Sufiyana 238

रब के ख़ास बंदे (पार्ट 2)

यहां हम ख़ुदा के उन खास बंदों के बारे में बात करेंगे जिन्हें रिजालुल्लाह या रिजालुल ग़ैब कहा जाता है। इन्हीं में से कुतुब अब्दाल व ग़ौस होते हैं।
वो न तो पहचाने जा सकते हैं और न ही उनके बारे में बयान किया जा सकता है, जबकि वो आम इन्सानों की शक़्ल में ही रहते हैं और आम लोगों की तरह ही काम में मसरूफ़ रहते हैं।

रब के ये खास बंदे, खुदा की तजल्ली से दुनिया को रौशन करते हैं। रिजालुल ग़ैब का एक ऐसा जहां है, एक ऐसा निज़ाम है, जो हमें न समझ आता है और न ही ज़ाहिरी आंखों से दिखाई देता है। रब ने उन्हें चुन लिया है, उनके के लिए दुनिया की कोई हदें मायने नहीं रखतीं। उन्हीं के दम से कायनात का निज़ाम है। अगर अक़्ताबे आलम का निज़ाम एक लम्हे के लिए रुक जाए तो दुनिया खत्म हो जाए। इनके मामूलात को ज़ाहिरी आंखों से नहीं देखा जा सकता और न ही इन्हें अपनी मरज़ी के मुताबिक बुलाया जा सकता है। हां, साहिबे बसीरत इनसे फ़ैज़ पाते हैं।  ये सिर्फ रब की मरज़ी के पाबंद रहते हैं।

हज़रत अलीؓ फ़रमाते है कि हज़रत मुहम्मदﷺ  ने फ़रमाया. यक़ीनन अब्दाल शाम में होंगे और वो चालिस मर्द होंगे। जब कभी उन में से एक वफ़ात पाएगा तो अल्लाह उसकी जगह दूसरे को मुकर्रर कर देगा। उनकी बरकत से बारिश बरसाई जाएगी और उनके फ़ैज़ से दुश्मनों पर फ़तह दी जाएगी और उनके सदक़े ज़मीनवालों की बलाएं दूर कर दी जाएंगी।

कुतुब

हर ज़माने में सिर्फ एक कुतुब होते हैं। इनका ओहदा रिजालुल्लाह में सबसे बड़ा होता है। इन्हें मुख्तलिफ नामों से पुकारा जाता है। कुतुब.ए.आलम, कुतुब.ए.कुबरा, कुतुब.ए.अरशाद, कुतुब.ए.मदार, कुतुब.ए.अक़्ताब, कुतुब.ए.जहां, जहांगीर.ए.आलम वगैरह वगैरह। सारी दुनिया इन्हीं के फ़ैज़ व बरकत से क़ायम हैं। ये सीधे ख़ुदा से अहकाम व फ़ैज़ हासिल करते हैं और उस फ़ैज़ को आवाम में बांटते हैं। ये दुनिया में किसी बड़े शहर में रहते हैं और बड़ी उम्र पाते हैं। हुज़ूर अकरम हज़रत मुहम्मदﷺ  के नूर की बरकतें हर तरफ़ से हासिल करते हैं। सालिक (रब की राह का विद्यार्थी) के दरजे को बढ़ाना, घटाना, हटाना इनके इख्तियार में होता है।

अक़्ताब की कई किस्में हैं. कुतुब अब्दाल, कुतुब अक़ालीम, कुतुब विलायत वगैरह वगैरह। ये सभी अक़्ताब, कुतुब.ए.आलम के नीचे होते हैं। जहां जहां इन्सान आबाद है, वहां एक कुतुब भी मुकर्रर होते हैं।

ग़ौस

बहुत से लोग कुतुब व ग़ौस को एक ही समझते हैं, लेकिन ये अलग अलग ओहदे हैं। हां, दोनो ओहदों पर एक ही शख़्स मुकर्रर हो सकते हैं। ग़ौस तरक्की करते हुए, ग़ौस.ए.आज़म और ग़ौस.उस.सक़लैन के ओहदे पर फ़ाएज़ होते हैं।

