Sufiyana 242

अच्छे विचार उजाले की तरह हैं।

हर चीज़ पहले विचार के रूप में होती है।

फिर उसे सींचा जाता है, तपाया जाता है तो वो हक़ीक़त होकर सामने आती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे सोना को आग में तपाकर ताज बनाया जाता है।

विचार पहले ख्वाबों में होता है, फिर दिमाग में, फिर सोच में, फिर आंखों में, फिर बदन में, फिर कामों में होता है और फिर उसके बाद आपके सामने होता है।

ये नींद से शुरु होता है और फिर नींद उड़ा देता है। ग़ालिब का शेर है.

रगों में दौड़ते फिरने के, हम नहीं कायल।

जो आंख ही से न टपका तो वो लहू क्या है।

विचारों को राह दिखाना होता है, बस कुछ दूर चलाना होता है।

फिर वो इतने ताकतवर हो जाते हैं कि खुद ही चलने लगते हैं

बल्कि दौड़ने लगते हैं। और अगर रास्ता न हो तो नए रास्ते बना लेते हैं।

आपको कोई चीज़ प्रेरित कर सकती है, लेकिन विचार आपका खुद का होता है।

विचार दो तरह के होते हैं. अच्छे विचार और बुरे विचार।

एक इन्सान में अक्सर दोनों होते हैं। लेकिन कामयाब इन्सान में अच्छे विचार ज़्यादा होते हैं और नाकामयाब में बुरे विचार ज़्यादा होते हैं।

किसी की जि़न्दगी में बुरा ही बुरा होता है, अंधेरा ही अंधेरा होता है।

उसके ज़हन में यही सवाल होता है कि उजाला कब होगा।

जबकि उजाला तो हमेशा है, उजाला कहीं नहीं जाता,

बस देखने के लिए उसकी आंख नहीं खुली है।

जिस दिन आंख खुल जाए ये सारा अंधेरा, उजाले में बदल जाए।

हज़रत राबिया बसरीؓ कहीं से गुजर रही थीं, तो क्या सुनती हैं कि एक शख़्स दुआ कर रहा है. या रब! रहमत के दरवाजे खोल। और कितनी दुआएं करुं, कितना गिड़गिड़ाउं। अब तो रहम कर और मेरी जिन्दगी में उजाला कर दे। हज़रत राबियाؓ उसके पास गयीं, उसे हिलाया और कहा. ये क्या कह रहे हो। उस रब का दरवाजा कब बंद हुआ है। उसने कब अंधेरा किया है, जबकि वो खुद नूर है। हां, तुम्हारी आंख नहीं खुली है, तुम अंधे हो कि उसकी तजल्ली नहीं देख पा रहे, तुम्हें उसकी रहमत नहीं दिख रही।

हमारे लिए अच्छी बात ये है कि बुरे विचार एक छलावा बस है, ये अपने आप में कुछ नहीं। अच्छे विचार के आते ही ये ग़ायब होने लगते हैं।

उजाले के आने से अंधेरा ग़ायब हो जाता है लेकिन क्या ऐसा हुआ है कि

अंधेरे के आने से उजाला ग़ायब हो जाए?

240

लज़्ज़ते याद

लज़्ज़ते याद

मौलाना जामीؓ फ़रमाते हैं.

रब की याद की लज़्ज़त यूं हासिल की जाए कि हर वक्त और हर हाल में यानि आते और जाते हुए, खाते और सोते हुए, बोलते और सुनते हुए भी तुझे हक से अपनी वाबस्तगी का पूरा पूरा एहसास हो।

मुख़्तसर यह कि हालते आराम और काम काज करते हुए भी तुझे होशियार होना चाहिए ताकि इस वाबस्तगी के मामले मे ग़फ़लत व लापरवाही का शक़ तक भी न गुज़र सके और इस तरह तुझे अपने एक एक सांस से भी हिसाब लेना पड़ेगा कि कहीं वो यादे इलाही से खाली तो नहीं।

चेहरा तेरा देखे हुए गुज़रे कई साल।

फिर भी तेरी उल्फ़त को नहीं ख़ाफे़ ज़वाल।

जिस हाल में भी चाहूं, जहां जाके रहूं।

आंखों में है तू दिल में भी है, तेरा ख़याल।

 

जमाल व कमाल

मौलाना जामीؓ फ़रमाते हैं.

कूवत व रहमतवाली वह ज़ात जमाले मुतलक है। खाकदाने वजूद के जुमला मराहिल से हुस्नों कमाल आशकारा है, वह उसी के परतवे जमाल व कमाल का नज़्ज़ारा है। उसी के जल्वों से अहले मरातिब नकूशे जमाल और सिफाते कमाल से आरस्ता हुए। दाना की दानाई भी इसी का असर और बिनाअ की बिनाई भी उसी का समर है। वह पाक ज़ात है। इस की कुल सिफ़ात जो कुल्लियत व कामिलियत की बुलंदियों से उतर कर जुजि़्ज़यत व तिक़य्यद (इनफरादी व इज़ानी) की गहराईयों में जल्वागर हुए हैं, इसका मक़सद यह था कि तो जुज़्व से कुल का रास्ता पा सके और तकय्युद से मुतलक़ की तरफ़ मुतवज्जह हो सके और तुझे यह ख्याल न हो कि जुज़्व कुल से जुदा है और न तो तिक़य्यद पर इतना गौर करे कि मुतलक़ से तेरा रिश्ता ही मुनकता हो जाए।

नज़्ज़ारा गुल के लिए, मैं बाग़ मे था

देखा मुझे उसने तो यह शोखी से कहा

मैं असल हूं और गुल तो हैं मेरी शक्लें

क्यों असल को छोड़कर सूए शाख आया

बेकार यह आरिज़ ये क़दूर इनायत

किस काम की यह जुल्फों की खुश अराई

हर सिमत जि़या बार है नुरे मुतलक

गाफिल न तक़ीद से तुझे होश आयी

Sufiyana 241

घमंड, गुनाह से बढ़कर

घमंड, गुनाह से बढ़कर

शेख सादीؓ फ़रमाते हैं.

हज़रत ईसाؑ के दौर में एक बहुत गुनाहगार, जिहालत व गुमराही का सरदार, सख़्त दिल, बद कि़रदार, जि़न्दगी से बेज़ार, इन्सानियत को शर्म करने वाला, गोया शैतान का नापाक नुमाइन्दा था। सर, अक़्ल से ख़ाली मगर गुरूर से भरा हुआ। जबकि पेट हराम के लुकमों से भरा हुआ। झूठा और तुनक खानदान। न सीधी राह चलता, न किसी की सुनता। लोग उससे दूर भागते। ऐसा बदअमाल कि अब उसके आमालनामे में लिखने की जगह ही नहीं बची। एक नंबर का अय्याश और हमेशा नशे में मस्त रहता।

हज़रत ईसाؑ एक दिन जंगल से आ रहे थे कि उस के मकान के पास से गुज़र हुआ। आप के पांव पर, अपना सर रख कर ऐसे शर्मिन्दा हुआ जैसे दरवेश सरमायादार के सामने होता है। अपनी गुजिस्ता ग़लतियों और गुनाहों की माफ़ी मांगने लगा और रो रो कर अल्लाह से तौबा करने लगा। इस हालत में एक घमंडी इबादत गुज़ार भी आ गया और उसे हिकारत की निगाहों से देख कर, डांटने लगा कि यह बदबख़्त कहां मेरे और हज़रत ईसाؑ के बीच आ गया। यह कितना बदबख्त है, मुझे तो इस की सूरत से भी नफ़रत है। कहीं ऐसा न हो कि इस की बुराई की आग मेरे दामन में भी लग जाए। ऐ अल्लाह कयामत के दिन मुझे इस के साथ न उठाना। अभी यह बातें कर रहा था कि हज़रत ईसाؑ पर वही नाजि़ल हुई कि दोनों की दुआ कुबूल हुई. वह गुनाहगार आजिज़ी व इन्केसारी की वजह से जन्नत में जाएगा और वो घमंडी इबादतगुज़ार, जिसने उसके साथ हश्र में न होने कि दुआ की है, दोज़ख़ में जाएगा।

सबक

अल्लाह से डरने वाला गुनाहगार उस दिखावा करनेवाले और घमंडी इबादतगुज़ार से बहुत बेहतर है, जो लोगों को जहन्नम बांटता फिरता है और खुद जन्नत का चौकीदार बना हुआ है।

 

क़नाअ़त (संतोष)

शेख सादीؓ फ़रमाते हैं.

एक भिखारी ये कहता हुआ घूम रहा था. ऐ धनी लोगों! अगर तुम में इन्साफ़ होता और हम में क़नाअत (संतोष) होता, तो दुनिया में कोई भीख मांगनेवाला न होता।

ऐ क़नाअ़त! मुझे अमीर बना दे, क्योंकि तेरे बग़ैर कोई अमीर नहीं हो सकता। जिसके पास तू नहीं, उसके पास चाहे जितनी भी दौलत हो, ग़रीब है। और जिसके पास तू है, सहीं मायने में वही अमीर है।

ऐ क़नाअ़त तवंगरम गरदां।

के वराए तो हेच नेअमत नेस्त।

Sufiyana 238

रब के ख़ास बंदे (पार्ट 2)

यहां हम ख़ुदा के उन खास बंदों के बारे में बात करेंगे जिन्हें रिजालुल्लाह या रिजालुल ग़ैब कहा जाता है। इन्हीं में से कुतुब अब्दाल व ग़ौस होते हैं।
वो न तो पहचाने जा सकते हैं और न ही उनके बारे में बयान किया जा सकता है, जबकि वो आम इन्सानों की शक़्ल में ही रहते हैं और आम लोगों की तरह ही काम में मसरूफ़ रहते हैं।

रब के ये खास बंदे, खुदा की तजल्ली से दुनिया को रौशन करते हैं। रिजालुल ग़ैब का एक ऐसा जहां है, एक ऐसा निज़ाम है, जो हमें न समझ आता है और न ही ज़ाहिरी आंखों से दिखाई देता है। रब ने उन्हें चुन लिया है, उनके के लिए दुनिया की कोई हदें मायने नहीं रखतीं। उन्हीं के दम से कायनात का निज़ाम है। अगर अक़्ताबे आलम का निज़ाम एक लम्हे के लिए रुक जाए तो दुनिया खत्म हो जाए। इनके मामूलात को ज़ाहिरी आंखों से नहीं देखा जा सकता और न ही इन्हें अपनी मरज़ी के मुताबिक बुलाया जा सकता है। हां, साहिबे बसीरत इनसे फ़ैज़ पाते हैं।  ये सिर्फ रब की मरज़ी के पाबंद रहते हैं।

हज़रत अलीؓ फ़रमाते है कि हज़रत मुहम्मदﷺ  ने फ़रमाया. यक़ीनन अब्दाल शाम में होंगे और वो चालिस मर्द होंगे। जब कभी उन में से एक वफ़ात पाएगा तो अल्लाह उसकी जगह दूसरे को मुकर्रर कर देगा। उनकी बरकत से बारिश बरसाई जाएगी और उनके फ़ैज़ से दुश्मनों पर फ़तह दी जाएगी और उनके सदक़े ज़मीनवालों की बलाएं दूर कर दी जाएंगी।

कुतुब

हर ज़माने में सिर्फ एक कुतुब होते हैं। इनका ओहदा रिजालुल्लाह में सबसे बड़ा होता है। इन्हें मुख्तलिफ नामों से पुकारा जाता है। कुतुब.ए.आलम, कुतुब.ए.कुबरा, कुतुब.ए.अरशाद, कुतुब.ए.मदार, कुतुब.ए.अक़्ताब, कुतुब.ए.जहां, जहांगीर.ए.आलम वगैरह वगैरह। सारी दुनिया इन्हीं के फ़ैज़ व बरकत से क़ायम हैं। ये सीधे ख़ुदा से अहकाम व फ़ैज़ हासिल करते हैं और उस फ़ैज़ को आवाम में बांटते हैं। ये दुनिया में किसी बड़े शहर में रहते हैं और बड़ी उम्र पाते हैं। हुज़ूर अकरम हज़रत मुहम्मदﷺ  के नूर की बरकतें हर तरफ़ से हासिल करते हैं। सालिक (रब की राह का विद्यार्थी) के दरजे को बढ़ाना, घटाना, हटाना इनके इख्तियार में होता है।

अक़्ताब की कई किस्में हैं. कुतुब अब्दाल, कुतुब अक़ालीम, कुतुब विलायत वगैरह वगैरह। ये सभी अक़्ताब, कुतुब.ए.आलम के नीचे होते हैं। जहां जहां इन्सान आबाद है, वहां एक कुतुब भी मुकर्रर होते हैं।

ग़ौस

बहुत से लोग कुतुब व ग़ौस को एक ही समझते हैं, लेकिन ये अलग अलग ओहदे हैं। हां, दोनो ओहदों पर एक ही शख़्स मुकर्रर हो सकते हैं। ग़ौस तरक्की करते हुए, ग़ौस.ए.आज़म और ग़ौस.उस.सक़लैन के ओहदे पर फ़ाएज़ होते हैं।

