Sufiyana 212

सबका ख़ुदा एक है…

यहां हम सूफ़ी मख़्दूम यहया मुनीरीؓ के उन तालीमात का ज़िक्र करेंगे, जो आपने अपने खास मुरीद क़ाज़ी शम्सुद्दीनؓ को ख़त की शक्ल में अता की। दरअस्ल क़ाज़ी साहब आपकी खि़दमत में हाज़िर नहीं हो सकते थे, इसलिए आपसे इस तरह से (यानी ख़तो किताबत के ज़रिए) तालिम की दरख़्वास्त की थी। ये भी बुजूर्गों का एक हिकमत भरा अंदाज़ ही है कि क़ाज़ी साहब के साथ.साथ हम लोगों को भी तालीम हासिल हो रही है। शुक्र है उन सूफ़ीयों, आलिमों और जांनिसारों का जिनके ज़रिए ये सूफ़ीयाना बातें हम तक पहुंच रही है और दुआ है कि ताक़यामत इससे लोग फ़ैज़याब होते रहें।

 

ऐ मेरे प्यारे शम्सुद्दीन! अल्लाह तुम्हें दोनों जहान की इज़्ज़त दे। मालूम होना चाहिए कि बुजूर्गों के नज़दीक शरीअ़त-तरीक़त-हक़ीक़त-मारफे़त की तरह तौहीद के भी चार दर्जे हैं और हर दर्जे में अलग अलग हालत व असरात हैं।

पहला दर्जा

इसमें वो लोग आते हैं जो जुबान से तो ‘लाईलाहा इल्लल्लाह’ (अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं) का इक़रार करते हैं, लेकिन दिल से हुजूरﷺ  की रिसालत और तौहीद (एक ईश्वर) को नहीं मानते। ऐसे लोगों को मुनाफि़क़ कहा गया और ऐसों से बचने सख्त हिदायत है।

दूसरा दर्जा

इसकी दो शाखें हैं, एक गिरोह वो जो ज़बान से भी तौहीद का इक़रार करता है और दिल से भी तक़लीदन (नकलची की तरह) यक़ीन रखता है कि ‘अल्लाह एक है और उसका कोई शरीक नहीं’। जैसा कि बाप दादाओं से सुना है, वैसा ही मानने लगते हैं। इस गिरोह में आम मुसलमान आते हैं। दूसरा गिरोह वो है जो ज़बान से भी तौहीद का इक़रार करता है और दिल से भी सच्चा यक़ीन रखता है। सिर्फ अपने बड़ों से सुनने की वजह से तौहीद पर यक़ीन नहीं रखता बल्कि ईल्म और सैकड़ों दलीलों के साथ पुख्ता यक़ीन रखता है। ये लोग उलमा.ए.ज़वाहिर (ज़ाहिरी बातों को अहमियत देने वाले ज्ञानी) या मुतकल्लेमीन (अक़ली दलील के माहिर) कहलाते हैं।

आम मुसलमान व उलमा ए ज़वाहिर की तौहीद, शिर्के जली से बचने के लिए होती है। इसमें आखिरत की भलाई, दोजख से रिहाई और जन्नत के लालच भी होता है। अलबत्ता इस तौहीद में मुशाहिदा नहीं होता। यानी इसमें नूरे इलाही हासिल नहीं होती। इसलिए अरबाबे तरीक़त के नज़दीक इस तौहीद से तरक्की न करना, बहुत छोटे दर्जे पर क़नाअत करना है। इसे बुढ़ी औरत के दीन अख्तियार करना कहा गया है।

तीसरा दर्जा

इस दर्जे में मुवह्हेदे मोमिन आते हैं, जो अपने पीरे तरीक़त की इत्तेबा करते हुए मुजाहिदा व रियाज़त में मशगूल रहते हैं। इनके दिल में रफ्ता रफ्ता तरक्क़ी करते हुए नूरे बसीरत पैदा हो जाती है और इस नूर से उसको इसका मुशाहिदा होता है कि फाएल हक़ीक़ी वही एक ज़ात है। सारा आलम गोया कठपुतली की तरह है। किसी को कोई इख्तियार नहीं है। तौहीद का ऐसा यक़ीन किसी फेल की निसबत से दूसरे की तरफ नहीं किया जा सकता। ये ख़ुद की तलब और खुदा की इनायत से ही हासिल हो सकता है।

