Sufiyana 115

मी रक़्सम

सूफ़ीयाना कलाम

नमी दानम चे आखिर चूं दमे दीदार मी रक्सम

मगर नाज़म बईं ज़ौक़े के पेशे यार मी रक्सम

मुझे नहीं मालूम कि आखिर दीदार के वक्त क्यूं रक्स कर रहा हूं

लेकिन अपने इस ज़ौक़ पर नाज़ है कि अपने यार के सामने रक्स कर रहा हूं

तू आं क़ातिल के अज़ बहरे तमाशा खूने मनरेज़ी

मन आं बिस्मिल के ज़ेरे खंजरे खूंखार मी रक्सम

तू वो क़ातिल है के तमाशे के लिए मेरा खूंन बहाता है

और मैं वो बिस्मिल हूं के खूंखार खंजर के नीचे रक्स करता हूं

सरापा बर सरापाए खुदम अज़ बेखुदी कुरबां

बगिरदे मरकज़े खुद सूरते परकार मी रक्सम

सर से पांव तक जो मेरा हाल है, उस बेखुदी पर मैं कुरबान जाउं,

के परकार की तरह अपने ही इर्द गिर्द रक्स करता हूं

बया जानां तमाशा कुन के दर अन्बूहे जांबजां

बसद सामाने रूसवाई सरे बाज़ार मी रक्सम

आ ऐ महबूब, और तमाशा देख कि जांबजां की भीड़ में,

मैं सैकड़ों रूसवाइयों के सामान के साथ, सरे बाज़ार रक्स करता हूं

खुशा रिन्दी के पामालश कुनम सद पारसाइ रा

ज़हे तक़वा के मन बा जुब्बा ओ दसतार मी रक्सम

वाह मयनोशी, कि जिसके लिए मैंने सैंकड़ों पारसाइयों को पामाल कर दिया

खूब तकवा, कि मैं जुब्बा व दस्तार के साथ रक्स करता हूं

तू हर दम मी सराई नग़मा व हर बार मी रक्सम

बहर तरज़े के रक्सानी मनम ऐ यार मी रक्सम

तू हर वक्त जब भी मुझे नग़मा सुनाता है, मैं हर बार रक्स करता हूं

और जिस धून में रक्स कराता है, ऐ यार, मैं रक्स करता हूं

अगरचे क़तर ए शबनम नपायद बर सरे खारे

मनम आं क़तर ए शबनम बनोके खार मी रक्सम

अगरचे शबनम का क़तरा कांटे पर नहीं पड़ता

लेकिन मैं शबनम का वो क़तरा हूं के कांटे की नोक पर रक्स करता हूं

मनम ‘उसमान हारूनी’ के यारे शैख मन्सूरम

मलामत मी कुनद खल्क़े व मन बरदार मी रक्सम

मैं उस्मान हारूनी रज़ी., शैख मन्सूर हल्लाज रज़ी. का दोस्त हूं,

मुझे खल्क़ मलामत करती है और मैं सूली पर रक्स करता हूं

– कलाम – हज़रत ख्वाजा उसमान हारूनी रज़ी.

(ख्वाजा गरीबनवाज़ रज़ी. के पीरोमुर्शिद)

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Masnavi Maulana Rome

तलब (मसनवी मौलाना रूमी)

 

मसनवी मौलाना रूमी- सूफ़ीयाना हिकायात, अख्लाकी तालिमात और आरिफ़ाना मकाशिफ़ात का वो नमूना है, जिसकी मिसाल नहीं मिलती।

ख़ुद मौलाना रूमी रज़ी. कहते हैं कि इसमें क़ुरान के राज़ छिपे हैं। जिस शख्स की जान में मसनवी का नूर होगा, बाक़ी हिस्सा उसके दिल में ख़ुद ब ख़ुद उतर जाएगा।

मौलवी हरग़िज़ नशुद मौलाए रोम

ता ग़ुलामी ए शम्स तबरेज़ी नशुद

(मौलाना रूमी, मौलाना नहीं बन पाता, अगर हज़रत शम्स तबरेज़ रज़ी. का ग़ुलाम नहीं होता।)

- मौलाना जलालुद्दीन रूमी रज़ी.

