी तौहीद का इक़रार करता है और दिल से भी तक़लीदन (नकलची की तरह) यक़ीन रखता है कि ‘अल्लाह एक है और उसका कोई शरीक नहीं’। जैसा कि बाप दादाओं से सुना है, वैसा ही मानने लगते हैं। इस गिरोह में आम मुसलमान आते हैं। दूसरा गिरोह वो है जो ज़बान से भी तौहीद का इक़रार करता है और दिल से भी सच्चा यक़ीन रखता है। सिर्फ अपने बड़ों से सुनने की वजह से तौहीद पर यक़ीन नहीं रखता बल्कि ईल्म और सैकड़ों दलीलों के साथ पुख्ता यक़ीन रखता है। ये लोग उलमा.ए.ज़वाहिर (ज़ाहिरी बातों को अहमियत देने वाले ज्ञानी) या मुतकल्लेमीन (अक़ली दलील के माहिर) कहलाते हैं।

आम मुसलमान व उलमा ए ज़वाहिर की तौहीद, शिर्के जली से बचने के लिए होती है। इसमें आखिरत की भलाई, दोजख से रिहाई और जन्नत के लालच भी होता है। अलबत्ता इस तौहीद में मुशाहिदा नहीं होता। यानी इसमें नूरे इलाही हासिल नहीं होती। इसलिए अरबाबे तरीक़त के नज़दीक इस तौहीद से तरक्की न करना, बहुत छोटे दर्जे पर क़नाअत करना है। इसे बुढ़ी औरत के दीन अख्तियार करना कहा गया है।

तीसरा दर्जा

इस दर्जे में मुवह्हेदे मोमिन आते हैं, जो अपने पीरे तरीक़त की इत्तेबा करते हुए मुजाहिदा व रियाज़त में मशगूल रहते हैं। इनके दिल में रफ्ता रफ्ता तरक्क़ी करते हुए नूरे बसीरत पैदा हो जाती है और इस नूर से उसको इसका मुशाहिदा होता है कि फाएल हक़ीक़ी वही एक ज़ात है। सारा आलम गोया कठपुतली की तरह है। किसी को कोई इख्तियार नहीं है। तौहीद का ऐसा यक़ीन किसी फेल की निसबत से दूसरे की तरफ नहीं किया जा सकता। ये ख़ुद की तलब और खुदा की इनायत से ही हासिल हो सकता है।

यहां एक मिसाल लेते हैं जिससे तौहीद आमियाना, तौहीद मुतकल्लेमाना और तौहीद आरिफाना में फ़र्क़ समझ आ जाएगा। किसी शहर में एक सौदागर सामान बेचने पहुंचा, उसकी शोहरत हुई, लोग उसके माल असबाब देखने पहुंचे। किसी ने ज़ैद से पूछा. क्या तुम्हें मालूम है कि शहर में एक सौदागर आया है। हां सहीं खबर है क्योंकि मुझे एक भरोसेमंद इन्सान ने बताया है। ये तौहीद आमियाना की मिसाल है। इसी तरह किसी ने उमर से उस सौदागर के बारे में पूछा तो उमर ने फ़रमाया कि हां, मैं अभी अभी उसी तरफ से होकर आया हूं, सौदागर से मुलाकात तो नहीं हुई लेकिन उसके माल व सामान, नौकरों और उसकी घोड़ी भी देखा। यहां किसी तरह का शक या शुबा नहीं है। ये तौहीद मुतकल्लेमाना की मिसाल है। इसी तरह किसी ने खालिद से सौदागर के बारे पूछा तो उसने कहा . बेशक, मैं तो अभी अभी उन्हीं के पास से आ रहा हूं। मेरी उनसे अच्छी तरह मुलाकात हुई। ये तौहीद आरिफाना है।

यहां गौर करने वाली बात है कि ज़ैद ने सुनी सुनाई बात पर यकीन किया, उमर ने मालो असबाब यानि दलीलों से यकीन किया और खालिद ने देखकर यकीन किया। ये तीनों बातें उपर दर्ज तौहीद के तीन दर्जे को बयान करती है। सूफियों के नज़दीक, जिस तौहीद में मुशाहिदा न हो, वो सिर्फ ढांचे की तरह है। उसमें जान नहीं है। इसमें ख्याली असरात हैं। जब तक नूरे इलाही का दीदार न हो, उसका पूरा यक़ीन कैसे हो सकता है।

हमारे हुजूरﷺ  को अल्लाह ने अपना दीदार कराया। हमारी तौहीद दलीलों पर बेस्ड नहीं है, हम तो देखे हुए पर ईमान लाते हैं।

चौथा दरजा

तौहीद का चौथा दरजा, वो दरजा है जहां तक बहुत बहुत ज़िक्र, इबादत, रियाज़त व मुजाहिदे के बाद तरक़्क़ी करते हुए पहुंचा जाता है। यहां कभी हर सिम्त अल्लाह के सिवा कुछ नज़र नहीं आता। तजल्लियाते सिफाती का ज़हूर इस शिद्दत से दिल पर उतर जाता है कि बाकी सारी हस्तियां उसकी नज़र से गुम हो जाती है। जिस तरह सूरज की तेज़ रौशनी के आगे ज़र्रा नज़र नहीं आता। धूप में जो ज़र्रा नज़र नहीं आता, ऐसा नहीं कि वो खत्म हो जाता है, बल्कि वो ज़र्रा भी सूरज की रौशनी से चमकदार हो जाता है। खिड़की से आती धूप में ज़र्रे नाचते झूमते दिखते हैं, लेकिन जब बाहर आकर देखो तो धूप के सामने कोई ज़र्रा नज़र नहीं आता। इसी तरह बंदा खुदा नहीं होता और ना ही बंदा खत्म होता है। नहीं होना अलग चीज़ है और नहीं दिखना अलग चीज़। जब उसका नूर नहीं होता सब दिखता है और जब उसके नूर से मुशाहिदा होता है तो कोई नज़र नहीं आता। इसे नूर का जलवा कहें या फिर नज़र की कूवत। जो भी हो, होता वही है और होना वही है। सूफि़यों के नज़दीक इस मुकाम को ‘फ़ना.फि़त.तौहीद’ कहा जाता है। इस दर्जे में किसी पर हफ्ते में फनाहियत तारी होती है तो किसी पर हर रोज़ तो कोई हर वक़्त इसी हालत में होता है।

इस मुकाम पर अगर झूठ, फरेब, दिखावा या शैतानियत सवार हो तो ये बंदे की ही कमी मानी जाएगी। इसमें कोई शक नहीं कि खुदा की तजल्ली होती है और वो अपना जलवा दिखाता है। लेकिन इस मुकाम पर पहुंचना और वहां कायम रहना, बगैर खुदा की मरज़ी और पीर की मदद के मुमकीन नहीं है। पीर वो है जो ख़ुद उस मुकाम पर फ़ाएज़ हो, साहबे बसीरत हो और मुरीद के बहकने या गिरने पर, सम्भालने की ताक़त रखता हो।

‘फ़ना-फि़त-तौहीद’ से उपर भी एक मुकाम होता है जिसे ‘अल-फ़नाओ-अनिल-फ़ना’ कहते हैं। इस फ़नाहियत में ख़ुद के होने का एहसास भी नहीं होता। यहां तक कि फ़ना होने की खबर भी नहीं होती। एक जुम्बीश में सब बातें गायब हो जाती है। किसी किस्म का इल्म बाकी नहीं रह जाता। ‘मक़ामे ऐनुल जमा’ इसी में हासिल होता है।

तू दर्द गुम शो के तौहीद ईं बूद

गुमशुदन गुम कुन के तफ़रीद ऐन बूद

(तू इस में खो जा यहीं तौहीद है और इस खो जाने को भूल जा, इसका नाम तफ़रीद है।)

इस मुकाम में पहुंच कर हक़ीक़त रब इस तरह जल्वानुमा होती है बाकी सब नज़रों से ओझल हो जाते हैं। नामो नसब, दुनिया व दौलत, शोहरत व इज़्ज़त, ज़मीन व आसमान, दोस्त व खानदान का कुछ पता नहीं होता।

‘यहां हर चीज़ को फ़ना है (सिवा उस ज़ात के)’

(कुरान 55:26)

ऐ शम्सुद्दीन! इसी बात पर ग़ौर फि़क्र करने की ज़रूरत है। अच्छी तरह से इसको देखो और समझो। क्योंकि यही तमाम मक़ामात, अहवाल, मामलात व मकाशफेात सभी चीज़ों की जड़ है। यही पैमाना है, तुम्हारे लिए भी और दूसरों के लिए भी। जब तुम किसी उलमा व मशाएख को देखो या सुनो या पढ़ो तो यही पैमाना उनका मकाम तय करेगा, तुम्हें गलतफहमी नहीं होगी। वस्सलाम।

Sufiyana 210

मज़हब नहीं सिखाता…

ऐ ईमानवालों! कोई क़ौम किसी क़ौम का मज़ाक न उड़ाए…

(कुरान 49:11)

भाई, भाई से और बहन, बहन से नफ़रत न करे। एक मन और गति वाले होकर मंगलमय बात करें।

(अथर्ववेद 3:30:3)

जो कुछ तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, वैसा ही तुम भी उनके साथ करो।

(बाईबिल मती 18:15)

 

मज़हब या धर्म या रिलिजन उसे कहते हैं, जो रूहानियत (अध्यात्म) तक ले जाए, जो ख़ुदा तक पहुंचाए। और जो ख़ुदा से दूर करे, जो नफ़्सानियत या निफ़्सयात (मनोविज्ञान) की तरफ़ ले जाए, वो धर्म नहीं। वो भटकाव है, छलावा है, धोखा है। रास्ते अलग अलग हो सकते हैं, तरीके अलग अलग हो सकते है, लेकिन मंज़िल एक ही है। नाम अलग अलग हो सकते हैं, पर जिसे पुकारा जा रहा है, वो एक ही है।

तुम कह दो कि अल्लाह कह कर पुकारो या रहमान कह कर पुकारो, सब उसी के अच्छे नाम हैं…

(कुरान 17:110)

उस एक ईश्वर को विद्वान अनेक नामों से पुकारते हैं।

(ऋगवेद.1:164:36)

लेकिन इस अलग अलग राह पर भी लोग लड़ने लगते हैं, फ़साद करने लगते हैं। कि मेरी राह सहीं है, तेरी गलत। मैं सहीं हूं, तू गलत। दरअस्ल ये अपने दीन के लिए नहीं लड़ते बल्कि ये ख़ुद के लिए लड़ते हैं। ख़ुदा को नहीं, ख़ुद को साबित करना चाहते हैं। ये भी नफ़्स की पैरवी ही है। ऐसे लोगों के लिए अल्लाह कुरान में फ़रमाता है-

और जो लोग अल्लाह (के दीन के बारे में) झगड़ते हैं, बाद इसके कि उसे कुबूल कर लिया गया (है), उनकी बहस व तक़रार उनके रब के नज़दीक बातिल (झूठा व गलत) है और उन पर (अल्लाह का) सख़्त गुस्सा व अज़ाब है।

(कुरान 42:16)

मज़हब तो एक मंज़िल की तरफ़ इशारा है, एक ख़ुदा की तरफ़ बुलावा है। और इसके लिए कोई जबरदस्ती नहीं, कोई लड़ाई नहीं। अगर आप जबरदस्ती करते हैं, तो अपने मज़हब के खिलाफ़़ हैं। अगर नफ़रत करते हैं, तो अपने रब के खिलाफ़ हैं।

(ऐ मुहम्मदﷺ ) आप फ़रमा दीजिए कि मुझे हुक्म है कि तुम्हारे दर्मियान अदल व इन्साफ़ करूं। अल्लाह हमारा (भी) रब है और तुम्हारा (भी) रब है, हमारे लिए हमारे आमाल (काम आएंगे) और तुम्हारे लिए तुम्हारे आमाल। हमारे तुम्हारे दर्मियान कोई बहस व तक़रार नहीं। अल्लाह हम सब को जमा फ़रमाएगा और (हमें) उसी की तरह लौटना है।

(कुरान 42:15)

(ऐ रसूल, काफि़रों से कह दो कि) तुम्हारा दीन तुम्हारे लिए और मेरा दिन मेरे लिए।

(कुरान 109:6)

ख़ुदा की राह पर चलने वालों में एक बात समान होती है, और वो है मुहब्बत। उनकी एक ही पहचान है, वो है प्रेम। अगर इस रास्ते पर हो तो आपमें मुहब्बत होगी, अच्छाई होगी, नेकी होगी। नफ़रत न होगी, दुश्मनी न होगी, बदला न होगा।

हज़रत मुहम्मदﷺ  जब चला करते थे, तो अगर कोई उम्र दराज़ शख़्स सामने चल रहा होता, तो आप उससे अदबन आगे नहीं होते थे, पीछे ही रहते थे। चाहे वो कोई भी हो, किसी भी मज़हब का हो। ये बात मुहब्बत से पैदा होती है। सब अपने लगने लगते हैं, सब एक ही नज़र आते हैं, सबका रंग एक होता है।

ये रंग आप ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ की दरगाह में देख सकते हैं। सूफ़ीयों की खानकाहों में देख सकते हैं। वो भी ऐसा रंग कि समझ में ही नहीं आता कि कौन सा धर्म है, क्या ज़ात है। बस ये दिखता है कि एक ख़ुदा की इबादत कर रहे हैं।

अल्लामा इक़बाल कहते हैं-

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।

हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दुस्तान हमारा।

Sufiyana 208

दरूद सलाम

मुहम्मदﷺ  साहब ने दूसरे धर्मों के लोगों को भी आमंत्रित किया, क्योंकि वो कोई नया धर्म नहीं बना रहे थे। वो तो सभी को एक ही आस्था में शामिल होने के लिए आवाज़ दे रहे थे। वो धार्मिक दूरियों को तोड़ना चाहते थे। अगर ऐसा हो गया होता तो आज नफ़रत की जगह सिर्फ मुहब्बत होती।

(नेपोलियन हील, थींक ग्रो एण्ड रिच)

 

व्यवहारिक इस्लाम की मदद लिए बिना वेदांती सिद्धांत, चाहे कितने ही उत्तम व अद्भूत हों, विशाल मानव जाति के लिए मूल्यहीन हैं।

(टीचिंग ऑफ विवेकानंद 214-218, अद्वैत आश्रम, कोलकाता 2004)

 

‘‘…मुहम्मदﷺ  की शिक्षा, सम्पूर्ण एवं सार्वभौमिक शिक्षा है, जो कि अपने सभी अनुयायियों से समानता का व्यवहार करती है। ये कोई तलवार नहीं है, बल्कि सच्चाई व समानता की वो ताकत है, जो अपनी बाहों में आने को विवश करता है…।’’

(डॉ. भीमराव अम्बेडकर, ‘दस स्पोक अम्बेडकर’ चौथा खंड-भगवानदास 144-145)

 

किसी समाज में स्त्रियों का जायदाद पर इतना हक़, पहले कभी नहीं दिया गया, जितना मुहम्मदﷺ  ने दिया।

(मुंशी प्रेमचंद)

 

 

दरूद सलाम

सारे आमाले हस्ना और अज़कारे तय्यबा में यही एक मुक़द्दस अमल है, जिसकी निसबत अल्लाह ने ख़ुद अपनी तरफ़ फ़रमाई है .

