Sufiyana 242

अच्छे विचार उजाले की तरह हैं।

हर चीज़ पहले विचार के रूप में होती है।

फिर उसे सींचा जाता है, तपाया जाता है तो वो हक़ीक़त होकर सामने आती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे सोना को आग में तपाकर ताज बनाया जाता है।

विचार पहले ख्वाबों में होता है, फिर दिमाग में, फिर सोच में, फिर आंखों में, फिर बदन में, फिर कामों में होता है और फिर उसके बाद आपके सामने होता है।

ये नींद से शुरु होता है और फिर नींद उड़ा देता है। ग़ालिब का शेर है.

रगों में दौड़ते फिरने के, हम नहीं कायल।

जो आंख ही से न टपका तो वो लहू क्या है।

विचारों को राह दिखाना होता है, बस कुछ दूर चलाना होता है।

फिर वो इतने ताकतवर हो जाते हैं कि खुद ही चलने लगते हैं

बल्कि दौड़ने लगते हैं। और अगर रास्ता न हो तो नए रास्ते बना लेते हैं।

आपको कोई चीज़ प्रेरित कर सकती है, लेकिन विचार आपका खुद का होता है।

विचार दो तरह के होते हैं. अच्छे विचार और बुरे विचार।

एक इन्सान में अक्सर दोनों होते हैं। लेकिन कामयाब इन्सान में अच्छे विचार ज़्यादा होते हैं और नाकामयाब में बुरे विचार ज़्यादा होते हैं।

किसी की जि़न्दगी में बुरा ही बुरा होता है, अंधेरा ही अंधेरा होता है।

उसके ज़हन में यही सवाल होता है कि उजाला कब होगा।

जबकि उजाला तो हमेशा है, उजाला कहीं नहीं जाता,

बस देखने के लिए उसकी आंख नहीं खुली है।

जिस दिन आंख खुल जाए ये सारा अंधेरा, उजाले में बदल जाए।

हज़रत राबिया बसरीؓ कहीं से गुजर रही थीं, तो क्या सुनती हैं कि एक शख़्स दुआ कर रहा है. या रब! रहमत के दरवाजे खोल। और कितनी दुआएं करुं, कितना गिड़गिड़ाउं। अब तो रहम कर और मेरी जिन्दगी में उजाला कर दे। हज़रत राबियाؓ उसके पास गयीं, उसे हिलाया और कहा. ये क्या कह रहे हो। उस रब का दरवाजा कब बंद हुआ है। उसने कब अंधेरा किया है, जबकि वो खुद नूर है। हां, तुम्हारी आंख नहीं खुली है, तुम अंधे हो कि उसकी तजल्ली नहीं देख पा रहे, तुम्हें उसकी रहमत नहीं दिख रही।

हमारे लिए अच्छी बात ये है कि बुरे विचार एक छलावा बस है, ये अपने आप में कुछ नहीं। अच्छे विचार के आते ही ये ग़ायब होने लगते हैं।

उजाले के आने से अंधेरा ग़ायब हो जाता है लेकिन क्या ऐसा हुआ है कि

अंधेरे के आने से उजाला ग़ायब हो जाए?

Sufiyana 123

अक्लमंद इन्सान – शेख़ सादी

शेख सादी रज़ी. फ़रमाते हैं-

न गोयद अज सरे बाजीचा हर्फे।
कर्जा पन्दे नगीरद साहबे होश॥
व गर सद बाबे हिकमत पेशे नादां।
बख्बानन्द आयदश बाजीचह दरगोश॥

तर्जुमा- अक्लमन्द इन्सान खेल खेल में भी अच्छी बातें सीख लेता है जबकि बेवकूफ इन्सान बड़ी बड़ी किताबों के सौ पाठ पढ़ने के बाद भी बेवकूफी ही सीखता है।
लुकमान हकीम से किसी ने पूछा आपने अदब और तमीज किससे सीखी?, तो अपने फ़रमाया ‘बेअदबों से’, ‘वो कैसे’ पूछा गया तो जवाब मिला ‘मैंने उनकी बेवकूफी और बूरी आदतों से परहेज किया। मैं उनकी बेअदबी व बदतमीजी से दूर रहा, खुद ब खुद अदबवाला बन गया। अक्लमन्द इन्सान खेल खेल में भी अच्छी तालीम हासिल कर लेता है जबकि बेवकूफ बड़े बड़े ग्रंथ पढ़कर भी बेवकूफी ही सीखता है।