 

तलब, रब की राह की पहली ज़रूरत है। ढुंढने और खटखटाने के बगैर हक़ का दरवाजा न मिलता है न खुलता है। और इस दरवाजे की कुन्जी हिम्मत है।

चूं दर मअनी ज़नी बाज़त कुनन्द

पर्र फिकरत ज़न के शहबाज़त कुनन्द

बुराई या खुबी हो या फिर बेवकूफी हो, किसी पर यहां रोक नहीं। अगर एक मक़सद हो, उसके लिए दिल की लगन हो और हिम्मत हो तो बस फिर कामयाबी ही कामयाबी है।

मगर अन्दर खूब व ज़श्ते खवैश

बगर अन्दर इश्क व बर मतलूब खवैश

मगर आं के तो हक़ीरी या ज़ईफ़

बगर अंदर रहमत ख़ुदाए शरीफ़

इस सफर के लिए किसी साज़ो सामान की ज़रूरत नहीं। बिना किसी काबिलियत वाला गरीब अदना भी इस राह में उड़ने के काबिल है। यानि बेबस भी उड़ान भर सकता है। पानी पर पहुंचने के लिए लबों की खुश्की ख़ुद गवाह है कि ज़रूर मिलेगा। तेरी प्यास ही तेरी रहनुमा है। प्यास से होंठों का सुख जाना दरअस्ल ख़ुद पानी की तरफ से इशारा है कि ये परेशानी, पानी तक पहुंचा कर रहेगी।

जुस्तजू और जद्दो जहद मत छोड़ो क्योंकि पानी के बग़ैर प्यास का बुझना मुमकीन नहीं। और इतमिनान रखो कि पानी तक पहुंचोगे ही, क्योंकि तुम ही नहीं ढुंढ रहे हो उसे, पानी को भी तुम्हारी प्यास है।

खुश्की लब हस्त पैग़ामे ज़ आब

के बमाअत आरद यक़ीन इं इज़तेराब

तिश्नगां गर आब जवेन्दा ज़ जहां

आब हम जवेद बआलम तिश्नगां

जुस्तजू हर क़िस्म की रूकावटों को दूर कर देती है। यही आपकी लावलश्कर है और यही आपके जीत की ज़मानत भी है। ये इत्तेफ़ाक़ और क़िस्मत की बात है कि कभी कभी बेतलब भी खज़ाना मिल जाता है लेकिन इस वजह से जुस्तजू छोड़ना बेवकूफी है।

ज़ौक़े तलब पैदा करने के लिए तालिबों से दोस्ती रखना दवा का काम करती है। तलब सोच समझकर हो या किसी की नकल कर के हो, कभी बेकार नहीं जाती। ये भी सच है कि नकल करने वालों के लिए खतरा ज्यादा है अंदरूनी भी और बाहरी भी। लेकिन हक़ की रौशनी उसे सहारा देती है और शको शुब्ह के बादल छट जाते हैं।

जुस्तजू, किसी ग़रज से हो या बेग़रज हो, हक़ की कशिश ख़ुद ब ख़ुद खिंच लेती है। तलब की वजह कुछ भी हो उसकी अहमियत नहीं, सिर्फ सच्ची तलब ही ज़रूरी है। जो गिरफतार करने वाला है वही तलब पैदा करता है।

गर मोहिब्ब हक़ बूद लेग़ैरा, के नयाल दायमन मन खैरा।

नूरे हक़ बर नूरे हुस्न राकिब शूद, वआं गहे जां सूए हक़ राग़िब शूद।

लयक पैदा नेस्त आं राकिब बरो, जुज़ बआसार व बेगुफ्तार नको।

ताक़त की अहमियत नहीं है। मक़सद कितना ही बड़ा क्यूं न हो और तुम कितने ही छोटे क्यों न हो, जुस्तजू होनी चाहिए। तेज़ चलें या धीरे चलें, दोनों ही मंज़िल पर पहुंचते हैं, कोई जल्दी तो कोई देर से। तुम्हारा काम तो ये है कि अपनी तमाम ताक़तों को लगा दो और अपनी सोच को एक जगह केन्द्रित कर दो। इस संजीदा जद्दो जहद और सच्ची तलब के लिए पहली शर्त सच्ची लगन और दिली तड़प है। और इसके लिए अपनी ख्वाहिशात को रब के हवाले कर देना ज़रूरी है। हक़ के ताबेअ हो जाने की पहचान ये है कि आमाल व अक़वाल (कथनी करनी) में नेकी ज़ाहिर होने लगती है।