यहां एक मिसाल लेते हैं जिससे तौहीद आमियाना, तौहीद मुतकल्लेमाना और तौहीद आरिफाना में फ़र्क़ समझ आ जाएगा। किसी शहर में एक सौदागर सामान बेचने पहुंचा, उसकी शोहरत हुई, लोग उसके माल असबाब देखने पहुंचे। किसी ने ज़ैद से पूछा. क्या तुम्हें मालूम है कि शहर में एक सौदागर आया है। हां सहीं खबर है क्योंकि मुझे एक भरोसेमंद इन्सान ने बताया है। ये तौहीद आमियाना की मिसाल है। इसी तरह किसी ने उमर से उस सौदागर के बारे में पूछा तो उमर ने फ़रमाया कि हां, मैं अभी अभी उसी तरफ से होकर आया हूं, सौदागर से मुलाकात तो नहीं हुई लेकिन उसके माल व सामान, नौकरों और उसकी घोड़ी भी देखा। यहां किसी तरह का शक या शुबा नहीं है। ये तौहीद मुतकल्लेमाना की मिसाल है। इसी तरह किसी ने खालिद से सौदागर के बारे पूछा तो उसने कहा . बेशक, मैं तो अभी अभी उन्हीं के पास से आ रहा हूं। मेरी उनसे अच्छी तरह मुलाकात हुई। ये तौहीद आरिफाना है।

यहां गौर करने वाली बात है कि ज़ैद ने सुनी सुनाई बात पर यकीन किया, उमर ने मालो असबाब यानि दलीलों से यकीन किया और खालिद ने देखकर यकीन किया। ये तीनों बातें उपर दर्ज तौहीद के तीन दर्जे को बयान करती है। सूफियों के नज़दीक, जिस तौहीद में मुशाहिदा न हो, वो सिर्फ ढांचे की तरह है। उसमें जान नहीं है। इसमें ख्याली असरात हैं। जब तक नूरे इलाही का दीदार न हो, उसका पूरा यक़ीन कैसे हो सकता है।

हमारे हुजूरﷺ  को अल्लाह ने अपना दीदार कराया। हमारी तौहीद दलीलों पर बेस्ड नहीं है, हम तो देखे हुए पर ईमान लाते हैं।

चौथा दरजा

तौहीद का चौथा दरजा, वो दरजा है जहां तक बहुत बहुत ज़िक्र, इबादत, रियाज़त व मुजाहिदे के बाद तरक़्क़ी करते हुए पहुंचा जाता है। यहां कभी हर सिम्त अल्लाह के सिवा कुछ नज़र नहीं आता। तजल्लियाते सिफाती का ज़हूर इस शिद्दत से दिल पर उतर जाता है कि बाकी सारी हस्तियां उसकी नज़र से गुम हो जाती है। जिस तरह सूरज की तेज़ रौशनी के आगे ज़र्रा नज़र नहीं आता। धूप में जो ज़र्रा नज़र नहीं आता, ऐसा नहीं कि वो खत्म हो जाता है, बल्कि वो ज़र्रा भी सूरज की रौशनी से चमकदार हो जाता है। खिड़की से आती धूप में ज़र्रे नाचते झूमते दिखते हैं, लेकिन जब बाहर आकर देखो तो धूप के सामने कोई ज़र्रा नज़र नहीं आता। इसी तरह बंदा खुदा नहीं होता और ना ही बंदा खत्म होता है। नहीं होना अलग चीज़ है और नहीं दिखना अलग चीज़। जब उसका नूर नहीं होता सब दिखता है और जब उसके नूर से मुशाहिदा होता है तो कोई नज़र नहीं आता। इसे नूर का जलवा कहें या फिर नज़र की कूवत। जो भी हो, होता वही है और होना वही है। सूफि़यों के नज़दीक इस मुकाम को ‘फ़ना.फि़त.तौहीद’ कहा जाता है। इस दर्जे में किसी पर हफ्ते में फनाहियत तारी होती है तो किसी पर हर रोज़ तो कोई हर वक़्त इसी हालत में होता है।