अमामान

कुतुबुल अक़ताब के दो वज़ीर होते हैं जिन्हें अमामान कहते हैं। एक कुतुब के दाहिने तरफ़ रहते हैं, जिनका नाम अब्दुल.मालिक है और दूसरे बाईं तरफ़ के अमामान का नाम अब्दुर.र्रब है। दोनों कुतुबे मदार से फ़ैज़ पाते हैं लेकिन दाहिने हाथ वाले अमामान, आलमे अलवी से इफ़ाज़ा करते हैं और बाईं तरफ़ के अमामान, आलमे सफ़ली से इफ़ाज़ा करते हैं। बाईं तरफ़ के अमामान का रुतबा दाईं तरफ़ के अमामान से बड़ा होता है। जब कुतुबुल अक़ताब की जगह खाली होती है तो बाएं वाले अमामान उनकी जगह तरक्की पाते हैं, जबकि दाएं वाले, बाएं की जगह आ जाते हैं।

अवताद

दुनिया में चार अवताद हैं। ये चारो दिशाओं में रहते हैं। ये मयख़ों का काम देते हैं और ज़मीन पर अमन व चैन बरक़रार रखते हैं।

अब्दाल

रिजालुल ग़ैब में अब्दाल का मुक़ाम बड़ा बुलन्द है। अब्दाल, एक वक़्त में सात होते हैं। ये सात अक़ालीम पर मुतय्यन होते हैं। ये सात अंबिया के मशरब पर काम करते हैं। ये लोगों की रूहानी इमदाद करते हैं और आजिज़ों व बेकसों की फ़रयाद पूरी करते हैं।

अफ़राद

अफ़राद वो मुक़ाम है, जहां कुतुबे आलम से तरक़्क़ी करते हुए पहुंचते हैं।

ये ग़ाज़ी, ये तेरे पुर असरार बंदे,

जिन्हें तूने बख़्शा है, ज़ौक़े ख़ुदाई।

दोनेयम उनकी हैबत से, सेहरा व दरिया,

पहाड़ उनकी ठोकर से, मानिन्द राई।

-अल्लामा ईक़बाल

 

(नोट: आम तौर पर लोग, बुजूर्गों के नाम के साथ कुतुब या अब्दल या ग़ौस वगैरह इस्तेमाल करते हैं। ये ज़रूरी नहीं की वो बुजूर्ग, उसी मुक़ाम पर फ़ाएज़ हो, क्योंकि रिजालुल्लाह का मुक़ाम हम तय नहीं करते बल्कि ये तो अल्लाह की जानिब से होता है।)

Sufiyana 236

मुरीद होना (बैअ़त होना)

चूं तू करदी ज़ात मुर्शिद रा क़ुबूल

हम ख़ुदा आमद ज़ ज़ातिश हम रसूल

नफ़्स नतवां कश्त इल्ला ज़ाते पीर

दामने आं नफ़्स कुश महकम बगीर

(मौलाना जलालुद्दीन रूमीؓ)

 

जब तूने पीर की ज़ात को कुबूल कर लिया तो तुझ से अल्लाह भी मिल गया और रसूलﷺ  भी।

उस नाफ़रमान नफ़्स को पीर की ज़ात के सिवाए कोई नहीं मार सकता, तो उस नफ़्स के मारनेवाले (पीर) का दामन मज़बूती से पकड़ ले।

 

 

तरीक़त की तलाश और बातिनी कमालों का हासिल करना, हम पर वाजिब है। लेकिन ये रास्ता निहायत ही नाज़ुक और दुश्वार है, क्योंकि नफ़्स और शैतान, इससे रोकने में लगे हुए हैं।

बेशक नफ़्स, इन्सान को बुराई की तरफ़ ले जाने वाला है, मगर (ये उसके लिए नहीं है) जिस पर खुदा रहम करे।

(कुरान 12:53)

बेशक़ शैतान, इन्सान का खुला दुश्मन है।

(कुरान 17:53)

नफ़्स और शैतान से बचने का तरीक़ा, मुर्शिद कामिल से बैअ़त है। बैअ़त होना, रब तक पहुंचने का सबसे आसान व सबसे ज़्यादा नज़दीक का रास्ता है, क्योंकि इसमें नफ़्सानियत नहीं है और न ही शैतानियत है।

हज़रत इश्तियाक़ आलम शाहबाज़ीؓ फ़रमाते हैं. कुरान को कुरान हम इसलिए मानते हैं कि उसकी सनद मौजूद है। अहादीस नबवीया को कलामे रसुलल्लाह इसलिए मानते हैं कि उसकी भरोसेमंद सनद मौजूद है। इसी तरह इसकी भी सनद मौजूद है कि रूहानी मुर्शिदे कामिल का दिल, अपने पीर के दिल से होता हुआ, रसूले अकरमﷺ  से मिला हुआ होता है।

यही मुर्शिदे कामिल का गिरोह ही है जो बनामे सूफ़ीया व तालिमाते तसव्वफु़, बारगाहे नबुव्वतﷺ  के सच्चे वारिस व अमीन हैं। इनका सिलसिलए रूहानी, ज़ंजीर की मुसलसल मज़बूत कड़ीयों जैसा है। जिसका सरचश्मा तक़दीस व रूहानियत, क़ल्बे रसूल है। इस ज़ंज़ीर से जुड़ने के लिए और क़ल्बे रसूलल्लाह तक पहुंचने के लिए बैअ़त ज़रूरी है। और हुज़ूरﷺ  तक पहुंचना यानी खुदा तक पहुंचना है। क्योंकि…

(ऐ महबूब) बेशक जो लोग आपसे बैअ़त करते हैं, वो अल्लाह ही से बैअ़त करते हैं। उनके हाथों पर (आपके हाथों की सूरत में) अल्लाह का हाथ है।

(कुरान 48:10)

बैअ़त, सूफ़ीया किराम के यहां ये सब से अहम तरीन रूक्न है, जिसके ज़रिये तालीम व तरबियत, रुशदो हिदायत और इस्लाह अहवाल का काम शुरू होता है। बैअ़त.ए.शैख अल्लाह के हुक्म से और हुज़ूरे अकरम हज़रत मुहम्मदﷺ  के अमल से साबित है। बैअ़त का अमल हुज़ूरﷺ  के अमल ‘बैअ़त.उर.रिजवान’ से बतरिकए ऊला साबित है। कुछ अहले इल्म के नज़दीक बैअ़त वाजिब है और कुछ ने बैअ़त को सुन्नत कहा है। बल्कि ज़्यादातर ने इसे सुन्नत ही कहा है।

बैअ़त की कई किस्में होती है, लेकिन तज़किया.ए.नफ़्स और तसफि़या.ए.बातिन के लिए जो सूफ़ीया किराम बैअ़त करते हैं, वो कुरबे इलाही का ज़रिया बनता हैं और इसी को ‘बैअ़त.ए.शैख’ कहते हैं।

जब कोई बैअ़त व इरादत का चाहने वाला हाजि़र होता है और इज़हारे गुलामी व बन्दगी के लिए हल्कए मुरीदैन में शामिल होना चाहता है तो उसका हाथ अपने हाथ में लेकर हल्कए इरादत और तरीकए गुलामी में दाखिल किया जाता है।

फिर तालीब से पूछते हैं कि वो किस खानवाद ए मारफ़त (क़ादिरिया, चिश्तिया, नक्शबंदिया वगैरह) में बैअ़त कर रहा है और उससे सुनते है, वो किस खानवाद ए तरीक़त में दाखिल हुआ। शिजरा ए मारफ़त के सरखेल का नाम लेते हुए सिलसिला ब सिलसिला अपने पीर के ज़रिए अपने तक पहुंचाते हैं और कहते हैं कि क्या तू इस फ़क़ीर को कुबूल किया? तालिब कहता है कि दिलो जान से मैंने कुबूल किया, इस इक़रार के बाद उसे कहते हैं कि हलाल को हलाल जानना और हराम को हराम समझना और शरीअ़ते मुहम्मदीﷺ  पर क़दम जमाए रखना।

अकाबिरों के नज़दीक वसीला से तवस्सले मुर्शिद ही मुराद है। हज़रत मौलाना शाह अब्दुर्रहीमؓ, शाह वलीउल्लाह मुहद्दीसؓ और शाह अब्दुल अजीज मुहद्दीस देहलवीؓ जैसे साहेबान का भी यही मानना है। इसमें कोई शक नहीं है कि अल्लाह की बारगाह में मुकर्रेबीन का वसीला ही वो वसीला है जिसे हासिल करने की हिदायत, अल्लाह ने कुरान में फ़रमाई।

Sufiyana 237

उम्र चार साल

नौशेरवां एक राजा थे। एक दिन वो भेष बदलकर कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक बुढ़ा किसान मिला। उस किसान के बाल पक गये थे, लेकिन उसमें जवानों जैसा जोश था। ये देख राजा ने पूछा. आपकी उम्र कितनी है। उस बुढ़े ने कहा. चार साल। राजा ने सोचा मज़ाक कर रहे हैं। जब फिर पूछने पर भी वही जवाब मिला तो राजा गुस्से में आ गए और कहा. मैं साधारण इन्सान नहीं हूं, मैं राजा नौशेरवां हूं। मज़ाक मत करो, सहीं सहीं अपनी उम्र बताओ। फिर राजा ने सोचा मैं एक बुजूर्ग पर कैसे गुस्सा हो सकता हूं, जबकि गुस्सा करने से हमारा दिमाग काम नहीं करता और हम ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते।

राजा शांत होकर नए सिरे से पूछा. पितामह! आपके बाल पक गए हैं, शरीर में झुर्रियां पड़ गयीं हैं। आपकी उम्र लगभग 80 साल होनी चाहिए, लेकिन आप सिर्फ 4 साल बता रहे हैं। बुढ़े ने कहा. आप सहीं कह रहे हैं, मेरी उम्र 80 साल ही है, लेकिन मैंने 76 साल, पैसे कमाने, बच्चे पैदा करने, पालने, शादी ब्याह करने में बिता दिए। ऐसा जीवन जो एक पशु भी जी सकता है। इसलिए उसे मैं मनुष्य की नहीं, बल्कि पशु की जि़न्दगी मानता हूं।

इधर चार साल से मुझे समझ आई है और मेरा मन ईश्वर की उपासना, जप, तप, सेवा, सदाचार, दया, करुणा उदारता में लगा रहा है। इसलिए में अपने को 4 वर्ष का ही मानता हूं।

यही 4 साल मेरी असल उम्र है।

Sufiyana 234

महफि़ले सिमा – 2

सिमा के जवाज़ में आयाते कुरानी

हज़रत मख़्दुम अशरफ़ सिमनानी किछौछवीؓ फ़रमाते हैं. सिमा के जवाज़ के सबूत में चन्द दलाएल पेश किए जाते हैं।

अल्लाह पैदा करने में जितना चाहता है, बढ़ा देता है।

(कुरान 35:1)

कुछ ने किरात में ‘अलख़्ल्क़’ में ‘ख़ा’ की जगह ‘हा’ पढ़ा है, यानी ‘अलहल्क़’। (दर करारत बअज़े फ़ील ख़ल्क़ बिलहाए अलमहमला अस्त . महज़ूता449)

तुम्हारे लिए पाकीज़ा चीज़ें हलाल कर दी गयी हैं।

(कुरान 5:4)

और सिमा पाकीज़ा तरीन चीज़ है, कि इस से दिल व रुह खुश होते हैं।

जो लोग कान लगाकर ग़ौर से सुनें, फिर उस के बेहतर पर चलें। ये वो लोग हैं, जिनको अल्लाह ने राह दिखाई, ये लोग अक्लवाले भी हैं।

(कुरान 39:18)

ये बात आम लोगों के लिए कही जा रही है और अच्छा सुनने वालों की तारीफ फ़रमाई जा रही है। ये भी खुलासा हो रहा है कि ग़ौर से सुनना, चाहे धुन में हो या बग़ैर धुन में, रब की राह में शामिल है, पसंदीदा आवाज़ में शामिल है और उसकी इनायत से होता है। और सुननेवाले को अक़्लमंद कहा जा रहा है। अब अगर कोई ग़ौर से सुनना ही हराम कहे तो ये ग़लत है, हां इसे मुबाह कहा जा सकता है।

जो कोई ये कहे कि राग, नग़्मा, गाना वगैरह सुनना बिल्कुल हराम है, दूसरी हराम चीज़ों की तरह, तो ये समझा जाए कि उनको अल्लाह ने हिदायत नहीं फ़रमाई और उनको अक़्ल भी नहीं है। और जिनको हिदायत नहीं होती वो गुमराह होता है। क्योंकि हिदायत की उल्टा गुमराही है और गुमराह लोग दोज़ख़ी है। इसकी कोई दलील नहीं कि सिर्फ खास खास नग़्मों को ही सुना जाए। जबकि दफ़ के साथ गाना सेहत को पहुंच चुका है और साबित हो चुका है, उन रवायात से जिसमें हुज़ूरﷺ  दफ के गाने के वक़्त और रक़्स के वक्त मौजूद थे। (इन्शाअल्लाह इसका बयान बाद में किया जाएगा)

और इस बात पर दलील कि अल्लाह ने तारीफ फ़रमाई है उन लोगों के नेक सुखन (अच्छे सुनने) की इत्तेबा में ये आयत है.

