Husn w Jamal

हुस्न व जमाल

हज़रत हस्सान बिन साबितؓ फ़रमाते हैं.

व अहसनो मिन्का लम तरा क़त्तो ऐनी

व अजमलो मिन्का लम तलेदिन्नेसाओ

ख़ुलेक़त मुबर्रा.अम.मिन कुल्ले ऐबिन

कअन्नका क़द ख़ुलेक़त कमा तशाओ

 

हुजूरﷺ  से हसीनतर

मेरी आंख ने कभी देखा ही नहीं

और न कभी किसी मां ने

आपसे जमीलतर पैदा किया है।

आप की तख़लीक़ बेएैब है,

(ऐसा महसूस होता है कि) जैसे

रब ने आपकी ख़्वाहिश के मुताबिक़

सूरत बनाई है।

 

हज़रत ताहिर उल क़ादरी मद्देजि़ल्लहू फ़रमाते हैं.

हज़रत मूसाؑ खुदा के दीदार की ख्वाहिश रखते हैं और कहते हैं.

ऐ मेरे रब! मुझे (अपना जल्वा) दिखा कि मैं तेरा दीदार कर लूं।

(कुरान 7:143)

 

कभी ऐ हक़ीक़ते मुन्तिज़र! नज़र आ लिबासे मजाज़ में।

कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मेरी जिबीने नियाज़ में।

 

फिर क्या हुआ, एक जल्वा दिखा और पहाड़ के टुकड़े टुकड़े हो गए

और हज़रत मूसाؑ बेहोश हो गए।

होश में आकर कहते हैं, तुझसा कोई नहीं।

हरीमे नाज़ से सदा आती है, ऐ हुस्नो जमाल की तलाश करने वाले! तेरी तलाश पूरी हो चुकी है।

 

यूं तो हर तरफ़ रब के ही हुस्न का जल्वा है…

तुम जिधर भी रूख करो उधर ही अल्लाह की तवज्जो है।

(यानी हर सिम्त अल्लाह ही की ज़ात जल्वागर है।)

(कुरान 2:115)

 

लेकिन महबूबﷺ  का हुस्न, सारे ख़ल्क़ में आला है।

और महबूबﷺ  की ज़ाते अक़दस पर रब का हुस्न शबाब पर है।

 

तेरे जमाल से बढ़कर कोई जमाल नहीं।

तु बेमिसाल है तेरी कोई मिसाल नहीं।

 

कहते हैं सूरत दरअस्ल सीरत का आईना होती है।

ज़ाहिरी सूरत देख कर इन्सान के सीरत का बहुत कुछ अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

जब हुज़ूरﷺ  की मिसाल सीरत में नहीं मिलती तो फिर हुज़ूरﷺ  की हुस्नो जमाल कैसा होगा?

हुस्ने युसफू, दमे ईसा, यदे बैज़ा दारी।

आंचा खूबां हमा दारंद तु तन्हादारी।

हुज़ूरﷺ  की ज़ात, हुस्नो कमाल की वो शाहकार है, कि

कायनात के सारी खुबसूरती उसके सामने ग़रीब है।

दुनिया की सारी रानाइयां आप ही के दम से है।

हुज़ूरﷺ  के हुस्न के सामने चांद भी फीका है।

और आपके चेहरे में वो ताब व जलाल है कि

सहाबियों की जी भर के देखने की हिम्मत भी नहीं होती।

रब ने आपको वो हुस्नो जमाल अता फ़रमाया है कि अगर उसका ज़हूर एक साथ हो जाए

तो इन्सानी आंख में ताब नहीं कि उन जल्वों को देख सके।

लेकिन रब है कि हुजूरﷺ  को तकता रहता है…

हम तो आपकी तरफ़ से निगाहें हटाते ही नहीं हैं और हम हर वक़्त आप ही को तकते रहते हैं।

(कुरान 52:48)

 

एक सूफ़ी का फ़रमाते है-

अक्सर लोगों ने रब का इरफ़ान तो हासिल कर लिया

लेकिन हुज़ूरﷺ  का इरफ़ान उन्हें हासिल नहीं हो सका,

क्योंकि बशरियत के परदे ने उनकी आंखें ढक दी थीं।

 