अमामान

कुतुबुल अक़ताब के दो वज़ीर होते हैं जिन्हें अमामान कहते हैं। एक कुतुब के दाहिने तरफ़ रहते हैं, जिनका नाम अब्दुल.मालिक है और दूसरे बाईं तरफ़ के अमामान का नाम अब्दुर.र्रब है। दोनों कुतुबे मदार से फ़ैज़ पाते हैं लेकिन दाहिने हाथ वाले अमामान, आलमे अलवी से इफ़ाज़ा करते हैं और बाईं तरफ़ के अमामान, आलमे सफ़ली से इफ़ाज़ा करते हैं। बाईं तरफ़ के अमामान का रुतबा दाईं तरफ़ के अमामान से बड़ा होता है। जब कुतुबुल अक़ताब की जगह खाली होती है तो बाएं वाले अमामान उनकी जगह तरक्की पाते हैं, जबकि दाएं वाले, बाएं की जगह आ जाते हैं।

अवताद

दुनिया में चार अवताद हैं। ये चारो दिशाओं में रहते हैं। ये मयख़ों का काम देते हैं और ज़मीन पर अमन व चैन बरक़रार रखते हैं।

अब्दाल

रिजालुल ग़ैब में अब्दाल का मुक़ाम बड़ा बुलन्द है। अब्दाल, एक वक़्त में सात होते हैं। ये सात अक़ालीम पर मुतय्यन होते हैं। ये सात अंबिया के मशरब पर काम करते हैं। ये लोगों की रूहानी इमदाद करते हैं और आजिज़ों व बेकसों की फ़रयाद पूरी करते हैं।

अफ़राद

अफ़राद वो मुक़ाम है, जहां कुतुबे आलम से तरक़्क़ी करते हुए पहुंचते हैं।

ये ग़ाज़ी, ये तेरे पुर असरार बंदे,

जिन्हें तूने बख़्शा है, ज़ौक़े ख़ुदाई।

दोनेयम उनकी हैबत से, सेहरा व दरिया,

पहाड़ उनकी ठोकर से, मानिन्द राई।

-अल्लामा ईक़बाल

 

(नोट: आम तौर पर लोग, बुजूर्गों के नाम के साथ कुतुब या अब्दल या ग़ौस वगैरह इस्तेमाल करते हैं। ये ज़रूरी नहीं की वो बुजूर्ग, उसी मुक़ाम पर फ़ाएज़ हो, क्योंकि रिजालुल्लाह का मुक़ाम हम तय नहीं करते बल्कि ये तो अल्लाह की जानिब से होता है।)

Sufiyana 136

रब के ख़ास बंदे (पार्ट 1)

रिजालुल्लाह

यहां हम ख़ुदा के उन खास बंदों के बारे में बात करेंगे जिन्हें रिजालुल्लाह या रिजालुल ग़ैब कहा जाता है। इन्हीं में से कुतूब अब्दाल होते हैं। 
वो न तो पहचाने जा सकते हैं और न ही उनके बारे में बयान किया जा सकता है, जबकि वो आम इन्सानों की शक्ल में ही रहते हैं और आम लोगों की तरह ही काम में मसरूफ़ रहते हैं।

इन्सानी मुआशरे (समाज) को एक बेहतर और अच्छी जिंदगी देने के लिए ख़ुदा के कुछ खास बंदे हर दौर में रहे हैं। उन्होंने हमेशा इन्सान की इस्लाह और फ़लाह के लिए काम किया। मौलाना रूमी रज़ी. फ़रमाते हैं कि खामोशी अल्लाह की आवाज़ है। इसी खामोशी से ये खास बंदे अपना काम करते हैं। ये कभी अपने काम से ग़ाफ़िल नहीं रहते। इनके हाथों कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचा। इन खास बंदों को रिजालुल्लाह या मर्दाने ख़ुदा या मर्दाने हक़ कहते हैं। इनके लिए क़ुरान में आया है-

वो मर्दाने ख़ुदा जिन्हें तिजारत और खरीद फरोख्त, यादे ख़ुदा से ग़ाफिल नहीं करती।

(क़ुरान:24:37)