और तुम को सुनने की ताकत, देखने की कुवत और दिल अता हुआ, लेकिन कम ही उस (रब) का शुक्र अदा करते हैं।

(कुरान 21:9)

यहां रब का एहसान बताया जा रहा है और जिसमें सारे सुनने, देखने व दिल से समझने की बातें शामिल है, सिवाए गुनाह व फ़साद की तरफ़ ले जाने वाले बातों के। हज़रत सुल्लमी से रवायत है कि इब्ने अता ने फ़रमाया. सुनने, देखने व दिल के अता होने से मुराद ये है कि ख़ुदा को बखूबी पहचाने, बखुबी तसव्वुर करें और दिल में मुशाहिदा करें। और एक हज़रत ने कहा. मोमीन के दिलों में रब ने अपनी मुहब्बत डाल दी, मुश्ताक़ों को इश्क़ अता किया और आशिकों को ख़ुदासनासी की दौलत अता फ़रमाई। इमाम कुशैरीؓ फ़रमाते हैं. इन तीनों बातों से मुराद बिना किसी दलील के ख़ुदाशनासी, शौक बिल्लाह और गैरुल्लाह से दिलों को पाक रखना है।

इन अक़्वाल से ये भी साबित होता है कि ऐसी आवाज़ का सुनना, जिसका कोई मफ़हूम व मायने नहीं है, जायज़ है। तो फिर जिसके मायने हिकमत व दानाई पर मबनी हो और बगैर लहवो.लईब के इसमें सहीह मायने मौजूद हैं, तो ऐसी आवाज़ का सुनना क्यों कर जायज़ नहीं हो सकता?

सिमा में तो ईमान ताज़ा होता है और खुशहाली पैदा होती है। सिमा सुननेवालों का दिल, रब के लिए तड़पने लगता है। जबकि वो सनाए हक़ को हक़ की जानिब, खिताबे हक़ के ज़रिए सुनते हैं। इस तरह वो ग़ैर हक़ से हक़ की तरफ़ रुजूअ करते हैं।

वले वजहेहा मिउं वजहेहा क़मरन

वले अयनेहा मिन अयनेहा कोहलन

(और उसके चेहरे से इसका चेहरा रौशन है और उसकी आंखों से इसकी आंखों को सुरमा मिलता है)

सिमा को ग़लत माननेवाले कुरान की इस आयते करीमा को सनद बताते हैं.

और कुछ लोग बेहूदा बातें खरीदते हैं, ताकि बिना समझे रब की राह से बहका दें और उस (राह) का मज़ाक उड़ाएं। ऐसे लोगों के लिए जि़ल्लतवाला अज़ाब है।

(कुरान 31:6)

जबकि इस आयत को बतौर सबूत पेश करना इंसाफ नहीं। बल्कि सिमा को मानने वालों के खि़लाफ़ लड़ाई है कि उनकी नज़र मुतल्लिक़ है, मुतल्लक़ पर नहीं।

ये आयत उन बाज़ारु लोगों के बारे में है, जो क़नीज़ों को खरीद कर उसका गाना लोगों को सुनाने के लिए बुलाते हैं। और इस तरह वो हक़ की बातें सुनने से लोगों को रोक देते हैं।

(क्या बाज़ारु कलाम में और ख़ुदा के कलाम में कोई फ़र्क़ नहीं। क्या बाज़ारु गाने में और हुज़ूरﷺ  की नात में कोई फ़र्क़ नहीं।) ऐसे लोगों ने सही मायने में कुरान की ये आयतें नहीं पढ़ीं.

अपनी गर्दन को (तकब्बुर से) मरोड़े हुए ताकि (दूसरों को भी) रब की राह से बहका दें।

(कुरान 22:9)

अल्लाह ने उनके दिलों पर व कानों पर मुहर लगा दी और उनकी आंखों पर पर्दा (पड़ गया) है।

(कुरान 2:7)

जिसे अल्लाह गुमराह ठहरा दे तो उसके लिए (कोई) राह दिखानेवाला नहीं।

(कुरान 7:186)

इन आयतों का ये खुलासा है कि लोगों में ऐसा शख़्स भी हो सकता है, जो फ़रेब बातें करता है। जो सुननेवालों का ध्यान, हक़ से हटाकर दूसरी तरफ़ ले जाता है, और (ख़ुदा का नाम लेकर) ख़ुदा की राह से दूर करता है। उन्होंने इन आयतों पर ग़ौर नहीं किया, इनकी शाने नुजूल पर नज़र नहीं डाली। (ये आयतें उनका हाल बयान करती हैं।) ये लोग अज़ीम मरतबे वाले मशाएख की शान में भी गुस्ताखी कर सकते हैं, इसमें कोई ताज्जुब नहीं। ये कुरान का ऐसा ग़लत मायने बयान करते हैं, जिसमें हल्कापन होता है।

बाज़ लोगों ने इसी वजह से सरोद व मज़ामीर के सुनने को हराम क़रार दे दिया है। इसे सहीं साबित करने के लिए बहुत से अक़्वाल व हदीसें भी पेश करते हैं। लेकिन ये बात नहीं समझते कि ये सारी बातें तो उस ‘सुनने’ के लिए है जो बाज़ारु है। जिसके ग़लत व हराम होने में किसी को शक़ नहीं।

…जारी है… सिमा के जवाज़ में हदीस मुबारक…
Sufiyana 232

तालीमाते आला हज़रतؓ

हज़रत अहमद रज़ा खां फ़ाजि़ल बरेलवीؓ, जिन्हें हम ‘आला हज़रत’ के नाम से जानते हैं, वो हस्ती हैं, जिन्होंने शरीअते मुहम्मदीﷺ को नज्द के फ़साद से महफूज़ किया और दीन की तारीख़ में नई इबारत लिखी। इसी वजह से आपको तमाम अहले सुन्नत बगैर किसी शक व शुब्ह के ‘मुजद्दीद ए वक़्त’ तस्लीम करती है। आज शरीअ़त का नाम आते ही आपका जि़क्र होने लगता है, तो क्यूं न हम भी इस बाब में आपके मल्फ़ूज़ात व तालीमात से फ़ैज़ हासिल करें।

वाह क्या जूदो करम है, शहे बतहा तेरा।
नहीं, सुनता ही नहीं, मांगने वाला तेरा।

मैं तो मालिक ही कहूंगा, के हो मालिक के हबीब।
यानी महबूब व मोहिब में नहीं मेरा तेरा।
तेरे क़दमों में जो हैं, ग़ैर का मुंह क्या देखें।
कौन नज़रों पे चढ़े, देख के तलवा तेरा।
तेरे टुकड़ों से पले, ग़ैर की ठोकर पे न डाल।
झिड़कियां खाएं कहां, छोड़ के सदक़ा तेरा।
तुझ से दर, दर से सग और सग से है मुझको निसबत।
मेरे गरदन में भी है, दूर का डोरा तेरा।
इस निशानी के जो सग हैं, नहीं मारे जाते।
हश्र तक मेरे गले में रहे पट्टा तेरा।
तेरी सरकार में लाता है ‘रज़ा’ उसको शफ़ीक़।
जो मेरा ग़ौस है और लाडला बेटा तेरा।

हयाते फ़ाज़‍िल बरेलवी (मुख्‍़तसर)

फाजि़ल बरेलवी मौलाना अहमद रज़ा खानؓ नसबन पठान, मसलकन हनफ़ी और मशरबन क़ादरी थे। वालिद माजिद मौलाना नक़ी अली खानؓ (1297हि./1880) और जद्दे अमजद मौलाना रज़ा अली खानؓ (1282हि./1865) आलिम और साहिबे तसनीफ़ बुजुर्ग थे। फाजि़ल बरेलवी की विलादत 10 शव्वाल 1272 हि. मुताबिक 14 जून 1856 को बरेली (यूपी) में हुई। नाम ‘मुहम्मद’ रखा गया और तारीखी नाम ‘अलमुख़्तार’ (1272हि.) तजवीज़ किया गया जद्दे अमजद ने ‘रज़ा’ नाम रखा। बाद में आपने खुद अपने नाम में ‘अब्दुल मुस्तफ़ा’ का इज़ाफ़ा किया।
आप बुलन्द पाया शायर भी थे और ‘रज़ा’ तख़ल्लुस लिखते थे। लोग ‘आला हज़रत’ और ‘फ़ाजि़ल बरेलवी’ के नाम से आपको याद करते हैं। आप बहुत से इल्म व फ़नों में माहिर थे।
कुरान, हदीस, उसूले हदीस, फि़क़्ह, जुमला मज़ाहिब, उसूले फि़क़्ह, तफ़सीर, अक़ाएद, कलाम, नहू, सफ़र्, मआनी, बयान, बदीअ, मनतक़, मुनाज़रा, फ़लसफ़ा, हयात, हिसाब, हिनदसा वगैरह का इल्म अपने वालिद मोहतरम से हासिल किये।
हज़रत शाह आले रसूलؓ, शेख अहमद मक्कीؓ, शेख अब्दुल रहमान मक्कीؓ, शेख हसीन बिन सालेह मक्कीؓ, शेख अबुल हसन नूरीؓ जैसे आलिमों से कि़रात, तजवीद, तसव्वफु़, सुलूक, अख़लाक़, असमा उर रिजाल, तारीख, नअत, अदब का इल्म हासिल किए।
इसके अलावा खुद के मुताला व बशीरत से अरसमा तयकी, जबर व मुकाबला, हिसाब सैनी, तौकीत, मन्ज़र व मराया, जफ़र, नज़्म व नस्र फारसी, नज़्म व नस्र हिन्दी, खते नस्ख, खते नस्तलीक़ वगैरह का इल्म हासिल किया।
आप हज़रत शाह आले रसूलؓ मारहरा से मुरीद हुए। आपको क़ादरी, चिश्ती, नक्शबंदी, सोहरवर्दी, अलविया सिलसिले में खिलाफ़त थी।

मुफ़्तीए आज़म हिन्दؓ के सवाल और आला हज़रतؓ के जवाब

अर्ज़: मुफ़्ती ए आज़म हिन्दؓ फ़रमाते हैं. आला हज़रतؓ की खि़दमत में, मैं और मौलवी अब्दुल अलीम साहब हाजि़र थे। मौलवी साहब ने आपसे अज़्र किया. हज़रत मुहम्मदﷺ से पहले क्या चीज़ पैदा फ़रमाई गई?
इरशाद: हदीस मुबारक है. ऐ जाबिर बेशक अल्लाह ने तमाम चीज़ों से पहले तेरे नबी का नूर अपने नूर से पैदा फ़रमाया। फिर रब ने चार दिन में आसमान और दो दिन में ज़मीन पैदा फ़रमाया।

अर्ज़: इल्मे बातिन का अदना दर्जा क्या है?
इरशाद: हज़रत जुन्नुन मिस्रीؓ फ़रमाते हैं. मैं एक बार सफ़र किया और वो इल्म लाया जिसे खास व आम सभी ने कुबूल किया। दोबारा सफ़र किया और वो ईल्म लाया जिसे खास ने तो कुबूल किया लेकिन आम ने नहीं किया। तीसरी बार सफ़र किया और वो इल्म लाया जिसे न खास ने कुबूल किया न आम लोगों ने।
यहां सफ़र का मतलब दिल का सफ़र है।

‘अक़्ल वाले ही नसीहत समझते हैं’  (कुरान 3:7)

अदना दर्जे का इल्म बातिन ये है कि आलिमों से तस्दीक़ करे और आलिम से मुहब्बत रखे।

अर्ज़: क्या वाज़ (तक़रीर) का ईल्म होना ज़रूरी है?
इरशाद: जो आलिम नहीं उसे वाज़ करना हराम है।

अर्ज़: आलिम की क्या तारीफ़ है?
इरशाद: आलिम की तारीफ़ यह है कि अक़ीदे पूरे तौर पर आगाह हो और मुस्तिक़ल (अटल) हो और अपनी ज़रूरियात को बगैर किसी की मदद से किताब से निकाल सके।

अर्ज़: क्या मुजाहिदे में उम्र की क़ैद है?
इरशाद: मुजाहिदे के लिए कम अज़ कम अस्सी बरस दरकार होते हैं। बाक़ी तलब ज़रूर की जाए।

अर्ज़: एक शख़्स अस्सी बरस की उम्र से मुजाहिदात करे या अस्सी बरस मुजाहिदा करे।
इरशाद: आम तौर पर अगर रब की इनायत न हो तो इस राह की फ़तह में अस्सी बरस लग जाते हैं। लेकिन रब की रज़ा हो तो अदना भी लम्हेभर में अब्दाल कर दिया जाता है। अल्लाह फ़रमाता है: ‘वह जो हमारी राह में मुजाहिदा करे, हम ज़रूर उन्हें अपने रास्ते दिखा देंगें’।

अर्ज़: क्या दुनियावी ख्वाहिशात वाला दिल, ख़ुदा व उसके रसूलﷺ के जि़क्र में डुबे हुए दिल पर कुछ असर करता है?
इरशाद: हां करता है।

अर्ज़: रुकूअ व सज्दे में कितनी देर ठहरना चाहिए?
इरशाद: रुकूअ व सज्दे में एक बार ‘सुब्हानल्लाह’ कहने तक रुकना फ़ज़्र है। इससे कम रुकने पर नमाज़ न होगी।

आला हज़रतؓ का जवाब

दोबारा बैअत होना कैसा है?