इस मुकाम पर अगर झूठ, फरेब, दिखावा या शैतानियत सवार हो तो ये बंदे की ही कमी मानी जाएगी। इसमें कोई शक नहीं कि खुदा की तजल्ली होती है और वो अपना जलवा दिखाता है। लेकिन इस मुकाम पर पहुंचना और वहां कायम रहना, बगैर खुदा की मरज़ी और पीर की मदद के मुमकीन नहीं है। पीर वो है जो ख़ुद उस मुकाम पर फ़ाएज़ हो, साहबे बसीरत हो और मुरीद के बहकने या गिरने पर, सम्भालने की ताक़त रखता हो।

‘फ़ना-फि़त-तौहीद’ से उपर भी एक मुकाम होता है जिसे ‘अल-फ़नाओ-अनिल-फ़ना’ कहते हैं। इस फ़नाहियत में ख़ुद के होने का एहसास भी नहीं होता। यहां तक कि फ़ना होने की खबर भी नहीं होती। एक जुम्बीश में सब बातें गायब हो जाती है। किसी किस्म का इल्म बाकी नहीं रह जाता। ‘मक़ामे ऐनुल जमा’ इसी में हासिल होता है।

तू दर्द गुम शो के तौहीद ईं बूद

गुमशुदन गुम कुन के तफ़रीद ऐन बूद

(तू इस में खो जा यहीं तौहीद है और इस खो जाने को भूल जा, इसका नाम तफ़रीद है।)

इस मुकाम में पहुंच कर हक़ीक़त रब इस तरह जल्वानुमा होती है बाकी सब नज़रों से ओझल हो जाते हैं। नामो नसब, दुनिया व दौलत, शोहरत व इज़्ज़त, ज़मीन व आसमान, दोस्त व खानदान का कुछ पता नहीं होता।

‘यहां हर चीज़ को फ़ना है (सिवा उस ज़ात के)’

(कुरान 55:26)

ऐ शम्सुद्दीन! इसी बात पर ग़ौर फि़क्र करने की ज़रूरत है। अच्छी तरह से इसको देखो और समझो। क्योंकि यही तमाम मक़ामात, अहवाल, मामलात व मकाशफेात सभी चीज़ों की जड़ है। यही पैमाना है, तुम्हारे लिए भी और दूसरों के लिए भी। जब तुम किसी उलमा व मशाएख को देखो या सुनो या पढ़ो तो यही पैमाना उनका मकाम तय करेगा, तुम्हें गलतफहमी नहीं होगी। वस्सलाम।

Sufiyana 210

मज़हब नहीं सिखाता…

ऐ ईमानवालों! कोई क़ौम किसी क़ौम का मज़ाक न उड़ाए…

(कुरान 49:11)

भाई, भाई से और बहन, बहन से नफ़रत न करे। एक मन और गति वाले होकर मंगलमय बात करें।

(अथर्ववेद 3:30:3)

जो कुछ तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, वैसा ही तुम भी उनके साथ करो।

(बाईबिल मती 18:15)

 

मज़हब या धर्म या रिलिजन उसे कहते हैं, जो रूहानियत (अध्यात्म) तक ले जाए, जो ख़ुदा तक पहुंचाए। और जो ख़ुदा से दूर करे, जो नफ़्सानियत या निफ़्सयात (मनोविज्ञान) की तरफ़ ले जाए, वो धर्म नहीं। वो भटकाव है, छलावा है, धोखा है। रास्ते अलग अलग हो सकते हैं, तरीके अलग अलग हो सकते है, लेकिन मंज़िल एक ही है। नाम अलग अलग हो सकते हैं, पर जिसे पुकारा जा रहा है, वो एक ही है।

तुम कह दो कि अल्लाह कह कर पुकारो या रहमान कह कर पुकारो, सब उसी के अच्छे नाम हैं…

(कुरान 17:110)

उस एक ईश्वर को विद्वान अनेक नामों से पुकारते हैं।

(ऋगवेद.1:164:36)

लेकिन इस अलग अलग राह पर भी लोग लड़ने लगते हैं, फ़साद करने लगते हैं। कि मेरी राह सहीं है, तेरी गलत। मैं सहीं हूं, तू गलत। दरअस्ल ये अपने दीन के लिए नहीं लड़ते बल्कि ये ख़ुद के लिए लड़ते हैं। ख़ुदा को नहीं, ख़ुद को साबित करना चाहते हैं। ये भी नफ़्स की पैरवी ही है। ऐसे लोगों के लिए अल्लाह कुरान में फ़रमाता है-