और ये तो सोचो ही मत कि उस बारगाह में कैसे हमें जगह मिल सकती है, हम उसके लायक़ नहीं हैं क्योंकि वो बारगाह बड़े रहीम व करीम का है। इतना लिहाज़ रखो कि उस वादी में हर तालिब (तलब करने वाला) का एक मक़ाम है और जहां से इजाज़त व दस्तूर के बग़ैर आगे जाना मुमकिन नहीं। तुम तो तलब और जुस्तजू से काम रखो, यही तुम्हे मंज़िले मक्सूद तक पहुंचाएगी।

दर तलब ज़न दाएमा तू हर दो दस्त

के तलब दर राह नेको रहबरस्त

 

ख़ुद तो मिट लूं, उनके पाने की नहीं मुश्किल मुझे।

मिल ही जाएगा मुझी में, वो संगे दरे महफिल मुझे।

इश्क की गर्मी से पैदा, दिल में होगी जब खलिश,

खैंच लेगी अपनी जानिब, देखना मंज़िल मुझे।

(ख़िज्र रूमी रहमतुल्‍लाह अलैह)

Sufiyana 110

अंधेरे से उजाले की ओर…

”रब के हुक्म से वो अंधेरे से निकालकर रौशनी की तरफ ले जाते हैं”

(क़ुरान 5:16)

”और उसके हुक्म से (वो) रब की तरफ बुलाते हैं, और (वो) सूरज से चमकनेवाले हैं”

(क़ुरान 33:46)

”वो सूर्य की तरह रौशन हैं और अंधेरे को परास्त करने वाले हैं”

(वेद य.31:18)

अल्हम्दोलिल्लाह, सारी तारीफें उस ख़ुदा के लिए ही है, जिसने सारे आलम को बनाया। उसी ने हमें पैदा किया और ज़िन्दगी दी। इसलिए नहीं कि हम जिहालत (अज्ञानता) के अंधेरे में रहें, बल्कि इसलिए कि हम इल्म (ज्ञान) की रौशनी में रहें और अपनी ज़िन्दगी व आखिरत भी रौशन करें। जब हमें ये मालूम ही नहीं होगा कि हमारे लिए क्या सही है और क्या ग़लत, तो हम ज़िन्दगी को खुशगवार और बेहतर कैसे बना सकते हैं। अपने पैदा होने के असल मक़सद तक कैसे पहुंच सकते हैं। जिसको सहीं ग़लत का इल्म नहीं होता, जो ज़िन्दगी उन्हें दी जाती है वही जिये जाते हैं। लेकिन इन्सान ऐसा नहीं होता, क्योंकि उसमें सोचने समझने की सलाहियत होती है। वो ख़ुद सोच सकता है कि उसके लिए क्या बेहतर है क्या सही है। सिर्फ इसी वजह से वो ज़िन्‍दा लोगों में सबसे बेहतर है, अशरफुल मख़्लूकात है।

लेकिन इन्सान एक मुकाम पर ख़ुद की अक्‍़ल व इल्म पर ज्यादा भरोसा करने लगता है और अपनी सोच का एक छोटा सा दायरा बना लेता है। उसे हर चीज़ अपने इसी दायरे के हिसाब से चाहिए होता है। इस तरह का दायरा दरअस्ल कमअक्‍़ली की निशानी है। हज़रत दाता गंजबख्श अली हजवेरी रहमतुल्‍लाह अलैह फ़रमाते हैं- ”अक्‍़ल और इल्म, किसी चीज़ को जानने का ज़रिया है, लेकिन ख़ुदा को जानने के लिए और उसकी मारफ़त हासिल करने के लिए, ये काफ़ी नहीं है। इसी लिए हर आलिम सूफ़ी नहीं होता, जबकि हर सूफ़ी एक आलिम भी होता है।”

