आमाल ही काम आएंगे Aamal hi Kaam Aayenge

Sufi Saint Amal Amaal Karm Paap Punya Rooh e Tasawwuf Khwaja Bandanawaz Gesudaraj Gulbarga

आमाल ही काम आएंगे (रूहे तसव्‍वुफ)

ख्‍़वाजा बन्‍दानवाज़ ग़ेसूदराज़ रहमतुल्‍लाह अलैह ने फरमाया-

हजरत ख्‍वाजा हसन बसरी रअ रात को काबा में इबादत कर रहे थे। तभी काबा के कोठी के उपर किसी आदमी के रोने की आवाज आई। आपने सोचा इतनी रात को काबा की छत पर कौन हो सकता है। आप उपर जाकर देखते हैं कि एक आदमी अल्‍लाह की बारगाह में गिड़गिड़ा रहा है और रो रो कर कह रहा है कि या अल्‍लाह तू जानता है कि मुझे दोज़ख़ (नरक) में जलाया जाएगा या नहीं, मुझे मेरे गुनाहों की सजा दी जाएगी या नहीं। ये सब देखकर हजरत ने सोचा कि कोई बहुत गुनाहगार आदमी है अल्‍लाह के हुजूर में फरियाद कर रहा है, इस वक्‍त इसके पास जाना ठीक नहीं।

बड़ी देर के बाद जब वो आदमी नीचे उतरा तो आप उसके सामने गए। हजरत ख्‍वाजा हसन बसरी रअ देख कर हैरान हो जाते हैं कि वो आदमी, हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्‍सलाम थे। हजरत हसन बसरी रअ फौरन इमाम हुसैन अलै के कदमों पर गिर पड़े और कहा- ऐ नवासा ए रसूल (हजरत मुहम्‍मद सल्‍ल के नवासे)! आपको खुदा ने इतना इल्‍म (ज्ञान) और बुजुर्गी दी है जो बयान नहीं किया जा सकता, और ये छोड़ भी दिया जाए तो क्‍या हजरत फातिमा रजि. काफी नहीं, क्‍या हजरत अली रजि. काफी नहीं, क्‍या हजरत मुहम्‍मद सल्‍ल. काफी नहीं। ये सुनकर हजरत इमाम हुसैन रजि. की आंखों में आंसू आ जाते हैं आप फरमाते हैं- जिस रोज नानाजान (हजरत मुहम्‍मद सल्‍ल.) पर कुरआन की ये आयत उतरी-

وَأَنذِرْ عَشِيرَتَكَ ٱلْأَقْرَبِينَ [कुरआन २६:२१४]

(और ऐ मुहम्‍मद आप अपने करीबी रिश्‍तेदारों को अजाब से डराइये।)

तो नानाजान ने अम्‍मीजान (हजरत फातिमा रजि.) को हिलाकर फरमाया-

”ऐ फातिमा, रसूलल्‍लाह की बेटी, अपने नफ्स को आग से बचा, खुदा के यहां मैं तेरे काम न आउंगा।”

ये सीख मेरे लिए भी है बाप की रियासत पर मगरूर न हो जाना। जब हजरत मोहम्‍मद सल्‍ल. का होना फातिमा रजि. के लिए काफी नहीं तो मेरे लिए कैसे काफी हो सकता है। कयामत के दिन हमारे आमाल (पुण्‍य) ही काम आएंगे।

Āmāla hī kāma ā’ēṅgē (rūhē tasavvupha) Ḵẖvājā bandānavāza ġēsūdarāza rahamatullāha alaiha nē pharamāyā-