Sufiyana 123

बारिश की बूंद – शेख़ सादी

शेख़ सादी रज़ी. फ़रमाते हैं-
बारिश की बूंद, बादल से टपकने लगी। टपकते हुए सोचने लगी कि न जाने मेरा क्या हश्र होना है। मैं पथरीली ज़मीन पर गिरूंगी कि उफान मारते पानी में। कांटे पर गिरूंगी या फूल पर। कुछ देर बाद उसने नीचे समंदर के जोश व फैलाव को देखा। वो शरमिन्दा सी हो गई और खुद को बहुत अदना छोटा समझने लगी। सोचने लगी कि इतने बड़े समंदर के सामने मेरी क्या हक़ीक़त। मेरी क्या बिसात।
तभी सीप ने अपना मुंह खोल दिया कुदरत ने उस कतरे (पानी की बूंद) को सीप में महफूज कर दिया। वो बूंद खुद को मिटाकर, मोती बन गई और बादशाह के ताज में सजी।

छोड़ अपनी बुलन्दी, ईख्लास कर इख्तियार
रूतबा मस्जिद के मीनार का है कम, मेहराब से

ख़ुदा ने इन्सान को मिट्टी से बनाया और शैतान को आग से। शैतान ने अपने आग होने पर घमंड किया और हमेशा के लिए दूत्कारा हुआ मरदूद हो गया। जबकि आदम रज़ी. ने अपनी चूक को माना, ख़ुदा की बारगाह में आजिज़ी से खुद को छोटा समझकर गिरयावोज़ारी किया। इसके ईनाम में ख़ुदा ने आदम को तमाम इन्सानों का जद्दे आला यानी पितामह बना दिया।

तकब्बुर अज़ाज़ील राख्वार करद
बज़िन्दाने लअनत गिरफतार करद

Sufiyana 122

फ़ना व बक़ा – मौलाना जामी

मौलाना जामी रज़ी. फ़रमाते हैं-
ख़ुदाए बुलन्द बरतर के मासिवा (सूफ़ी, अल्लाह के अलावा जो कुछ भी है उसे मासिवा कहते हैं) जो कुछ भी है वो आनी व फ़ानी (नश्वर) है। दुनिया की हक़ीक़त एक गुमान है जिसका कोई वजूद नहीं और ज़ाहिरी सूरत इसकी महज एक वहमी (झूटी) वजूदसी है। कल इसका कोई वजूद न था, न आगे रहने वाला है। ज़ाहिर है कि कल इसका एक अन्जाम होगा। तो उम्मीदों आरजूओं का ग़ुलाम क्यों बना हुआ है। छोड़ झूठी चमक दमक रखने वाली नापाएदार चीज़ों को और उस हमेशा रहने वाले रब से जुड़ जा। वक़्झत के कांटों से उसकी बंदगी का चेहरा कभी घायल नहीं हो सकता।

हर शक्ले हसीन, तुझको लगी है जो भली,
वो ज़ेरे फलक से जल्द रूपोश हुई।
दिल उस से लगा जो जि़न्दा व पाइन्दान है,
वो ज़ात रहेगी और हमेशा से रही॥
दिल जाके सनमखानों में शरमिन्दा है,
क्या इश्के बुतां से कोई दिल जिन्दा है।
मुझको है जमाले जावेदानी की तलाश,
उस हुस्न का तालिब हूं जो पाइन्दा है॥
जो शै तुझे देती नहीं पैगामें बका,
आखिर वही लाएगी तेरे सर पे बला।
जिन चीजों से होना है जुदा, बादुल मौत,
बेहतर है कि जीते जी रहो उनसे जुदा॥

Sufiyana 122

एक वली एक रूई – मौलाना जामी

मौलाना जामी रज़ी. फ़रमाते हैं-

अल्लाह ने इन्सान को ऐसा नहीं बनाया कि उसके पहलू में दो दिल हों। जिसने तूझे जिन्दगी की नेअमत दी है उसी ने तेरे पहलू में एक दिल भी रख दिया है। ताकि उस वाहिद-अल्लाह (एक-ईश्वर) की मुहब्बत में तुझे यक वली (एक मक़सद) व यक रूई (एकाग्रता) हासिल हो। उसके अलावा किसी और से तुझे कोई वास्ता न हो और तू अपने आप को उसी की इबादत के लिए वक्फ़ कर (छोड़) दे। ये मुमकीन नहीं कि एक दिल के टुकड़े टुकड़े करके अलग अलग कामों में लगा दिया जाए-

रूख तेरा है कि़बलाए वफ़ा की जानिब।
तन परदा है क्यूं ज़हन रसा की जानिब॥
बेहतर है कि दिल को न बहुत रोग लगाए।
एक दिल है, लगा उसको ख़ुदा की जानिब॥

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