बेशक अल्लाह और उसके फरिश्ते दरूद भेजते हैं, उस ग़ैब बताने वाले (हज़रत मुहम्मदﷺ ) पर। ऐ ईमानवालों! (तुम भी) उन पर दरूद और खूब सलाम भेजो।

(कुरान 33:56)

हुज़ूरﷺ  फ़रमाते हैं कि जिसके सामने मेरा ज़िक्र हो उसे, मुझ पर दरूद भेजना वाजिब है और जिसने मुझ पर एक मरतबा दरूद भेजा, अल्लाह उस पर दस रहमतें नाज़िल फ़रमाता है। (तरगीब 2.494, रवाहुन निसाई.1409)

हज़रत मुहम्मदﷺ  पर, ज़िन्दगी में कम से कम एक बार दरूद पढ़ना फ़ज़्र है और जिस मजलीस में आपﷺ  का ज़िक्र हो रहा है, वहां एक बार दरूद पढ़ना वाजिब है।

दिखावे के लिए दरूद पढ़ना

नमाज़ अगर दिखावे के लिए पढ़ी जाए तो उसे आपके मुंह पर मार दी जाएगी और सवाब के बजाए अज़ाब मिलेगा, लेकिन दरूद पाक वो अज़ीम अमल है, जो हर सूरत में बारगाहे ख़ुदावंदी में मक़बूल है। चाहे वो दिखावे के लिए ही क्यूं न हो।

दरूद सलाम क्यों पढ़ें?

हुज़ूरﷺ  पर सलातो सलाम का नज़राना पेश करना एक तरह से बुलन्द दरजात की दुआ है। अब यहां ये सवाल उठता है कि क्या हुज़ूरﷺ  हमारी दुआ के मोहताज हैं? क्या हमारे दुआ करने से उनके दरजात बुलन्द होते हैं, नहीं बिल्कुल नहीं। उनके दरजात बुलन्द करने की हमारी क्या औकात। जिनका नूर, सबसे पहले पैदा किया गया, जो तमाम अम्बिया के सरदार हैं, जिन पर ख़ुद रब्बुल आलमीन दरूद भेजता है। उन्हें हमारी दुआ की क्या ज़रूरत। हमारी दुआ के बगैर भी उनका दरजा अल्लाह के बाद सबसे ऊपर है।

तो फिर हम दरूदो सलाम क्यों पढ़ते हैं?

इसके जवाब में हज़रत इश्तियाक़ आलम शहबाज़ीؓ फ़रमाते हैं कि हुज़ूरﷺ  पर दरूदो सलाम भेजने के दो मक़सद हैं.

  1. ज़िक्र ब़ुलन्द करना

अल्लाह ने क़ुरान में फ़रमाया.

‘‘और हमने आप की खातिर, आपका ज़िक्र (अपने ज़िक्र के साथ मिलाकर दुनिया व आखि़रत में हर जगह) बुलन्द फ़रमा दिया’’

(कुरान 94:4)

अल्लाह ने हुज़ूरﷺ  का ज़िक्र हमेशा के लिए सबसे बुलन्द कर दिया है और हम वो ज़िक्र करके अल्लाह के उस फ़रमान के शाहिद व गवाह हो रहे हैं।

 

  1. शुक्र अदा करना

‘‘बेशक अल्लाह ने ईमानवालों पर बड़ा एहसान फ़रमाया कि उनमें उन्हीं में से (बड़ी अज़मत वाले) रसूल भेजा, जो उन पर उसकी आयतें पढ़ते और उन्हें पाक करते है और उन्हें किताब व हिकमत की तालीम देते हैं,…’’

(कुरान 3:164)

हुज़ूरﷺ  के इतने एहसानात तो हम पर हैं ही, इस आयत के मुताबिक उनकी विलादत भी हम पर एहसान है। जब कोई एहसानमंद, एहसान का सिला नहीं दे पाता तो एहसान करने वाले के हक़ में दुआ व शुक्र अदा करता है। हुज़ूरﷺ  का हम पर बेहिसाब एहसानात हैं और दरूदो सलाम उसका छोटा सा शुकराना है। हम उनके एहसानों का सिला तो नहीं दे सकते लेकिन उनका शुक्र तो अदा कर सकते हैं।

‘‘अल्लाहुम्मासल्ले अला मुहम्मदिन’’

ऐ अल्लाह, तू ही हमारी तरफ़ से अपने महबूब पर दरूद भेज दे।

Sufiyana 205

ये ज़मीं जब न थी…

ये ज़मीं जब न थी, ये फ़लक जब न था,

फिर कहां और कैसे थे ये मासिवा,

कौन उल्टे भला, पर्दा असरार का,

पूछ दिल से तू अपने, तो देगा सदा…

ला इलाहा इल्लल्लाह।

ला इलाहा इल्लल्लाह।

जब ये ज़मीन न थी और ये आसमान भी न था, तो उस रब के अलावा बाक़ी कुछ कहां थे और कैसे थे। कौन बता सकता है और कौन उस छिपे हुए भेदों से पर्दा हटा सकता है। इसके जवाब में अगर अपने दिल से पूछा जाए, तो वो यही जवाब देगा कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं।

 

जबकि तन्हा था, वो ख़ालिके दोसरा,

जोशे वहदत में फिर, या मुहम्मदﷺ  कहा,

जल्वए कुन से नूरे मुहम्मदﷺ  हुआ,

और उस नूर ने फिर ये बरसों पढ़ा…

ला इलाहा इल्लल्लाह।

ला इलाहा इल्लल्लाह।

सारे जहान को पैदा करने वाला अल्लाह उस वक्त तन्हा ही था। कुछ न था उसके सिवा। फिर उसने वहदत के जोश में अपने नूर से एक नूर पैदा करना चाहा और कहा ‘कुन’ यानि ‘हो जा’। और वो नूर पैदा हो गया। उस नूर का नाम मुहम्मदﷺ  रखा। फिर उस नूर ने बरसों कहा कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं।

 

है उसी नूर से, दो जहां जलवागर,

अर्शो लौहो क़लम, चर्खो शम्सो क़मर,

ये ज़मीनों ज़मां, गुलशनो बहरोबर,

पत्ता पत्ता पुकारा किये झुमकर…

ला इलाहा इल्लल्लाह।

ला इलाहा इल्लल्लाह।

हुज़ूरﷺ  के उसी नूर से सारा आलम पैदा किया गया। इन्सान, हैवान, अर्श, नसीब दर्ज करने वाले लौहो क़लम, सूरज, चांद, ज़मीन, आसमान, तमाम दुनिया, जीव, पेड़, पौधे, यहां तक कि जो कुछ भी है, वो सब इसी नूर से पैदा किया गया। अब ये सारे के सारे गवाही में कहते हैं कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं।

Sufiyana 204

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सूफ़ीयाना रिसाला मिला, पहला ही शुमारा इतना अच्छा पेश किया गया कि दिल से पुरखुलूस दुआ निकलती है। ‘सूफ़ीयाना’ टाईटल ही इसके अंदर का हाल बयान करता है। रिसाले के मज़ामीन बहुत उम्दा और बेहतरीन है, जिनको पढ़कर लोगों के दिलों में सिराते मुस्तक़ीम पर चलने की ख़्वाहीश जाग उठेगी। मैं सिदक़े दिल से अल्लाह से दुआ करता हूं कि ‘सूफ़ीयाना’ बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी करे और बुजूर्गानेदीन की तालीमात व इन्सानियत के इस मिशन में कामयाबी हासिल करे। आमीन!

इस्हाक़ बिन इस्माईल चिश्ती (बी.ई.)
सज्जादा नशीन ख़्वाजा ग़रीबनवाज़, अजमेर

 

मैंने ऐसी पत्रिका की कल्पना भी नहीं की थी, जैसी आपने प्रकाशित की है। धन्य हैं आप और आपकी सोच, जिसने अध्यात्म को इतने सुंदरता से प्रस्तुत किया है। सिर्फ एक अनुरोध है कि इसके कठीन उर्दू शब्द को हटाकर, आसान बोलचाल वाले शब्द दें या फिर मतलब भी साथ में दें।

अवधेश शर्मा शास्त्री
नई दिल्ली

 

ज़िन्दगी में पहला रिसाला, जिसे बिना रुके पढ़ने का मन करता है और जिसके अगले अंक का इंतेज़ार अभी से है।

मो.अशरफ़
दुर्ग

 

इल्मे ज़ाहिर व इल्मे बातिन में जो खाई, बनी उमय्या के दौर ने पैदा की गई थी, वो आज तक बनी हुई है। इस खाई को भरने में आपकी ‘सूफ़ीयाना’ की शक़्ल में ऐसी कोशिश, काबिले तारीफ़ है। अल्लाह, अपने रसूल के सदक़े आपको तरक़्की अता फ़रमाए और आने वाली रूकावटों को दूर करे।

मौलाना फ़ैज़ान रिज़वी
बरेली (उत्तर प्रदेश)

 

Sufiyana Magazine is a great initiative to remind, appreciate and follow the teaching of Sufism. Sheikh Safiuddin Saadi Miyan Huzur is my Murshid and I am proud to be his disciple as he has transformed my life into a better human being with love for all.

Tauseef Irfan (B.E.)
New Jersy, USA
Sufiyana 2 editor

दुनिया की ज़िन्दगी तो बस खेल तमाशा है…

दुनिया की ज़िन्दगी तो बस खेल तमाशा है…

(कुरान 47:36)

आदमी एक बच्चे की तरह है, जो दुनिया के मेले में खो गया है। मेले में बहुत अच्छी अच्छी चीजें हैं, खेल है, खिलौने हैं, झूले हैं, नौटंकी हैं, यहां तक कि मौज मस्ती के सारे सामान मौजूद हैं। मेले की चकाचौंध में बच्चा भूल ही गया है कि उसका घर भी है, घरवाला भी है और उसे लौटना भी है। ये मेला हमेशा के लिए नहीं है, ये तो आज है कल नहीं रहेगा। लेकिन घर तो हमेशा रहेगा। मेले में उसका कोई नहीं है, लेकिन घर पर उसका कोई है, जो उसकी राह देख रहा है। उसके लौटने का इंतेज़ार कर रहा है।

बच्चे को पैदा करनेवाला बड़ी चिंता में है। कहीं कुछ उंच नीच न हो जाए। कोई तकलीफ़ न हो जाए। उसने अपना ‘पैग़ाम’ देकर भेजा, लेकिन बच्चा नहीं आया। उसने ‘इनाम’ देकर भेजा, लेकिन बच्चा नहीं आया। बच्चे का दिल वहीं रम गया। उसे कोई फि़क्र नहीं, अपने पालनहार की।

गुमने और न गुमने में राब्ते (संपर्क) का ही फ़र्क़ है। अगर घरवाले से राब्ता है तो नहीं गुमा है और राब्ता नहीं है तो गुम गया। तो यहां उस पालनहार से सिर्फ राब्ता रखना है, उसे हमेशा याद रखना है। वो ये नहीं चाहता कि बच्चा सब छोड़कर घर ही आ जाए, लेकिन वो ये भी नहीं चाहता कि बच्चा मेले में ही गुम हो जाए। वो तो ये चाहता है कि मेले में रहे, जो अच्छा है वो करे और फिर घर लौट आए।

जो दुनिया का इनाम चाहे तो वो (भी) रब के ही पास है,

उसी के पास दुनिया व आखिरत (दोनों) का ईनाम है।

(कुरान 4:134)

