मुरीद होना (बैअ़त होना)

चूं तू करदी ज़ात मुर्शिद रा क़ुबूल

हम ख़ुदा आमद ज़ ज़ातिश हम रसूल

नफ़्स नतवां कश्त इल्ला ज़ाते पीर

दामने आं नफ़्स कुश महकम बगीर

(मौलाना जलालुद्दीन रूमीؓ)

 

जब तूने पीर की ज़ात को कुबूल कर लिया तो तुझ से अल्लाह भी मिल गया और रसूलﷺ  भी।

उस नाफ़रमान नफ़्स को पीर की ज़ात के सिवाए कोई नहीं मार सकता, तो उस नफ़्स के मारनेवाले (पीर) का दामन मज़बूती से पकड़ ले।

 

 

तरीक़त की तलाश और बातिनी कमालों का हासिल करना, हम पर वाजिब है। लेकिन ये रास्ता निहायत ही नाज़ुक और दुश्वार है, क्योंकि नफ़्स और शैतान, इससे रोकने में लगे हुए हैं।

बेशक नफ़्स, इन्सान को बुराई की तरफ़ ले जाने वाला है, मगर (ये उसके लिए नहीं है) जिस पर खुदा रहम करे।

(कुरान 12:53)

बेशक़ शैतान, इन्सान का खुला दुश्मन है।

(कुरान 17:53)

नफ़्स और शैतान से बचने का तरीक़ा, मुर्शिद कामिल से बैअ़त है। बैअ़त होना, रब तक पहुंचने का सबसे आसान व सबसे ज़्यादा नज़दीक का रास्ता है, क्योंकि इसमें नफ़्सानियत नहीं है और न ही शैतानियत है।

हज़रत इश्तियाक़ आलम शाहबाज़ीؓ फ़रमाते हैं. कुरान को कुरान हम इसलिए मानते हैं कि उसकी सनद मौजूद है। अहादीस नबवीया को कलामे रसुलल्लाह इसलिए मानते हैं कि उसकी भरोसेमंद सनद मौजूद है। इसी तरह इसकी भी सनद मौजूद है कि रूहानी मुर्शिदे कामिल का दिल, अपने पीर के दिल से होता हुआ, रसूले अकरमﷺ  से मिला हुआ होता है।

यही मुर्शिदे कामिल का गिरोह ही है जो बनामे सूफ़ीया व तालिमाते तसव्वफु़, बारगाहे नबुव्वतﷺ  के सच्चे वारिस व अमीन हैं। इनका सिलसिलए रूहानी, ज़ंजीर की मुसलसल मज़बूत कड़ीयों जैसा है। जिसका सरचश्मा तक़दीस व रूहानियत, क़ल्बे रसूल है। इस ज़ंज़ीर से जुड़ने के लिए और क़ल्बे रसूलल्लाह तक पहुंचने के लिए बैअ़त ज़रूरी है। और हुज़ूरﷺ  तक पहुंचना यानी खुदा तक पहुंचना है। क्योंकि…

(ऐ महबूब) बेशक जो लोग आपसे बैअ़त करते हैं, वो अल्लाह ही से बैअ़त करते हैं। उनके हाथों पर (आपके हाथों की सूरत में) अल्लाह का हाथ है।

(कुरान 48:10)

बैअ़त, सूफ़ीया किराम के यहां ये सब से अहम तरीन रूक्न है, जिसके ज़रिये तालीम व तरबियत, रुशदो हिदायत और इस्लाह अहवाल का काम शुरू होता है। बैअ़त.ए.शैख अल्लाह के हुक्म से और हुज़ूरे अकरम हज़रत मुहम्मदﷺ  के अमल से साबित है। बैअ़त का अमल हुज़ूरﷺ  के अमल ‘बैअ़त.उर.रिजवान’ से बतरिकए ऊला साबित है। कुछ अहले इल्म के नज़दीक बैअ़त वाजिब है और कुछ ने बैअ़त को सुन्नत कहा है। बल्कि ज़्यादातर ने इसे सुन्नत ही कहा है।

बैअ़त की कई किस्में होती है, लेकिन तज़किया.ए.नफ़्स और तसफि़या.ए.बातिन के लिए जो सूफ़ीया किराम बैअ़त करते हैं, वो कुरबे इलाही का ज़रिया बनता हैं और इसी को ‘बैअ़त.ए.शैख’ कहते हैं।