और जो लोग अल्लाह (के दीन के बारे में) झगड़ते हैं, बाद इसके कि उसे कुबूल कर लिया गया (है), उनकी बहस व तक़रार उनके रब के नज़दीक बातिल (झूठा व गलत) है और उन पर (अल्लाह का) सख़्त गुस्सा व अज़ाब है।

(कुरान 42:16)

मज़हब तो एक मंज़िल की तरफ़ इशारा है, एक ख़ुदा की तरफ़ बुलावा है। और इसके लिए कोई जबरदस्ती नहीं, कोई लड़ाई नहीं। अगर आप जबरदस्ती करते हैं, तो अपने मज़हब के खिलाफ़़ हैं। अगर नफ़रत करते हैं, तो अपने रब के खिलाफ़ हैं।

(ऐ मुहम्मदﷺ ) आप फ़रमा दीजिए कि मुझे हुक्म है कि तुम्हारे दर्मियान अदल व इन्साफ़ करूं। अल्लाह हमारा (भी) रब है और तुम्हारा (भी) रब है, हमारे लिए हमारे आमाल (काम आएंगे) और तुम्हारे लिए तुम्हारे आमाल। हमारे तुम्हारे दर्मियान कोई बहस व तक़रार नहीं। अल्लाह हम सब को जमा फ़रमाएगा और (हमें) उसी की तरह लौटना है।

(कुरान 42:15)

(ऐ रसूल, काफि़रों से कह दो कि) तुम्हारा दीन तुम्हारे लिए और मेरा दिन मेरे लिए।

(कुरान 109:6)

ख़ुदा की राह पर चलने वालों में एक बात समान होती है, और वो है मुहब्बत। उनकी एक ही पहचान है, वो है प्रेम। अगर इस रास्ते पर हो तो आपमें मुहब्बत होगी, अच्छाई होगी, नेकी होगी। नफ़रत न होगी, दुश्मनी न होगी, बदला न होगा।

हज़रत मुहम्मदﷺ  जब चला करते थे, तो अगर कोई उम्र दराज़ शख़्स सामने चल रहा होता, तो आप उससे अदबन आगे नहीं होते थे, पीछे ही रहते थे। चाहे वो कोई भी हो, किसी भी मज़हब का हो। ये बात मुहब्बत से पैदा होती है। सब अपने लगने लगते हैं, सब एक ही नज़र आते हैं, सबका रंग एक होता है।

ये रंग आप ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ की दरगाह में देख सकते हैं। सूफ़ीयों की खानकाहों में देख सकते हैं। वो भी ऐसा रंग कि समझ में ही नहीं आता कि कौन सा धर्म है, क्या ज़ात है। बस ये दिखता है कि एक ख़ुदा की इबादत कर रहे हैं।

अल्लामा इक़बाल कहते हैं-

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।

हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दुस्तान हमारा।

Sufiyana 208

दरूद सलाम

मुहम्मदﷺ  साहब ने दूसरे धर्मों के लोगों को भी आमंत्रित किया, क्योंकि वो कोई नया धर्म नहीं बना रहे थे। वो तो सभी को एक ही आस्था में शामिल होने के लिए आवाज़ दे रहे थे। वो धार्मिक दूरियों को तोड़ना चाहते थे। अगर ऐसा हो गया होता तो आज नफ़रत की जगह सिर्फ मुहब्बत होती।

(नेपोलियन हील, थींक ग्रो एण्ड रिच)

 

व्यवहारिक इस्लाम की मदद लिए बिना वेदांती सिद्धांत, चाहे कितने ही उत्तम व अद्भूत हों, विशाल मानव जाति के लिए मूल्यहीन हैं।

(टीचिंग ऑफ विवेकानंद 214-218, अद्वैत आश्रम, कोलकाता 2004)

 

‘‘…मुहम्मदﷺ  की शिक्षा, सम्पूर्ण एवं सार्वभौमिक शिक्षा है, जो कि अपने सभी अनुयायियों से समानता का व्यवहार करती है। ये कोई तलवार नहीं है, बल्कि सच्चाई व समानता की वो ताकत है, जो अपनी बाहों में आने को विवश करता है…।’’

(डॉ. भीमराव अम्बेडकर, ‘दस स्पोक अम्बेडकर’ चौथा खंड-भगवानदास 144-145)

 

किसी समाज में स्त्रियों का जायदाद पर इतना हक़, पहले कभी नहीं दिया गया, जितना मुहम्मदﷺ  ने दिया।

(मुंशी प्रेमचंद)

 

 

दरूद सलाम

सारे आमाले हस्ना और अज़कारे तय्यबा में यही एक मुक़द्दस अमल है, जिसकी निसबत अल्लाह ने ख़ुद अपनी तरफ़ फ़रमाई है .