उस पालनहार ने ‘पैग़ाम’ वालों को भेजना बंद कर दिया है, कोई नया ‘पैग़ाम’ अब नहीं आएगा। लेकिन ‘इनाम’ व ‘एहसान’ वालों को अभी भी भेज रहा है। अब बच्चे को चाहिए कि उनका दामन थाम ले, उनसे राब्ता कायम कर ले। इसी में यहां भी भलाई है और वहां भी। आखि़र इन ‘दौलतमंदों’ का साथ जो होगा।

और जो कोई ख़ुदा व उसके रसूल का हुक्म मानता है,

उसे उनका साथ मिलेगा, जिन पर रब ने (खास) इनाम अता किया है,

यानी अंबिया व सिद्दीक़ व शहीद व नेक लोग,

ये बहुत बेहतरीन साथी हैं।

(कुरान 4:69)

shah ast hussain

2nd सूफ़ीयाना मैगज़ीन शाया हुई

शाह अस्त हुसैन

बादशाह अस्त हुसैनؑ

दीन अस्त हुसैनؑ

दीन पनाह अस्त हुसैनؑ

सर दाद न दाद

दस्त दर दस्ते यज़ीद

हक्का के बिनाए

लाइलाह अस्त हुसैनؑ

(ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ)

 

हज़रत हुसैनؑ रूहानी शाह हैं और दुनिया के बादशाह भी हैं। इमाम हुसैनؑ दीन हैं और दीन के संरक्षक भी हैं। जब करबला में आपको परिवार सहित घेर लिया गया, और यज़ीद के हाथों बैअ़त की ज़बरदस्ती होने लगी, तो आपने, अपना सर दे दिया, लेकिन वो हाथ न दिया, जिस हाथ पर बैअ़त हुए थे। इसी कुरबानी की वजह से, आज हमारा दीन ज़िन्दा है। हक़ तो ये है कि ‘ला इलाहा’ की बुनियाद हुसैनؑ हैं। अगर यज़ीद के हाथों बैअ़त ले ली जाती, तो इमाम हुसैनؑ और उनके परिवार की जान तो बच जाती, लेकिन धर्म न बचता, सत्य न बचता और हज़रत मुहम्मदﷺ  की शिक्षाएं नहीं बचती। आप जंग हार गये, मगर दीन जीत गया। और इस तरह असत्य पर सत्य की जीत हुई।

हज़रत मुहम्मदﷺ  फ़रमाते हैं- हुसैन मुझसे हैं और मैं हुसैन से हूं।

 

सुनते हैं, सर बचाने को उठते हैं पहले हाथ।

सर देकर, अपना हाथ बचाया हुसैनؑ ने।

(पंडित गयाप्रसाद रूमवी)

 

क़त्ले हुसैनؑ अस्ल में मर्गे़ यज़ीद है।

इस्लाम ज़िन्दा होता है, हर करबला के बाद।

(मुहम्मद अली जौहर)

 

इन्सान को बेदार तो हो लेने दो,

हर क़ौम पुकारेगी, हमारे हैं हुसैन।

(जोश मलीहाबादी)

 

वो हुसैनؑ जिसने छिड़क के खून,

चमने वफ़ा को हरा किया।

(मौलाना एजाज़ कामठी)

 

मैंने हुसैन से सीखा कि मजलूमियत में किस तरह जीत हासिल की जा सकती है। इस्लाम की बढ़ोतरी तलवार पर निर्भर नहीं करती, बल्कि हुसैन के बलिदान का एक नतीजा है, जो एक महान संत थे।

-महात्मा गांधी

इमाम हुसैन की कुरबानी तमाम गिरोहों और सारे समाज के लिए है और यह कुरबानी इंसानियत की भलाई की एक अनमोल मिसाल है।

-पंडित जवाहर लाल नेहरू

यह इमाम हुसैन की कुरबानियों का नतीजा है कि आज इस्लाम का नाम बाक़ी है। नहीं तो दुनिया में कोई नाम लेने वाला भी नहीं होता।

-स्वामी शंकराचार्य

इस बहादुर और निडर लोगों में सभी औरतें और बच्चे इस बात को अच्छी तरह से जानते और समझते थे कि दुश्मन की फौजों ने उनका घिराव किया हुआ है और दुश्मन सिर्फ लड़ने नहीं बल्कि उनको क़त्ल करने के लिए आए हैं। जलती रेत, तपता सूरज और बच्चों की प्यास भी उनके क़दम नहीं डगमगा पाई। सारी मुश्किलों का सामना करते हुए भी उन्होंने अपनी सत्यता का कारनामा कर दिखाया।

-चार्लस डिकेन्स

मानवता के वर्तमान और अतीत के इतिहास में कोई भी युद्ध ऐसा नहीं है, जिसने इतनी मात्रा में सहानुभूति और प्रशंसा हासिल की हो और सारी मानवजाति की इतनी अधिक उपदेश व उदाहरण दिया हो, जितनी इमाम हुसैन की शहादत ने करबला के युद्ध से दी है।

-अंटोनी बारा

Sufiyana 143

प्रेरक प्रसंग

जीवन दर्शन

मनुष्य के प्रकार

परमहंस जी अपने शिष्यों के साथ टहल रहे थे। देखा कि एक मछुआरा जाल फेंककर मछली पकड़ रहा है। आप वहां ठहर गए और अपने शिष्यों से कहा कि ध्यान से इन मछलियों को देखो। कुछ मछलियां जाल में निश्चल पड़ी हैं, तो कुछ जाल से निकलने की कोशिश कर रही हैं लेकिन कामयाब नहीं हो पा रही हैं। कुछ उस जाल से निकलने में कामयाब हो गई और आज़ादी से घुमने लगी। लेकिन कुछ मछलियां तो जाल में फंसी ही नहीं।
जिस तरह मछलियां चार किस्म की होती है, ठीक उसी तरह मनुष्य भी चार तरह के होते हैं। एक मनुष्य वो जो अपनी इंद्रियों के जाल में फंस चुका है और हार मान चुका है। वो इससे निकलने की कोशिश भी नहीं करता। दूसरा मनुष्य वो जो इंद्रियों के जाल में फंसा तो है लेकिन उससे निकलने की कोशिश कर रहा। ये अलग बात है कि कामयाब नहीं हो पा रहा। तीसरा मनुष्य वो है, जो इंद्रियों के जाल में फंसा भी और उससे निकल भी गया। अब आज़ादी से अपने अस्ल की तरफ लौट आया है। चौथा मनुष्य वो है जो अपना अस्ल जानता है। वो ये भी जानता है कि इन इंद्रियों का जाल कितना भयावह है और इससे कैसे बचा जाए। वो इस जाल में फंसता ही नहीं और खुद को इससे हमेशा आज़ाद रखता है। इस तरह वो रब को पाने में अग्रसर है।

गुरू की ज़रूरत

एक संत से मिलने अक्सर देव आया करते थे। संत बड़े आदर से उनका इस्तेकबाल करते, उनके साथ बैठते, बातचीत करते। लेकिन जब देव चले जाते तो उनकी बैठी हुई मिट्टी को उठाकर दूर फिकवा देते थे।
ये बात जब देव को पता चली तो वो बहुत गुस्सा हुए और संत के पास पहुंचकर सवाल किया- ‘ऐ संत! मैं कौन हूं, ये आप जानते हैं, मैं किनका पुत्र हूं, ये भी आप जानते हैं, मेरा ज्ञान और महिमा किसी से छुपी नहीं है। फिर मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यूं किया जा रहा है? पहले इतने अच्छे से मिला जा रहा है फिर मेरा इतना अपमान। ऐसा तो कोई दुश्मनों के साथ भी नहीं करता।’
संत ने कहा ‘हे देव! आपसे अच्छे से मिलना तो मेरा व्यवहार है और आपके ज्ञान व शान में मुझे कोई शक नहीं है। लेकिन आपमें एक कमी भी है, वो ये कि आप किसी गुरू से नहीं जुड़े हैं। इसलिए मेरे लिए आपका ज्ञान व शान किसी काम की नहीं। बिना गुरू के वो छुत समान है। मैं नहीं चाहता कि जो गुरू से जुड़ा न हो उसका साया भी यहां की मिट्टी पर पड़े।’

ईश्वर कहां है?

संत नामदेव से एक जिज्ञासु प्रश्न किया-‘गुरूदेव, कहा जाता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है, तो उसे अनुभव कैसे किया जा सकता है? क्या आप उसकी प्राप्ति का कोई उपाय बता सकते हैं?’ नामदेव यह सुनकर मुस्कराए। फिर उन्होंने उसे एक लोटा पानी और थोड़ा सा नमक लाने को कहा। वहां उपस्थित शिष्यों की उत्सुकता बढ़ गई।
नमक और पानी के आ जाने पर संत ने नमक को पानी में छोड़ देने को कहा। जब नमक पानी में घुल गया तो संत ने पूछा- ‘बताओ, क्या तुम्हें इसमें नमक दिख रहा है?’ जिज्ञासु बोला- ‘नहीं गुरूदेव, नमक तो इसमें पूरी तरह घुल-मिल गया है।’ संत ने पानी चखने को कहा। उसने चखकर कहा- ‘जी, इसमें नमक उपस्थित है, पर वह दिखाई नहीं दे रहा।’ अब संत ने उसे जल उबालने को कहा। पूरा जल जब भाप बन गया तो संत ने पूछा- ‘क्या इसमें वह दिखता है?’ जिज्ञासु ने गौर से लोटे को देखा और कहा-‘हां, अब इसमें नमक दिख रहा है।’ तब संत ने समझाया-‘जिस तरह नमक पानी में होते हुए भी दिखता नहीं, उसी तरह ईश्वर भी हर जगह अनुभव किया जा सकता है, मगर वह दिखता नहीं। जिस तरह जल को गर्म करके तुमने नमक पा लिया, उसी प्रकार तुम भी उचित तप और कर्म करके ईश्वर को प्राप्त कर सकते हो।’

Sufiyana 142

लकड़हारा और कौवां

एक गांव में एक ग़रीब लकड़हारा रहता था, वह हर रोज जंगल से लकड़ी काट कर लाता और उन्हें बेचकर अपना और अपने परिवार का पेट पालता था। लकड़हारा, था तो बहुत गरीब लेकिन ईमानदार, दयालु और अच्छे अख्लाक वाला इन्सान था। वह हमेशा दूसरों के काम आता और यहां तक कि बेज़बान जानवरों का भी खयाल रखता था।

एक दिन जंगल में लकड़ी काटते काटते थक गया तो एक छाया दार पेड़ के नीचे सुस्ताने लगा। तभी उसने देखा कि एक सांप पेड़ पर बने हुए घोंसले की ओर बढ़ रहा था, इस घोंसले में कौवे के बच्चे थे जो सांप के डर से चिल्ला रहे थे। बच्चों के मां बाप कौवे दाना चुगने कहीं दूर गए थे। लकड़हारे को उन बच्चों पर दया आ गयी, वो अपनी थकान भूल कर फ़ौरन उठ बैठा और कौवे के बच्चों को सांप से बचाने के लिये पेड़ पर चढ़ने लगा। सांप खतरा देखकर भागने लगा और घोंसले से दूर जाने लगा। उसी बीच कौवे भी लौट आए, लकड़हारे को पेड़ पर चढ़ा देखा तो वह समझे कि ज़रूर उसने बच्चों को मार दिया होगा। वह गुस्से में काओं काओं चिल्लाने लगे और लकड़हारे को चोंच मार मार कर अधमरा कर दिया। बेचारा लकड़हारा किसी तरह जान बचाकर नीचे उतरा और चैन की सांस ली।

लेकिन जब कव्वे अपने घोंसले में गए तो बच्चे वहां दुबके हुए बैठे थे, बच्चों ने मां बाप को सारी बात बता दी और उन्होंने देखा कि सांप पेड़ से उतर कर भाग रहा है। अब कौवों को अपनी गलती का एहसास हुआ। वे बहुत शर्मिन्दा हुए। कौवे लकड़हारे का शुक्रिया अदा करना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने घोंसले में रखा मोती का क़ीमती हार जो उन्हें कुछ ही दिन पहले गांव के तालाब के किनारे मिला था, उठा कर लकड़हारे के आगे डाल दिया और थोड़ी दूर हटकर काओं काओं करने लगे। इस तरह कव्वे अपने प्यारे बच्चों की जान बचाने पर दयालु लकड़हारे को धन्यवाद कर रहे थे, ग़रीब लकड़हारा भी कीमती हार पाकर बहुत खुश हुआ और उसने मन ही मन में अल्लाह का शुक्र अदा किया।

जब लकड़हारा लकडियों का गट्ठर सिर पर उठा कर अपने गांव की ओर चलने लगा तो कव्वे भी उसके ऊपर कांव कांव करते उड़ रहे थे, लेकिन अब चोंच मारने के लिये नहीं बल्कि अलविदा कहने के लिये।

सबक़-

  • हमें इंसानों के साथ साथ जानवरों और चिड़ियों पर भी रहम करना चाहिये और बुरे समय में उनके काम आना चाहिये।
  • सही जानकारी हासिल किये बिना जल्दबाज़ी में कोई फैसला नहीं करना चाहिए।
  • अपनी ग़ल्ती का एहसास हो जाने पर सामने वाले से माफ़ी मांग लेना चाहिए।
  • अगर किसी ने हमारे साथ भलाई की, तो उसका शुक्रिया ज़रूर अदा करना चाहिए।
Sufiyana 141