इनका वजूद हज़रत आदम रज़ी. से लेकर हुजूर अकरम ﷺ तक और उनसे लेकर ताकयामत रहेगा। कायनात का क़याम व निज़ाम का दारोमदार इन्हीं मर्दाने ख़ुदा पर है। रब और बंदे के दर्मियान का रिश्ता इन्हीं की तालिमात व हिदायत पर क़ायम है। इन्हीं की बरकत से बारिश होती है, पेड़ पौधे हरे होते हैं। कायनात के किस्म किस्म के जीवों की जिंदगी इन्हीं की निगाहे करम की एहसानमंद है। शहरी व गांव की जिंदगी, बादशाहों का जीतना हारना, सुलह व लड़ाइयां, अमीरी व ग़रीबी के हालात, अच्छाइयां व बुराईयां, गरज़ कि अल्लाह की दी हुई करोड़ों ताकतों का मुज़ाहेरा इन्हीं के इख्तियार में है। अल्लाह अपने ग़ैबुल ग़ैब से इनको नूर अता करता है, जिससे ये लोगों की इस्लाह करते रहते हैं।

ये आम लोगों में भी रहते हैं, आम जिंदगी जीते हैं, खाना खाते हैं, चलते फिरते बोलते हैं, बीमार होते हैं, इलाज कराते हैं, शादी करते हैं, रिश्तेदारी निभाते हैं, लेन देन करते हैं, हत्ता कि जिंदगी के सारे जायज़ काम में हिस्सा लेते हैं। ये न पहचाने जा सकते हैं न ही उनकी ताकत बयान की जा सकती है, जबकि ये आम लोगों के दर्मियान होते हैं। लेकिन जब लोग दुनियादारी में डूबे रहते हैं तो ये ख़ुदा की याद में मश्गूल रहते हैं। और ख़ुदा के हुक्म से हर काम को अन्जाम देते हैं। लोग इनको बुरी नीयत से या हसद से नुकसान पहुचाने की कोशिश करते हैं तो ये अपने विलायत की ताकत से बच जाते हैं। इनकी खासियत लोगों से छिपी हुई होती है। इनमें से कोई पहाड़ों विरानों पर रहता है तो कोई आबादी में रहते हैं।

चन्द लम्हों में ये दूसरे देश तक का सफ़र तय कर सकते हैं। पानी पर चल सकते हैं। जब चाहें तब गायब हो सकते हैं। जिसकी चाहें सूरत इख्तियार कर सकते हैं। ग़ैब की ख़बर रखते हैं। छोटी सी जगह में हज़ारों की तादाद में इकट्ठा हो सकते हैं। महफ़िले सिमा में रक्स करते हैं और किसी को नज़र नहीं आते। रोते हैं गिरयावोजारी करते हैं लेकिन किसी को सुनाई नहीं देता। पत्थर को सोना बना सकते हैं।

इनके पास ख़ुदा की दी हुई असीम ताकत होती है लेकिन ये खुद के लिए इस्तेमाल नहीं करते। जैसा अल्लाह का हुक्म होता है वैसा करते हैं। लोगों की परेशानियां दूर करते हैं। लोगों की मदद करते हैं।

रिजालुल्लाह अपने वक्त के नबी के उम्मती होते हैं और उन्हीं का कलमा पढ़ते हैं। इन्हीं के बारे में हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि- मेरे वली मेरे क़बा के नीचे होते हैं और मेरे अलावा उन्हें कोई नहीं पहचानता। यानी आम लोगों इनको नहीं जानते।

दुनिया के सारे रिजालुल्लाह साल में दो बार आपस में मुलाकात करते हैं, एक बार आराफात के मैदान में और दुसरी बार रजब के महिने में किसी ऐसी जगह जहां रब का हुक्म होता है।

अल्लाह ने दुनिया को इन खास औलिया के क़ब्ज़े में दे दिया है, यहां तक कि ये तन्हा रब के काम के लिए वक्फ़ हो गए हैं।

मख्दुम अशरफ सिमनानी रज़ी. फ़रमाते हैं- अल्लाह ने कुछ औलिया को बाक़ी का सरदार बनाया है और मख्लूक की इस्लाह व हाजत रवाई का काम इनके सुपुर्द किया है। ये हज़रात अपने काम को करते हैं, इसके लिए एक दुसरे की मदद भी लेते हैं। ये रब के काम से कभी ग़ाफ़िल नहीं होते।

इनके बारह ओहदे (या क़िस्में) होते हैं-

1.कुतुब, 2.ग़ौस, 3.अमामा, 4.अवताद, 5.अब्दाल, 6.अख्यार, 7.अबरार, 8.नक़बा, 9.नजबा, 10.उमदा, 11.मक्तूमान, 12.मफ़रदान।

…जारी है पार्ट 2 में…

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