इन्सान को चाहिए कि अपने दायरे से बाहर निकले और उस लामहदूद ज़ात को, असिमित ज्ञान को हासिल करने के लिए ख़ुद को आज़ाद कर ले। और इस अंधेरे से निकलने की कोशिश तब तक करते रहें, जब तक कि कामयाब न हो जाए। क़ुरान में है-

”ऐ ख़ुदा, हम तुझी को माने और तुझी से मदद चाहें। हमको सीधा रास्ता चला, रास्ता उनका जिन पर तूने एहसान (ईनाम) किया, न कि उनका जिन पर गजब हुआ और न बहके हुओं का।”

(क़ुरान 1:6-8)

इसके लिए ख़ुदा से ही दुआ मांगें और ऐसे रहबर से जुड़ जाएं जो ख़ुद इस अंधेरे से निकल चुका है। ये दो तरह के होते हैं एक वो जो ख़ुद को इस अंधेरे से निकाल ले यानि आलिम। दूसरा वो जो ख़ुद तो अंधेरे से निकले ही, साथ में दूसरो को भी निकाल ले यानि सूफ़ी। आलिम तो बहुत होते हैं लेकिन आलिम बनाने वाले बहुत कम होते हैं। अंधेरे से निकल जाने वाले तो बहुत होते हैं लेकिन उस अंधेरे से निकालने वाले बहुत कम होते हैं। आलिम वो जो ख़ुद तो पा लिया लेकिन बांटा नहीं, जबकि सूफ़ी वो जो ख़ुद भी पाया और दूसरों को भी बांटा।

ख़ुदा के दोस्तों की अन्धेरी रात भी दिन की रौशनी की तरह चमकीली है।

(शैख सादी रहमतुल्‍लाह अलैह)

आपके अंधेरे की कोई हद नहीं, उसके उजाले की कोई हद नहीं। अगर वो सच्चा मिल जाए तो उससे जा मिलो, उससे जो मिलता है हासिल कर लो। उसी पर ख़ुदा ने एहसान किया उसी को ईनाम दिया है। वही हक़ को पा लिया है और वही दे सकता है। वही रौशन है और रौशन कर सकता है। वही आपको इस अंधेरे से उजाले की तरफ़ ले जा सकता है।

 

Sufiyana 108

पैगम्बर मुहम्मद ﷺ और फ़क़ीरी

पैगम्बर मुहम्मद ﷺ

अगर आप लगन की अद्भूत शक्ति का अध्ययन करना चाहते हैं

तो हज़रत मुहम्मद ﷺ  की जीवनी पढ़ें

(नेपोलियन हील, थींक ग्रो एण्ड रिच)

 

अगर मुहम्मद ﷺ  न होते तो धर्म, मठों और जंगलों में सिमटकर रह जाता।

(स्वामी विवेकानंद)

 

हम में से जो भी नैतिक व सदाचारी जीवन व्यतीत करते हैं,

वे सभी दरअस्ल इस्लाम में ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

क्योंकि यह गुण वो सर्वोच्च ज्ञान एवं आकाशिय प्रज्ञा है

जो हज़रत मुहम्मद ﷺ  ने हमें दी।

(कारलायल)

 

Fakiri

फ़क़ीरी

आमतौर पर फ़क़ीर उसे समझा जाता है जो हाथ में क़ासा लिए लोगों से मांगता फिरे। लेकिन यहां उस फ़क़ीरी की बात नहीं हो रही है। यहां फ़क़ीरी का मतलब ख़ुदापरस्ती के लिए दुनियावी चीज़ों या ज़िदगी की ज़रूरियात का कम से कम इस्तेमाल करना है। जितना इन चीज़ों की चाहत बढ़ेगी, उतना ही ख़ुदा से दूरी बढ़ती जाएगी। हत्ता कि इन्सान इन ख्वाहिशात के दलदल में फंसता चला जाएगा। इसी से बचने के लिए हुज़ूर ﷺ ने फ़क़ीरी इख्तियार करने को कहा। आप फ़रमाते हैं-