हदीस के मुताबिक,

हुज़ूरﷺ  की हक़ीक़त खुदा के अलावा कोई नहीं जानता।

 

खुदा की ग़ैरत ने डाल रखे हैं तुझ पे सत्तर हज़ार परदे।

जहां में लाखों ही तूर बनते जो इक भी उठता हिजाब तेरा।

 

 

 

 

hazarat hassaan bin saabit faramaate hain.

va ahasano minka lam tara qatto ainee

va ajamalo minka lam taledinnesao

khuleqat mubarra.am.min kulle aibin

kaannaka qad khuleqat kama tashao

hujoorashly allh ʿlyh wslm se haseenatar

meree aankh ne kabhee dekha hee nahin

aur na kabhee kisee maan ne

aapase jameelatar paida kiya hai.

aap kee takhaleeq beeaib hai,

(aisa mahasoos hota hai ki) jaise

rab ne aapakee khvaahish ke mutaabiq

soorat banaee hai.

hazarat taahir ul qaadaree maddejillahoo faramaate hain.

hazarat moosa khuda ke deedaar kee khvaahish rakhate hain aur kahate hain.

ai mere rab! mujhe (apana jalva) dikha ki main tera deedaar kar loon.

(kuraan 7:143)

kabhee ai haqeeqate muntizar! nazar aa libaase majaaz mein.

ki hazaaron sajade tadap rahe hain meree jibeene niyaaz mein.

phir kya hua, ek jalva dikha aur pahaad ke tukade tukade ho gae

aur hazarat moosa behosh ho gae.

hosh mein aakar kahate hain, tujhasa koee nahin.

hareeme naaz se sada aatee hai, ai husno jamaal kee talaash karane vaale! teree talaash pooree ho chukee hai.

yoon to har taraf rab ke hee husn ka jalva hai…

tum jidhar bhee rookh karo udhar hee allaah kee tavajjo hai.

(yaanee har simt allaah hee kee zaat jalvaagar hai.)

(kuraan 2:115)

lekin mahaboobashly allh ʿlyh wslm ka husn, saare khalq mein aala hai.

aur mahaboobashly allh ʿlyh wslm kee zaate aqadas par rab ka husn shabaab par hai.

tere jamaal se badhakar koee jamaal nahin.

tu bemisaal hai teree koee misaal nahin.

kahate hain soorat darasl seerat ka aaeena hotee hai.

zaahiree soorat dekh kar insaan ke seerat ka bahut kuchh andaaza lagaaya ja sakata hai.

jab huzoorashly allh ʿlyh wslm kee misaal seerat mein nahin milatee to phir huzoorashly allh ʿlyh wslm kee husno jamaal kaisa hoga?

husne yusaphoo, dame eesa, yade baiza daaree.

aancha khoobaan hama daarand tu tanhaadaaree.

huzoorashly allh ʿlyh wslm kee zaat, husno kamaal kee vo shaahakaar hai, ki

kaayanaat ke saaree khubasooratee usake saamane gareeb hai.

duniya kee saaree raanaiyaan aap hee ke dam se hai.

huzoorashly allh ʿlyh wslm ke husn ke saamane chaand bhee pheeka hai.

aur aapake chehare mein vo taab va jalaal hai ki

sahaabiyon kee jee bhar ke dekhane kee himmat bhee nahin hotee.

rab ne aapako vo husno jamaal ata faramaaya hai ki agar usaka zahoor ek saath ho jae

to insaanee aankh mein taab nahin ki un jalvon ko dekh sake.

lekin rab hai ki hujoorashly allh ʿlyh wslm ko takata rahata hai…

ham to aapakee taraf se nigaahen hataate hee nahin hain aur ham har vaqt aap hee ko takate rahate hain.

(kuraan 52:48)

ek soofee ka faramaate hai-

aksar logon ne rab ka irafaan to haasil kar liya

lekin huzoorashly allh ʿlyh wslm ka irafaan unhen haasil nahin ho saka,

kyonki bashariyat ke parade ne unakee aankhen dhak dee theen.

hadees ke mutaabik,

huzoorashly allh ʿlyh wslm kee haqeeqat khuda ke alaava koee nahin jaanata.

khuda kee gairat ne daal rakhe hain tujh pe sattar hazaar parade.

jahaan mein laakhon hee toor banate jo ik bhee uthata hijaab tera.