डिसिप्लिन

डिसिप्लिन मतलब वक्त क़ी पाबंदी, अनुशासन। अपने मक़सद में लगन लगाए रखना। एक चीज़ को दूसरी बड़ी चीज के लिए छोड़ देना। बाद की ज्यादा बड़ी खुशी के लिए आज की छोटी खुशी को कुरबान कर देना।

ज़ाहिरी तौर पर इसमें मजबूरी दिखाई देती है कि करना ही पड़ेगा। बिना किये काम नहीं चलेगा। लेकिन असल आज़ादी इसी में होती है। जैसे लिखना पढ़ना हमारी एक खूबी है, इसके बगैर जिंदगी को हम सोच भी नहीं सकते। लेकिन अगर बचपन में अनुशासित होकर इसे नहीं सीखते तो क्या लिख पढ़ पाते। इसी लिखने पढ़ने की आज़ादी के लिए ही हमने घूमना फिरना खेलना कूदना छोड़ दिया था।

जो डिसिप्लिन में नहीं रहते वो दरअसल आज़ादी को नहीं जानते। वो छोटी छोटी खुशियों में ही खोए रहते हैं, बड़ी खुशियां तो उन्हें मालूम ही नहीं। वो खुशी के बारे में उसी तरह जानते हैं जिस तरह अंधा रंगों के बारे में जानता है।

कारण तो हमेशा रहते हैं, बहाना कभी नहीं रहता। फिर भी वो अक्सर बहाने बनाने में अपना वक्त जाया करते रहते हैं। ऐसे लोग अक्सर नाकामयाब होते हैं। ऐसे लोग जिन कामों को बहाना बना कर छोड़ देते हैं अक्सर कामयाब लोग उसी काम को करके कामयाब होते हैं। चाहे पसंद हो या नापसंद हो।

सबसे पहले अपने मक़सद को पहचाने फिर उसे हासिल करने में लग जाएं। परेशानी आ सकती है लेकिन नाउम्मीद न हो। इसे इस तरह पकड़े रहें कि इसके लिए बाक़ी सब छोड़ दें। चाहे आपकी पसंद का हो या न हो। इसमें कोई दो राय नहीं कि कामयाबी हर किसी को पसंद होती है और डिसिप्लिन में ही कामयाबी छुपी हुई है।

शैख सादी रज़ी. फ़रमाते हैं-

‘धीरे धीरे ही सही, लेकिन डिसिप्लिन व लगन से लगातार चलने वाले की कामयाबी तय है।’

लगातार गिरता पानी, पत्थर को भी चीर देता है।

Sufiyana 140

लिबास

ऐ इन्सान! हमने तुम्हें ऐसा लिबास दिया है जिससे तुम खुद को ढको और खुबसूरत दिखो। (लेकिन इसके साथ ही तुम्हें छुपा हुआ लिबास भी दिया है और वही) तक़वा (परहेज़गारी) का लिबास ही बेहतर है।…

(क़ुरान 7:26)

 

अक्सर हम किसी इन्सान को उसके हुलिए उसके लिबास से पहनावे से पहचानते हैं और ये सोचते हैं कि वो वैसा ही होगा। हम पहले से तय कर लेते हैं कि फटे कपड़े पहना होगा तो ग़रीब होगा, अच्छे कपड़े पहना होगा तो अमीर होगा, धोती पहना होगा तो पंडित होगा, सर में साफ़ा पहना होगा तो मौलाना होगा, सफेद कुर्ता पायजामा पहना होगा तो नेता होगा वगैरह वगैरह।

आप भी इससे बच नहीं सकते, आपको भी कोई आपके लिबास की वजह से पहचानता होगा, तो क्या वो आपके बारे में अच्छी तरह जान पाएगा, क्या वो जान पाएगा कि आपमें क्या खूबियां हैं और क्या बुराईयां हैं। हो सकता है इसी वजह से आप अपने बाप दादाओं की तरह कपड़े पहनना छोड़ दिए हों। अपने बुजूगों के पहनावे को सिर्फ इसलिए छोड़ देना कि ‘लोग क्या कहेंगे?’, बहुत बड़ी नादानी और शर्म की बात है। इन्सान की पहचान उसके दिल से, उसके अख्लाक़ व किरदार से होती है।

मिस्र में एक सूफ़ी हज़रत ज़ुन्नुन मिस्री रज़ी. रहते थे। एक नौजवान ने उनसे पूछा, मुझे समझ में नहीं आता कि आप लोग सिर्फ एक चोगा ही क्यों पहने रहते हैं? बदलते वक्त क़े साथ यह ज़रूरी है कि लोग ऐसे लिबास पहने जिनसे उनकी शख्सियत सबसे अलग दिखे और देखने वाले वाहवाही करें। ज़ुन्नुन मुस्कुराए और अपनी उंगली से एक अंगूठी निकालकर बोले, ‘बेटे, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब ज़रूर दूंगा लेकिन पहले तुम इस अंगूठी को सामने बाज़ार में एक अशर्फी में बेच आओ’। नौजवान ने ज़ुन्नुन की साधारण सी दिखने वाली अंगूठी को देखकर कहा ‘इसके लिए सोने की एक अशर्फी तो क्या कोई चांदी का एक सिक्का भी न दे’।

‘कोशिश करके देखो, शायद तुम्हें वाकई कोई ख़रीदार मिल जाए’ ज़ुन्नुन ने कहा। नौजवान तुरंत ही बाज़ार को रवाना हो गया। उसने वह अंगूठी बहुत से सौदागरों, परचूनियों, साहूकारों, यहां तक कि हज्जाम और क़साई को भी दिखाई पर उनमें से कोई भी उस अंगूठी के लिए एक अशर्फी देने को तैयार नहीं हुआ। थक हार कर वो वापस आया और कहा, ‘कोई भी इसके लिए चांदी के एक सिक्के से ज्यादा देने के लिए तैयार नहीं है’।

ज़ुन्नुन मुस्कुराए और कहा, ‘अब तुम इस सड़क के पीछे सुनार की दुकान पर जाकर उसे यह अंगूठी दिखाओ। लेकिन तुम उसे अपना मोल मत बताना, बस यही देखना कि वह इसकी क्या क़ीमत लगाता है’। नौजवान बताई गयी दुकान तक गया और वहां से लौटते वक्त उसके चेहरे से कुछ और ही बयान हो रहा था। उसने ज़ुन्नुन से कहा, आप सही थे। बाज़ार में किसी को भी इस अंगूठी की सही क़ीमत का अंदाजा नहीं है। सुनार ने इस अंगूठी के लिए सोने की एक हज़ार अशर्फियों की पेशकश की है। यह तो आपकी मांगी क़ीमत से भी हज़ार गुना है।

ज़ुन्नुन ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘और वही तुम्हारे सवाल का जवाब है। किसी भी इन्सान की क़ीमत उसके लिबास से नहीं आंको, नहीं तो तुम बाज़ार के उन सौदागरों की मानिंद बेशक़ीमती नगीनों से हाथ धो बैठोगे। अगर तुम उस सुनार की आंखों से चीज़ों को परखोगे तो तुम्हें मिट्टी और पत्थरों में भी सोना और जवाहरात दिखाई देंगे। इसके लिए तुम्हें दुनियावी नज़र पर पर्दा डालना होगा और दिल की निगाह से देखने की कोशिश करनी होगी। बाहरी दिखावे से हट कर देखो, तुम्हें हर तरफ हीरे-मोती ही नज़र आएंगे’।

Sufiyana 139

पाकी (स्‍वच्‍छता)

‘उसमें वो लोग हैं जो खूब पाक होना चाहते हैं और पाक (साफ सूथरे) लोग अल्लाह को प्यारे हैं।’

(क़ुरान 9:108)

‘अल्लाह नहीं चाहता कि तुम पर कुछ तंगी रखे, हां ये चाहता है कि तुम्हें साफ सूथरा (पाक) कर दे।’

(क़ुरान 5:6)

‘पाकीज़गी आधा ईमान है।’

(तिरमिज़ी 3530)

‘दीन की बुनियाद पाकीज़गी पर है।’

(अश-शिफा 1:61, इहयाउल उलूम 396)

 

पाकी के मायने हैं- खुद को बुराईयों और गंदगी से पाक रखना। पाकी दो तरह की होती है- एक ज़ाहिरी और दूसरा बातिनी। दोनों पाकी ज़रूरी है। बातिनी यानी दिल की पाकी भी और ज़ाहिरी यानी जिस्म की पाकी भी। किसी भी तरह की इबादत व अमल के लिए जिस्म का पाक होना ज़रूरी होता है। साथ जगह और कपड़े भी पाक हो।

गुस्ल

पाकी हासिल करने के लिए गुस्ल करना पड़ता है। गुस्ल करना और सिर्फ नहाने में फ़र्क होता है। गुस्ल करने का ये तरीक़ा है-

  • गुस्ल करने की नियत करें
  • गंदगी से तमाम जिस्म को पाक कर लें
  • वजू करें
  • कुल्ली करें व अच्छी तरह मुंह साफ करें
  • नाक में पानी डालें
  • पूरे बदन में तीन बार पानी बहाएं, इस तरह कि कोई हिस्सा बाकी न रहे
  • साफ व पाक कपड़े पहनें।

वजू

गुस्ल करने से पाक तो हो जाते हैं, लेकिन किसी भी इबादत व अमल के लिए या क़ुरान की तिलावत के लिए या मज़ार में हाजिरी के लिए या पीर की सोहबत के लिए सिर्फ पाक होना काफ़ी नहीं है। इसके लिए वजू करना भी ज़रूरी है। बल्कि कोशिश करें कि हमेशा ही वजू से रहें। वजू का ये तरीक़ा है-

 

  • ख़ुदा की खुशनूदी व आखिरत के अजर के साथ वजू की नीयत करें
  • बिस्मिल्लाह पढ़ कर गट्टो सहित हाथ धोएं
  • तीन बार कुल्ली करके मुंह साफ करें, (ज़रूरत पड़े तो मिसवाक करें)
  • तीन बार नाक में पानी डालें
  • तीन बार पूरा चेहरा अच्छी तरह धोएं (दाढ़ी में खिलाल करें)
  • तीन बार हाथों कोहनी समेत अच्छी तरह धोएं (उंगलियों में खिलाल करें)
  • पूरे सर का और गर्दन व कान का मसा करें
  • पैर के पंजों को टखनों समेत अच्छी तरह धोएं

गुस्ल नहीं रहता

कुछ बातों से गुस्ल नहीं रहता (टूट जाता है)। जैसे- जिस्म में सिक्के के बराबर गंदगी (नजासत) लगने, मनी निकलने, शहवत/सोहबत, हैज व निफास वगैरह से।

वजू नहीं रहता

कुछ बातों से वजू नहीं रहता (टूट जाता है) और फिर से वजू बनाना ज़रूरी हो जाता है। वो बातें जिससे गुस्ल टूट जाता है, उससे वजू भी टूट जाता है।

कुछ बातें ऐसी हैं जिससे वजू तो टूट जाता है लेकिन गुस्ल नहीं टूटता। जैसे- हवा खारिज होने से, पेशाब या गंदे पानी के छिंटे से, खून या मवाद निकलने से, उल्टी होने से, चीत या पट लेटने से, नशा चढ़ने से, बेहोश होने से वगैरह वगैरह।

वजू पर वजू करना अच्छी बात है। नए काम के लिए फिर से ताजा वजू करना अच्छा है।

Sufiyana 138

ह. अबुबक्र सिददीक़ रज़ी. और तसव्वुफ

और (ख़ुदाए) रहमान के ख़ास बन्दे तो वह हैं जो ज़मीन पर अख्लाक व इन्केसारी के साथ चलते हैं और जब जाहिल उनसे (जिहालत की) बात करते हैं तो वो उनको सलाम करते हैं।

(क़ुरान25:63)

हुजूरे अकरम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि

जो सूफियों की आवाज़ सुने और उनकी दुआ पर आमीन न कहे तो वो अल्लाह के नज़दीक ग़ाफ़िलों में शुमार होगा।

कशफुल महजुब में हज़रत दाता गंजबख्श अली हजवेरी रज़ी. फ़रमाते हैं कि अगर तुम सूफ़ी बनना चाहते हो तो जान लो कि सूफ़ी होना हज़रत अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. की सिफ़त है। सफ़ाए बातिन के लिए कुछ उसूल और फ़रोअ हैं। एक असल तो ये है दिल को ग़ैर-अल्लाह से खाली करे और फ़रोअ ये है कि मकरो फरेब से भरपूर दुनिया से दिल को खाली कर दे। ये दोनों सिफ़तें अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. की हैं। इसलिए आप तरीक़त के रहनुमाओं के इमाम हैं।

हुजूरे अकरम ﷺ के विसाल के बाद जब तमाम सहाबा बारगाहे मुअल्ला में दिल शिकस्ता होकर जमा हुए तो हज़रत उमर फारूक़ रज़ी. अपनी तलवार निकाल कर खड़े हो गये और फ़रमाने लगे कि जिसने भी ये कहा कि अल्लाह के रसूल ﷺ का इन्तेकाल हो गया है, मैं उसका सर कलम कर दूंगा। ऐसे वक्त में अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. तशरीफ लाए और बुलन्द आवाज़ में खुत्बा दिया कि – ”खबरदार,जो हुजूर ﷺ की परसतिश करता था, वो जान ले कि हुजूर ﷺ का विसाल हो चुका है और जो उनके रब की इबादत करता है तो वो आगाह हो कि वो ज़िन्दा है, उसे मौत नहीं है।”