बेशक अल्लाह और उसके फरिश्ते दरूद भेजते हैं, उस ग़ैब बताने वाले (हज़रत मुहम्मदﷺ ) पर। ऐ ईमानवालों! (तुम भी) उन पर दरूद और खूब सलाम भेजो।

(कुरान 33:56)

हुज़ूरﷺ  फ़रमाते हैं कि जिसके सामने मेरा ज़िक्र हो उसे, मुझ पर दरूद भेजना वाजिब है और जिसने मुझ पर एक मरतबा दरूद भेजा, अल्लाह उस पर दस रहमतें नाज़िल फ़रमाता है। (तरगीब 2.494, रवाहुन निसाई.1409)

हज़रत मुहम्मदﷺ  पर, ज़िन्दगी में कम से कम एक बार दरूद पढ़ना फ़ज़्र है और जिस मजलीस में आपﷺ  का ज़िक्र हो रहा है, वहां एक बार दरूद पढ़ना वाजिब है।

दिखावे के लिए दरूद पढ़ना

नमाज़ अगर दिखावे के लिए पढ़ी जाए तो उसे आपके मुंह पर मार दी जाएगी और सवाब के बजाए अज़ाब मिलेगा, लेकिन दरूद पाक वो अज़ीम अमल है, जो हर सूरत में बारगाहे ख़ुदावंदी में मक़बूल है। चाहे वो दिखावे के लिए ही क्यूं न हो।

दरूद सलाम क्यों पढ़ें?

हुज़ूरﷺ  पर सलातो सलाम का नज़राना पेश करना एक तरह से बुलन्द दरजात की दुआ है। अब यहां ये सवाल उठता है कि क्या हुज़ूरﷺ  हमारी दुआ के मोहताज हैं? क्या हमारे दुआ करने से उनके दरजात बुलन्द होते हैं, नहीं बिल्कुल नहीं। उनके दरजात बुलन्द करने की हमारी क्या औकात। जिनका नूर, सबसे पहले पैदा किया गया, जो तमाम अम्बिया के सरदार हैं, जिन पर ख़ुद रब्बुल आलमीन दरूद भेजता है। उन्हें हमारी दुआ की क्या ज़रूरत। हमारी दुआ के बगैर भी उनका दरजा अल्लाह के बाद सबसे ऊपर है।

तो फिर हम दरूदो सलाम क्यों पढ़ते हैं?

इसके जवाब में हज़रत इश्तियाक़ आलम शहबाज़ीؓ फ़रमाते हैं कि हुज़ूरﷺ  पर दरूदो सलाम भेजने के दो मक़सद हैं.

  1. ज़िक्र ब़ुलन्द करना

अल्लाह ने क़ुरान में फ़रमाया.

‘‘और हमने आप की खातिर, आपका ज़िक्र (अपने ज़िक्र के साथ मिलाकर दुनिया व आखि़रत में हर जगह) बुलन्द फ़रमा दिया’’

(कुरान 94:4)

अल्लाह ने हुज़ूरﷺ  का ज़िक्र हमेशा के लिए सबसे बुलन्द कर दिया है और हम वो ज़िक्र करके अल्लाह के उस फ़रमान के शाहिद व गवाह हो रहे हैं।

 

  1. शुक्र अदा करना

‘‘बेशक अल्लाह ने ईमानवालों पर बड़ा एहसान फ़रमाया कि उनमें उन्हीं में से (बड़ी अज़मत वाले) रसूल भेजा, जो उन पर उसकी आयतें पढ़ते और उन्हें पाक करते है और उन्हें किताब व हिकमत की तालीम देते हैं,…’’

(कुरान 3:164)

