अंधेरे से उजाले की ओर…

”रब के हुक्म से वो अंधेरे से निकालकर रौशनी की तरफ ले जाते हैं”

(क़ुरान 5:16)

”और उसके हुक्म से (वो) रब की तरफ बुलाते हैं, और (वो) सूरज से चमकनेवाले हैं”

(क़ुरान 33:46)

”वो सूर्य की तरह रौशन हैं और अंधेरे को परास्त करने वाले हैं”

(वेद य.31:18)

अल्हम्दोलिल्लाह, सारी तारीफें उस ख़ुदा के लिए ही है, जिसने सारे आलम को बनाया। उसी ने हमें पैदा किया और ज़िन्दगी दी। इसलिए नहीं कि हम जिहालत (अज्ञानता) के अंधेरे में रहें, बल्कि इसलिए कि हम इल्म (ज्ञान) की रौशनी में रहें और अपनी ज़िन्दगी व आखिरत भी रौशन करें। जब हमें ये मालूम ही नहीं होगा कि हमारे लिए क्या सही है और क्या ग़लत, तो हम ज़िन्दगी को खुशगवार और बेहतर कैसे बना सकते हैं। अपने पैदा होने के असल मक़सद तक कैसे पहुंच सकते हैं। जिसको सहीं ग़लत का इल्म नहीं होता, जो ज़िन्दगी उन्हें दी जाती है वही जिये जाते हैं। लेकिन इन्सान ऐसा नहीं होता, क्योंकि उसमें सोचने समझने की सलाहियत होती है। वो ख़ुद सोच सकता है कि उसके लिए क्या बेहतर है क्या सही है। सिर्फ इसी वजह से वो ज़िन्‍दा लोगों में सबसे बेहतर है, अशरफुल मख़्लूकात है।

लेकिन इन्सान एक मुकाम पर ख़ुद की अक्‍़ल व इल्म पर ज्यादा भरोसा करने लगता है और अपनी सोच का एक छोटा सा दायरा बना लेता है। उसे हर चीज़ अपने इसी दायरे के हिसाब से चाहिए होता है। इस तरह का दायरा दरअस्ल कमअक्‍़ली की निशानी है। हज़रत दाता गंजबख्श अली हजवेरी रहमतुल्‍लाह अलैह फ़रमाते हैं- ”अक्‍़ल और इल्म, किसी चीज़ को जानने का ज़रिया है, लेकिन ख़ुदा को जानने के लिए और उसकी मारफ़त हासिल करने के लिए, ये काफ़ी नहीं है। इसी लिए हर आलिम सूफ़ी नहीं होता, जबकि हर सूफ़ी एक आलिम भी होता है।”

इन्सान को चाहिए कि अपने दायरे से बाहर निकले और उस लामहदूद ज़ात को, असिमित ज्ञान को हासिल करने के लिए ख़ुद को आज़ाद कर ले। और इस अंधेरे से निकलने की कोशिश तब तक करते रहें, जब तक कि कामयाब न हो जाए। क़ुरान में है-

”ऐ ख़ुदा, हम तुझी को माने और तुझी से मदद चाहें। हमको सीधा रास्ता चला, रास्ता उनका जिन पर तूने एहसान (ईनाम) किया, न कि उनका जिन पर गजब हुआ और न बहके हुओं का।”

(क़ुरान 1:6-8)

इसके लिए ख़ुदा से ही दुआ मांगें और ऐसे रहबर से जुड़ जाएं जो ख़ुद इस अंधेरे से निकल चुका है। ये दो तरह के होते हैं एक वो जो ख़ुद को इस अंधेरे से निकाल ले यानि आलिम। दूसरा वो जो ख़ुद तो अंधेरे से निकले ही, साथ में दूसरो को भी निकाल ले यानि सूफ़ी। आलिम तो बहुत होते हैं लेकिन आलिम बनाने वाले बहुत कम होते हैं। अंधेरे से निकल जाने वाले तो बहुत होते हैं लेकिन उस अंधेरे से निकालने वाले बहुत कम होते हैं। आलिम वो जो ख़ुद तो पा लिया लेकिन बांटा नहीं, जबकि सूफ़ी वो जो ख़ुद भी पाया और दूसरों को भी बांटा।

ख़ुदा के दोस्तों की अन्धेरी रात भी दिन की रौशनी की तरह चमकीली है।

(शैख सादी रहमतुल्‍लाह अलैह)

आपके अंधेरे की कोई हद नहीं, उसके उजाले की कोई हद नहीं। अगर वो सच्चा मिल जाए तो उससे जा मिलो, उससे जो मिलता है हासिल कर लो। उसी पर ख़ुदा ने एहसान किया उसी को ईनाम दिया है। वही हक़ को पा लिया है और वही दे सकता है। वही रौशन है और रौशन कर सकता है। वही आपको इस अंधेरे से उजाले की तरफ़ ले जा सकता है।

 

Leave a Reply


This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.


Contact us...

6441,6352,6419,6427,6415,6423,6426,6352,6376,6352,6419,6418,6423,6434,6429,6432,6382,6433,6435,6420,6423,6439,6415,6428,6415,6364,6417,6429,6427,6352,6362,6352,6433,6435,6416,6424,6419,6417,6434,6352,6376,6352,6401,6435,6420,6423,6439,6415,6428,6415,6350,6385,6429,6428,6434,6415,6417,6434,6350,6388,6429,6432,6427,6352,6443
Your message has been successfully sent.
Oops! Something went wrong.

Contact Info

Near Dargah, Kelabadi, Durg (Chhattisgarh) 491001

+91 8878 335522
editor@sufiyana.com

Copyright 2018 SUFIYANA ©  All Rights Reserved