फिर क़ुरान की आयत तिलावत फ़रमाई-

(फिर लड़ाई से जी क्यों चुराते हो) और मुहम्मद ﷺ तो सिर्फ रसूल हैं, उनसे पहले कई पैग़म्बर गुज़र चुके हैं। फिर क्या अगर मुहम्मद ﷺ का विसाल हो जाए या शहीद कर दिये जाएं तो तुम उलटे पॉव (कुफ्र की तरफ़) पलट जाओगे। और (ये जान लो कि) जो उलटे पांव फिरेगा तो हरगिज़ ख़ुदा का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा और जल्द ही ख़ुदा शुक्र करने वालों को अच्छा बदला देगा

(क़ुरान 3:144)

मतलब ये था कि अगर कोई ये समझे बैठा था कि हुजूर ﷺ मअबूद थे तो जान ले कि हुजूर ﷺ का विसाल हो चुका है और अगर वो हुजूर ﷺ के रब की इबादत करता था तो वो ज़िन्दा है हरग़िज़ उस पर मौत नहीं आनी है। हकीकत ये है कि जिसने हज़रत मुहम्मद ﷺ को बशरीयत की आंख से देखा (और आपको अपने जैसा आम इन्सान समझा) तो जब आप दुनिया से तशरीफ ले जाएंगे तो आपकी वो ताज़ीम जो उसके दिल में है जाती रहेगी और जिसने आप को हक़ीक़त की आंख से देखा तो उसके लिए आपका तशरीफ़ ले जाना व मौजूद रहना, दोनों बराबर है।

जिसने मख़लूक़ पर नज़र डाली वो हलाक हुआ और जिसने हक की तरफ रूजूअ किया वो मालिक हुआ।

जिसका दिल फ़ानी (नश्वर) से जुड़ा होता है, उसके मिटने से वो भी मिट जाता है। लेकिन जिसका दिल रब (ईश्वर) से जुड़ा होता है, वो नफ्स को मिटाकर अपने रब के साथ बाक़ी रह जाता है।

Sufiyana 136

रब के ख़ास बंदे (पार्ट 1)

रिजालुल्लाह

यहां हम ख़ुदा के उन खास बंदों के बारे में बात करेंगे जिन्हें रिजालुल्लाह या रिजालुल ग़ैब कहा जाता है। इन्हीं में से कुतूब अब्दाल होते हैं। 
वो न तो पहचाने जा सकते हैं और न ही उनके बारे में बयान किया जा सकता है, जबकि वो आम इन्सानों की शक्ल में ही रहते हैं और आम लोगों की तरह ही काम में मसरूफ़ रहते हैं।

इन्सानी मुआशरे (समाज) को एक बेहतर और अच्छी जिंदगी देने के लिए ख़ुदा के कुछ खास बंदे हर दौर में रहे हैं। उन्होंने हमेशा इन्सान की इस्लाह और फ़लाह के लिए काम किया। मौलाना रूमी रज़ी. फ़रमाते हैं कि खामोशी अल्लाह की आवाज़ है। इसी खामोशी से ये खास बंदे अपना काम करते हैं। ये कभी अपने काम से ग़ाफ़िल नहीं रहते। इनके हाथों कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचा। इन खास बंदों को रिजालुल्लाह या मर्दाने ख़ुदा या मर्दाने हक़ कहते हैं। इनके लिए क़ुरान में आया है-

वो मर्दाने ख़ुदा जिन्हें तिजारत और खरीद फरोख्त, यादे ख़ुदा से ग़ाफिल नहीं करती।

(क़ुरान:24:37)

इनका वजूद हज़रत आदम रज़ी. से लेकर हुजूर अकरम ﷺ तक और उनसे लेकर ताकयामत रहेगा। कायनात का क़याम व निज़ाम का दारोमदार इन्हीं मर्दाने ख़ुदा पर है। रब और बंदे के दर्मियान का रिश्ता इन्हीं की तालिमात व हिदायत पर क़ायम है। इन्हीं की बरकत से बारिश होती है, पेड़ पौधे हरे होते हैं। कायनात के किस्म किस्म के जीवों की जिंदगी इन्हीं की निगाहे करम की एहसानमंद है। शहरी व गांव की जिंदगी, बादशाहों का जीतना हारना, सुलह व लड़ाइयां, अमीरी व ग़रीबी के हालात, अच्छाइयां व बुराईयां, गरज़ कि अल्लाह की दी हुई करोड़ों ताकतों का मुज़ाहेरा इन्हीं के इख्तियार में है। अल्लाह अपने ग़ैबुल ग़ैब से इनको नूर अता करता है, जिससे ये लोगों की इस्लाह करते रहते हैं।

ये आम लोगों में भी रहते हैं, आम जिंदगी जीते हैं, खाना खाते हैं, चलते फिरते बोलते हैं, बीमार होते हैं, इलाज कराते हैं, शादी करते हैं, रिश्तेदारी निभाते हैं, लेन देन करते हैं, हत्ता कि जिंदगी के सारे जायज़ काम में हिस्सा लेते हैं। ये न पहचाने जा सकते हैं न ही उनकी ताकत बयान की जा सकती है, जबकि ये आम लोगों के दर्मियान होते हैं। लेकिन जब लोग दुनियादारी में डूबे रहते हैं तो ये ख़ुदा की याद में मश्गूल रहते हैं। और ख़ुदा के हुक्म से हर काम को अन्जाम देते हैं। लोग इनको बुरी नीयत से या हसद से नुकसान पहुचाने की कोशिश करते हैं तो ये अपने विलायत की ताकत से बच जाते हैं। इनकी खासियत लोगों से छिपी हुई होती है। इनमें से कोई पहाड़ों विरानों पर रहता है तो कोई आबादी में रहते हैं।

चन्द लम्हों में ये दूसरे देश तक का सफ़र तय कर सकते हैं। पानी पर चल सकते हैं। जब चाहें तब गायब हो सकते हैं। जिसकी चाहें सूरत इख्तियार कर सकते हैं। ग़ैब की ख़बर रखते हैं। छोटी सी जगह में हज़ारों की तादाद में इकट्ठा हो सकते हैं। महफ़िले सिमा में रक्स करते हैं और किसी को नज़र नहीं आते। रोते हैं गिरयावोजारी करते हैं लेकिन किसी को सुनाई नहीं देता। पत्थर को सोना बना सकते हैं।

इनके पास ख़ुदा की दी हुई असीम ताकत होती है लेकिन ये खुद के लिए इस्तेमाल नहीं करते। जैसा अल्लाह का हुक्म होता है वैसा करते हैं। लोगों की परेशानियां दूर करते हैं। लोगों की मदद करते हैं।

रिजालुल्लाह अपने वक्त के नबी के उम्मती होते हैं और उन्हीं का कलमा पढ़ते हैं। इन्हीं के बारे में हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि- मेरे वली मेरे क़बा के नीचे होते हैं और मेरे अलावा उन्हें कोई नहीं पहचानता। यानी आम लोगों इनको नहीं जानते।

दुनिया के सारे रिजालुल्लाह साल में दो बार आपस में मुलाकात करते हैं, एक बार आराफात के मैदान में और दुसरी बार रजब के महिने में किसी ऐसी जगह जहां रब का हुक्म होता है।

अल्लाह ने दुनिया को इन खास औलिया के क़ब्ज़े में दे दिया है, यहां तक कि ये तन्हा रब के काम के लिए वक्फ़ हो गए हैं।

मख्दुम अशरफ सिमनानी रज़ी. फ़रमाते हैं- अल्लाह ने कुछ औलिया को बाक़ी का सरदार बनाया है और मख्लूक की इस्लाह व हाजत रवाई का काम इनके सुपुर्द किया है। ये हज़रात अपने काम को करते हैं, इसके लिए एक दुसरे की मदद भी लेते हैं। ये रब के काम से कभी ग़ाफ़िल नहीं होते।

इनके बारह ओहदे (या क़िस्में) होते हैं-

1.कुतुब, 2.ग़ौस, 3.अमामा, 4.अवताद, 5.अब्दाल, 6.अख्यार, 7.अबरार, 8.नक़बा, 9.नजबा, 10.उमदा, 11.मक्तूमान, 12.मफ़रदान।

…जारी है पार्ट 2 में…

Sufiyana 134

महफिल ए समा – 1

क़ालल अशरफ़:

अस्सिमाअ तवाजिद उस सूफिया फि तफहिमुल मआनी अल्लज़ी यतसव्वूर मन अला सवात अल मुख्तलेफ़ा

हज़रत सैय्यद मख्दूम अशरफ़ सिमनानी रज़‍िअल्‍लाह अन्‍हो, ‘लताएफ अशरफ़ी’ में फ़रमाते हैं कि मुख्तलिफ़ आवाज़ों को सुनकर फ़हम में जो मअानी पैदा होती हैं, उनके असर से सूफ़ियों का वज्द करना सिमा है।

सुल्तानुल मशाएख़ फ़रमाते हैं कि जब तक ये इल्म न हो जाए कि सिमा क्या है और सुनने वाला कौन है, तब तक सिमा न हराम है न हलाल है।

सिमा इ बिरादर बगोयम के चिस्त

अगर उसतमा रा बदानम के किस्त

मैं इसी वक्त बता सकता हूं कि सिमा क्या है जबकि मुझे ये मालूम हो जाए कि सुननेवाला कौन है।

आगे फ़रमाते हैं कि जिस मसले में हिल्लत व हुरमत मुख्तलिफ़ फ़िया हो उसमें दिलेराना और बेबाकाना गुफ्तगू नहीं करना चाहिए, बल्कि ग़ौरो तातिल के बाद इस सिलसिले में बात करना चाहिए। ऐसे ही मुख्तलिफ़ फ़िया मसला है, महफ़िले सिमा। इसको न तो मुतलक़न हराम कहा जा सकता है और न बग़ैर क़ैद के हलाल कहा जा सकता है।

सिमा, ख़ुदा के छिपे हुए भेदों में एक भेद है और उसके नूर में से एक नूर है। वही खुशनसीब व नेक है, जिसका दिल सिमा का आफ़ताब बन जाए यानी सिमा का हक़ीक़ी ज़ौक़ व शौक़ हो।

इश्क़ दर परदा मी नवाज़द साज

आशिक़ी को के बशनूद आवाज़

हमा आलम सदाए नग़मए उस्त

के शनेद इब्न चुनैन सदाए दराज़

इश्क़ ने दरपरदा साज़ छेड़ रखा है, वो आशिक़ कहां है जो इस आवाज़ को सुनें। ये तमाम कायनात इसी नग़मए ‘कुन’ की आवाज़ है, किसी ने इतनी लंबी तान कभी सुनी है।

तालिब और इसके राज़ को जानने वाले आलिम को चाहिए कि सिमा की तरफ तवज्जो करें। सिमा की तारिफ़ बुजुर्गाने दीन ने इस तरह की है – ”बेशक सिमा एक अमरे मख्फ़ी, एक नूरे जली और सिर्रुन अलियुन है। इस राज़ से वही आगाह हो सकते हैं, जो अहले तहक़ीक़ हैं और इल्म में मज़बूत हैं और अल्लाहवाले हैं। साहिबाने मारेफत हैं, हक़ से जुड़े हुए हैं और ख़ुदा के साथ हैं। जिनके लिए इब्तेदा में ज़ौक़ है और इन्तहा में शुरब है।”

मतरब बराह परदा दरासाजे उदरा

दर दा बगोश होश दर्दो सरूद रा

अज़ नग़मए सरूद के गोयन्द फ़ैज़ उस्त

दरपर्दाए सिमा दरआवर हसूद रा

ऐ मतरब साज़े ओर को परदा के रास्ते से अन्दर ले आ और दर्दो सोज़ की मौसिक़ी को गोशए होश से सुन। नग़माए मौसिक़ी को इसका फ़ैज़ कहते हैं, सिमा के परदे में इसे हासिदीन ले आए हैं।

और कुछ लोग वो हैं जो सिमा से मअज़ दिल कर दिए गए हैं। ”वो सुनने की जगह से दूर कर दिए गए हैं” (क़ुरान 26:212)। अगर अल्लाह उनमें खूबी पाता तो उन को ज़रूर सुनाता अगर उनको सुनवा भी दिया जाता, तब भी वो पीठ फेर लेते। ये वही लोग हैं जो ‘अरबाबे सिमा’ के मुन्किर हैं, इनमें कुछ तो सिमा को फासिक़ कहते हैं और कुछ कुफ्र का फतवा भी लगा देते हैं, और कुछ लोग इन्हें बिदअती भी कहते हैं। बहरहाल उनके दर्मियान असहाबे सिमा पर फतवों और इल्ज़ामात पर एक राय नहीं है।

ख्वाह खलक़ी गबरख्वान वख्वाह तरसा ख्वाहमुग़

सज्दागाहे क़िब्लए अब्रो बतो नतवान गुज़ाश्त

अज़ हमा दरबगुज़रम नगज़ारमश मारा बाव

अज़ जहान बतवान गुज़शतन रूई तू नतवान गुज़ाश्त

लोग मुझे गबर बहे ख्वाह तरसा ख्वाह मुग़ कहे, कुछ भी कहे, मैं तेरे क़िब्ल ए अबरू को, जो मेरी सज्दागाह है, नहीं छोड़ सकता। मैं सब को छोड़ दूंगा और सब से मुंह फेर लूंगा। दुनिया को भी तर्क कर दूंगा, लेकिन तुझे नहीं छोड़ सकता।