हुज़ूरﷺ  के इतने एहसानात तो हम पर हैं ही, इस आयत के मुताबिक उनकी विलादत भी हम पर एहसान है। जब कोई एहसानमंद, एहसान का सिला नहीं दे पाता तो एहसान करने वाले के हक़ में दुआ व शुक्र अदा करता है। हुज़ूरﷺ  का हम पर बेहिसाब एहसानात हैं और दरूदो सलाम उसका छोटा सा शुकराना है। हम उनके एहसानों का सिला तो नहीं दे सकते लेकिन उनका शुक्र तो अदा कर सकते हैं।

‘‘अल्लाहुम्मासल्ले अला मुहम्मदिन’’

ऐ अल्लाह, तू ही हमारी तरफ़ से अपने महबूब पर दरूद भेज दे।

Sufiyana 205

ये ज़मीं जब न थी…

ये ज़मीं जब न थी, ये फ़लक जब न था,

फिर कहां और कैसे थे ये मासिवा,

कौन उल्टे भला, पर्दा असरार का,

पूछ दिल से तू अपने, तो देगा सदा…

ला इलाहा इल्लल्लाह।

ला इलाहा इल्लल्लाह।

जब ये ज़मीन न थी और ये आसमान भी न था, तो उस रब के अलावा बाक़ी कुछ कहां थे और कैसे थे। कौन बता सकता है और कौन उस छिपे हुए भेदों से पर्दा हटा सकता है। इसके जवाब में अगर अपने दिल से पूछा जाए, तो वो यही जवाब देगा कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं।

 

जबकि तन्हा था, वो ख़ालिके दोसरा,

जोशे वहदत में फिर, या मुहम्मदﷺ  कहा,

जल्वए कुन से नूरे मुहम्मदﷺ  हुआ,

और उस नूर ने फिर ये बरसों पढ़ा…

ला इलाहा इल्लल्लाह।

ला इलाहा इल्लल्लाह।

सारे जहान को पैदा करने वाला अल्लाह उस वक्त तन्हा ही था। कुछ न था उसके सिवा। फिर उसने वहदत के जोश में अपने नूर से एक नूर पैदा करना चाहा और कहा ‘कुन’ यानि ‘हो जा’। और वो नूर पैदा हो गया। उस नूर का नाम मुहम्मदﷺ  रखा। फिर उस नूर ने बरसों कहा कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं।

 

है उसी नूर से, दो जहां जलवागर,

अर्शो लौहो क़लम, चर्खो शम्सो क़मर,

ये ज़मीनों ज़मां, गुलशनो बहरोबर,

पत्ता पत्ता पुकारा किये झुमकर…

ला इलाहा इल्लल्लाह।

ला इलाहा इल्लल्लाह।

हुज़ूरﷺ  के उसी नूर से सारा आलम पैदा किया गया। इन्सान, हैवान, अर्श, नसीब दर्ज करने वाले लौहो क़लम, सूरज, चांद, ज़मीन, आसमान, तमाम दुनिया, जीव, पेड़, पौधे, यहां तक कि जो कुछ भी है, वो सब इसी नूर से पैदा किया गया। अब ये सारे के सारे गवाही में कहते हैं कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं।

Sufiyana 204

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सूफ़ीयाना रिसाला मिला, पहला ही शुमारा इतना अच्छा पेश किया गया कि दिल से पुरखुलूस दुआ निकलती है। ‘सूफ़ीयाना’ टाईटल ही इसके अंदर का हाल बयान करता है। रिसाले के मज़ामीन बहुत उम्दा और बेहतरीन है, जिनको पढ़कर लोगों के दिलों में सिराते मुस्तक़ीम पर चलने की ख़्वाहीश जाग उठेगी। मैं सिदक़े दिल से अल्लाह से दुआ करता हूं कि ‘सूफ़ीयाना’ बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी करे और बुजूर्गानेदीन की तालीमात व इन्सानियत के इस मिशन में कामयाबी हासिल करे। आमीन!