Rab ka Shukrana

Rab ka Shukrana

रब का शुक्राना

 

खुदा ने कहा…

अगर तुम शुक्र अदा करोगे तो मैं तुम पर नेमअतों की बारिश कर दूंगा…

(कुरान 14:7)

जो शुक्र अदा करता है, वो अपने फ़ायदे के लिए ही शुक्र अदा करता है…

(कुरान 31:12)

पूजनीय, आकाश व पृथ्वी को सत्य के मार्ग से चलाने वाले परमेश्वर से

शुक्र के साथ (विनम्रता पूर्वक) हाथ ऊपर उठाकर प्रार्थना करो।

(ऋगवेद 6:16:46)

पवित्र आत्मा की सहायता पाने के लिए (शुक्रिया के साथ) प्रार्थना करो।

(बाईबिल 1कुरि.1:26.2:16)

 

एक सूफ़ी हर रोज़ सुब्ह शाम रब का शुक्र अदा करते। वो कहते. या रब! तेरे रहमो करम की कोई इंतेहा नहीं। तु मेरी ज़रूरतें हमेशा पूरी करता है। तेरा जितना शुक्र अदा किया जाए कम है।

शेर

तु नवाज़ने पे आए, तो नवाज़ दे ज़माना।

तु करीम ही जो ठहरा, तो करम का क्या ठिकाना।।

ये उनके मुरीदों को अच्छी नहीं लगती। क्योंकि कभी कभी तो ज़रूरतें पूरी हो जाती थी, मगर ज़्यादातर नहीं होती थी। लेकिन सूफ़ी साहब हैं कि हमेशा यही दुआ व शेर पढ़ते और शुक्र अदा करते रहते।

एक बार सूफ़ी साहब अपने मुरीदों के साथ सफ़र के लिए रवाना हुए। रास्ते में एक गांव पड़ा। वहां कुछ दिनों पहले ही कोई ढोंगी बाबा, गांववालों को धोका देकर और लूट कर भागा था।

जब सूफ़ी जी वहां पहुंचे तो गांव वालों ने उन्हें गांव में घुसने ही नहीं दिया और बुरा भला कह कर भगा दिया।

इसी तरह आसपास के गांववालों ने भी ऐसा ही किया। अब कई दिन हो गए, गर्म रेत का सफ़र, न खाना मिला न पानी। सबकी हालत खराब। लेकिन सूफ़ी साहब का मामूल जारी रहा। वो उसी तरह रब का शुक्र अदा करते रहते और शेर पढ़ते रहते।

इस पर मुरीदों को बर्दाश्त नहीं हुआ, उनसे पूछने लगे. आप किस रहमो करम की बात कर रहे हैं। भूख से हमारा बुरा हाल है। खाना पीना तो दूर, गांव वालों को तो हमारा आना ही बर्दाश्त नहीं।

उस रब का हम पर इतना जुल्म। और आपकी जुबान पर हमेशा वही शुक्राना?

सूफ़ी साहब जब शुक्र अदा करते तो उनके आंखों से आंसु बहते।

लेकिन मुरीद की ये बात सुनकर वो मुस्कराए और बोले. तुम नादान हो बेटा। तुम्हें समझ नहीं। इतने दिन हमारी ये हालत, हमारी ज़ात के लिए ज़रूरी है।

हमारा प्यासा रहना, भूखा रहना, दरबदर रहना, सब उसकी इनायतें हैं। क्योंकि वो कभी हमारा बुरा नहीं करता। हां, आज़माता ज़रूर है और सिर्फ़ उसका इम्तेहान लेता है, जो उसे पसंद होता है।

वो शुक्र ही क्या जो बग़ैर आज़माईश के हो। वो कैसा शुक्र है कि इम्तेहान के वक़्त न रहे।