बिला वजह बैअत तब्दील करना शरई तौर पर मना है। लेकिन फ़ैज़ उठाना जायज़ है, बल्कि मुबाह है। एक बार तीन कलंदर हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाؓ की खि़दमत में हाजि़र हुए और खाना मांगा। जब खाना पेश किया गया तो उन्होंने फेंक दिया। कहा. खाना अच्छा नहीं है, दूसरा लाओ। फिर लाया गया तो फिर फेंक दिया। जब तीसरी बार भी ऐसा किया, तो महबूबे ईलाही हज़रत निज़ामुद्दीनؓ ने उन्हें पास बुलाकर कान में कहा. ये खाना तो उस मुरदार से बेहतर था, जो तुमने रास्ते में खाया था। हज़रत के इस ग़ैब के इल्म को देखकर कलंदर कदमों पर गिर पड़े। हज़रत ने उन्हें उठाया और अपने सीने से लगाकर रुहानी गि़ज़ा अता की। उसके बाद कलंदर वज्द में रक़्स करने लगे और ये कहने लगे कि मेरे हुज़ूर ने मुझे नेअमत अता फ़रमाई। वहां हाजि़र लोगों ने कहा. कैसे बेवकफू लोग हो, तुम्हें तुम्हारे पीर ने नहीं बल्कि हमारे पीर ने नेअमत अता की है। इस कलंदर ने कहा. बेवकफू तुम हो, अगर मेरे पीर की नज़रे इनायत नहीं होती तो तुम्हारे पीर से मुझे कुछ नहीं मिलता। ये मेरे पीर का ही सदक़ा है कि तुम्हारे पीर से मुझे फ़ैज़ हासिल हुआ। ये सुनकर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया महबूबे ईलाहीؓ फ़रमाते हैं. ये बिल्कुल सच कह रहा है। मुरीदी सीखना है तो इससे सीखो।

Sufiyana 231

अशरफ़े अंबिया…

अशरफ़े अंबिया, शाहे ख़ैरूल अनाम,
तुमपे लाखों दरूद और लाखों सलाम।
नूरे खल्लाके कौनो मकां हो दवाम,
तुमपे लाखों दरूद और लाखों सलाम।

शान वाले, तुम्हारी बड़ी शान है,
जान सदक़े, ये दिल तुम पे कुरबान है,
तुम हो आक़ा मेरे, मै तुम्हारा गुलाम,
तुमपे लाखों दरूद और लाखों सलाम।

फ़र्श क्या, अर्श क्या, और लौहो कलम,
सब पे नाफि़ज़ है, प्यारे ख़ुदा की कसम,
हुक्मरानी तुम्हारी, तुम्हारा निज़ाम,
तुमपे लाखों दरूद और लाखों सलाम।

ग़मगुसारे जहां दस्तगीरे उमम,
रख लो बहरे खुदा, आसियों का भरम,
हम ग़रीबों का महशर में बन जाए काम,
तुमपे लाखों दरूद और लाखों सलाम।

क्या शजर, क्या हजर, क्या ये शम्सो कमर,
क्या फ़लक, क्या मलक, क्या ये जिन्नो बशर,
कह रहे हैं सभी, बस यही सुब्हो शाम,
तुमपे लाखों दरूद और लाखों सलाम।

नूर वाले ज़रा नूर की भीक दो,
मुर्दा दिल हैं, हमें जि़ंदगी बख़्श दो,
तालिबे लुत्फ है, तुम से हर खासो आम,
तुमपे लाखों दरूद और लाखों सलाम।

ऐ सबा तू मदीने पहुंचना अगर,
चुमकर शौक से मेरे आका का दर,
एक गुनाहगार का अज़्र करना पयाम,
तुमपे लाखों दरूद और लाखों सलाम।

होगी बेदार ख़ुफ़्ता नसीबी मेरी,
जि़ंदगी होगी, फिर जि़ंदगी जि़ंदगी,
काश दो बूंद मिल जाए उल्फ़त का जाम,
तुमपे लाखों दरूद और लाखों सलाम।

जि़ंदगी का सफ़ीना है मझधार में,
इल्तेजा ‘अशरफ़ी’ की है सरकार में,
एक नज़र मेरे मुख़्तारे ज़ी एहतेराम,
तुमपे लाखों दरूद और लाखों सलाम।

(मौलाना अब्दुल ग़फूर अशरफ़ी, दुर्ग)

Sufiyana 228

ताजवाला मेरा सनम है

हज़रत बाबा ताजुद्दीनؓ

ताजाबाद नागपूर

खानदान

बाबा ताजुद्दीन औलियाؓ का सिलसिला नसब इमाम हसन असकरी से मिलता है। इमाम हसन असकरी की औलादें फुज़ैल मेहदी अब्दुल्लाह हिन्दुस्तान तशरीफ लाए और ज़नूबी हिन्द के साहिली इलाके मद्रास में कयाम किया। हज़रत फुज़ैल मेहदी अब्दुल्लाह के दो साहबजादे हसन मेहदी जलालुद्दीन और हसन मेहदी रुकनुद्दीन थे।
बाबा ताजुद्दीन हसन मेहदी जलालुद्दीन की औलाद में से है। बाबा साहब बुजुर्गों में जनाब सअदुद्दीन मेहदी मुगलिया दौर में फौजी अफसर होकर देहली आये। बादशाह देहली की तरफ़ से अहार नाम का एक मौजअ बतौर जागीर उन्हें दिया गया। बाद में गर्वनर नवाब मलागढ़ ने नाराज होकर हकुके जागीरदारी ज़ब्त कर ली। सिर्फ काश्तकारी की हैसियत बाकी रह गयी।
बाबा ताजुद्दीन के दादा का नाम जमालुद्दीन था। बाबा साहब के वालिद जनाब बदरुद्दीन मेहदी थे, जो सागर (मध्यप्रदेश) डिपो में सूबेदार थे। बाबा साहब की वालिदा का नाम मरियम बी था।

पैदाइश

बाबा साहब की वालिदा ने एक ख्वाब देखा कि चांद आसमान पर पूरी आबो ताब से चमक रहा है और सारी फिज़ा चान्दनी से भर गई है। अचानक चांद आसमान से गेन्द की तरह लुढ़क कर आपकी गोद में आ गिरा और कायनात इसकी रोशनी से मुनव्वर हो गयी। इस ख्वाब की ताबीर बाबा ताजुद्दीनؓ की पैदाइश की सूरत में सामने आयी। आम रवायत के मुताबिक बाबा साहब 5 रजब 1277 हि. (27 जनवरी 1861) को पैदा हुए। आप की पैदाइश पीर के दिन फज़र के वक्त मुक़ाम कामटी (नागपूर) में हुई। कलन्दर बाबा औलियाؓ(बाबा ताजुद्दीनؓ के नवासे) ने किताब तज़किरा ताजुद्दीन बाबा में लिखा है:.
बड़ी छानबीन के बाद भी नाना ताजुद्दीनؓ का साल पैदाइश मालूम नहीं हो सका। बड़े नाना (बाबा साहब के भाई) की हयात में मुझे ज़्यादा होश नहीं था और वालिद साहब को इन बातों से कोई दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन मैंने बड़े नाना की ज़ुबानी सुना है कि ताजुद्दीनؓ की उमर गदर में (यानि 1857हि. में) कुछ साल ही थी।
इन दिनों रिवायतों को सामने रखा जा रहे तो भी बाबा साहब के सन् पैदाइश में चन्द साल का फर्क पड़ा है।
आम बच्चों के तरह बाबा साहब पैदाईश के वक्त रोये नहीं बल्कि आप की आंख बन्द थी और जिस्म सख्त था। यह देख कर वहां मौजुद ख्वातीन को शक हुआ कि शायद बच्चा मुर्दा पैदा हुआ है। चुनान्चे कदीम कायदे के मुताल्लिक किसी चीज को गरम करके पेशानी और तलवों को दागा गया। बाबा साहब ने आंख खोली और रोए, फिर खामोश होकर चारो तरफ़ टक टक देखने लगे।

बचपन और जवानी

बाबा ताजुद्दीनؓ की उमर अभी एक बरस थी की उनके वालिद का इन्तकाल हो गया। और जब आप 9 साल के हुए तो वालिदा का साया भी सर से उठ गया। वालिदैन के इन्तकाल के बाद नाना नानी और मामू ने बाबा साहब को अपनी सरपरस्ती में ले लिया।
छ: साल की उमर में बाबा साहब को मकतब में दाखिल कर दिया गया था। एक दिन मकतबे में बैठे दर्स सुन रहे थे, कि उस ज़माने के एक वलीउल्लाह हजरत अबदुल्लाह शाह कादरीؓ मदरसे में आए और उस्ताद से मुख़ातिब होकर कहा. यह लड़का पढ़ा पढ़ाया है, इसे पढ़ाने की ज़रूरत नहीं है।
लड़कपन में बाबा को पढ़ने के आलावा कोई शौक न था। आप खेलकूद के बजाए तन्हाई को ज़्यादा पसन्द करते थे। पन्द्रह साल की उमर तक आप ने नाजरह कुरआन पाक, उर्दू, फारसी और अंग्रेजी की तालीम हासिल की।

फौज में

एक मरतबा नागपूर की कनहान नदी में बहुत बड़ा सैलाब आया जिसमें बाबा साहब के सरपरस्तों का सारा सामान बह गया। मजबूरी में बाबा साहब ने फौज में नौकरी कर ली और नागपूर की रेजीमेन्ट नंबर 8 (मदरासी प्लाटून) में शामिल कर लिए गये। उस वक्त आपकी उम्र 18 साल थी।
बाबा साहब के नवासे कलन्दर बाबा औलिया लिखते है. नाना (बाबा साहब) फौज में भरती होने के बाद सागर डिपो में तैनात किये गये थे। रात को गिनती से फारिग होकर आप हज़रत दाउद मक्कीؓ की मज़ार पर तशरीफ़ ले जाते। वहां सुबह तक मुराकबा व मुशाहेदा में मशरुफ़ रहते और सुबह सवेरे परेड के वक़्त डिपो में पहुंच जाते। यह दौर मुसलसल पूरे दो साल तक जारी रहा। उसके बाद भी हफ्ते में एक दो बार वहां हाजिरी ज़रूर दिया करते थे। जब तक सागर में रहे, ऐसा करते रहे।
कामटी में बाबा की नानी को जब इस बात की खबर मिली की नवासा रातों को गायब रहता है तो बहुत चिंता हुई। नानी ने खुद पीछा किया तो पाया कि बाबा साहब जि़क्र व फि़क्र में मशगूल थे। नवासे को इस तरह इबादत में डुबा हुआ देख कर नानी के दिल का बोझ उतर गया। उन्होंने बाबा साहब को बहुत दुआ दी और खामोशी से वापस लौट आयी।
बाबा साहब सुबह नानी के पास आये तो उनके हाथों में छोटे छोटे पत्थर थे। नानी ने नाश्ता पेश किया तो बाबा साहब ने पत्थर दिखाते हुये कहा . नानी मेरे लिए तो ये पत्थर ही लड्डू पेड़े हैं। यह कहकर बाबा साहब ने पत्थरों को खाना शुरू किया जैसे कोई मिठाई खाता है। नवासे की यह कैफियत देख नानी को कुछ कहने कि हिम्मत नहीं हुई।