इस्हाक़ बिन इस्माईल चिश्ती (बी.ई.)
सज्जादा नशीन ख़्वाजा ग़रीबनवाज़, अजमेर

 

मैंने ऐसी पत्रिका की कल्पना भी नहीं की थी, जैसी आपने प्रकाशित की है। धन्य हैं आप और आपकी सोच, जिसने अध्यात्म को इतने सुंदरता से प्रस्तुत किया है। सिर्फ एक अनुरोध है कि इसके कठीन उर्दू शब्द को हटाकर, आसान बोलचाल वाले शब्द दें या फिर मतलब भी साथ में दें।

अवधेश शर्मा शास्त्री
नई दिल्ली

 

ज़िन्दगी में पहला रिसाला, जिसे बिना रुके पढ़ने का मन करता है और जिसके अगले अंक का इंतेज़ार अभी से है।

मो.अशरफ़
दुर्ग

 

इल्मे ज़ाहिर व इल्मे बातिन में जो खाई, बनी उमय्या के दौर ने पैदा की गई थी, वो आज तक बनी हुई है। इस खाई को भरने में आपकी ‘सूफ़ीयाना’ की शक़्ल में ऐसी कोशिश, काबिले तारीफ़ है। अल्लाह, अपने रसूल के सदक़े आपको तरक़्की अता फ़रमाए और आने वाली रूकावटों को दूर करे।

मौलाना फ़ैज़ान रिज़वी
बरेली (उत्तर प्रदेश)

 

Sufiyana Magazine is a great initiative to remind, appreciate and follow the teaching of Sufism. Sheikh Safiuddin Saadi Miyan Huzur is my Murshid and I am proud to be his disciple as he has transformed my life into a better human being with love for all.

Tauseef Irfan (B.E.)
New Jersy, USA
Sufiyana 2 editor

दुनिया की ज़िन्दगी तो बस खेल तमाशा है…

दुनिया की ज़िन्दगी तो बस खेल तमाशा है…

(कुरान 47:36)

आदमी एक बच्चे की तरह है, जो दुनिया के मेले में खो गया है। मेले में बहुत अच्छी अच्छी चीजें हैं, खेल है, खिलौने हैं, झूले हैं, नौटंकी हैं, यहां तक कि मौज मस्ती के सारे सामान मौजूद हैं। मेले की चकाचौंध में बच्चा भूल ही गया है कि उसका घर भी है, घरवाला भी है और उसे लौटना भी है। ये मेला हमेशा के लिए नहीं है, ये तो आज है कल नहीं रहेगा। लेकिन घर तो हमेशा रहेगा। मेले में उसका कोई नहीं है, लेकिन घर पर उसका कोई है, जो उसकी राह देख रहा है। उसके लौटने का इंतेज़ार कर रहा है।

बच्चे को पैदा करनेवाला बड़ी चिंता में है। कहीं कुछ उंच नीच न हो जाए। कोई तकलीफ़ न हो जाए। उसने अपना ‘पैग़ाम’ देकर भेजा, लेकिन बच्चा नहीं आया। उसने ‘इनाम’ देकर भेजा, लेकिन बच्चा नहीं आया। बच्चे का दिल वहीं रम गया। उसे कोई फि़क्र नहीं, अपने पालनहार की।

गुमने और न गुमने में राब्ते (संपर्क) का ही फ़र्क़ है। अगर घरवाले से राब्ता है तो नहीं गुमा है और राब्ता नहीं है तो गुम गया। तो यहां उस पालनहार से सिर्फ राब्ता रखना है, उसे हमेशा याद रखना है। वो ये नहीं चाहता कि बच्चा सब छोड़कर घर ही आ जाए, लेकिन वो ये भी नहीं चाहता कि बच्चा मेले में ही गुम हो जाए। वो तो ये चाहता है कि मेले में रहे, जो अच्छा है वो करे और फिर घर लौट आए।

जो दुनिया का इनाम चाहे तो वो (भी) रब के ही पास है,

उसी के पास दुनिया व आखिरत (दोनों) का ईनाम है।

(कुरान 4:134)

उस पालनहार ने ‘पैग़ाम’ वालों को भेजना बंद कर दिया है, कोई नया ‘पैग़ाम’ अब नहीं आएगा। लेकिन ‘इनाम’ व ‘एहसान’ वालों को अभी भी भेज रहा है। अब बच्चे को चाहिए कि उनका दामन थाम ले, उनसे राब्ता कायम कर ले। इसी में यहां भी भलाई है और वहां भी। आखि़र इन ‘दौलतमंदों’ का साथ जो होगा।

