महफि़ले सिमा – 2

सिमा के जवाज़ में आयाते कुरानी

हज़रत मख़्दुम अशरफ़ सिमनानी किछौछवीؓ फ़रमाते हैं. सिमा के जवाज़ के सबूत में चन्द दलाएल पेश किए जाते हैं।

अल्लाह पैदा करने में जितना चाहता है, बढ़ा देता है।

(कुरान 35:1)

कुछ ने किरात में ‘अलख़्ल्क़’ में ‘ख़ा’ की जगह ‘हा’ पढ़ा है, यानी ‘अलहल्क़’। (दर करारत बअज़े फ़ील ख़ल्क़ बिलहाए अलमहमला अस्त . महज़ूता449)

तुम्हारे लिए पाकीज़ा चीज़ें हलाल कर दी गयी हैं।

(कुरान 5:4)

और सिमा पाकीज़ा तरीन चीज़ है, कि इस से दिल व रुह खुश होते हैं।

जो लोग कान लगाकर ग़ौर से सुनें, फिर उस के बेहतर पर चलें। ये वो लोग हैं, जिनको अल्लाह ने राह दिखाई, ये लोग अक्लवाले भी हैं।

(कुरान 39:18)

ये बात आम लोगों के लिए कही जा रही है और अच्छा सुनने वालों की तारीफ फ़रमाई जा रही है। ये भी खुलासा हो रहा है कि ग़ौर से सुनना, चाहे धुन में हो या बग़ैर धुन में, रब की राह में शामिल है, पसंदीदा आवाज़ में शामिल है और उसकी इनायत से होता है। और सुननेवाले को अक़्लमंद कहा जा रहा है। अब अगर कोई ग़ौर से सुनना ही हराम कहे तो ये ग़लत है, हां इसे मुबाह कहा जा सकता है।

जो कोई ये कहे कि राग, नग़्मा, गाना वगैरह सुनना बिल्कुल हराम है, दूसरी हराम चीज़ों की तरह, तो ये समझा जाए कि उनको अल्लाह ने हिदायत नहीं फ़रमाई और उनको अक़्ल भी नहीं है। और जिनको हिदायत नहीं होती वो गुमराह होता है। क्योंकि हिदायत की उल्टा गुमराही है और गुमराह लोग दोज़ख़ी है। इसकी कोई दलील नहीं कि सिर्फ खास खास नग़्मों को ही सुना जाए। जबकि दफ़ के साथ गाना सेहत को पहुंच चुका है और साबित हो चुका है, उन रवायात से जिसमें हुज़ूरﷺ  दफ के गाने के वक़्त और रक़्स के वक्त मौजूद थे। (इन्शाअल्लाह इसका बयान बाद में किया जाएगा)

और इस बात पर दलील कि अल्लाह ने तारीफ फ़रमाई है उन लोगों के नेक सुखन (अच्छे सुनने) की इत्तेबा में ये आयत है.

और तुम को सुनने की ताकत, देखने की कुवत और दिल अता हुआ, लेकिन कम ही उस (रब) का शुक्र अदा करते हैं।

(कुरान 21:9)

यहां रब का एहसान बताया जा रहा है और जिसमें सारे सुनने, देखने व दिल से समझने की बातें शामिल है, सिवाए गुनाह व फ़साद की तरफ़ ले जाने वाले बातों के। हज़रत सुल्लमी से रवायत है कि इब्ने अता ने फ़रमाया. सुनने, देखने व दिल के अता होने से मुराद ये है कि ख़ुदा को बखूबी पहचाने, बखुबी तसव्वुर करें और दिल में मुशाहिदा करें। और एक हज़रत ने कहा. मोमीन के दिलों में रब ने अपनी मुहब्बत डाल दी, मुश्ताक़ों को इश्क़ अता किया और आशिकों को ख़ुदासनासी की दौलत अता फ़रमाई। इमाम कुशैरीؓ फ़रमाते हैं. इन तीनों बातों से मुराद बिना किसी दलील के ख़ुदाशनासी, शौक बिल्लाह और गैरुल्लाह से दिलों को पाक रखना है।

इन अक़्वाल से ये भी साबित होता है कि ऐसी आवाज़ का सुनना, जिसका कोई मफ़हूम व मायने नहीं है, जायज़ है। तो फिर जिसके मायने हिकमत व दानाई पर मबनी हो और बगैर लहवो.लईब के इसमें सहीह मायने मौजूद हैं, तो ऐसी आवाज़ का सुनना क्यों कर जायज़ नहीं हो सकता?