अगर वो तक़लीफ़ दे रहा है तो यक़ीनन उस तक़लीफ़ में भी हमारी कोई भलाई छिपी हुई होगी।

rahmatul lil alameen

Rahmatul lil Alameen

सबके लिए रह़मत

वो हर आलम के लिए रहमत

किसी आलम में रह जाते…

ये उनकी मेहरबानी है,

कि ये आलम पसंद आया…

हज़रत मुहम्मदﷺ सारे आलम के लिए रहमत और मुहब्बत हैं, चाहे वो इस दुनिया का हो या उस दुनिया का, चाहे किसी भी ग्रह या सौरमंडल का, चाहे इन्सान हो या जानवर, चाहे मुसलमान हो या न हो। हर किसी के लिए हुज़ूरﷺ मुहब्बत हैं। फातिमा कहती हैं. मुहम्मदﷺ का मतलब मुहब्बत है।

हुज़ूरﷺ की पैगम्बरी जि़ंदगी देखिए. जो ‘पढ़ अल्लाह के नाम से’ (इक़रा बिस्मे रब्बोकल्लजी) से शुरू हो रही है। पहला ही दर्स पढ़ने का दे रहे हैं। बल्कि इल्म (ज्ञान) का हासिल करना फ़र्ज़ कर रहे हैं और अज्ञानता के अंधेरे से निकाल रहे हैं। आप कह रहे हैं कि इल्म हासिल करो चाहे चीन जाना पड़े। पुरानी सामाजिक कुरीतियों को तोड़कर सबको एक होने का पाठ पढ़ा रहे हैं। सबको एक हो जाने की दावत दे रहे हैं। बच्चियों को जि़ंदा मार देने से रोक रहे हैं। दहेज से मना कर रहे हैं।

इन्सान एक चींटी तो बना नहीं सकता लेकिन सैकड़ो खुदा बना लेता है। हुज़ूरﷺ इन बातों से निकाल कर वहदानियत (एकेश्वरवाद) की तरफ आने की दावत दे रहे हैं। जो मक्की (मक्के के रहने वाले) उन्हें ‘सादिक़ उल वादुल अमीन’ (वादे का सच्चा, सत्यनिष्ठ और अमानतदार) कहते थे, वो अब दुश्मन हो गए हैं। हुज़ूरﷺ की पहाड़ के दूसरी तरफ फौज वाली बात मान रहे हैं, लेकिन ये नहीं मान रहे कि सबका मालिक एक है। बल्कि इस बात पर उन्हें सताया जा रहा है, यहां तक कि आप पे पत्थर बरसाए जा रहे हैं, सर से खून बह रहा है, लेकिन आप उफ़ भी नहीं कर रहे हैं।

आपको ‘सादिक़’ की जगह ‘मजनूं’ कहा जा रहा है। आपको और आपके मानने वालों को भुका प्यासा खाली हाथ, शहर से बाहर कर दिया जा रहा है। इस पर आप कह रहे हैं, मुझे पैगम्बर नहीं मानते, मत मानो, लेकिन छोटे छोटे बच्चों की ख़ातिर कम से कम एक इन्सानों जैसा बरताव तो करो। मक्का, जो बहुत से खुदाओं का मरकज़ (केन्द्र) होने की वजह से व्यापार का भी मरकज़ है, वहां से एक इन्सान तमाम बुरी और ग़लत परंपराओं को तोड़कर एक इंकेलाब (क्रांति) ला रहा है। वो कह रहा है. लो हक़ (सत्य) आ गया, इसे आना ही था, उसे छाना ही था और बातिल (असत्य) मिट गया, इसे मिटना ही था।

हुजूरﷺ सारी तकलीफ़ों को सहते हुए, खुदाई चट्टान की तरह मज़बूत डटे रहे। हर मुसीबत के आगे आपकी हिम्मत भारी रही। आप अपनी जि़न्दगी का एक लम्हा भी खुद के लिए नहीं छोड़ा। आप पांच वक्त की इमामत फ़रमा रहे हैं। खुतबे दे रहे हैं, वाज़ फ़रमा रहे हैं। दिन भर गली गली घूम घूम कर दीन की तब्लीग़ कर रहे हैं। रातभर रब की इबादत में गुज़ार रहे हैं। वो भी ऐसी इबादत कि खड़े खड़े पांव मुबारक में सूजन आ रही है। इस पर रमज़ान आ गया तो रोज़े पर रोज़े रख रहे हैं और वैसे ही दूसरे रखने लगे, तो कह रहे हैं. तुम में से मेरे मिस्ल कौन?