और जो कोई ख़ुदा व उसके रसूल का हुक्म मानता है,

उसे उनका साथ मिलेगा, जिन पर रब ने (खास) इनाम अता किया है,

यानी अंबिया व सिद्दीक़ व शहीद व नेक लोग,

ये बहुत बेहतरीन साथी हैं।

(कुरान 4:69)

shah ast hussain

2nd सूफ़ीयाना मैगज़ीन शाया हुई

शाह अस्त हुसैन

बादशाह अस्त हुसैनؑ

दीन अस्त हुसैनؑ

दीन पनाह अस्त हुसैनؑ

सर दाद न दाद

दस्त दर दस्ते यज़ीद

हक्का के बिनाए

लाइलाह अस्त हुसैनؑ

(ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ)

 

हज़रत हुसैनؑ रूहानी शाह हैं और दुनिया के बादशाह भी हैं। इमाम हुसैनؑ दीन हैं और दीन के संरक्षक भी हैं। जब करबला में आपको परिवार सहित घेर लिया गया, और यज़ीद के हाथों बैअ़त की ज़बरदस्ती होने लगी, तो आपने, अपना सर दे दिया, लेकिन वो हाथ न दिया, जिस हाथ पर बैअ़त हुए थे। इसी कुरबानी की वजह से, आज हमारा दीन ज़िन्दा है। हक़ तो ये है कि ‘ला इलाहा’ की बुनियाद हुसैनؑ हैं। अगर यज़ीद के हाथों बैअ़त ले ली जाती, तो इमाम हुसैनؑ और उनके परिवार की जान तो बच जाती, लेकिन धर्म न बचता, सत्य न बचता और हज़रत मुहम्मदﷺ  की शिक्षाएं नहीं बचती। आप जंग हार गये, मगर दीन जीत गया। और इस तरह असत्य पर सत्य की जीत हुई।

हज़रत मुहम्मदﷺ  फ़रमाते हैं- हुसैन मुझसे हैं और मैं हुसैन से हूं।

 

सुनते हैं, सर बचाने को उठते हैं पहले हाथ।

सर देकर, अपना हाथ बचाया हुसैनؑ ने।

(पंडित गयाप्रसाद रूमवी)

 

क़त्ले हुसैनؑ अस्ल में मर्गे़ यज़ीद है।

इस्लाम ज़िन्दा होता है, हर करबला के बाद।

(मुहम्मद अली जौहर)

 

इन्सान को बेदार तो हो लेने दो,

हर क़ौम पुकारेगी, हमारे हैं हुसैन।

(जोश मलीहाबादी)

 

वो हुसैनؑ जिसने छिड़क के खून,

चमने वफ़ा को हरा किया।

(मौलाना एजाज़ कामठी)

 

मैंने हुसैन से सीखा कि मजलूमियत में किस तरह जीत हासिल की जा सकती है। इस्लाम की बढ़ोतरी तलवार पर निर्भर नहीं करती, बल्कि हुसैन के बलिदान का एक नतीजा है, जो एक महान संत थे।

-महात्मा गांधी

इमाम हुसैन की कुरबानी तमाम गिरोहों और सारे समाज के लिए है और यह कुरबानी इंसानियत की भलाई की एक अनमोल मिसाल है।

-पंडित जवाहर लाल नेहरू

यह इमाम हुसैन की कुरबानियों का नतीजा है कि आज इस्लाम का नाम बाक़ी है। नहीं तो दुनिया में कोई नाम लेने वाला भी नहीं होता।

-स्वामी शंकराचार्य

इस बहादुर और निडर लोगों में सभी औरतें और बच्चे इस बात को अच्छी तरह से जानते और समझते थे कि दुश्मन की फौजों ने उनका घिराव किया हुआ है और दुश्मन सिर्फ लड़ने नहीं बल्कि उनको क़त्ल करने के लिए आए हैं। जलती रेत, तपता सूरज और बच्चों की प्यास भी उनके क़दम नहीं डगमगा पाई। सारी मुश्किलों का सामना करते हुए भी उन्होंने अपनी सत्यता का कारनामा कर दिखाया।

-चार्लस डिकेन्स

मानवता के वर्तमान और अतीत के इतिहास में कोई भी युद्ध ऐसा नहीं है, जिसने इतनी मात्रा में सहानुभूति और प्रशंसा हासिल की हो और सारी मानवजाति की इतनी अधिक उपदेश व उदाहरण दिया हो, जितनी इमाम हुसैन की शहादत ने करबला के युद्ध से दी है।

-अंटोनी बारा

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