सिमा में तो ईमान ताज़ा होता है और खुशहाली पैदा होती है। सिमा सुननेवालों का दिल, रब के लिए तड़पने लगता है। जबकि वो सनाए हक़ को हक़ की जानिब, खिताबे हक़ के ज़रिए सुनते हैं। इस तरह वो ग़ैर हक़ से हक़ की तरफ़ रुजूअ करते हैं।

वले वजहेहा मिउं वजहेहा क़मरन

वले अयनेहा मिन अयनेहा कोहलन

(और उसके चेहरे से इसका चेहरा रौशन है और उसकी आंखों से इसकी आंखों को सुरमा मिलता है)

सिमा को ग़लत माननेवाले कुरान की इस आयते करीमा को सनद बताते हैं.

और कुछ लोग बेहूदा बातें खरीदते हैं, ताकि बिना समझे रब की राह से बहका दें और उस (राह) का मज़ाक उड़ाएं। ऐसे लोगों के लिए जि़ल्लतवाला अज़ाब है।

(कुरान 31:6)

जबकि इस आयत को बतौर सबूत पेश करना इंसाफ नहीं। बल्कि सिमा को मानने वालों के खि़लाफ़ लड़ाई है कि उनकी नज़र मुतल्लिक़ है, मुतल्लक़ पर नहीं।

ये आयत उन बाज़ारु लोगों के बारे में है, जो क़नीज़ों को खरीद कर उसका गाना लोगों को सुनाने के लिए बुलाते हैं। और इस तरह वो हक़ की बातें सुनने से लोगों को रोक देते हैं।

(क्या बाज़ारु कलाम में और ख़ुदा के कलाम में कोई फ़र्क़ नहीं। क्या बाज़ारु गाने में और हुज़ूरﷺ  की नात में कोई फ़र्क़ नहीं।) ऐसे लोगों ने सही मायने में कुरान की ये आयतें नहीं पढ़ीं.

अपनी गर्दन को (तकब्बुर से) मरोड़े हुए ताकि (दूसरों को भी) रब की राह से बहका दें।

(कुरान 22:9)

अल्लाह ने उनके दिलों पर व कानों पर मुहर लगा दी और उनकी आंखों पर पर्दा (पड़ गया) है।

(कुरान 2:7)

जिसे अल्लाह गुमराह ठहरा दे तो उसके लिए (कोई) राह दिखानेवाला नहीं।

(कुरान 7:186)

इन आयतों का ये खुलासा है कि लोगों में ऐसा शख़्स भी हो सकता है, जो फ़रेब बातें करता है। जो सुननेवालों का ध्यान, हक़ से हटाकर दूसरी तरफ़ ले जाता है, और (ख़ुदा का नाम लेकर) ख़ुदा की राह से दूर करता है। उन्होंने इन आयतों पर ग़ौर नहीं किया, इनकी शाने नुजूल पर नज़र नहीं डाली। (ये आयतें उनका हाल बयान करती हैं।) ये लोग अज़ीम मरतबे वाले मशाएख की शान में भी गुस्ताखी कर सकते हैं, इसमें कोई ताज्जुब नहीं। ये कुरान का ऐसा ग़लत मायने बयान करते हैं, जिसमें हल्कापन होता है।

बाज़ लोगों ने इसी वजह से सरोद व मज़ामीर के सुनने को हराम क़रार दे दिया है। इसे सहीं साबित करने के लिए बहुत से अक़्वाल व हदीसें भी पेश करते हैं। लेकिन ये बात नहीं समझते कि ये सारी बातें तो उस ‘सुनने’ के लिए है जो बाज़ारु है। जिसके ग़लत व हराम होने में किसी को शक़ नहीं।

…जारी है… सिमा के जवाज़ में हदीस मुबारक…

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