सिमा के बारे में आसारे पाक और अक़वाले सहीहिया ये हैं कि सिमा नफ्सुल अम्र में मुबाह है। सिमा की तारीफ ये है कि

अस्सिमा सूत तय्येबा मौज़ून मफहूमुलमअनी महरकुल कुलूब

सिमा ऐसी पाकीज़ा और मौजून आवाज़ को कहते हैं जिसको समझा जा सके और दिलों को हरकत में लाने वाली हो।

पस इसके अन्दर कोई वजहए हुरमत नहीं है। ‘हराम’ वो चीज़ है जिसका तर्क दलील क़तई से साबित हो चुका हो और जिसके सबूते तर्क में कोई शको शुब्ह न हो और हमने सिमा की जो तारीफ बयान की है उस में कोई ऐसी चीज़ नहीं है। जो लोग दरवेशों की बज्मे सिमा के मुन्किर हैं और महफिले सिमा से इन्कार करते हैं उनके लिए ये रूबाई

दुनिया तलब जहान बकामत बादा

दाइन जेफए मुरदार ब दामत बादा

गुफ्ती के ब नज्द मन हराम अस्त सिमा

गर बर तू हराम अस्त हरामत बादा

ऐ दुनिया के तालिब, दुनिया तुझे मुबारक हो, ये तो मुरदार है, ये मुरदार तेरे दाम ही में रहे। अच्छा है तू कहता है कि सिमा मेरे लिए हराम है।

अगर महफिले समा तुझ पर हराम है तो हराम ही रहे।

Sufiyana 133

किरपा करो सरकार…

मैं मली, तन मेरा मैला, किरपा करो सरकार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

सरपे उठाकर पाप की गठरी, आई हूं तुम्हरे द्वार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

मेरे खिवइया बीच भंवर में, कश्ती डूब न जाए।

तेरा हूं, तू मेरी खबर ले, कौन लगाए पार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

मुझ मंगते की बात ही क्या है, वो हैं बड़े लजपाल।

उनकी किरपा और दया से, पलता है सब संसार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

उनकी अता के गुन गाओ, उनसे ही फरियाद करो।

सबसे बड़े दाता हैं वो, सबसे बड़ी सरकार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

उनकी याद ईमान बना लो, ख़ुद को ही क़ुरान बना लो।

उनकी याद से मिट जाते हैं, सारे ही आज़ार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

उसके लिए तो सरमाया है, प्यारे मदिने वाले का।

सोचें समझें कहने वाले, ‘खालिद’ को नादार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

आज़ार=बीमार, सरमाया=असल दौलत, नादार=ग़रीब

 

 

Sufiyana 131

मुरीद का मतलब क्‍या?

मीम मुर्शिद से मिला, हमको मुहब्बत का सबक़,

रे से राहत मिली, और रहे हमारे मुतलक,

शीन से शिर्क़ हुआ दूर दिल से,

दाल से दस्त मिला और मिला दिल दिल से।

हज़रत मुहम्मद ﷺ को देखकर जो ईमान लाए उसे सहाबी कहते हैं। सहाबी के मायने होते हैं ”शरफे सहाबियत” यानि सोहबत हासिल करना। जो हुजूर ﷺ की सोहबत में रहे वो सहाबी हुए। आलातरीन निसबत के एतबार से सहाबी अपने आप में अकेले हैं जिन्हें हुजूर ﷺ की कुरबत नसीब हुई, यहां ग़ैर की समाई नहीं। तसव्वुफ़ में सूफ़ीयों ने इसी इरादत को ‘मुरीदी’ का नाम दिया है। मुरीदी का मफ़हूम भी यही है कि जिस मुर्शिद कामिल से लगाव व ताल्लुक़ पैदा हो जाए और सच्चे दिल से उनकी तरफ़ माएल हो जाए तो उनकी ख़िदमत में आख़िरत सवांरने के लिए इताअत व नियाजमंदी के साथ फ़रमाबरदार हो जाए। ये हुक्मे ख़ुदा की ऐन तामील है-

ऐ ईमानवालों ख़ुदा से डरो और सच्चों के साथ रहा करो।

(कुरआन-9.सूरे तौबा-119)

इस आयात में तीन बातें कही गयी हैं एक ईमान-बिल्लाह, दुसरा तकवा-अल्लाह और तीसरा सोहबत-औलियाअल्लाह। सबसे पहले ईमान के बारे में कहा गया है कि ईमान को अव्वलियत हासिल है। फिर तकवा के बारे में कहा गया है। तकवा की जामे तारीफ में सूफ़ियों ने कहा कि- ‘ख़ुदा तुझे उस जगह न देखे जहां जाने से तूझे रोका है और उस जगह से कभी गैर हाजिर न पाए जहां जाने का हुक्म दिया है।’ फिर कहा गया कि सिर्फ हुसूले ईमान और वसूले तक़वा व तहारत ही काफी नहीं है बल्कि इसके बाद भी एक मरतबा है जिसे एहसान की तकमील कहते हैं, जो शैख़ की सोहबत से हासिल होता है।

यहां सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात ये है कि अल्लाह ईमानवालों से बात कर रहा है। ये नहीं फ़रमा रहा कि सच्चों के साथ हो जाओ और ईमान ले आओ, बल्कि ये फ़रमा रहा है कि ईमान लाने के बाद भी अल्लाह से डरना और सच्चों की सोहबत ज़रूरी है।

हाजी इमदादुल्ला शाह महाजर मक्की रज़ी. और इमाम ग़ज़ाली रज़ी. फ़रमाते हैं कि हुजूर ﷺ फ़रमाते हैं- शैख़ अपने हल्कए मुरीदैन में इस तरह होता है, जिस तरह नबी अपनी उम्मत में होता है। (तसफिया-तुल-कुलूब:4) (इहयाउल उलूम)

हज़रत अबुतालिब मक्की रज़ी. फ़रमाते हैं कि बुजुरगाने दीन ने फ़रमाया – ‘जो नबी के साथ बैठना चाहे उसे चाहिए अहले तसव्वुफ़ की मजलिस व सोहबत इख्तियार करे। जिस तरह वहां नबी की सोहबत ज़रूरी है यहां भी इस के लिए शेख़ का होना ज़रूरी है। अगर शैखे कामिल की नज़र में हो और हर अमल फ़रमान के मुताबिक करे और अपने तमाम इख्तियार व इरादों को अपने शेख़ के दस्ते इख्तियार में दे दे तो बहुत जल्द मंजिले मकसूद व मकबूलियत हासिल होगी।’ (कुतुल कुलूब)

ग़ौसे आज़म अब्दुल क़ादिर जिलानी रज़ी. फ़रमाते हैं- ‘बेशक हक़ीक़त यही है कि अल्लाह की आदते जारिया है कि ज़मीन पर शैख़ भी हो और मुरीद भी, हाकिम भी हो और महकूम भी, ताबेअ भी हो और मतबूअ भी (इन्सान इस बात पर पुख्ता यक़ीन रखे) कि ये सिलसिला आदम अलैहिस्सलाम से क़यामत तक के लिए है’। (गुनियातुत तालेबीन:840)

शाह वलीउल्लाह मोहद्दिस देहलवी रज़ी. फ़रमाते हैं- ‘ज़ाहिरी तौर पर बिना मां-बाप के बच्चा नहीं हो सकता, ठीक उसी तरह बातिनी में बिना पीर के अल्लाह की राह मुश्किल है।’ और फ़रमाते हैं – ‘जिसका कोई पीर नहीं उसका पीर, शैतान है।‘  (अलइन्तेबाह:33)

‘हर मुरीद ये यकीन रखे कि बेशक तुम्हारा पीरे कामिल ही वो है जो अल्लाह से मिलाता है। तुम्हारा ताल्लुक अपने ही पीर के साथ पक्का हो, किसी दुसरे की तरफ न हो।’

शैख़ अब्दुल हक़ मोहद्दिस देहलवी रज़ी. फ़रमाते हैं-‘अपने पीर से मदद मांगना, हजरत मुहम्मद ﷺ से मदद मांगना है, क्योंकि ये उनके नाएब और जानशीन हैं। इस अक़ीदे को पूरे यक़ीन से अपने पल्लु बांध लो।’

हक़ीक़ी निजात के लिए अपने इबादत व मुजाहिदे से पहले मुर्शिद ज़रूरी है और सुननत-अल्लाह भी इसी तर्ज़ पर जारी है। इसी रहबरी में कामयाबी है।

 

क़ुरान में बैअत की अहमियत

बैअत की अहमियत के बारे में क़ुरान में है-

‘ऐ ईमानवालों! तुम अल्लाह से डरते रहो और उस तक पहुंचने का वसीला तलाश करो और उसकी राह में जिहाद करो ताकि तुम फलाहो कामयाब हो जाओ’ (क़ुरान-5:35)

इस आयत में पूरा तसव्वुफ़ ही सिमट आया है, यहां फलाहो कामयाबी के लिए चार बातें कही गयी हैं-

ईमान–  जुबान से इकरार करना और दिल से तस्दीक़ करना कि अल्लाह एक है और हुजूर ﷺ अल्लाह के रसूल हैं।

तक़वा–  अल्लाह ने जिस काम का हुक्म दिया उसे करना और जिस से मना किया है उस से परहेज़ करना।

वसीला–  अल्लाह के नेक बंदों की सोहबत इख्तियार करना और उनसे रहबरी हासिल करना।

जिहाद–  अपने नफ्स और अना (मैं) को अल्लाह की राह में मिटा देना।

Sufiyana 128

हज़रत राबिया बसरी

हज़रत राबिया बसरी रज़ी. ख़ुदा की खास बंदी, पर्दानशीनों में मख्दूमा, ईश्क़ में डूबी हुई, इबादत गुज़ार, वो पाक़िज़ा औरत हैं जिन्हें आलमे सूफ़िया में ”दूसरी मरयम” कहा गया।

यहां छोटे बड़े का कोई फ़र्क नहीं, यहां मर्द व ज़न (औरत) का कोई फ़र्क नहीं, क्योंकि अल्लाह सूरत नहीं देखता, वो तो दिल देखता है और जब आख़िरत में हिसाब होगा तो नियत को देखकर होगा। लिहाजा जो औरत इबादत व रियाज़त में मर्दों के मुकाबिल हो तो उसे मर्दों की सफ़ में ही शुमार किया जाए क्योंकि रोज़े महशर जब मर्दों को पुकारा जाएगा तो सबसे पहले हज़रत मरयम रज़ी. आगे बढ़ेंगी।

विलादत

जिस रात हज़रत राबिया बसरी रज़ी. पैदा होने वाली थीं तो घर में इतना तेल भी न था कि नाफ की मालिश की जाए या चिराग़ जलाया जाए और इतना कपड़ा भी न था कि आपको लपेटा जा सके। आपका नाम राबिया (चौथी) रखा गया क्योंकि आप तीन बहनों के बाद पैदा हुईं थीं। आपके वालिद (अब्बा) का ये हाल था कि ख़ुदा के अलावा किसी से कुछ नहीं मांगते यहां तक कि पड़ोसियों से भी कुछ न लेते। इसी परेशानी के आलम में पैगम्बर मुहम्मद ﷺ ने ख्वाब में बशारत दी और तसल्ली देते हुए फ़रमाया कि ये लड़की बहुत मक़बूलियत हासिल करेगी और इसकी शफ़ाअत से हज़ारों लोग बख्श दिए जाएंगे। आगे हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि इस शहर (बसरा) के हाकिम के पास जाओ और कहो कि वो हर रोज़ 100 मरतबा और जुमा को 400 मरतबा मुझ पर दरूद भेजता है, लेकिन आज भेजना भूल गया। तो इसी की कफ्फ़ारे के तौर पर तुम्हें 400 दीनार दे दे। ये जानकर हाकिम ने इस बशारत पर बतौर शुक़राना 1000 दीनार फ़क़ीरों में तक़सीम करा दिए और हज़रत राबिया रज़ी. के वालिद को 400 दिनार दिए और ताज़ीमन ख़ुद आकर कहा किसी भी ज़रूरत पर याद किजिए। इस तरह आपकी विलादत की तमाम ज़रूरतें पूरी की गई।

आपने जब होश संभाला तो वालिद का साया सर से उठ गया और बहनें भी जुदा हो गयीं। एक जालिम ने आपको जबरन कनीज़ बना लिया और कम दाम में आपको बेच भी दिया। वहां आपसे बहुत ज्यादा काम लिया जाता। एक बार नामहरम को सामने देखकर गिर गईं, जिससे आपका हाथ टूट गया। आपने ख़ुदा की बारगाह में सर-ब-सुजूद होकर अर्ज़ किया कि या अल्लाह! बेमददगार पहले से ही थी, अब लाचार भी हो गई। इसके बावजूद तेरी रज़ा चाहती हूं। इस पर ग़ैब से आवाज़ आई ‘ऐ राबिया! ग़म न कर। कल तुझे वो मरतबा हासिल होगा जिस पर फ़रिश्ते भी रश्क करेंगे।’ ये सुन कर आप बहुत खुश हुईं।

आपका मामूल था कि दिन में रोज़ा रखतीं और रात भर इबादत करतीं। एक रात आपके मालिक की नींद खुली तो क्या देखता है कि आप इबादत में मश्गूल हैं और ख़ुदा से अर्ज़ कर रहीं है ‘या ख़ुदा, मैं हर वक्त तेरी इबादत करना चाहती हूं लेकिन तूने मुझे किसी की कनीज़ बनाया है इसलिए दिन को तेरी बारगाह में हाज़िर नहीं हो पाती।’ ये सुनकर मालिक परेशान हो गया और सोचने लगा इससे ख़िदमत लेने के बजाय मुझे इसकी ख़िदमत करनी चाहिए। अगले दिन उसने आपसे कहा ‘आप आज से आज़ाद हैं, आप चाहें तो यहीं रहें या कहीं और जाएं’। इसके बाद आप दिन रात ख़ुदा की इबादत में ही मशगूल रहने लगीं और कभी कभी हज़रत हसन बसरी रज़ी. (जो उस वक्त के बहुत बड़े सूफ़ी थे।) की महफिल में भी शिरकत करतीं।

सफरे हज

एक बार आप हज करने गईं। काबे में पहुंच कर आपने ख़ुदा से दर्याफ्त किया मैं खाक से बनी हूं और काबा पत्थर का। मैं बिला वास्ते तुझसे मिलना चाहती हूं। इस पर निदा आई ‘ऐ राबिया! क्या तू दुनिया के निज़ाम को बदलना चाहती है? क्या इस जहां में रहने वालों के खून अपने सर लेना चाहती है? क्या तूझे मालूम नहीं जब मूसा रज़ी. ने दीदार की ख्वाहिश की तो एक तजल्ली को तूर का पहाड़ बर्दाश्त नहीं कर पाया?’

