Rab ka Shukrana

Rab ka Shukrana

रब का शुक्राना

 

खुदा ने कहा…

अगर तुम शुक्र अदा करोगे तो मैं तुम पर नेमअतों की बारिश कर दूंगा…

(कुरान 14:7)

जो शुक्र अदा करता है, वो अपने फ़ायदे के लिए ही शुक्र अदा करता है…

(कुरान 31:12)

पूजनीय, आकाश व पृथ्वी को सत्य के मार्ग से चलाने वाले परमेश्वर से

शुक्र के साथ (विनम्रता पूर्वक) हाथ ऊपर उठाकर प्रार्थना करो।

(ऋगवेद 6:16:46)

पवित्र आत्मा की सहायता पाने के लिए (शुक्रिया के साथ) प्रार्थना करो।

(बाईबिल 1कुरि.1:26.2:16)

 

एक सूफ़ी हर रोज़ सुब्ह शाम रब का शुक्र अदा करते। वो कहते. या रब! तेरे रहमो करम की कोई इंतेहा नहीं। तु मेरी ज़रूरतें हमेशा पूरी करता है। तेरा जितना शुक्र अदा किया जाए कम है।

शेर

तु नवाज़ने पे आए, तो नवाज़ दे ज़माना।

तु करीम ही जो ठहरा, तो करम का क्या ठिकाना।।

ये उनके मुरीदों को अच्छी नहीं लगती। क्योंकि कभी कभी तो ज़रूरतें पूरी हो जाती थी, मगर ज़्यादातर नहीं होती थी। लेकिन सूफ़ी साहब हैं कि हमेशा यही दुआ व शेर पढ़ते और शुक्र अदा करते रहते।

एक बार सूफ़ी साहब अपने मुरीदों के साथ सफ़र के लिए रवाना हुए। रास्ते में एक गांव पड़ा। वहां कुछ दिनों पहले ही कोई ढोंगी बाबा, गांववालों को धोका देकर और लूट कर भागा था।

जब सूफ़ी जी वहां पहुंचे तो गांव वालों ने उन्हें गांव में घुसने ही नहीं दिया और बुरा भला कह कर भगा दिया।

इसी तरह आसपास के गांववालों ने भी ऐसा ही किया। अब कई दिन हो गए, गर्म रेत का सफ़र, न खाना मिला न पानी। सबकी हालत खराब। लेकिन सूफ़ी साहब का मामूल जारी रहा। वो उसी तरह रब का शुक्र अदा करते रहते और शेर पढ़ते रहते।

इस पर मुरीदों को बर्दाश्त नहीं हुआ, उनसे पूछने लगे. आप किस रहमो करम की बात कर रहे हैं। भूख से हमारा बुरा हाल है। खाना पीना तो दूर, गांव वालों को तो हमारा आना ही बर्दाश्त नहीं।

उस रब का हम पर इतना जुल्म। और आपकी जुबान पर हमेशा वही शुक्राना?

सूफ़ी साहब जब शुक्र अदा करते तो उनके आंखों से आंसु बहते।

लेकिन मुरीद की ये बात सुनकर वो मुस्कराए और बोले. तुम नादान हो बेटा। तुम्हें समझ नहीं। इतने दिन हमारी ये हालत, हमारी ज़ात के लिए ज़रूरी है।

हमारा प्यासा रहना, भूखा रहना, दरबदर रहना, सब उसकी इनायतें हैं। क्योंकि वो कभी हमारा बुरा नहीं करता। हां, आज़माता ज़रूर है और सिर्फ़ उसका इम्तेहान लेता है, जो उसे पसंद होता है।

वो शुक्र ही क्या जो बग़ैर आज़माईश के हो। वो कैसा शुक्र है कि इम्तेहान के वक़्त न रहे।

अगर वो तक़लीफ़ दे रहा है तो यक़ीनन उस तक़लीफ़ में भी हमारी कोई भलाई छिपी हुई होगी।

Sufiyana 2 editor

दुनिया की ज़िन्दगी तो बस खेल तमाशा है…

दुनिया की ज़िन्दगी तो बस खेल तमाशा है…

(कुरान 47:36)

आदमी एक बच्चे की तरह है, जो दुनिया के मेले में खो गया है। मेले में बहुत अच्छी अच्छी चीजें हैं, खेल है, खिलौने हैं, झूले हैं, नौटंकी हैं, यहां तक कि मौज मस्ती के सारे सामान मौजूद हैं। मेले की चकाचौंध में बच्चा भूल ही गया है कि उसका घर भी है, घरवाला भी है और उसे लौटना भी है। ये मेला हमेशा के लिए नहीं है, ये तो आज है कल नहीं रहेगा। लेकिन घर तो हमेशा रहेगा। मेले में उसका कोई नहीं है, लेकिन घर पर उसका कोई है, जो उसकी राह देख रहा है। उसके लौटने का इंतेज़ार कर रहा है।

बच्चे को पैदा करनेवाला बड़ी चिंता में है। कहीं कुछ उंच नीच न हो जाए। कोई तकलीफ़ न हो जाए। उसने अपना ‘पैग़ाम’ देकर भेजा, लेकिन बच्चा नहीं आया। उसने ‘इनाम’ देकर भेजा, लेकिन बच्चा नहीं आया। बच्चे का दिल वहीं रम गया। उसे कोई फि़क्र नहीं, अपने पालनहार की।

गुमने और न गुमने में राब्ते (संपर्क) का ही फ़र्क़ है। अगर घरवाले से राब्ता है तो नहीं गुमा है और राब्ता नहीं है तो गुम गया। तो यहां उस पालनहार से सिर्फ राब्ता रखना है, उसे हमेशा याद रखना है। वो ये नहीं चाहता कि बच्चा सब छोड़कर घर ही आ जाए, लेकिन वो ये भी नहीं चाहता कि बच्चा मेले में ही गुम हो जाए। वो तो ये चाहता है कि मेले में रहे, जो अच्छा है वो करे और फिर घर लौट आए।

जो दुनिया का इनाम चाहे तो वो (भी) रब के ही पास है,

उसी के पास दुनिया व आखिरत (दोनों) का ईनाम है।

(कुरान 4:134)

उस पालनहार ने ‘पैग़ाम’ वालों को भेजना बंद कर दिया है, कोई नया ‘पैग़ाम’ अब नहीं आएगा। लेकिन ‘इनाम’ व ‘एहसान’ वालों को अभी भी भेज रहा है। अब बच्चे को चाहिए कि उनका दामन थाम ले, उनसे राब्ता कायम कर ले। इसी में यहां भी भलाई है और वहां भी। आखि़र इन ‘दौलतमंदों’ का साथ जो होगा।

और जो कोई ख़ुदा व उसके रसूल का हुक्म मानता है,

उसे उनका साथ मिलेगा, जिन पर रब ने (खास) इनाम अता किया है,

यानी अंबिया व सिद्दीक़ व शहीद व नेक लोग,

ये बहुत बेहतरीन साथी हैं।

(कुरान 4:69)

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