दो नौकरिया नहीं करते

रफ़्ता रफ़्ता बाबा साहब ख़ुदा की याद में डूबने लगे। इन ही दिनों एक ऐसा वाक्या हुआ, जिसने बाबा साहब की जि़न्दगी के अगले दौर की बुनियाद डाली। बाबा साहब की ड्यूटी औज़ारों की देखरेख पर लगायी गयी थी। एक रात दो बजे बाबा साहब पहरा दे रहे थे, तो अंग्रेज कैप्टन अचानक मुआयने के लिए आ गया। मुआयने के बाद जब वापस होने लगा, कुछ दूरी पर एक मस्जिद में क्या देखता है कि जिस सिपाही को पहरा देते देख कर आया था, वो मस्जिद में नमाज़ अदा कर रहा है। उसे सख्त गुस्सा आया। वह वापिस लौटा। लेकिन क्या देखता है कि सिपाही (बाबा साहब) अपनी जगह पर मौजूद है। कैप्टन ने दोबारा मस्जिद में देखा और वही पाया।
दूसरे रोज उसने अपने बड़े अफसर के सामने बाबा साहब को तलब किया और कहा हमने तुमको रात दो दो जगह देखा है। हमको लगता है कि तुम ख़ुदा का कोई खास बन्दा है। यह सुनना था कि बाबा साहब को कैफियत तारी हो जाती है और आप उस जलाल व कैफियत के आलम में अपने मखसूस मद्रासी लहजे में फ़रमाया. लो जी हज़रत अब दो दो नौकरिया नहीं करते जी हज़रत।
यह कहकर बाबा साहब जज़्बो जलाल में फौजी अहाते से बाहर निकल आये। कामटी में रिश्तेदारों को ख़बर मिली कि बाबा साहब पर पागल पन का दौरा पड़ गया है और उन्होंने नौकरी छोड़ दी। नानी ने बेताब होकर सागर आयी और देखा की नवासे पर बेखुदी तारी है। वह बाबा साहब को कामटी ले गयी और दिमागी मरीज़ समझ कर उन का इलाज शुरू किया। लेकिन कोई मज़्र होता तो इलाज कारगर होता। चार साल तक बाबा साहब को वही सुरूर व कैफियत तारी थी। लोग आपको पागल समझकर छेड़ते और तंग करते थे, लेकिन कुछ लोग एहतराम भी करते थे।

ताज मोहीउद्दीन ताज मोईनुद्दीन

सुनने में आया है कि आपके पीरो मुर्शिद, मद्रास में आराम फ़रमां हैं। लेकिन ये भी माना जाता है कि बाबा ताजुद्दीन ने ज़ाहिरी तौर पर किसी के हाथों पर बैअत नहीं की।
आपकी जि़न्दगी में हज़रत अब्दुल्लाह शाह कादरीؓ (कामठी) और बाबा दाउद मक्की चिश्तीؓ (सागर) का बहुत असर रहा। हज़रत अब्दुल्लाह शाह कादरीؓ, वही बुजूर्ग हैं जो मदरसे में आपको पहचान लिए थे। बाद में जवानी के आलम में भी बाबा साहब आपकी खि़दमत में हाजि़र हुआ करते थे। आप अपना झूठा शरबत बाबा साहब को पिलाया करते थे। आपका मज़ार मुबारक कामठी में है।
हज़रत बाबा दाउद मक्कीؓ को हज़रत ख़्वाजा शम्सुद्दीन तुर्क पानीपतीؓ (जो हज़रत अलाउद्दीन साबिर कलियरीؓ के खलीफ़ा हैं) से खिलाफ़त थी। आप पीर के हुक्म से सागर आ गए और वहीं आपका मज़ार मुबारक है। वही मज़ार, जहां बाबा साहब दो साल तक शब्बेदारी किया करते थे।
क़लन्दर बाबा औलियाؓ फ़रमाते हैं. बाबा ताजुद्दीनؓ को हज़रत अब्दुल्लाह क़ादरी कामठीؓ से कुरबत हासिल हुई और बाबा दाउद मक्की चिश्तीؓ से उवैसिया निसबत हासिल हुई। बाबा ताजुद्दीनؓ अक्सर कहा करते. हमारा नाम ‘‘ताज मोहीउद्दीन ताज मोईनुद्दीन’’ है।

Sufiyana 227

ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ का नसब नामा

पांच चिश्त

हेरात के पास एक कस्बे का नाम चिश्त है। हज़रत अबू इसहाक़ शामी चिश्तीؓ की रूहानी मौजूदगी से ये कस्बा रूहानियत का मरकज़ बन गया। आप पहले बुजूर्ग हैं जिनके नाम के आगे चिश्ती लगा। आपके बाद इस सिलसिले आलिया के पांच जलीलुल कद्र मशायख, चिश्त ही में रहे। इन्हें पांच चिश्त कहा जाता है। ये हैं. हज़रत सैय्यद अहमद अब्दाल चिश्तीؓ, हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मोहर्रम चिश्तीؓ, हज़रत नासीरुद्दीन अबूयूसफु चिश्तीؓ, हज़रत ख़्वाजा सैय्यद मौदूद चिश्तीؓ व हज़रत सैय्यद शरीफ़ ज़न्दनीؓ। लेकिन सिलसिलए चिश्ती को हज़रत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्तीؓ के नाम से जाना जाता है।

चिश्ती निस्बत की खासियत

निस्बते चिश्तिया यानी निस्बते इशि्क़या। बिल्कुल इन्सानी फि़तरत के मुताबिक है। यही इसकी कामयाबी व उरुजि़यत की वजह है। क्योंकि क़ल्ब में ‘‘मैंने इन्सान में अपनी रूह फूंकी (कुरान 38:82)’’ और ‘‘मोमीन वो है जो शिद्दत से अल्लाह से मुहब्बत करता है (कुरान 2:165)’’ के मुताबिक़, इश्क़े इलाही कूट कूट कर भरा हुआ है। इसी वजह से चिश्ती लोग अक्सर केसरिया रंग के कपड़े पहनते हैं, जो आग का रंग है, इश्क़ की आग का। आज चिश्ती सिलसिले की बुलंदी किसी से छिपी नहीं। बल्कि दिगर सिलसिलों में ‘चिश्ती रंग’ साफ तौर पर देखा जा सकता है। और ये सब ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ की रूहानियत की वजह से है।

सिलसिल ए तरीक़त

हज़रत ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ
हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनीؓ
हज़रत सैय्यद शरीफ़ जि़न्दनीؓ
हज़रत ख़्वाजा सैय्यद मौदूद चिश्तीؓ
हज़रत नासीरुद्दीन अबूयूसफु चिश्तीؓ
हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मोहर्रम चिश्तीؓ
हज़रत सैय्यद अहमद अब्दाल चिश्तीؓ
हज़रत अबू इसहाक़ शामी चिश्तीؓ
हज़रत मुमशाद अली दीनवरी चिश्तीؓ
हज़रत अमीनुद्दीन अबू हबीरा बसरीؓ
हज़रत ख़्वाजा सैय्यद हुज़फै़ा मरअ़शीؓ
हज़रत सुल्तान इब्राहीम अदहम बल्ख़ीؓ
हज़रत जमालुद्दीन फुज़ैल बिन अयाज़ؓ
हज़रत ख़्वाजा वाहिद बिन ज़ैदؓ
हज़रत ख़्वाजा हसन बसरीؓ
हज़रत इमाम मौला अलीؓ
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ाﷺ

नस्ब नामा पिदरी (पैतृक वंशावली)

हज़रत ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ
हज़रत ग़यासुद्दीनؓ
हज़रत नजमुद्दीन ताहिरؓ
हज़रत सय्यद इब्राहीमؓ
हज़रत सय्यद इदरीसؓ
हज़रत इमाम काजि़मؓ
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ؓ
हज़रत इमाम बाक़रؓ
हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीनؓ
हज़रत इमाम हुसैनؓ
हज़रत इमाम मौला अलीؓ

नस्ब नामा मादरी (मातृक वंशावली)

हज़रत ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ
हज़रत बीबी उम्मुल विदाअؓ
हज़रत सय्यद दाउदؓ
हज़रत सय्यद अब्दुल्लाहؓ
हज़रत सय्यद ज़ाहिदؓ
हज़रत मुहम्मद मोरिसؓ
हज़रत सय्यद दाउदؓ
हज़रत सय्यद मूसाؓ
हज़रत अब्दुल्लाह मख़्फ़ीؓ
हज़रत हसन मसनीؓ
हज़रत इमाम हसनؓ
हज़रत इमाम मौला अलीؓ

Sufiyana 226

फ़रमाने पीर

यहां हम ख़्वाजा ए चिश्तिया के मल्फूज़ात से फ़ैज़ हासिल करेंगे। मल्फूज़ात, सूफ़ीयों की जि़ंदगी के उस वक़्त के हालात और तालीमात का ख़जाना होती है। जिसे कोई ऐसे मुरीद ही लिख सकते है, जो ज़्यादा से ज़्यादा पीर की सोहबत से फ़ैज़याब हुए हों। इस बार हम हज़रत ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेरीؓ के मल्फूज़ात ‘‘दलील उल आरेफि़न’’ में से कुछ हिस्सा नकल कर रहे हैं, जिसे उनके मुरीद व ख़लीफ़ा हज़रत कुतुबुद्दीन बिख़्तयार काकीؓ ने लिखा है।

बतारीख़ 5 रजब 814हिजरी को इस दरवेश कुतबुद्दीन बख्तियार को सुल्तानुस सालेकिन हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती संजरी अजमेरीؓ की क़दमबोसी का शर्फ हासिल हुआ। आपने मुझे शर्फे बैअ़त से नवाज़ा और चहारतरकीताज मेरे सर पर रखी। अल्हमदोलिल्लाह अला ज़ालेका। उस दिन वहां आपके साथ शहाबुद्दीन सोहरवर्दी, शैख दाउद करमानी, शैख बुरहानुद्दीन चिश्ती व शैख ताजुद्दीन सफाहानी एक ही जगह मौजूद थे और नमाज़ के बारे में गुफ्तगू हो रही थी।

आपने फ़रमाया. नमाज़ में सरे निगाहे इज़्ज़त से लोग नज़दीक हो सकते हैं। इस वास्ते कि नमाज़ मोमीन की मेराज़ है। तमाम मक़ामों से बढ़कर यही नमाज़ है। रब से मिलना इसी से शुरू होता है। नमाज़ एक राज़ है जो बंदा अपने परवरदिगार से बयान करता है। राज़ कहने के लिए मिलने की ज़रुरत होती है और रब के नज़दीक वही जा सकता है, जो इसके लायक़ हो।

फिर मुझ नाचीज़ (कुतबुद्दीन बख्तियार) की तरफ़ रूख करके फ़रमाने लगे. मैं जब सुल्तानुल मशायख ख्वाजा उस्मान हारूनीؓ से मुरीद हुआ तो मुसलसल आठ साल आपकी खि़दमत में रहा, एक दम भी आराम न किया, न दिन देखा न रात। जहां आप सफ़र को जाते तो आपका सामान उठाकर आपके साथ चलता। इस खि़दमत व मेहनत को देख ऐसी नेअमत से नवाज़ा कि जिसकी कोई इन्तेहा नहीं।

जिसने कुछ पाया खि़दमत से पाया। मुरीद को लाजि़म है कि पीर के फ़रमान से ज़र्रा बराबर भी न हटे। जो भी अमल (अवराद नमाज़ तस्बीह व दीगर इबादात) उससे फ़रमाया जाए पुरे होश से सुने और उसे ठीक ठीक अदा करे। क्योंकि पीर मुरीद का संवारनेवाला है। पीर जो कुछ भी फ़रमाएगा वो मुरीद के कमाल के लिए ही फ़रमाएगा।

tauba astaghfar

तौबा और अस्तग़फ़ार

मगर जिसने तौबा कर ली और ईमान ले आया और अच्छे काम किया, तो अल्लाह ऐसे लोगों की बुराईयों को नेकियों में बदल देगा, और अल्लाह बड़ा बख्शनेवाला व बहुत मेहरबान है।

(कुरान 25:70)

मगर जिसने तौबा कर ली और ईमान ले आया और अच्छे काम किया, तो यक़ीनन वो फ़लाह व कामयाबी पाने वालों में से है।

(कुरान 28:49)

और तुम अपने रब से मग़फि़रत मांगो, फिर उसकी बारगाह में (सच्चे दिल से) तौबा करो, बेशक रब बहुत मेहरबान मुहब्बत करनेवाला है।

(कुरान 11:90)

अल्लाह ने सिर्फ़ उन्हीं लोगों की तौबा कुबूल करने का वादा किया है, जो नादानी या अन्जाने में बुराई कर बैठते हैं, फिर जल्द ही तौबा कर लेते हैं। ऐसे लोगों पर ख़ुदा अपनी रहमत के साथ रूजूअ करेगा।

(कुरान 4:17)

अरबी में तौबा का मतलब- रुजूअ के होता है। यानी बुराई से अच्छाई की तरफ़ लौटना। जिस तरह इबादत के लिए पहला क़दम तहारत है, उसी तरह राहे हक़ में पहला क़दम तौबा है। तौबा, सालेकीन की पहली मंज़िल और तालेबीन का पहला मुक़ाम है। तौबा, ईमान व इबादतों की जड़ है।

हुज़ूरﷺ  फ़रमाते हैं-

अन्निदामतुत तौबतुन यानी नदामत (पछतावा) ही तौबा है।

इसमें तीन बातें शामिल होती हैं-

1.ग़लत काम करने का अफ़सोस,

2.उस ग़लत काम से बचना,

3.ज़िन्दगी में दोबारा वो ग़लती नहीं करने का इरादा।

तौबा करने की शुरुआत, बुरे काम व बुरे लोगों का साथ से होती है। सबसे बुरा तो वो है जिसे अपने अपने बुरे होने का एहसास नहीं होता और ऐसे की संगती से फिर उस गुनाह में मुब्तेला होने का डर रहता है। अगर तौबा करने के बाद भी उन बुरों से दोस्ती रखा जाए, तो इसमें कोई शक़ नहीं कि तौबा सिर्फ दिखावा है, आज नहीं कल फिर वही गुनाह होना है।