काफी अर्से बाद आप जब दोबारा हज करने गयीं तो देखा कि काबा ख़ुद आपके दीदार को चला आ रहा है। आपने फ़रमाया मुझे हुस्ने काबा से ज्यादा, जमाले ख़ुदावन्दी की तमन्ना है। हज़रत इब्राहीम अदहम रज़ी. जगह जगह नमाज अदा करते हुए पूरे 14 साल में जब हज करने मक्का पहुंचे तो देखते हैं कि काबा गायब है। ख़ुदा की बारगाह में गिरयावोज़ारी करने लगे इन आंखों से क्या गुनाह हो गया है। तब निदा आई वो किसी ज़ईफ़ा के इस्तेकबाल के लिए गया है। कुछ देर बाद काबा अपनी जगह पर था और एक बुढ़िया लाठी टेकते हुए चली आ रही है। हज़रत अदहम रज़ी. ने कहा ये निज़ाम के ख़िलाफ़ काम क्यूं कर रही हो? तब हज़रत राबिया रज़ी. फ़रमाती हैं तुम नमाज़ पढ़ते पढ़ते यहां पहुंचे हो और मैं इज्ज़ इंकिसारी के साथ यहां पहुंची हूँ।

यक़ीन

दो भूखे लोग हज़रत राबिया रज़ी. से मुलाकात करने हाज़िर हुए और दौराने गुफ्तगू खाने की इच्छा जाहिर की। आपके पास दो रोटियां थीं लेकिन तभी एक भीखारी मांगता हुआ पहुंचा तो आपने दोनों रोटियां उसे दे दी। अब आप लोगों के लिए कुछ न था।

थोड़ी देर ही गुजरा था कि एक कनीज़ आपकी ख़िदमत में कुछ रोटियां लेकर हाजिर हुईं। आपने उन रोटियों को गिना तो वो 18 थीं, आपने वापस कर दीं। कनीज़ के बहुत मनाने पर भी आप नहीं मानी। कुछ देर बाद वो कनीज फिर आई और इस बार 20 रोटियां लेकर। आपने कुबूल कर लीं और उन दोनों के सामने रख दीं।

ये सब देखकर उनमें से एक ने आपसे पूछा ये सब क्या माजरा है। तो आपने बताया कि मेरे पास दो ही रोटी थी जो आपको देना चाहती थी, लेकिन तभी भिखारी आ गया। मैंने ख़ुदा से दर्याफ्त किया कि ‘या ख़ुदा! तेरा वादा है कि तू एक के बदले 10 देता है।’ फिर मैने दो रोटियां उस भिखारी को दे दी। अब रब के वादे के मुताबिक मुझे 20 रोटियां मिलनी चाहिए, तो कम क्यूं लूं? मुझे अपने रब पर और उसके वादे पर पूरा यक़ीन है।

चादरवाली

एक बार आप इबादत करते करते सो गईं, तभी एक चोर आया आपकी चादर लेकर भागने लगा। लेकिन उसे बाहर जाने का रास्ता नज़र नहीं आया। वो चादर रखकर जैसे ही पलटा, रास्ता दिखने लगा। उसने फिर चादर उठा ली, लेकिन फिर क्या। रास्ता गायब हो गया। उसने कई बार ऐसा किया और हर बार ऐसा ही हुआ। ग़ैब से आवाज़ आई- ‘तू ख़ुद पर आफ़त क्यों ला रहा है? इस चादरवाली (राबिया रज़ी.) ने ख़ुद को ख़ुदा के हवाले कर दिया है। इसके पास शैतान भी नहीं फटकता तो किसी और की क्या मजाल जो इसे नुकसान पहुंचा सके? एक दोस्त सो रहा है लेकिन दूसरा तो जाग रहा है।’

हवा पर मुसल्ला

हज़रत हसन बसरी रज़ी. दरिया में मुसल्ला बिछाकर कहा आइए यहां नमाज अदा कीजिए। आपने कहा- क्या ये लोगों के दिखाने के लिए है। अगर नहीं तो फिर इसकी क्या ज़रूरत है। आपने हवा पर इतने उपर मुसल्ला बिछाया कि किसी को न दिख सके और फ़रमाया आईए यहां इबादत करते हैं। फिर आपने फ़रमाया पानी में इबादत एक मछली भी कर सकती है और हवा में एक मक्खी भी नमाज़ पढ़ सकती है। इसका हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं।

एक मजलिस में आपने फ़रमाया कि जो हज़रत मुहम्मद ﷺ को सच्चे दिल से मानता है उसे उनके मोजज़ात में से कुछ हिस्सा ज़रूर मिलता है। ये अलग बात है कि नबीयों के मोजज़ा को वलियों के लिए करामत कहते हैं।

निकाह

आपसे पूछा गया कि क्या आपको निकाह की ख्वाहिश नहीं होती। तो आपने फ़रमाया कि निकाह का ताल्लूक तो जिस्म व वजूद से है, जिसका वजूद ही रब में गुम हो गया हो उसे निकाह की क्या हाजत।

मारफ़त

मारफ़त तवज्जह का नाम है और आरिफ़ की पहचान यह है कि वो ख़ुदा से पाकीज़ा दिल तलब करे। जब दिया जाए तो फौरन ख़ुदा के हवाले कर दे ताकि बुराईयों से बचा रहे।

अपने रब को खुश करने के लिए मेहनत के वक्त ऌस तरह शुक्र अदा करो जिस तरह नेअमत के वक्त करते हो। तौबा की दौलत भी रब की मर्जी से ही मिलती है वरना लोग तो अपने गुनाहों पर फ़ख्र करते हैं। अपनी बुराईयों से, गुनाहों से इस तरह तौबा की जाए फिर से तौबा करने की ज़रूरत न पड़े।

आप अक्सर मरीज़ों की तरह सूरत बनाकर इबादत में गिड़गिड़ाती रोती। किसी ने पूछा तो आपने फ़रमाया कि मेरे सीने में ‘ख़ुदा का दर्द’ छिपा है। जिसका इलाज किसी हकीम के पास नहीं और न ही तुम्हें वो दिख सकता है। इसका इलाज सिर्फ ‘रब से मिलना’ ही है।

 

ख़ुदा की बंदगी

एक रोज़ एक मजलिस में ‘ख़ुदा की बंदगी’ यानि इबादत के बारे में बातचीत हो रही थी। आप भी उसमें मौजूद थीं। एक ने कहा कि मैं इबादत इसलिए करता हूं कि जहन्नम से महफूज़ रहूं। एक ने कहा इबादत करने से मुझे जन्नत में आला मकाम हासिल होगा। तब आपने फ़रमाया कि अगर मैं जहन्नम के डर से इबादत करू तो ख़ुदा मुझे उसी जहन्नम में डाल दे और अगर जन्नत के लालच में इबादत करूं तो ख़ुदा मुझ पर जन्नत हराम कर दे। ऐसी इबादत भी कोई इबादत है। ख़ुदा की बंदगी तो हम पर ऐन फ़र्ज़ है, हमें तो हर हाल में करना है, चाहे उसका हमें सिला मिले या न मिले। अगर ख़ुदा जन्नत या दोज़ख़ नहीं बनाता तो क्या हम उसकी बंदगी नहीं करते। उसकी बंदगी बिना मतलब के करनी चाहिए।

आज़माईश

किसी ने आज़माईश के लिए पूछा कि ऐसा क्यूं कि नबूव्वत सिर्फ़ मर्दों को ही मिली फिर भी औरतों को ख़ुद पर नाज़ क्यूं। आपने जवाब में कहा- क्या किसी औरत ने कभी ख़ुदाई का दावा किया है। नहीं किया। अल्लाह की मर्ज़ी जिसे चाहे नबूव्वत दे न दे। हम कौन होते हैं उसके ख़िलाफ़ जाने वाले। हमें ख़ुद पर नहीं ख़ुदा की बंदगी पर नाज़ है।

एक शख्स आपसे दुनिया की बहुत शिकायत करने लगा तो अपने फ़रमाया लगता है तुम्हें उसी दुनिया से बहुत लगाव है। तुम जब से आए हो उसी दुनिया का ज़िक्र कर रहे हो। जिससे बहुत ज्यादा मुहब्बत होती है, इन्सान उसी का ज़िक्र करता रहता है। अगर नफ़रत है तो उसकी बात ही मत करो।

विसाल

विसाल के वक्त आपने हाजिर लोगों से कहा यहां से चले जाएं फरिश्तों के आने का वक्त हो गया है। सब बाहर चले गए। फरिश्ते आए, आपसे दरयाफ्त किया ऐ मुतमईन नफ्स! अपने मौला की जानिब लौट चल। इस तरह आपका विसाल हुआ। आपने न किसी से कभी कुछ मांगा और न ही अपने रब से ही कुछ तलब किया और अनोखी शान के साथ दुनिया से रूख्सत हुईं।

Sufiyana 126

चार तरकी ताज

 

यहां हम ख्वाजा ए चिश्तिया के मल्फूज़ात से फ़ैज़ हासिल करेंगे। मल्फूज़ात, सूफ़ीयों की ज़िंदगी के उस वक्त क़े हालात और तालिमात का ख़जाना होता है। जिसे कोई ऐसे मुरीद ही लिख सकते है, जो ज्यादा से ज्यादा पीर की सोहबत से फ़ैज़याब हुए हो। इस बार हम हज़रत ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया रज़ी. के मल्फूज़ात ''अफ़ज़ल उल फ़वाएद'' (यानी ''राहत उल मुहिब्बिन'') में से कुछ हिस्सा नकल कर रहे हैं जिसे उनके मुरीद हज़रत अमीर खुसरो रज़ी. ने लिखा है।

बतारीख़ 24 माह ज़िलहिज्जा 713 हिजरी, इस बन्दए नाचीज़ खुसरो वल्द हुसैन को हज़रत निज़ामुद्दीन महबूबे इलाही रज़ी. की क़दमबोसी का शरफ़ हासिल हुआ। जिस रोज़ मैं उनकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ तो मेरे दिल में ये नियत थी कि पहले मैं आपकी बारगाह में बैठ जाउंगा और अगर आप मुझे ख़ुद बुलाएंगे तो ही मैं बैअत होउंगा। मैंने ऐसा ही किया, आस्ताने पर जा कर बैठ गया। थोड़ी ही देर में आपके एक खादिम बशीर मियां ने आकर सलाम किया और फ़रमाया कि हुजूर आपको याद फ़रमा रहे हैं, उन्होंने कहा कि बाहर एक तुर्क बैठा है, जाओ उसे बुला लाओ। मैं फौरन आपकी खि़दमत में हाजिर होकर सर ज़मीन पर रख दिया। आपने कहा सर उठाओ, अच्छे मौके पर आए हो, खुश आए हो। फिर निहायत इनायत व शफ़क़त से मेरे हाल पर दुआ फ़रमाई और मुझे शरफ़े बैअत अता फ़रमाई। ”खास बारानी” और चारतरकीताज इनायत फ़रमाई।

फिर पीर की खि़दमत में मुरीद होने के बारे में गुफ्तगू शुरू हुई। हज़रत निज़ामुद्दीन रज़ी. ने फ़रमाया कि जिस रोज़ मैं बाबा फ़रीद गंजशकर रज़ी. का मुरीद हुआ तो आपने फ़रमाया कि ऐ मौलाना निज़ामुद्दीन! मैं किसी और को विलायत ए हिन्दुस्तान का सज्जादा देना चाहता था लेकिन ग़ैब से आवाज़ आई कि ये नेअमत हमने निजामुद्दीन बदायूंनी के लिए रखी है, ये उसी को मिलेगी।