Hajarata khvājā hasana basarī ra’a rāta kō kābā mēṁ ibādata kara rahē thē. Tabhī kābā kē kōṭhī kē upara kisī ādamī kē rōnē kī āvāja ā’ī. Āpanē sōcā itanī rāta kō kābā kī chata para kauna hō sakatā hai. Āpa upara jākara dēkhatē haiṁ ki ēka ādamī allāha kī bāragāha mēṁ giṛagiṛā rahā hai aura rō rō kara kaha rahā hai ki yā allāha tū jānatā hai ki mujhē dōzaḵẖa (naraka) mēṁ jalāyā jā’ēgā yā nahīṁ, mujhē mērē gunāhōṁ kī sajā dī jā’ēgī yā nahīṁ. Yē saba dēkhakara hajarata nē sōcā ki kō’ī bahuta gunāhagāra ādamī hai allāha kē hujūra mēṁ phariyāda kara rahā hai, isa vakta isakē pāsa jānā ṭhīka nahīṁ. Baṛī dēra kē bāda jaba vō ādamī nīcē utarā tō āpa usakē sāmanē ga’ē. Hajarata khvājā hasana basarī ra’a dēkha kara hairāna hō jātē haiṁ ki vō ādamī, hajarata imāma husaina alaihis’salāma thē. Hajarata hasana basarī ra’a phaurana imāma husaina alai kē kadamōṁ para gira paṛē aura kahā- ai navāsā ē rasūla (hajarata muham’mada salla kē navāsē)! Āpakō khudā nē itanā ilma (jñāna) aura bujurgī dī hai jō bayāna nahīṁ kiyā jā sakatā, aura yē chōṛa bhī diyā jā’ē tō kyā hajarata phātimā raji. Kāphī nahīṁ, kyā hajarata alī raji. Kāphī nahīṁ, kyā hajarata muham’mada salla. Kāphī nahīṁ. Yē sunakara hajarata imāma husaina raji. Kī āṅkhōṁ mēṁ ānsū ā jātē haiṁ āpa pharamātē haiṁ- jisa rōja nānājāna (hajarata muham’mada salla.) Para kura’āna kī yē āyata utarī-

Wāảndẖir̊ ʿasẖīrataka ٱl̊ạảq̊rabīna [kura’āna 26:214]
(Aura ai muham’mada āpa apanē karībī riśtēdārōṁ kō ajāba sē ḍarā’iyē.)

Tō nānājāna nē am’mījāna (hajarata phātimā raji.) Kō hilākara pharamāyā- ”Ai phātimā, rasūlallāha kī bēṭī, apanē naphsa kō āga sē bacā, khudā kē yahāṁ maiṁ tērē kāma na ā’uṅgā.” Yē sīkha mērē li’ē bhī hai bāpa kī riyāsata para magarūra na hō jānā. Jaba hajarata mōham’mada salla. Kā hōnā phātimā raji. Kē li’ē kāphī nahīṁ tō mērē li’ē kaisē kāphī hō sakatā hai. Kayāmata kē dina hamārē āmāla (puṇya) hī kāma ā’ēṅgē.

बैअत होना (मुरीद होना) Bait Hona

बैत होना (मुरीद होना)