लोग झुंड के झुंड चले आ रहे हैं, ईमानवाले बन रहे हैं। हुज़ूरﷺ उनसे मिल रहे हैं, उनके हाल चाल पूछ रहे हैं, उनकी इस्लाह कर रहे हैं, उनको दीन सिखा रहे हैं। हुज़ूरﷺ घर में हैं तो घर से, मस्जिद में हैं तो मस्जिद से, गरज़ के जहां भी हैं, वहीं से अपने रब का काम कर रहे हैं।

एक एक को रब की राह दिखा रहे हैं। नया दीन, नए मसले। लोगों को कुछ भी नहीं मालूम। छोटी से छोटी बात हो या बड़ी से बड़ी बात हो, बतानेवाले एक हुज़ूरﷺ ही हैं। किसी ने रब को नहीं देखा, किसी ने जिब्रईल को नहीं देखा, जो देखा सिर्फ़ हुज़ूरﷺ को देखा। हुज़ूरﷺ बोले ये कुरान है, तो वो कुरान है। हुज़ूरﷺ बोले अल्लाह एक है तो अल्लाह एक है। हुज़ूरﷺ बोले ये हक़ है तो वो हक़ है। लोग हैं कि दीवाने हुए जा रहे हैं, हुज़ूरﷺ की बारगाह में निगाहें सजाए बैठे हैं। और आपﷺ हैं कि मानो बताने के लिए तड़प रहे हैं। किसी को ऊंचा सुनाई देता है तो ऊंचा कह रहे हैं, किसी को समझ नहीं आया तो दोबारा समझा रहे हैं। जिसकी जैसी अक़्ल होती, हुज़ूरﷺ उनको उस तरह बता रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो, एक शमा है और बाक़ी सब परवाने हैं। शमा वो है जो अपने महबूब के नूर से जगमग है और परवाने उस नूर को पाने के लिए मचल रहे हैं।

हुज़ूरﷺ यतीमों, मिस्कीनों को गले लगा रहे हैं, जो समाज के ठेकेदारों को नागवार गुज़र रही है। हुज़ूरﷺ उन अरबियों को माफ़ करना सिखा रहे हैं, जिनकी डिक्शनरी में माफ़ करना था ही नहीं। हुज़ूरﷺ एक बुढ़िया का सामान ढो रहे हैं, जो आपको पसंद नहीं करती। ऐसा नहीं की सिर्फ दीन का ही काम कर रहे हैं, बल्कि घर के कामों में भी हाथ बटा रहे हैं। कोई ज़रूरत पड़ी तो खुद ही बाज़ार से सामान ला रहे हैं। आप अपना काम खुद करते हैं, दूसरो पर नहीं टालते।

आप सब कुछ मोहताज ज़रूरतमंदों को दान कर रहे हैं, बल्कि चालीसवां हिस्सा दान करने का कानून बना रहे हैं। अपना पहना हुआ भी दे रहे हैं, अपने हिस्से का खाना भी बांट रहे हैं। खुद के पास नहीं बचा तो दूसरों से दिला रहे हैं। खुद भूख लगने पर पेट में पत्थर बांध रहे हैं, लेकिन दूसरों को खाना खिला रहे हैं, और कह रहे हैं कि जिस खाने वाले का पड़ोसी भूखा सोए वो हम में से नहीं। इस सख़ावत पर लोग रश्क़ कर रहे हैं कि काश हम भी ग़रीब होते। आपकी सख़ावत को देखकर खुदा को आयत नाजि़ल करनी पड़ रही है कि. इस क़दर सख़ावत न करें कि आपको तकलीफ़ पहुंचे। क्योंकि आपकी तकलीफ़ से खुदा को तकलीफ़ होती है।