फिर निहायत रहमत व शफ़क़त मेरे हाल पर फ़रमाई और चारतरकीताज मेरे सर पर रखी और ये हिकायत बयान फ़रमाई – इस ताज के चार खाने होते हैं, पहला शरीअत का, दूसरा तरीक़त का, तीसरा मारेफ़त का और चौथा हक़ीक़त का। पस जो इनमें इस्तेकामत से काम ले उसके सर पर इस ताज का रखना वाजिब है।

आप ये बयान फ़रमा ही रहे थे कि मौलाना शम्सूद्दीन यहया, मौलाना बुरहानुद्दीन ग़रीब और मौलाना फ़खरूद्दीन कदमबोस हुए। हुजूर आगे फ़रमाते हुए कहते हैं कि एक टोपी एकतरकी, दूसरी टोपी दोतरकी, तीसरी टोपी तीनतरकी और चौथी टोपी चारतरकी।

फिर ताज के असल में फ़रमाते हैं कि मैंने अपने पीरो मुर्शिद से सुना है कि ख्वाजा अबुल लैस समरकन्दी रज़ी. की किताब में हज़रत हसन बसरी रज़ी. की रवायत लिखी है कि एक रोज़ पैगम्बरे ख़ुदा हज़रत मुहम्मद ﷺ बैठे थे और आसपास सहाबी बैठे थे कि तभी हज़रत जिबरईल रज़ी. चार ताज लेकर तशरीफ लाए और फ़रमाया कि ख़ुदा का हुक्म है कि ये चार ताज जन्नती हैं, इनको आप अपने सर पर रखें। बाद अजान आप जिसे चाहे इनायत फ़रमाएं और अपना खलिफा बनाएं। हजरत मुहम्मद ﷺ एकतरकीताज अपने सर पर रखे, फिर उतार कर हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ रज़ी. के सर पर रखे, इसी तरह दोतरकीताज हज़रत उमर रज़ी. के सर पर रखे, तीनतरकीताज हज़रत उस्मान ग़नी रज़ी. के सर पर रखे और चारतरकीताज हज़रत मौला अली रज़ी. के सर पर रखे और फ़रमाए कि ये आपका ताज है।

बाद अज़ान फ़रमाते हैं कि तबक़ात के मशाएख और जुनैदिया तबका ने फ़रमाया – हमें इस तरह मालूम हुआ कि चारतरकीताज की असल क्या है। पहले ख़ुदा से हुजूर ﷺ को अता हुआ और उनसे हमको मिला। बिलकुल वैसे ही जैसे ख़रक़ा, मेराज की रात अता हुआ था।

आगे हज़रत निजामुद्दीन रज़ी. फ़रमाते हैं कि एकतरकीताज, जो हज़रत अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. को पहनाई गई थी, वो अब्दाल व सिद्दीक़ीन के सर पर रखा जाता है। अल्लाह के सिवा किसी का ख्याल दिल में न हो और तमाम दुनिया के कामों से दूर रहें तो फिर वो शख्स इस ताज के काबिल हैं। इस ताज का हक़ उनके बारे में ये है कि इनके बातिन मुसलसल जिक्र की वजह से नूरे मारफ़त से मुनव्वर होते हैं और इन्हें ज़ाहिरी व बातिनी मक़सूद हासिल होते हैं। अगर साहिबे ताज दुनिया का तालिब हो जाए तो वो इस ताज के लायक नहीं रहता।

दोतरकीताज जो हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ी. के सर रखी गयी थी, उसे आबिद, अवताद और कुछ मनसूरी भी पहनते हैं। इसका मकसद ये है कि जब इन्सान इसे सर पर रखे तो दुनिया को तर्क कर दे और ज़िक्र करने वाला बन जाए। सिवाए यादे इलाही के किसी और चीज़ में मशगूल न रहे। यहां तक कि अगर हलाल चीज़ उसे मिल जाए तो शाम तक न बचाए, खर्च कर दे और दुनियादारी के पास भी न भटके। ऐसे शख्स को दोतरकीताज पहनना वाजिब है वरना गुमराह न हो जाए।

तीनतरकीताज, जो हज़रत उस्मान ग़नी रज़ी. के सर रखी गई। वो ज़ाहिद, अहले तहीर, मशाएख तबक़ात और अक्सर अक्लमंद लोग भी पहनते हैं। इससे मक़सूद ये है कि अव्वल गैरूल्लाह से किनारा करे और तमाम लज्ज़तों शहवतों का लालच छोड़ दे। दूसरे, दिल को हसद (जलन), किना, बुग्ज़, फ़हश व रिया (दिखावा) जैसे बूरी आदतों से पाक करे। तीसरे सिर्फ और सिर्फ अल्लाह से रिश्ता जोड़े। जब ये हालत पर पहुंचे तो सर पर इस ताज का रखना जाएज़ है वरना जुनैदी तबक़ा में छोटा ठहरेगा।

चारतरकीताज, जो हज़रत मौला अली रज़ी. के सरे मुबारक पर रखा गया, वो सूफ़ी, सादात और मशाएख बुजूर्ग पहनते हैं। इससे मुराद दौलते सआदत है और जो अठारह हज़ार आलम में है, सबके सब इसमें रखा गया है। लेकिन इसके सर पर रख कर चार चीज़ों को दूर रखें ताकि इस चारतरकीताज को रखना दुरूस्त हो। वो चार चीज़ें हैं- अव्वल, दुनिया व दौलत को तर्क करें। दूसरा, ”तर्क उल लिसान अन नख्मर उल तज़ामा बज़िक्रुल्लाह” यानि अल्लाह की याद के सिवा और कोई बात न रहे। तीसरा ”तर्क उल बसरा मन ग़ैरूल करामा” यानि ग़ैर की तरफ़ नज़र करने से दूर रहे और ग़ैर का न रहे ताकि ग़ैर के लिए अन्धा हो जाए। जब ख्वाजा साहब इस बात पर पहुंचे तो इस क़दर रोए कि सभी हाजिरीन भी रोने लगे, आपने ये शेर इरशाद फ़रमाया-

अगर बग़ैर रख्त दीदा अम बक्स बयन्द

कश्म बरून बान्गश्त चूं सज़ाश ईं अस्त

फिर फ़रमाया चौथा ये कि ”तहारतुल क़ल्ब मिन हुब्बुल दुनिया” यानि दिल को दुनिया की मुहब्बत से पाक कर ले। पस जब दुनियावी मुहब्बत का जंग, दिल से साफ करके अल्लाह को शामिले हयात कर ले तो ग़ैर, दरमियान से उठ जाएगा और अल्लाह से यगाना हो जाएगा। इस वक्त ये चारतरकीताज सर पर रखने का उसको हक़ होगा।

फिर फ़रमाते हैं कि क्या ही अच्छा हो अगर पर्दा दरमियान से उठ जाए और सारे भेद खुल जाएं और ग़ैरियत दूर हो जाए और ये आवाज़ दी- ”बी यबसरो अवबी यबसरो अव यसमा वबी यनतक़” मुझ ही से देखता है, मुझ ही से सुनता है और मुझ ही से बोलता है।

Sufiyana 124

दुआ (Prayer)

और तुम्हारा परवरदिगार इरशाद फ़रमाता है कि तुम मुझसे दुआएं मांगो,

मैं तुम्हारी (दुआ ज़रूर) क़ुबूल करूंगा। (कुरआन-60:40)

 

ख़ुदा तक न तो (कुरबानी के) गोश्त ही पहुंचेंगे और न ही खून,

(हां) मगर उस तक तुम्हारी (नेकी व) परहेज़गारी (ज़रूर) पहुंचेगी।

(कुरआन -37:22)

 

पस तुम अल्लाह को ईख्लास के साथ पुकारो

अगरचे काफिरों को नागवार गुजरे। (कुरआन-14:40)

 

अल्लाह के नज़दीक दुआ से ज्यादा कोई चीज़ मुकर्रम नहीं।

(इब्ने माजा-280, मिश्कारत-194.11)

दुआ इबादत की अस्ल है।  (तिरमिजी2.173ए मिश्कात-194.10)

अल्लाह से उसका फ़ज़ल मांगा करो क्योंकि अल्लाह सवाल और हाजत तलबी को पसंद फ़रमाता है और सबसे बड़ी इबादत ये है कि इन्सान सख्ती के वक्त फ़राख़ी का इंतेज़ार करे।  (मिश्कात-195.15)

जो शख्स अल्लाह से अपनी हाजत का सवाल नहीं करता, अल्लाह का उस पे गज़ब होता है। (यानी दुआ नहीं करने वाले से ख़ुदा नाराज़ होता है।)

(मिश्कात-195.16, हाकिम-491)

दुआ मोमिन का हथियार है और दीन का सुतून और आसमान व ज़मीन का नूर है। (हाकिम)

जिस शख्स के लिए दुआ के दरवाजे खोल दिए गये, उसके वास्ते रहमत के दरवाजे खुल गये और अल्लाह से कोई दुआ इससे ज्यादा महबूब नहीं मांगी गयी कि इन्सान उससे आफियत (सेहत, सलामती, अमन, हिफाजत) का सवाल करे। (तिरमिजी, हाकिम, मिश्कात-195.17)

गुनाह या रिश्ता तोड़ने की दुआ मांगना हराम है और ऐसी दुआ अल्लाह कुबूल नहीं करता।

(मिश्कात-196.35)

कुबूलियत का यकीन कामिल रखते हुए अल्लाह से दुआ मांगो (ज़रूर कुबूल होगी)। अल्लाह लापरवाही की दुआ कुबूल नहीं करता। (मिश्कात 2.195)

दुआ से नाउम्मीद न हो क्योंकि दुआ के साथ कोई हलाक नहीं होता।

(हाकिम-494)

जो भी दुआ की जाती है वो कुबूल होती है बशर्ते कि उसमें किसी गुनाह या नफ़रत की दुआ न हो। दुआ कुबूल होने की तीन सूरतें हैं –

  1. जो मांगी जाए वही मिल जाए
  2. मांगी हुई चीज़ के बदले आख़िरत का अज्र व सवाब दे दिया जाए
  3. मांगी हुई चीज़ तो न मिले मगर कोई आफ़त या मुसीबत जो आने वाली थी टल जाए।

(मुस्नद अहमद-10709)

जो चाहता है कि मुसीबत व परेशानी के वक्त उसकी दुआ कुबूल हो तो उसे चाहिए कि आराम व फ़राख़ी के वक्त दुआ करता रहे। (तिरमिजी 2.175, मिश्कात1.195)

और दुआ निजात दिलाती उस बला से जो आ चुकी है और (उससे भी) जो बला आने वाली है। जब बला व मुसीबत आती है तो दुआ उसे दूर करती है और जो बला व मुसीबत आने वाली होती है उससे दुआ लड़ने लगती है। उस वक्त तक जब तक कि उससे निजात न मिल जाए।

(मिश्कात-195)

दुआ के लिए न कोई वक्त शर्त है न तहारत न वजू। दुआ में किसी मख्सूस अल्फ़ाज़ की कैद नहीं। दुआ के लिए हाथ उठाना भी ज़रूरी नहीं।

दुआ में ज़ाहिरी तौर पर कोई शर्त नहीं है, मगर यक़ीन व इख्लास का होना ज़रूरी है। यकीन ये रहे कि ज़मीन व आसमान के सारे ख़जाने अल्लाह के पास है, वो चाहेगा तो ही अता होगा और उसे अता होगा, जो मांगेगा।

इख्लास ये रहे कि मांगना दिल की गहराइयों से हो, उसमें शिद्दत (तड़प) हो, सख्त मोहताजी हो, कामिल बेबसी हो। कुरआन में इसे ”इजतेराब” लफ्ज़ से ताबीर किया गया है। यही यक़ीन दरअस्ल, दुआ की रूह है। ”इन्नमल- आमालो- बिन्नियात”  सब कामों का दारोमदार नियत पर है। दुआ आजिज़ी व इन्केसारी के साथ की जाए, ग़फ़लत बेपरवाई से की गई दुआ कुबूल नहीं होती।

अपने परवरदिगार से गिड़गिड़ाकर और चुपके- चुपके दुआ करो।

(कुरआन-55.7)

 

दुआ कुबूल क्यूं नहीं होती?

हज़रत इब्राहीम अदहम रज़ी. से किसी ने पूछा कि क्या वजह है कि हमारी दुआएं कुबूल नहीं होती। इस पर आपने फ़रमाया-‘तुम हज़रत मुहम्मद ﷺ को पहचानते हो लेकिन उनके बताए रास्ते पर नहीं चलते, क़ुरान को पढ़ते हो मगर उस पर अमल नहीं करते, ख़ुदा की दी हुए नेअमत खाते हो लेकिन उसका शुक्र अदा नहीं करते, शैतान को जानते हो मगर शैतानियत से नहीं बचते, मौत से आगाह हो मगर उसकी तैय्यारी नहीं करते, मुर्दे को दफन करते हो मगर इबरत हासिल नहीं करते। तुम अपने ऐबो बुराईयों को सुधारना छोड़ दिया और दूसरों के ऐब गिनने में लगे हो। असल व सहीं काम करने के बजाय ग़लत व बुरे कामों में लगे हो और पूछते हो कि दुआ क्यों कुबूल नहीं होती।’

हर किसी के लिए दुआ करते रहें,

हो सकता है आपकी दुआ से किसी का काम बन जाए।

 

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