Masnavi Daftar 1

بشنو از نے چون حکایت می کند
از جدایی ها شکایت می کند

बाँसुरी से सुन! क्या बयान करती है
दर्द वजदाई की (क्या) शिकायत करती है

کز نیستان تا مرا ببریده اند
از نفیرم مرد و زن نالیده اند

कि जब से मुझे हँसली से काटा है
मेरे नाला से मर्द-ओ-औरत सब रोते हैं

سینه خواهم شرحه شرحه از فراق
تا بگویم شرحِ درد اشتیاق

मैं ऐसा सीना चाहता हूँ जो जुदाई से पारापारा होता
कि मैं इश्‍क़ के दर्द की तफ़सील सुनाऊँ

هر کسی کو دور ماند از اصلِ خویش
بازجوید روزگار وصلِ خویش

जो अपनी असल से दूर हो जाता है
वो अपने वस्ल का ज़माना तलाश करता है

من به هر جمعیتی نالاں شدم
جفت خوشحالان وبدحالاں شدم

मैं हर मजमा में रोई ख़ुश औक़ात
और बदअहवां लोगों के साथ रही

هر کسی از ظنِ خود شد یارِمن
از دورنِ من نجست اسرارِ من

हर शहस अपने ख़्याल के मुताबिक़ मेरा यार बना
और मेरे अंदर से मेरे राज़ों की जुस्तजू ना गई

سر من از ناله ی من دور نیست
لیک چشم و گوش را آں نور نیست

मेरा राज़ मेरे नाला से दूर नहीं है
लेकिन आँख और कान के लिए वो नूर नहीं है

تن ز جان و جاں ز تن مستور نیست
لیک کس را دید جاں دستور نیست

बदन रूह से और रूह बदन से छिपी हुई नहीं है
लेकिन किसी के लिए रूह को देखने का दस्तूर नहीं है

آتش است این بانگِ نائے و نیست باد
هر که این آتش ندارد نیست باد

बाँसुरी की ये आवाज़ आग है हवा नहीं है
जिसमें ये आग नहू वो नेस्त-ओ-नाबूद हो

آتش عشقست کاندرِ نے فتاد
جوشش عشق است کاندر می فتاد

इश्‍क़ की आग है जो बाँसुरी में लगी है
इश्‍क़ का जोश है जो शराब में आया है

نے حریفِ هر که از یارے بُرید
پرده هایش پرده هائے ما درید

बाँसुरी उस के साथ है जो यार से कटा हो
उस के रागों मैंने हमारे पर्दे फाड़ दिए

همچو نے زهرے و تریاقے که دید؟
همچو نی دمساز و مشتاقے که دید؟

बाँसुरी जैसा ज़हर और तिरयाक़ किस ने देखा है?
बाँसुरी जैसा साथी और आशिक़ किस ने देखा है?

نے حدیث راهِ پرخوں می کند
قصه های عشقِِ مجنوں می کند

बाँसुरी ख़तरनाक रास्ता की बात करती है
मजनून के इश्‍क़ क़िस्सा बयान करती है

محرم این هوش جز بیهوش نیست
مر زبان را مشتری جز گوش نیست

इस होश का राज़दां बेहोश के इलावा कोई और नहीं है
ज़बान का ख़रीदार कान जैसा कोई नहीं है

در غم ماروزها بیگاه شد
روزها با سوزها همراه شد

हमारे ग़म में बहुत से दिन ज़ाया हुए
बहुत से दिन सोज़िशों के साथ ख़त्म हुए

روزها گر رفت گو رو باک نیست
تو بماں ای آنکه چون تو پاک نیست

दिन अगर गुज़रीं तो कहदो-ओ-गुज़रीं पर्दा नहीं है
ऐ वो के तुझ जैसा कोई पाक नहीं है तो रहे!