सच्ची तौबा

हज़रत सिर्री सक्तीؓ फ़रमाते हैं- सच्ची तौबा करनेवाला, तौबा नहीं करनेवाले नाफ़रमानों या गुनाहगारों से कोई ताल्लुक नहीं रखता (और न ही उनकी इज़्ज़त करता है)।

सच्ची तौबा यानी दोबारा ग़लती न करने का पक्का इरादा। जिसके दिल में गुनाह की मिठास बाक़ी है, उसकी तौबा कुबूल नहीं होती।

गुनाह की वजह

तौबा नहीं करने की अक्सर ये वजह होती है कि गुनाहगार, गुनाह को छोटा समझता है। ये समझता है कि सब तो करते हैं, मैं कर लिया तो क्या ग़लत किया। हुज़ूरﷺ  फ़रमाते हैं- मोमीन अपने (छोटे से) गुनाह को ऐसा समझता है, मानो पहाड़ टूट पड़ा हो और मुनाफि़क अपने (बड़े) गुनाह को एक मक्खी की तरह (मामूली) समझता है।

ये कितनी अजीब बात है कि जिसके लिए गुनाह बड़ी चीज़ है, वो तौबा करके उससे बच जाता है और जो उसे मामूली समझता है, वो इसमें फंसता ही चला जाता है। हज़रत बिलाल बिन सअदؓ फ़रमाते हैं- गुनाह के छोटेपन को न देख, बल्कि ये देख कि तूने किसकी नाफ़रमानी की है।

तौबा की तकमील, अपने लोगों को खुश करने पर होती है। यानी आपके वो सबसे करीब लोग, जिनको आपके ग़लत काम करने से सबसे ज़्यादा तकलीफ़ हुई हो। अगर वो आपसे खुश हों जाएं, तो ये मान लें कि आपकी तौबा मुकम्मल हो गई। क्या खूब हो कि आप पर जिनके हुकूक़ हैं, वो आपकी आजिज़ी व इन्केसारी को देखते हुए, आपसे राज़ी हो जाएं और आपको माफ़ कर दें।

गुनाह को भूल जाना

अपनी ग़लतियों को हमेशा याद करना भी ग़लत है। सच्ची तौबा करके, गुनाह या ग़लती को भूल जाएं, सिर्फ इतना याद रखें कि दोबारा न होने पाए। बार बार अपनी ग़लतियों या गुनाहों को याद नहीं करना चाहिए और न ही ऐसे लोगों के पास जाना चाहिए जो याद दिलाएं। ख़ुद को इन बेड़ियों से आज़ाद कर लें।

हज़रत मुहम्मदﷺ  फ़रमाते हैं- सच्ची तौबा करनेवाला ऐसा है, जैसे उसने कभी गुनाह किया ही न हो।

(इब्ने माजा:30)

तौबा की बरकत

तौबा में बड़ी बरकत भी होती है। जैसे अगर एक गुनाह से तौबा कर ली जाए तो दूसरा गुनाह उसकी बरकत से ख़ुद ब ख़ुद छुट जाता है।

सूफ़ी की तौबा

तौबा के लिए ये ज़रूरी नहीं कि आप गुनाहगार ही हों। तौबा मोमीन की सिफ़त है। तौबा सिर्फ़ गुनाहों या ग़लतियों से ही नहीं की जाती है, बल्कि किसी अच्छे काम से, उससे भी अच्छे काम के लिए भी तौबा की जाती है। जैसे जैसे हमारा इल्म व अमल बेहतर होता जाता है, वैसे वैसे सोच व अंदाज़ भी बेहतर होता जाता है।

सूफ़ीयों का यही तरीक़ा है- ‘बेहतर’ के लिए ‘कमतर’ से तौबा करें और ‘ज़्यादा बेहतर’ के लिए ‘कुछ बेहतर’ से तौबा करें। इस तरह बेहतर से बेहतर मुक़ाम हासिल करते जाएं। हुज़ूरﷺ  शबो रोज़ अस्तग़फ़ार किया करते थे। जबकि वो मासूम हैं, उनसे कभी कोई गुनाह हुआ ही नहीं।

हज़रत जुन्नून मिस्रीؓ फ़रमाते हैं- अवाम की तौबा गुनाह से होती है और खास की तौबा ग़फ़लत से। ग़फ़लत वो नींद है, जो हमें मालूम ही नहीं होता कि हम नींद में हैं। हम समझते ज़रूर हैं कि हम जाग रहे हैं, लेकिन दरअस्ल हम सो रहे होते हैं। इस नींद से बेदार होने के लिए मुर्शिदे बरहक़ की ज़रूरत होती है, सिर्फ वही इस नींद से उठा सकता है और रब के नूर से दिल को रौशन कर सकता है।

मारफ़ते इलाही के लिए सच्ची तौबा बगैर मुर्शिद की तलक़ीन के मुमकिन नहीं हो सकती। आम तौबा वो है कि घांस काट दी, लेकिन जड़ बच गयी। जबकि तलक़ीने मुर्शिद की तौबा, ऐसी होती है मानो जड़ सहित उखाड़ फेंकी हो।

तौबा कई तरह की होती है। कोई अपने गुनाहों से तौबा करता है, कोई अपनी नादानियों से, कोई ग़फलत से। तो कोई अपनी अच्छाईयों को देखने से तौबा करता है, ताकि ख़ुद में अच्छा होने की बुराई पैदा न हो जाए। हज़रत नूरीؓ फ़रमाते हैं- तौबा ये है कि तू हक़ के सिवा हर शै से तौबा कर ले।

हज़रत अलीؓ फ़रमाते हैं- जो अंधा हुआ वो ज़िक्र भूल गया, उसने बदगुमानी की शुरूआत की और बगैर तौबा व आजिज़ी के मग़फि़रत तलब करने लगा। तौबा उस वक़्त सच्ची हो सकती है कि गुनाह का इक़रार करे, जुल्म का एतराफ़ करे, नफ़्सानियत से नफ़रत करे और बुराईयों से दूर रहे।

अल्लाह किसी कौम की हालत तब तक नहीं बदलता, जब तक कि वो लोग ख़ुद बदलना नहीं चाहते।

(कुरान 13:11)

हुज़ूरﷺ  फ़रमाते हैं- जब बुरा अमल कर बैठो, तो इसके बाद एक अच्छा अमल करो। अगर गुनाह छिप कर किए हो तो नेकी भी छिपकर करो और अगर गुनाह ऐलानिया सबके सामने किए हो तो नेकी भी सबके सामने करो। और फ़रमाते हैं- बुराई को अच्छाई मिटा देती है।

सच्चे दिल से तौबा करनेवालों की बड़ी इज़्ज़त बयान की गयी है। हज़रत मुहम्मदﷺ  फ़रमाते हैं- सच्ची तौबा करनेवालों से मेल जोल रखा करो, क्योंकि उनके दिल सबसे ज़्यादा नर्म होते हैं।

और नेक व अच्छे आमाल का क्या फ़ायदा होता है, कुरान की इस आयत से पता चलता है-

और जो लोग ईमान लाए और नेक व अच्छे काम करते रहे, तो हम उन्हें यक़ीनन सालेहीन (नेक बंदों) में दाखिल करेंगे।

(कुरान 9:29)
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मसलके दाता गंजबख़्शؓ

हज़रत दाता गंजबख़्श अली हजवेरीؓ फ़रमाते हैं-

दीने मुहम्मदी, दुनियाभर में सूफ़ीया किराम की बदौलत फैली। आज भी अगर इन्सान को सुकूने कल्ब चाहिए तो सूफ़ीयों की बारगाह में आना ही पड़ेगा। और ऐसा हो भी रहा है। लोग सूफ़ीयों की ख़ानक़ाहों में रब की तलाश कर रहे हैं और जो यहां नहीं आ पा रहे हैं, तो वो जुनैद बग़दादीؓ, इमाम ग़ज़ालीؓ, इब्ने अरबीؓ, मौलाना जलालुद्दीन रूमीؓ जैसे सूफ़ीयों की किताबों से फ़ायदा उठा रहे हैं।

तसव्वुफ़ के इस उरूजियत को देखकर, अक्सर लोग इस पर तरह तरह के झूठे मनगढ़ंत इल्ज़ामात भी लगाते हैं। यहां तक कहते हैं कि तसव्वुफ़ का इस्लाम से कोई वास्ता नहीं है, क्योंकि हुज़ूरﷺ  के ज़माने में ये लफ़्ज़ इस्तेमाल ही नहीं होता था। अगर सिर्फ़ इसी बिना पर, तसव्वुफ़ ग़ैर इस्लामी है, तो फिर कुरान का तर्जुमा व तफ़्सीरें, बुखारी शरीफ़, मुस्लिम शरीफ़, तिरमिजी शरीफ़ जैसी हदीसों की किताबें, फि़क़्ह, मानी व बयान सभी के सभी ग़ैर इस्लामी हैं, क्योंकि ये सब भी हुज़ूरﷺ  के दौर में नहीं थी।

उस वक़्त सहाबी, दीन को फैलाने पर ही ज़ोर दे रहे थे। उन्हें किसी और काम की फुरसत नहीं थी। इस दौर के बाद सहाबी, ताबेईन व तबे ताबेईन, इन इल्मों की तरफ़ तवज्जह किए। जिन हज़रात ने कुरान के मानी व मतलब पर काम किया, वो मफु़स्सिरिन कहलाए और इस इल्म को इल्मे तफ़सीर कहा गया। जिन्होने हदीस पर काम किया वो मुहद्दिसीन कहलाए और इस इल्म को इल्मे हदीस कहा गया। जिन्होने इस्लामी कायदा कानून पर काम किया वो फुक़्हा कहलाए और इस इल्म को इल्मे फिक़्ह कहा गया। जिन्होने तज़्कीया ए नफ़्स व रूहानियत पर काम किया वो सूफ़ी कहलाए और इस इल्म को इल्मे तसव्वुफ़ कहा गया।

लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सहाबा किराम इल्म तफ़सीर, हदीस, फिक़्ह व तसव्वुफ़ से बेखबर थे। बल्कि ये कहा जाए कि वे इन सब इल्मों में माहिर थे तो गलत नहीं होगा। हां ये ज़रूर है कि उन्हें मफु़स्सिर या मुहद्दिस या फुक़्हा या सूफ़ी नाम से नहीं पुकारा जाता, लेकिन ये सारी ख़ासियत उनमें मौजूद थी। उस वक़्त हक़ीक़त थी, नाम न था, आज नाम है लेकिन हक़ीक़त बहुत कम है।

सूफ़ी लफ़्ज़ ‘सफ़ा’ से निकला है। और सफ़ा, इन्सानी सिफ़त नहीं है, क्योंकि इन्सान तो मिट्टी से बना है और उसे बिलआखि़र ख़त्म ही होना है। इसके उलट नफ़्स की अस्ल मिट्टी है, इसलिए वो इन्सान से नहीं छुटती। इसलिए नफ़्स का ख़ात्मा और सफ़ा का हासिल करना, बगैर मारफ़ते इलाही के मुमकिन नहीं। बगैर फ़नाहियत के ये हासिल नहीं होती। लेकिन इसके हासिल होने के बाद सफ़ा या नूरानियत, फि़तरत में बस जाती है।

(शरह कशफुल महजूब)
Sufi

शरीअ़त तरीक़त हक़ीक़त मारफ़त

ग़ौसुल आज़म मोहीउद्दीन अब्दुल का़दिर जिलानीؓ फ़रमाते हैं-

मारफ़त ये है कि मकनुनात के पर्दों में जो मख़्फ़ी मआनी हैं और तमाम अशया में वहदानियत के मआनी पर और हर शय में इशारा के साथ हक़ के शवाहिद पर इत्तेला हो। हर एक फ़ानी के फ़ना में हक़ीक़त के इल्म का तदराक ऐसे वक़्त में हासिल हो कि बाक़ी का उस की तरफ़ इशारा हो, इस तौर पर कि तबूबियत की हैबत की चमक हो। बक़ा के असर की तासीर इसमें हो कि जिस तरफ़ बाक़ी का इशारा हो। इस तरह कि जलाल-उल-वहीत की चमक हो और उसके साथ ये भी हो कि दिल की आंख से ख़ुदा की तरफ़ नज़र हो।

(बेहिजातुल असरार)

 

ख्वाजा ग़रीबनवाज़ मोईनुद्दीन अजमेरीؓ फ़रमाते हैं-

जो लोग शरीअ़त में साबित क़दम रहते हैं। इसके तमाम अहकाम बगैर किसी कमी के अदा करते हैं, तो अक्सर वो दूसरे मरतबे पर पहुंचते हैं, जिसे तरीक़त कहते हैं। जब तरीक़त पर साबित क़दम होते हैं, बिना किसी कमी के सारे अहकाम व शर्तों को अदा करते हैं, तो वो मारफ़त के मुक़ाम पर पहुंचते हैं। जहां शनासाई व शिनाख्त का मुक़ाम आ जाता है, इसमें साबित क़दम रहने से हक़ीक़त के मरतबे पर पहुंचते हैं।