आप जहां अपने आशिक़ों के सरदार (नेता) हैं, वहीं एक बादशाह भी हैं। आपको दूसरे मुल्कों के बादशाह से राजनीतिक संबंध भी संभाल रहे हैं, उन्हें हक़ की दावत दे रहे हैं। जो मुल्क पर हमला कर रहे हैं, उनसे मुल्क की हिफ़ाज़त कर रहे हैं। साथ ही लोग आपके पास अपने झगड़े ले कर आ रहे हैं, आप उन्हें हल कर रहे हैं।

नमाज़ के साथ वक़्त की पाबंदी सिखा रहे हैं। ज़कात के साथ ग़रीबों की मदद करना सिखा रहे हैं। रोज़ा के साथ अपने नफ़्स (इंद्रियों) को काबू करना सिखा रहे हैं। लोगों को लेकर हज को जा रहे हैं, हज के सारे फ़राएज़ अंजाम दे रहे हैं। कहीं फ़ख्र से चल रहे हैं तो कहीं झुक कर इबादत कर रहे हैं।

लोग दूर दूर से चले आ रहे हैं, आप उनके रहने व खाने का भी इंतेज़ाम कर रहे हैं। आने वालों में जहां अक़्लमंद हैं जो समझदारी से काम लेते हैं तो वहीं जाहिल व उजड्डी लोग भी हैं, आप उन सब को साथ लेकर चल रहे हैं। कह रहे हैं. सब बराबर हैं। न गोरा, काले से बेहतर है, न काला गोरे से।
एक औरत हर रोज़ आप के ऊपर कचरा फेंक रही है। आप बदले में उसे मुस्कराहट दे रहे हैं और जिस दिन वो कचरा फेंकने नहीं आई तो उसके हालचाल पूछने जा रहे हैं। वो कह उठी. हक़ीक़तन आप सरापा रहमत हैं।

आप उस मुक़ाम पर फ़ाएज़ हैं कि खुदा का कलाम वही की शक़्ल में आप पर नाजि़ल हो रही है। उस कलाम को अपने ज़ुबान मुबारक से पढ़कर सुना रहे हैं, लिखवा रहे हैं, याद करवा रहे हैं और ताक़यामत सीनों में महफूज़ कर रहे हैं। आप चारों तरफ से दुश्मनों से घिरे हुए हैं, लेकिन उन्हें कुरान पढ़कर सुना रहे हैं, मुहब्बत सिखा रहे हैं।

आपकी सिखाई मुहब्बत का ये असर हुआ कि आपको क़त्ल करने आए, हज़रत उमरؓ आप पर ही फि़दा हो रहे हैं। आपके एक दांत टुटने पर हज़रत उवैस करनीؓ अपने सारे दांत तोड़ रहे हैं। गरज़ के लोग आपके दीवाने हुए जा रहे हैं, आप पर सब कुछ कुर्बान किए जा रहे हैं।

आप रब की बारगाह में इतना अस्तग़फ़ार कर रहे हैं, इतना गिड़गिड़ा रहे हैं कि आंसूओं से दामन भीग रहा है। जबकि आप मासूम हैं, आपसे कोई गुनाह हुआ ही नहीं। दुनिया में रहते हुए भी दुनियादार न रहना, कोई हुज़ूरﷺ से सिखे।

हमारे लिए इतना सब करने के बाद भी, आख़री खुतबे में लोगों से पूछ रहे हैं. क्या मैंने अपना फ़र्ज़ पूरा किया? लोगों ने आंसूओं के साथ कहा हां तो फ़रमाते हैं. ऐ अल्लाह तु ही बता, जो जि़म्मेदारी तुने मुझे सौंपी थी, वो पूरी हुई? खुदा कहता है. हां, हमने दीन को मुकम्मल कर दिया और अपनी सारी नेअमतें तुम्हें दे दी।

कुरबान मैं उनकी बिख़्शश पर,

मक़सद भी ज़ुबां पर आया नहीं।

बिन मांगे दिया और इतना दिया,

दामन में हमारे समाया नहीं।।

Sarkar Ghaus e Azam

सरकारे ग़ौसे आज़मؓ

ग़ौसे आज़मؓ
बमने बेसरो सामां मददे
किबलए दीं मददे
काबाए ईंमां मददे

सरकारे ग़ौसे आज़म, नज़रे करम खुदारा।
मेरा खाली क़ासा भर दो, मैं फ़क़ीर हूं तुम्हारा।।