هرکه جز ماهی ز آبش سیر شد
هرکه بی روزیست روزش دیر شد

जो मछली के इलावा है इस के पानी से सैर हुआ
जो बे रोज़ी है इस वक़्त ज़ाया हुआ

درنیابد حال پخته هیچ خام
پس سخن کوتاه باید والسلام

कोई नाक़िस कामिल का हाल नहीं मालूम कर सकता
पस बात मुख़्तसर चाहीए वस्सलाम

بند بگسل باش آزاد ای پسر
چند باشی بند سیم و بند زر

ऐ बेटा ! क़ैद को तोड़ आज़ाद हो जा
सोने चांदी का क़ैदी कब तक रहेगा

گر بریزی بحر را در کوزه‌ای
چند گنجد قسمت یک روزه‌ای

अगर को दरिया को एक प्याले में डाले
कितना आएगा एक दिन का हिस्सा

کوزه چشم حریصان پر نشد
تا صدف قانع نشد پر در نشد

हरीज़ों की आँख का पियाला ना भरा
जब तक सीप ने क़नाअत ना की हुई से ना भरा

هر که را جامه ز عشقے چاک شد
او ز حرص و عیب کُلی پاک شد

जिसका जामा इश्‍क़ की वजह से चाक हुआ
वो हरज़ और ऐब से बिलकुल पाक हुआ

شاد باش ای عشقِ خوش سودائے ما
ای طبیب جمله علتهائے ما

ख़ुश रह हमारे अच्छे जुनून वाले इश्‍क़
ऐ हमारी तमाम बीमारीयों के तबीब

ای دوائے نخوت و ناموس ما
ای تو افلاطون و جالینوس ما

ऐ हमारे तकब्बुर और झूटी ग़ैरत के ईलाज,
ऐ हमारे अफ़लातून और जालीनूस, तो सदा ख़ुश रहे

جسم خاک از عشق بر افلاک شد
کوه در رقص آمد و چالاک شد

ख़ाकी जिस्म इश्क़ की वजह से आसमानों पर पहुंचा
पहाड़ नाचने लगा और होशार हो गया

عشق جان طور آمد عاشقا
طور مست و خر موسی صعقا

ऐ आशिक़! इश्‍क़ तूर की जान बना
तूर मस्त बना और मूसा बेहोश हो कर गिरे

با لب دمساز خود گر جفتمے
همچو نی من گفتنیها گفتمے

अगर में अपने यार के होंट से मिला हुआ होता
बाँसुरी की तरह कहने की बातें कहता

هر که او از هم زبانی شد جدا
بی زبان شد گرچه دارد صد نوا

जो शख्‍़स दोस्त से जुदा हुआ
बेसहारा बना ख्‍़वाह सौ सहारे रखे

چونکه گل رفت و گلستاں درگذشت
نشنوی زان پس ز بلبل سر گذشت

जब फूल ख़त्म हुआ और बाग़ जाता रहा
उस के बाद तो बुलबल की सरगुज़श्त ना सुनेगा

جمله معشوقست و عاشق پردۃ
زنده معشوقست و عاشق مردۃ

तमाम कायनात माशूक़ है और आशिक़ पर्दा है
माशूक़ ज़िंदा है और आशिक़ मुर्दा है

چون نباشد عشق را پروائے او
او چو مرغے ماند بی پروائے او

जब इश्‍क़ को इस से पर्दा ना हो
वो बे पर के परिंद की तरह है इस पर अफ़सोस है

من چگونه هوش دارم پیش و پس
چون نباشد نورِ یارم ہم نفس

मैं क्या कहूं कि मैं आए पीछे का होश रखता हो
जब मेरे दोस्त का नूर का साथी ना हो

عشق خواهد کین سخن بیرون بود
آینہ ات غماز نبود چون بود

इश्‍क़ चाहता है कि ये बात ज़ाहिर हो
तेरा आईना ग़म्माज़ ना हो तो क्यूँ-कर हो

آئینات دانی چرا غمازِ نیست
زانکه زنگار از رخش ممتازِ نیست

तो जानता है तेरा आईना ग़म्माज़ क्यों नहीं है?
इस लिए कि ज़ंग उस के चेहरे से अलैहदा नहीं है

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