(मल्फूज़ाते ग़रीबनवाज़)

हज़रत सैय्यद ज़व्वार नक़्शबंदीؓ फ़रमाते हैं-

आम लोगों में ये मशहूर हो गया है कि सिर्फ ज़ाहिरी (दिखनेवाले) आमाल व इबादत को शरीअ़त कहते हैं और ये बातिनी (न दिखनेवाले) आमाल व इबादत पर ध्यान नहीं देते। ऐसे लोग सरासर जिहालत व ग़लती पर हैं। इसी तरह एक गिरोह बातिनी आमाल को ज़रूरी समझकर, ज़ाहिरी आमाल व इबादत को छोड़ देता है। ऐसे लोग भी गुमराही में हैं।

हुज़ूरﷺ के हुक्म को मानना ही शरीअ़त है, चाहे वो कुरान की शक्ल में हो या हदीस की शक्ल में। इसके ज़ाहिरी अहकाम को फि़क़्ह कहा जाता है (आमतौर पर इसे ही शरीअ़त कहते हैं)। और बातिनी अहकाम को तसव्वुफ़ कहा जाता है। और तसव्वुफ़ के तरीक़ों को तरीक़त कहा जाता है। शरीअ़त के बगैर, तरीक़त और तरीक़त के बगैर, शरीअ़त बेकार है।

इमामे आज़म अबू हनीफ़ाؓ फ़रमाते हैं-

नफ़्स का अपने हुकूक़ व फ़ज़्र को जानना ही शरीअ़त है।

अब्दुल हक़ मोहद्दिस देहलवीؓ फ़रमाते हैं-

जो शरीअ़त व तरीक़त में फ़र्क़ करे, वो सूफ़ी नहीं।

हज़रत अबू उस्मान हयरीؓ फ़रमाते हैं

ज़ाहिर में हुज़ूरﷺ के खि़लाफ़ करना, बातिन में रियाकारी की अलामत है।

शैख बायज़ीद बुस्तामीؓ फ़रमाते हैं-

अगर तुम किसी को करामत करते देखो, यहां तक कि हवा में उड़ता हो, तब भी धोखा न खाना। वो जो कोई भी हो, अगर हुज़ूरﷺ के हुक्म के मुताबिक नहीं है, तो किसी काम का नहीं।

इमाम कुशैरीؓ फ़रमाते हैं-

वो बातिन, जो ज़ाहिर के खिलाफ़ हो, दरअस्ल बातिल है।

हज़रत यहया मुनीरीؓ फ़रमाते हैं-

जिन दीनी मामलात का ताल्लुक़ ज़ाहिर से है, उसे शरीअ़त कहते हैं और जिनका ताल्लुक़ रूह से है, उसे तरीक़त कहते हैं।

हज़रत हाजी इमदादुल्लाह महाजर मक्कीؓ ने ‘शरह मसनवी’ में एक हदीस नक़ल की है-

‘हुज़ूरﷺ फ़रमाते हैं कि शरीअ़त मेरे क़ौल का नाम है, तरीक़त मेरे आमाल का नाम है, हक़ीक़त मेरे अहवाल का नाम है और मारफ़त मेरा राज़ है’।

(रूहानियते इस्लाम, असरारे मारफ़त)

इमाम मालिकؓ फ़रमाते हैं-

‘जिसने तसव्वुफ़ पर अमल किया, फि़क़ह न सीखी वो गुमराह है। जिसने फि़क़ह सीखी लेकिन तसव्वुफ़ न सीखा, वो फिस्क़ व फ़जूर में मुब्तेला है। जिसने दोनों को हासिल किया, वो हक़ीक़त को पहुंचा’।

(शरह ऐनुल उलूम:33)

ख़्वाजा सफै़ुद्दीन चिश्तीؓ फ़रमाते हैं-

तरीक़त, शरीअ़त की जान है, यही इस्लाम की रूह है और यही ताकत भी है। रूहानियत के बगैर इस्लाम एक खाली ढांचा और मुर्दा जिस्म की तरह है। आज हमारी ज़वाल व बर्बादी की असल वजह ये है कि ज़ाहिरी इल्म तो बहुत है लेकिन रूहानी इल्म से खाली हैं। जिस मज़हब से उसकी रूहानियत निकाल ली जाए, वो अंधेरे, गुमराही और खात्मे के दलदल में धंसता चला जाता है।

इन्सान की असल उसकी रूह है, बगैर रूह के इन्सान मिट्टी है। जिस तरह ज़िन्दा रहने के लिए हमें खाने की ज़रुरत होती है, उसी तरह रूह की गि़ज़ा रूहानियत है। क्योंकि रूहानियत से ही उस हक़ की मारफ़त नसीब होती है।

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हदीसे जिब्रईलؑ

हज़रत उमर फ़ारूक़ؓ फ़रमाते हैं कि एक रोज़ हुज़ूरﷺ  की बारगाह में एक सफेद कपड़े पहने, काले बालों वाला शख़्स हाज़िर हुआ। उसके चेहरे से सफ़र की थकान नज़र नहीं आ रही थी।

हम में से कोई भी उसे पहचानता न था। वो शख़्स हुज़ूरﷺ  के सामने, जानू से जानू मिलाकर बैठ गया और हुज़ूरﷺ  से पूछा – बताइए इस्लाम क्या है?

हुज़ूरﷺ  फ़रमाते हैं- ये गवाही देना कि ख़ुदा के अलावा कोई माबूद नहीं और मुहम्मदﷺ  उसके रसूल हैं। और ये भी कि नमाज़ अदा करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रखना और हैसियत हो तो हज अदा करना। तो उस शख़्स ने कहा- आप बिल्कुल सहीं फ़रमा रहे हैं। (हज़रत उमरؓ फ़रमाते हैं कि) हमें बड़ा ताज्जुब हुआ कि वो ख़ुद ही पूछ रहा है और तस्दीक भी कर रहा है।

फिर उस शख़्स ने पूछा- ईमान क्या है? हुज़ूरﷺ  ने फ़रमाया- यक़ीन रखना ख़ुदा का, उसके फरिश्तों का, उसकी किताबों का, उसके रसूलों का और कयामत के दिन का और अच्छी बुरी तक़दीर का। उसने कहा आप सहीं फ़रमाते हैं।

फिर उसने पूछा- एहसान (तसव्वुफ़) क्या है? आपने फ़रमाया- एहसान (तसव्वुफ़) ये है कि तुम ख़ुदा की इस तरह इबादत करो, मानो तुम उसे देख रहे हो। अगर उसे न देख सको तो ये समझो कि वो तुम्हें देख रहा है।

(बुखारी शरीफ़ व मुस्लिम शरीफ़)

 

पूछने वाले हज़रत जिब्रईलؑ हैं और इस हदीस को ‘हदीसे जिब्रईल’ भी कहते हैं। इसमें तीन बात कही गयी है- दीन, ईमान व एहसान। यहां ग़ौर करने वाली बात है कि जब दीन का खुलासा हो गया और फिर ईमान का खुलासा हो गया, तो फिर अब एहसान की बात करने की क्या ज़रूरत है। दरअस्ल इन्सान का दुनिया में आने का मक़सद सिर्फ दीन को जानना नहीं है और न ही सिर्फ ईमान रखने से आखि़रत की कामयाबी है। सिर्फ इबादत करना भी हमारा मक़सद नहीं है, क्योंकि इबादत तो ग़ैर अक़ीदा भी करते हैं, फ़रिश्ते भी करते हैं। शैतान ने भी इबादत की है। तो फिर इन्सान के होने का मक़सद क्या है? जबकि वो दूसरे मख़्लूक (जीवों) से बेहतर है तो उसका मक़सद भी आला होना चाहिए।

इन्सान के इस दुनिया में आने का मक़सद है- रब की मारफ़त हासिल करना। पहले तो ये यक़ीन रखना कि रब उसे देख रहा है और फिर उस मुक़ाम को हासिल करना जहां वो रब को देख रहा हो। इस दुनिया के तख़्लीक़ की वजह, दीन की वजह, ईमान की वजह, शरीअ़त की वजह, तरीक़त की वजह, हक़ीक़त की वजह- सिर्फ और सिर्फ ख़ुदा की मारफ़त है।

और बेशक हमें अपने रब की तरफ़ लौटना है।

(कुरान 43:14)
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इश्क़ (दर्से मसनवी)

मसनवी मौलाना रूमी- सूफ़ीयाना हिकायात, अख़्लाकी तालीमात और आरिफ़ाना मकाशिफ़ात का वो नमूना है, जिसकी मिसाल नहीं मिलती। ख़ुद मौलाना रूमीؓ कहते हैं कि इसमें कुरान के राज़ छिपे हैं। जिस शख़्स की जान में मसनवी का नूर होगा, बाक़ी हिस्सा उसके दिल में ख़ुद ब ख़ुद उतर जाएगा। फि़क़्ह शरीअ़त मुकद्दसा के लिए, जिस तरह इमाम अबूहनीफ़ाؓ व इमाम शाफ़ईؓ पैदा किए गए हैं, उसी तरह फि़क़्हे तरीक़े इश्क़ के लिए हक़ तआला ने मौलाना रूमीؓ को पैदा फ़रमाया।
 मौलवी हरिग़ज़ नशुद मौलाए रूम
 ता ग़ुलामी शम्स तबरेज़ी नशुद
 (मौलाना रूमी, मौलाना नहीं बन पाता अगर हज़रत शम्स तबरेज़ؓ का ग़ुलाम नहीं होता।)
 - मौलाना जलालुद्दीन रूमीؓ

बाकस नगिरम उल्फ़ते, अज़ ख़्ल्क़ दारम वहशते।

मस्ताना रक़्सम दम बदम, अज़ दस्त इश्क़ अज़ दस्त इश्क़।

-ग़ौसपाक मोहीयुद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानीؓ

(मैं किसी से वाकि़फ़ नहीं हूं, दुनियादारी से मुझे डर है। मैं तो हरदम इश्क़ में मस्ताना हो कर रक़्स कर रहा हूं, ये भी इश्क़ ही की सौग़ात है, ये सब इश्क़ ने किया है।)

जब इश्क़ में अपनी हस्ती का, एहसास मिटाया जाता है।
फिर जिसकी तमन्ना होती है, हर शै में वो पाया जाता है।

ऐ राहे मुहब्बत के रहरौ, अफ़सोस न कर नाकामी का।
मंज़िल तो मिल ही जाती है, जब ख़ुद को मिटाया जाता है।

हम लाख छिपाएं ग़म अपना, लेकिन ये कहां तक मुमकिन है।
सूरत में नुमायां होता है, जो ग़म भी छिपाया जाता है।

जब नक़्शे दूई मिट जाती है, वो सामने ख़ुद आ जाते हैं।
मेराजे मुहब्बत होती है, दीदार कराया जाता है।

वो जिस पे करम फ़रमाते हैं, वो जिस पे इनायत करते हैं।
दुनिया ए मुहब्बत का उसको, दस्तूर बनाया जाता है।

उस बाद ए ग़म के सागर की, मुझ को भी तमन्ना है साक़ी।
जो बाद ए ग़म दीवानों की, तक़दीर बनाया जाता है।

इतना ही समझ में आया है, दस्तूर ए मुहब्बत, ऐ ‘सादिक़’।
राज़ी ब रज़ा हो जाने से, महबूब को पाया जाता है।

-हज़रत यासीन सादिक़ देहलवीؓ

 

इश्क़ एक आग है और आशिक़ की हर सांस एक शोला है। और ये शोला महबूब के अलावा हर शय को जला देता है।

आतिशस्त ईं बांगे नाए व नेस्त बाद।
हर के ईं आतिश नदारद नेस्त बाद।

इश्क़ आं शोला अस्त के चॅूं बर फ़रोख़्त।
हर चे जुज़ माशूक़ बाक़ी जुमला सोख़्त।

आदमी की क्या हक़ीक़त है, इश्क़ ने समन्दरों को उबालकर रख दिया है, पहाड़ों को रेत कर दिया है, आसमानों के टुकड़े टुकड़े कर दिया है, ज़मीनों को लरज़ा दिया है। ये ऐसा सौदा है, जिसके बाद कोई सौदा नहीं रहता। न जिस्मानी न नफ्सानी, सबको जलाकर भस्म कर दिया है।

गिरया व ज़ारी, इस मर्ज़ की ख़ास पहचान है। आखें नहीं इस बीमारी में दिल रोता है।

आशिक़ी पैदास्त अज़ ज़ारीए दिल।
नेस्त बीमारी चू बीमारिए दिल।

आम बीमारियों के उलट इसकी खासियत असरारे इलाही है। और ये वो चीज़ है, जो इश्क़ की बेहोशी में ही महसूस हो सकता है। इसे समझना होशवालों के बस की बात नहीं।

