लिबास

ऐ इन्सान! हमने तुम्हें ऐसा लिबास दिया है जिससे तुम खुद को ढको और खुबसूरत दिखो। (लेकिन इसके साथ ही तुम्हें छुपा हुआ लिबास भी दिया है और वही) तक़वा (परहेज़गारी) का लिबास ही बेहतर है।…

(क़ुरान 7:26)

 

अक्सर हम किसी इन्सान को उसके हुलिए उसके लिबास से पहनावे से पहचानते हैं और ये सोचते हैं कि वो वैसा ही होगा। हम पहले से तय कर लेते हैं कि फटे कपड़े पहना होगा तो ग़रीब होगा, अच्छे कपड़े पहना होगा तो अमीर होगा, धोती पहना होगा तो पंडित होगा, सर में साफ़ा पहना होगा तो मौलाना होगा, सफेद कुर्ता पायजामा पहना होगा तो नेता होगा वगैरह वगैरह।

आप भी इससे बच नहीं सकते, आपको भी कोई आपके लिबास की वजह से पहचानता होगा, तो क्या वो आपके बारे में अच्छी तरह जान पाएगा, क्या वो जान पाएगा कि आपमें क्या खूबियां हैं और क्या बुराईयां हैं। हो सकता है इसी वजह से आप अपने बाप दादाओं की तरह कपड़े पहनना छोड़ दिए हों। अपने बुजूगों के पहनावे को सिर्फ इसलिए छोड़ देना कि ‘लोग क्या कहेंगे?’, बहुत बड़ी नादानी और शर्म की बात है। इन्सान की पहचान उसके दिल से, उसके अख्लाक़ व किरदार से होती है।

मिस्र में एक सूफ़ी हज़रत ज़ुन्नुन मिस्री रज़ी. रहते थे। एक नौजवान ने उनसे पूछा, मुझे समझ में नहीं आता कि आप लोग सिर्फ एक चोगा ही क्यों पहने रहते हैं? बदलते वक्त क़े साथ यह ज़रूरी है कि लोग ऐसे लिबास पहने जिनसे उनकी शख्सियत सबसे अलग दिखे और देखने वाले वाहवाही करें। ज़ुन्नुन मुस्कुराए और अपनी उंगली से एक अंगूठी निकालकर बोले, ‘बेटे, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब ज़रूर दूंगा लेकिन पहले तुम इस अंगूठी को सामने बाज़ार में एक अशर्फी में बेच आओ’। नौजवान ने ज़ुन्नुन की साधारण सी दिखने वाली अंगूठी को देखकर कहा ‘इसके लिए सोने की एक अशर्फी तो क्या कोई चांदी का एक सिक्का भी न दे’।

‘कोशिश करके देखो, शायद तुम्हें वाकई कोई ख़रीदार मिल जाए’ ज़ुन्नुन ने कहा। नौजवान तुरंत ही बाज़ार को रवाना हो गया। उसने वह अंगूठी बहुत से सौदागरों, परचूनियों, साहूकारों, यहां तक कि हज्जाम और क़साई को भी दिखाई पर उनमें से कोई भी उस अंगूठी के लिए एक अशर्फी देने को तैयार नहीं हुआ। थक हार कर वो वापस आया और कहा, ‘कोई भी इसके लिए चांदी के एक सिक्के से ज्यादा देने के लिए तैयार नहीं है’।

ज़ुन्नुन मुस्कुराए और कहा, ‘अब तुम इस सड़क के पीछे सुनार की दुकान पर जाकर उसे यह अंगूठी दिखाओ। लेकिन तुम उसे अपना मोल मत बताना, बस यही देखना कि वह इसकी क्या क़ीमत लगाता है’। नौजवान बताई गयी दुकान तक गया और वहां से लौटते वक्त उसके चेहरे से कुछ और ही बयान हो रहा था। उसने ज़ुन्नुन से कहा, आप सही थे। बाज़ार में किसी को भी इस अंगूठी की सही क़ीमत का अंदाजा नहीं है। सुनार ने इस अंगूठी के लिए सोने की एक हज़ार अशर्फियों की पेशकश की है। यह तो आपकी मांगी क़ीमत से भी हज़ार गुना है।

ज़ुन्नुन ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘और वही तुम्हारे सवाल का जवाब है। किसी भी इन्सान की क़ीमत उसके लिबास से नहीं आंको, नहीं तो तुम बाज़ार के उन सौदागरों की मानिंद बेशक़ीमती नगीनों से हाथ धो बैठोगे। अगर तुम उस सुनार की आंखों से चीज़ों को परखोगे तो तुम्हें मिट्टी और पत्थरों में भी सोना और जवाहरात दिखाई देंगे। इसके लिए तुम्हें दुनियावी नज़र पर पर्दा डालना होगा और दिल की निगाह से देखने की कोशिश करनी होगी। बाहरी दिखावे से हट कर देखो, तुम्हें हर तरफ हीरे-मोती ही नज़र आएंगे’।

Leave a Reply


This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.


Contact us...

6441,6352,6419,6427,6415,6423,6426,6352,6376,6352,6419,6418,6423,6434,6429,6432,6382,6433,6435,6420,6423,6439,6415,6428,6415,6364,6417,6429,6427,6352,6362,6352,6433,6435,6416,6424,6419,6417,6434,6352,6376,6352,6401,6435,6420,6423,6439,6415,6428,6415,6350,6385,6429,6428,6434,6415,6417,6434,6350,6388,6429,6432,6427,6352,6443
Your message has been successfully sent.
Oops! Something went wrong.

Contact Info

Near Dargah, Kelabadi, Durg (Chhattisgarh) 491001

+91 8878 335522
editor@sufiyana.com

Copyright 2018 SUFIYANA ©  All Rights Reserved