सूफिया किराम के यहां ये सब से अहम तरीन रूक्न है, जिसके जरिये तालिम व तरबियत, रशदो हिदायत और इस्लाह अहवाल का काम शुरू होता है।
बैअत-ए-शैख अल्लाह के हुक्म से और हुजूरे अकरम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अमल से साबित है। अल्लाह कुरआन में फरमाता है कि बेशक जो तुम्हारे हाथों में बैअत करते हैं हकीकतन वो अल्लाह के हाथों पर बैअत करते हैं, अल्लाह का हाथ उनके हाथों पर है। बैअत का अमल हुजूर सल्ल. के अमल “बैअत-अर-रिजवान” से बतरिकए ऊला साबित है। कुछ अहले ईल्म में नजदीक बैअत वाजिब है और कुछ ने बैअत को सुन्नत कहा है। बल्कि एक गिरोह कसीरा ने इसे सुन्नत ही कहा है।
बैअत की कई किस्में होती है- जैसे बैअत-ए-इस्लाम, बैअत-ए-खिलाफत, बैअत-ए-हिजरत, बैअत-ए-जिहाद, बैअत-ए-तकवा वगैरह। लेकिन तजकिया-ए-नफ्स और तसफिया-ए-बातिन के लिए जो सूफिया किराम बैअत करते हैं वो कुरबे इलाही का जरिया बनते हैं और तसव्वुफ में इसी बैअत को “बैअत-ए-शैख” कहते हैं।
जब कोई बैअत व इरादत का चाहने वाला हाजिर होता है और इजहारे गुलामी व बन्दगी के लिए हल्कए मुरीदैन में शामिल होना चाहता है तो उसको का हाथ अपने हाथ में लेकर हल्कए इरादत और तरीकए गुलामी में दाखिल किया जाता है।
फिर तालीब से पुछते हैं कि वो किस खानवाद ए मारफत (कादिरिया, चिश्तिया, अबुलउलाई वगैरह) में बैअत कर रहा है और उससे सुनते है वो किस खानवाद ए तरीकत में दाखिल हुआ। शिजर ए मारफत के सरखेल का नाम लेते हुए सिलसिला ब सिलसिला अपने पीर के जरिए अपने तक पहुंचाते हैं और कहते हैं कि क्या तू इस फकीर को कुबूल किया? तालिब कहता है कि दिलो जान से मैंने कुबूल किया, इस इकरार के बाद उसे तालिमन कहते हैं कि हलाल को हलाल जानना और हराम को हराम समझना और शरीअते मुहम्मदी सल्ल. पर कदम जमाए रखना। (फिलहम्दोअलिल्लामह अला जुल्क )
अकाबिरों के नजदीक वसीला से तवस्स‍ले मुर्शिद ही है। हज़रत मौलाना शाह अब्दुर्रहीम, शाह वलीउल्लाह मुहद्दीस और शाह अब्दुल अजीज मुहद्दीस देहलवी साहेबान का भी यही मानना है। यहां तक कि वहाबियों के सरगना इस्माइल देहलवी का भी ये कहना है कि- ‘कुरआन में सूरे बनी इसराइल के रूकूअ 6 में रब तआला ने शख्स अकरब अलीउल्लाइह के लिए वसीला ही का लफ्ज का इस्तेमाल किया है।’
इसमें कोई शक नहीं है कि अल्लाह की बारगाह के मुकर्रेबीन का वसीला ही वो वसीला है जिसके हासिल करने की हिदायत, अल्लाह तआला ने कुरआन में फरमाई।

33rd URS MUBARAK – Hz Sufi Jalaluddin Qhizr Rumi Shah R.A.

MEHFIL E SIMA 2012

01. Bas Yahi hai Ibadat yahi Bandagi
[Sufiyana Kalam] (Ibrahim Qawwal)

02. Tum Deen Dayal ho Manmohan Ya Khawaja Jalaluddin hassan
[Manqabat] (Ibrahim Qawwal)

03. YE INAYATO MOHABBAT
[Sufiyana Kalam] (Ibrahim Qawwal)


04. CHUMA HAI DAR ARZO SAMA Da Chuma hai Dar Arzo Sama Dama Tui Dama Tui
[Naat by Maulana Jami] (Ibrahim Qawwal)

Read Sufi Stories as a Comics

Sufi Comics is a web comic by brothers Mohammed Ali Vakil & Mohammed Arif Vakil that began in the year 2009. These comics are short stories taken from Islamic history & tradition to illustrate the eternal spiritual truths in the teachings of Islam. The first 40 comics have been published in the form of a book “40 Sufi comics“.

Sufi Comics are short comic strips that illustrate the eternal spiritual truths in the teachings of Islam. These comics were published on the Arif & Ali’s Blog over the last two years. 40 Sufi Comics is a collection of these comics in the form of a book. Along side each comic are verses from the Holy Quran & Traditions from the Prophet & the Ahlul Bayt, related to the topic of the comic. Some of the titles included in the book:

* The Truth about Lies
* Mother
* Where does Wisdom come from?
* Where is God’s Treasure?
* No Problem!
* How far is Heaven?
* A Visit to Hell
* Can I see God?
and more…

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Source: suficomics

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