महरुम ईं होश जुज़ बेहोश नेस्त।
मज़र्बान रा मश्तरी जुज़ गोश नेस्त।

इश्क़ शरह व बयान की चीज़ नहीं हैं। जो कुछ कहा जाए, हक़ीक़त उससे कहीं उंचाई पर होती है। इश्क़ की बेजुबानी हर जुबान पर भारी है। ये अपनी गहराईयों व फैलाव की वजह से कहने सुनने के पैमानों में समा नहीं सकता।

दर नगुन्जद इश्क़ दर गुफ़्तो शनीद।
इश्क़ दरया हस्त क़अरश नापदीद।

आशिक़ की ज़िन्दगी ये है कि दिन रात ग़म-ए-इश्क़ में खिलता जाता है। दिन रात ख़त्म हो जातें हैं, लेकिन इश्क़ की आग खत्म नहीं होती। आशिक़ की दवा सिर्फ इश्क़ है, उसके लिए इश्क़ ही क़ीमती है, ख़ुद की हस्ती कुछ नहीं।

इश्क़ नां बे नां गि़ज़ाए आशिक़स्त।
बन्द हस्ती नेस्त हर को सादिक़स्त।

उन्हें अपनी हस्ती से कोई सरोकार नहीं। इश्क़ की ज़ाहिरी कोई हस्ती नहीं, लेकिन यहां सिर्फ उसी की हस्ती है। इश्क़ का पहला मुतालबा सिर का नज़राना है। हज़रत इस्माईलؓ की तरह सिर पेश है, हंसी खुशी कुरबान होने को। महबूब के हाथों ‘मैं’ का क़त्ल हो जाए तो इससे बड़ी खुशी की बात क्या होगी।

हमचू इस्माईल पेशश सर नबा।
शादो खन्दां पेश तेग़श जां बदा।
आशिकां जामे फरह अंगा कुशन्द।
के बुदस्त खवैश खूबां शान कुशन्द।

इश्क़ का एक दरजा ये है कि ख़ुद के अक्स में महबूब नज़र आए। फिर उस दरजे से गुज़र जाएं तो फिर इश्क़ ही इश्क़ बाकी रह जाता है। मानो पूरी कायनात इश्क़ में समा गयी हो। इसके बाद सिर्फ महबूब ही रह जाता है। उसके अलावा हर शय फ़ना हो जाती है। हक़ के सिवा हर माबूद हर मौजूद मिट जाता है।

तेग़ ला दर क़त्ल ग़ैर हक़ बरान्द।
दर निगर, ज़ां पस के बाद ला चे मान्द।।
मान्द, इल्लल्लाह बाक़ी जुम्ला सोख़्त।
शाद बाश ऐ इश्क़, शिरकत शोज़ रफ़्त।।

आशिक़ की सूरत तो एक परदा है, दरअस्ल वो सरापा महबूब हो चुका है। आशिक़ की ज़ात, महबूब की ज़ात में फ़ना हो चुकी है। आशिक़ की जुबान से महबूब बोल रहा है।

जुम्ला माशूक़स्त व आशिक़ पर्दा।
ज़िन्दा माशूक़स्त व आशिक़ मुर्दा।।
चूं नबा शुद इश्क़ रा पर वाए ऊ।
ऊ चू मरग़े मांद बे पर, वाए ऊ।।

Sufiyana 216

ज़िक्र अज़कार

यहां हम सूफ़ी जलालुद्दीन खि़ज़्र रूमीؓ की तालीमात से फ़ैज़ हासिल करेंगे।

आप ज़िक्र की बहुत तालीम फ़रमाते हैं। इसका पहला हिस्‍सा हम पढ़ चुके हैं, पेश है इसका दुसरा हिस्‍सा...

इक़रा कुल्बा बिस्मिल्लाह

सल्लल्लाहो वलहम्दोलिल्लाह

हसबी रब्बी जल्लल्लाह

मा फ़ी क़ल्बी ग़ैरुल्लाह

नूर मुहम्मद सल्लल्लाह

ला इलाहा इल्लल्लाह

मुहम्मदुर्रसुलल्लाह

सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम

 

दस्त ब कार, दिल ब यार।

हाथ को काम में लगाए रखो और दिल को यार में लगाए रखो।

 

 

अलीफ़ अल्लाह चन्बे दी बूटी मुर्शिद मन मेरे विच लाई हू

नफ़ी असबात दा पानी मिलया हर रगें हरजाई हू

अन्दर बूटी मशक मचाया जान फलन पराई हू

जेवे मुर्शिद कामिल बाहू जैं इहया बूटी लाई हू

सुल्तान बाहूؓ

 

हज़रत अबूदरदाؓ से मरवी है कि हज़रत मुहम्मदﷺ  ने फ़रमाया कि ‘‘अल्लाह के नज़दीक सबसे बेहतरीन अमल ज़िक्र है। ज़िक्र सबसे ज्यादा पाकीज़ा और रूहानी दरजात को बुलन्द करने वाला है। ये सोना चांदी ख़ैरात करने से और जिहाद करने से भी अफ़ज़ल अमल है।’’

(तिरमिजी:3377, इब्नेमाजा:379)

 

 

‘ऐ ईमानवालो! अल्लाह का ज़िक्र बहुत बहुत किया करो।’

(कुरान 41:33)

‘उस (अल्लाह) का ज़िक्र किया करो, जैसे (तरीक़े) उसने तुम्हें हिदायत फ़रमाई है।’

(कुरान 2:198)

 

ज़िक्र की बरकतों और अज़मतों की कोई हद नहीं है। जो जितनी यकसूई (ध्यान से) और तड़प से इसे अदा करेगा उसे उतना ही फ़ैज और फ़ायदा हासिल होगा। ज़िक्र, दिल की वो आग है जो ख़ुदा की याद के अलावा बाक़ी सब जला देती है। सिफ़ाते बशरीया का पहाड़ इसी ‘लाईलाहा इल्लल्लाह’ के ‘ला’ से तोड़ा जा सकता है और यही ‘ला’ ही सारे माबूदाने बातिल की नफ़ी करता है।

ख़्वाजा बन्दानवाज़ गेसूदराज़ؓ फ़रमाते हैं- जो भी ज़िक्र अज़कार, सूफ़ीयों की बारगाह में अदा किए जाते हैं, वो सब हज़रत मुहम्मदﷺ  से सीना ब सीना पहुंचे हैं। आपﷺ  ने सहाबा को ज़िक्र की तालीम फ़रमाई और करने का तरीक़ा व क़ाएदा बताया। बिल्कुल वही क़ायदा व तरीक़ा, खुलफाए राशिदीन से सहाबी, फिर उनसे ताबेईन, उनसे सिलसिले के बुजूर्गों से होता हुआ, सीना ब सीना हम तक पहुंचा है।

हुज़ूरﷺ  ने फ़रमाया- ऐ अलीؓ! आओ हम तुम्हें वो राह बताएं, जिससे तुम अल्लाह को देख सकोगे। फिर फ़रमाया- कहो ‘लाइलाहा इल्लल्लाह’। तो हज़रत अलीؓ ने फ़रमाया- या रसुलल्लाह! इसे तो हम हमेशा पढ़ते हैं। तो आपने फ़रमाया- जैसा मैं कहता हूं और जैसा करता हूं, वैसा करो। और इसी तरह आगे भी किया करो। और लोगों को भी बताया करो।

ख़्वाजा बन्दानवाज़ؓ ने ज़िक्र अज़कार करने के तरीक़े के बारे में, हज़रत अलीؓ, हज़रत सिद्दीक़ؓ, हज़रत बिलालؓ, हज़रत सलमानؓ जैसे सहाबियों से और बड़े बड़े मशायखों से मरवी तकरीबन 54 रिवायतें, अपने रिसाले में दर्ज किए हैं।

ज़िक्र ज़र्ब ख़फ़ी का तरीक़ा

अच्छी तरह पाकसाफ व बावजू होकर, पीर के सामने दोजानू होकर बैठें। अगर पीर साहब हाज़िर न हों तो उनका तसव्वुर कर, उन्हें शामिले हयात समझें। दोजानू इस तरह बैठें कि सीधे पैर का पंजा खड़ा हो और दूसरा लेटा हो, और हाथ जानू पर रखें। पहले दरूद शरीफ़ पढ़ें।

फिर सिर को बाएं घुटने की तरफ़ (दिल की तरफ) झुका लें और ‘ला’ कहते हुए दाहिने घुटने तक ले आएं। फिर ‘इलाहा’ कहते हुए, सिर को दाहिने कंधे से थोड़ा पीछे की तरफ़ ले जाएं। और ये ख़्याल करें कि ‘रब के सिवा दिल में जो कुछ भी है, उसे दूर फेंकता हूं।’ फिर ‘इल्लल्लाह’ कहते हुए सिर को सामने, दिल की तरफ़ ज़ोर से ज़र्ब लगाएं। और ये ख़्याल करें कि ‘सिर्फ उस एक ज़ात को अपने दिल में बसाता हूं।’ इसे ‘चार ज़रबी’ भी कहते हैं, क्योंकि इसमें चार ज़र्ब हैं। 1.बाएं घुटने पर, 2.दाएं घुटने पर, 3.दाएं कंधे पर और 4.दिल पर।

ज़िक्र पास अनफ़ास ख़फ़ी

इसके लिए सांस बाहर छोड़ते वक़्त ‘ला ईलाहा’ दिल में पढ़ते हुए ये तसव्वुर करें कि ‘रब के सिवा दिल में जो कुछ भी है, उसे दूर फेंकता हूं।’ और सांस लेते वक़्त ‘इल्लल्लाह’ ख्याल करते हुए, दिल पर ज़र्ब करें। और ये तसव्वुर करें कि ‘सिर्फ उस एक ज़ात को अपने दिल में बसाता हूं।’ इस ज़िक्र में जुबान से कुछ नहीं कहते और न ही सर या हाथ वगैरह हिलाते हैं। और न ही बहुत ज़ोर ज़ोर से सांस की आवाज़ निकालें। इस ज़िक्र को चलते, फिरते, काम करते हुए भी कर सकते हैं।

 

यहां ये याद रखें कि ज़िक्र का पूरा तरीका लिखकर नहीं समझाया जा सकता।

इसे अपने पीरो मुर्शिद से सीख कर और उनकी इजाज़त से ही, सहीं तौर पर अदा किया जा सकता है।
Sufiyana 215

छाप तिलक सब छीनी रे

कलाम – हज़रत अमीर खुसरोؓ

 

उर्दू भाषा की पहली ग़ज़ल लिखनेवाले, हज़रत अमीर खुसरोؓ की तारीफ़ के लिए हमारे पास शब्द नहीं है। 

आप फ़नाइयत में डूबे हुए सूफ़ी हैं। पेश है आपका लिखा हुआ एक मशहूर हिन्दी कलाम...

 

 

छाप तिलक सब छीनी रे

मोसे नैना मिलाइके।

 

प्रेम भटी का मधवा पिलाइके

मतवाली कर दीनी रे

मोसे नैना मिलाइके।

 

गोरी गोरी बय्यां, हरी हरी चूरियां,

बय्यां पकड़ धर लीनी रे

मोसे नैना मिलाइके।

 

बल बल जाउं मैं, तोरे रंग रजवा,

अपनी सी कर लीनी रे

मोसे नैना मिलाइके।

 

‘खुसरो’ निजाम के बल बल जय्ये,

मोहे सुहागन कीनी रे

मोसे नैना मिलाइके।

 

छाप तिलक सब छीनी रे

मोसे नैना मिलाइके।

Sufiyana 214

ईश्वर के अस्त्र-शस्त्र – Bible

 

अन्त में यह- आप लोग प्रभु से और उसके अपार सामर्थ्य से बल ग्रहण करें, आप ईश्वर के अस्त्र-शस्त्र धारण करें, जिससे आप शैतान की धूर्तता का सामना करने में समर्थ हों, क्योंकि हमें निरे मनुष्यों से नहीं, बल्कि इस अन्धकारमय संसार के अधिपतियों, अधिकारियों तथा शासकों और आकाश के दुष्ट आत्माओं से संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए आप ईश्वर के अस्त्र-शस्त्र धारण करें, जिससे आप दुर्दिन में शत्रु का सामना करने में समर्थ हों और अन्त तक अपना कर्तव्य पूरा कर विजय प्राप्त करें।

आप सत्य का कमरबंद कसकर, धार्मिकता का कवच धारण कर और शान्ति-सुसमाचार के उत्साह के जूते पहन कर खड़े हों। साथ ही विश्वास की ढाल धारण किए रहें। उससे आप दुष्ट के सब अग्निमय बाण बुझा सकेंगे। इसके अतिरिक्त मुक्ति का टोप पहन लें और आत्मा की तलवार – अर्थात् ईश्वर का वचन – ग्रहण करें।

(एफेसियों के नाम पौलुस का पत्र, अध्याय-6, आयत-10 से 17)
पेशकर्दा – हरमैन पौल किन्डो (पूर्व आई.ए.एस.), भिलाई (छत्तीसगढ़)

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