जब कोई बैअ़त व इरादत का चाहने वाला हाजि़र होता है और इज़हारे गुलामी व बन्दगी के लिए हल्कए मुरीदैन में शामिल होना चाहता है तो उसका हाथ अपने हाथ में लेकर हल्कए इरादत और तरीकए गुलामी में दाखिल किया जाता है।

फिर तालीब से पूछते हैं कि वो किस खानवाद ए मारफ़त (क़ादिरिया, चिश्तिया, नक्शबंदिया वगैरह) में बैअ़त कर रहा है और उससे सुनते है, वो किस खानवाद ए तरीक़त में दाखिल हुआ। शिजरा ए मारफ़त के सरखेल का नाम लेते हुए सिलसिला ब सिलसिला अपने पीर के ज़रिए अपने तक पहुंचाते हैं और कहते हैं कि क्या तू इस फ़क़ीर को कुबूल किया? तालिब कहता है कि दिलो जान से मैंने कुबूल किया, इस इक़रार के बाद उसे कहते हैं कि हलाल को हलाल जानना और हराम को हराम समझना और शरीअ़ते मुहम्मदीﷺ  पर क़दम जमाए रखना।

अकाबिरों के नज़दीक वसीला से तवस्सले मुर्शिद ही मुराद है। हज़रत मौलाना शाह अब्दुर्रहीमؓ, शाह वलीउल्लाह मुहद्दीसؓ और शाह अब्दुल अजीज मुहद्दीस देहलवीؓ जैसे साहेबान का भी यही मानना है। इसमें कोई शक नहीं है कि अल्लाह की बारगाह में मुकर्रेबीन का वसीला ही वो वसीला है जिसे हासिल करने की हिदायत, अल्लाह ने कुरान में फ़रमाई।

Related Post

Leave a Reply


This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.


A Khan Khan

6 months ago

Murid bole to apne apko pir ke hatho bik jana bole pir me apni hadti and wajud mita dena fna me neha hai raj aya bka ka and jab tak fnahiyat kuli hasil na ho jaye tab tak pir se khub khub rafta rkho uske bad hi khalifa bno ya khalifha banao

A Khan Khan

6 months ago

Murid ko khub khub mursid ki kihdmat me rhe jab tak duaao me asar juban me tasir and nighaho me kubat na aa jaye nigaho me kubat aa jaye

A Khan Khan

6 months ago

Murid ko etni pina chahiye ki pilanewala ban jaye and etna dard sho ki o dard darma ban jaye / ye ahle zarb ka kam hai kamjoor zigar ka gujara nhi aur thodi si jo pikar bahak jaye use my kde se bahar kar do

A Khan Khan

6 months ago

Murid ko muradi nhi hona chahiye ye rah me lagdo lulho ki koie jagah nhi 7 din v fhasakash rhe to juban se uf aah na nikle kafan odh lo fasakash ko apna odna bichaona bna lo ye bachcho ka khel nhi ye raj bda muskil hai esko ohi samaz sakta hai jo ahlo dilwala haiapne aap me khudi ke naksho ko mita liya aour allah and rasol ko apna bna liya .

A Khan Khan

6 months ago

Ye makinoo kab tak rhoge lamaka mka kar ke hi dam lunga ye kubat hai to ye tarikat me aao warna kasrat ke sath namaz roja haz zakat krte rho and ayra kam kro sise allah and rasool frma giye hai

Subscribe via Email

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

Cart

Contact us...

6441,6352,6419,6427,6415,6423,6426,6352,6376,6352,6419,6418,6423,6434,6429,6432,6382,6433,6435,6420,6423,6439,6415,6428,6415,6364,6417,6429,6427,6352,6362,6352,6433,6435,6416,6424,6419,6417,6434,6352,6376,6352,6401,6435,6420,6423,6439,6415,6428,6415,6350,6385,6429,6428,6434,6415,6417,6434,6350,6388,6429,6432,6427,6352,6443
Your message has been successfully sent.
Oops! Something went wrong.

Contact Info

Near Dargah, Kelabadi, Durg (Chhattisgarh) 491001

+91 8878 335522
editor@sufiyana.com

Copyright 2018 SUFIYANA ©  All Rights Reserved

error: Content is protected !!