जन्नत और दोज़ख़

जीवन दर्शन

एक हज़रत से कुछ लोगों ने पूछा. जन्नत (स्वर्ग) और दोज़ख़ (नरक) क्या है? आपने उन्हें अगले दिन एक शिकारी के पास ले गए। वो शिकारी बहुत से जानवरों को शिकार करके लाया था, उन्हें मार डाला था। वहां का मंज़र उन लोगों को देखा नहीं गया और वहां से जाने लगे। जाते जाते हज़रत ने कहा. ये दोज़ख़ का मंज़र था। उस शिकारी के यहां कभी बरकत नहीं रहेगी और न ही उसे कुछ हासिल होगा। उसके लिए यहां भी दोज़ख़ और मरने के बाद भी दोज़ख़ है।

फिर उन्हें एक तवायफ़ के पास ले गए। लोग आनाकानी करने लगे, लेकिन फिर चले गए। हज़रत बोले. यहां की हर चीज़ आपको खुबसूरत दिखेगी। सारे बुरे काम होने के बावजूद, ये आपको बिल्कुल जन्नत की तरह लगेगा। लेकिन यहां तभी तक पूछ है, जब तक आप खुबसूरत हैं। क्योंकि यहां खुबसूरती बिकती है। और जब आपकी खुबसूरती नहीं बचती, तो यही जगह आपके लिए दोज़ख़ बन जाती है। इसी ज़िन्दगी में आप जन्नत व दोज़ख़, दोनों को देख लेते हैं। जबकि मौत के बाद दोज़ख़ मिलना निश्चित है।

फिर उन्हें एक फ़क़ीर के पास ले गए, जो जंगल में एक कुटिया बनाकर रहता था। फ़क़ीर के पास कुछ भी न था, लेकिन फिर भी उसकी मस्ती का कोई ठिकाना न था। वो बहुत खुश और सुकून से भरा हुआ था। हज़रत ने कहा. इस फ़क़ीर ने मरने के बाद के सुख के लिए, आज के सुख को त्याग दिया है। इसे जन्नत मिलना निश्चित है।

फिर उन्हें एक साधारण से घर में ले गए। जहां मां बाप थे, बेटे और बहू थे, बच्चे थे। सबमें आपसी मुहब्बत थी। मेहनती, सब्र करनेवाले, नेक और ईमानदार लोग थे। वो अच्छा कमाते और बहुत दान भी करते। उन्होंने किसी कमज़ोर को मारा या सताया नहीं था, बल्कि कमज़ोरों की हमेशा मदद की। उन्होंने अपने घर को और खुद को, दिखावे और आडंबर से बचाकर रखा, बल्कि सादगी को ही अपना गहना बनाकर रखा। उन्होंने रब की इबादत के लिए दुनिया का पूरी तरह त्याग नहीं किया, बल्कि जो ज़िन्दगी मिली है, उसे रब की मरज़ी समझकर कुबूल किया और उसी में रहते हुए इबादतें करते। चाहे बड़ों का अदब हो या छोटों से प्यार हो या फिर हमउम्र से मुहब्बत हो, हर रिश्तों को इबादत की तरह निभाते। ये वो लोग हैं जिनके लिए यहां भी जन्नत है और वहां भी जन्नत है।

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