झोली को मेरी भर दो, वरना कहेगी दुनिया।
ऐसे सख़ी का मंगता, फिरता है मारा मारा।।

सब का कोई न कोई, दुनिया में आसरा है।
मेरा बजुज़ तुम्हारे, कोई नहीं सहारा।।

मौला अली का सदक़ा, उसमां उमर का सदक़ा।
मेरी लाज रखना मीरां, मैं फ़क़ीर हूं तुम्हारा।।

मीरां बने हैं दुल्हा, शादी रची हुई है।
सब औलिया बराती, क्या खूब है नज़ारा।।

ये अ़ताए दस्तगीरी, कोई मेरे दिल से पूछे।
वहीं आ गए मदद को, मैंने जब जहां पुकारा।।

ये तेरा करम है या ग़ौस, जो बना लिया है अपना।
कहां मुझसा ये कमीना, कहां आसतां तुम्हारा।।

दामन पसारे दर पर, लाखों वली खड़े हैं।
कहां ‘रूसिया फ़रीदी’, कहां तेरा आस्ताना।।

سرکار غوثِ اعظم

؎  غوثِ اعظم
بمن بے سر وساماں مددے
قبلہ دیں مددے
کعبہ ایماں مددے

سرکار غوث اعظم نظر کرم خدارا
میرا خالی کاسہ بھردو میں فقیر ہوں تمھارا

جھولی کو میری بھردو ورنہ کہے گی دنیا
ایسے سخی کا منگتا پھرتا ہے مارا مارا

سب کا کوئی نہ کوئی دنیا میں آسرا ہے
میرا بجز تمھارے کوئی نہیں سہارا

مولا علی کا صدقہ عثماں عمر کا صدقہ
میری لاج رکھنا میراں، میں فقیر ہوں تمہارا

میراں بنے ہیں دولہا محفل سجی ہوئی ہے
سب اولیاء باراتی کیا خوب ہے نظارا

یہ ادائے دستگیری کوئی میرے دل سے پوچھے
وہیں آگئے مدد کو میں نے جب جہاں پکارا

یہ تیرا کرم ہے مجھ پر کہ بنا لیا ہے اپنا
کہاں مجھ سا یہ کمینہ کہاں سلسلہ تمہارا

دامن پسارے درپہ لاکھوں ولی کھڑے ہیں
کہاں روسیاہ فریدی کہاں آستاں تمہارا

Sarkar Ghaus e Azam

Ghause A’zam
Bamane Besaro Saamaan Madade
Qiblaa é Deen Madade
Ka’baa é Imaan Madade

Sarkaar-e-Ghous-e-Azam Nazr-e-Karam Khudara
Mera Khaali Kaasa Bhar Do Mein Faqeer Hoon Tumhara

Jholi Ko Meri Bhar Do Warna Kahe Gei Duniya
Aisay Sakhi Ka Mangta Phirta Hai Maara Maara

Sab Ka Koi Na Koi Duniya Mein Aasra Hai
Mera Bajuz Tumharay Koi Nahin Sahara

Maula Ali ka Sadqa, Usman Umar ka Sadqa
Meri Laaj rakhna Miran, Main Faqir hun tumhara

Miran bane hain Dulha, Shadi rachi hui hai
Sab Auliya Barati, Kya khoob hai Nazara

Ye Ada e Dastagiri, Koi mere Dil se puchhe
Wahi aa gaye madad ko, maine jab jahan Pukara

Ye Tera Karam Hai Ya Ghous Ke Bulaliya Hai Darpe
Kahan Mujhsa Ye Kameena Kahan Aastaan Tumhara

Daman pasare dar par, Lakhon Wali khade hain
Kahan Rusiya Fareedi Kahaan Astaan Tumhara

SARKAR GHAUS E AZAM (by Amna Ashfaq)


SARKAR GHAUS E AZAM (by Hooriya Rafiq Qadri)

SARKAR GHAUS E AZAM (by Owais Raza Qadri)

SARKAR GHAUS E AZAM (by Yasar Ali Qawwal)

SARKAR GHAUS E AZAM (Qawwali)


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