अलफ़ख़रो फ़क़री

यानि फ़क़ीरी मेरा फ़ख़्र है।

ख़ुदा के पैगम्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ की कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। उनकी बहुत सी खासियत में से एक खासियत उनकी फ़क़ीरी है। उनको बादशाही से ज्यादा फ़क़ीरी पसंद रही, तवंगरी से ज्यादा मुफ्लिसी पसंद रही, यहां तक कि हज़रत आईशा (रज़ीअल्लाह अन्हा) फरमाती हैं कि ”आप ने जिंदगीभर कभी पेट भरकर खाना नहीं खाया और इसका कभी शिकवा भी नहीं किया।”

ज़माने का दाता मगर घर में फाका।

ख़ुदाई का मालिक मगर पेट खाली।

ये फ़क्र व फ़ाक़ा (भूखा रहना) इख्तियारी था यानि खुद की मर्ज़ी से किया हुआ, क्योंकि जिसके हाथों कायनात की सारी नेअमतें हों, उस पर कोई तकलीफ कैसे हो सकती, जब तक वो खुद न चाहे।

यहां मक़सद दुनिया की ख्वाहिश नहीं है। यहां तो रब के दिए हुए काम की फिक्र है, अल्लाह के बंदों की फिक्र है, इसलिए जितना जीने के लिए जरूरी है बस उतना ही, उससे ज्यादा नहीं। और इतना तो बिल्कुल नहीं कि ख़ुदा की याद से दूर करे।

हज़रत जिब्रईल (रज़ीअल्लाह अन्हो) फरमाते हैं कि अल्लाह ने हुक्म दिया है, कि आप जो चाहें आपकी खिदमत में पेश कर दूं। ये आपके अख्तियार में है कि आप ‘बादशाह नबी’ बने या ‘बंदे नबी’। तो आप ﷺ ने तीन मरतबा फरमाया कि ”मैं बंदा नबी बनना चाहता हूं।” (तबरानी, ज़रक़ानी 322/4)

आप गरीब व मिस्किनों से इस तरह पेश आते थे कि वे लोग अपनी गरीबी को रहमत समझते थे और अमीर को जलन होती थी हम गरीब क्यों न हुए।

आप खाना तीन उंगलियों से खाते, ताकि निवाला छोटा हो और फरमाते है कि खाना इस तरह खाओ कि पेट का एक तिहाई हिस्सा ही भरे, फिर एक तिहाई हिस्सा पानी पियो और बाक़ी एक तिहाई हिस्सा खाली रखो। इससे पेट की कोई भी बीमारी नहीं होगी।

आपकी तरह फाका रहना हर किसी के बस की बात नहीं। रमज़ान में आप बिना इफ्तार किए कई दिनों तक रोज़ा पर रोज़ा रखते। ये देखकर सहाबियों (रज़ीअल्लाह अन्हो) ने भी इसी तरह रोज़ा रखना शुरू कर दिया। कुछ दिनों में ही कमज़ोरी ज़ाहिर होने लगी। जब आपने पूछा तो सहाबियों ने बताया कि आपकी तरह मुसलसल बिना इफ्तार के रोज़ा रख रहे हैं। तब आपने फरमाया ”तुम में, मेरे मिस्ल (मुझ जैसा) कौन है? मुझे रूहानी तौर पर ख़ुदा की तरफ से खिलाया जाता है, पिलाया जाता है।” (बुखारी व मुस्लिम 384/1)

अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद ﷺ से फरमाया कि अगर तुम चाहो तो मक्के की पथरीली ज़मीन (पहाड़ों) को सोना बना दूं। तो हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फरमाया कि ”नहीं मैं ये नहीं चाहता, बल्कि मैं तो ये चाहता हूं कि एक दिन खुशहाल रहूं और एक दिन भूखा रहूं। जब भूखा रहूं तो तेरी बारगाह में गिड़गिड़ाऊं और तुझसे मांगूं। और जब खुशहाल रहूं तो तेरा ज़िक्र करता रहूं और तेरा शुक्र अदा करता रहूं।”

Sufiyana 105

हम्दो सना

हम्‍द बेहद

हम्दो सना है तेरी, कौनो मकान वाले।

एै रब्बे हर दो आलम, दोनो जहान वाले।

बिन मांगे देने वाले, अर्शो क़ुरान वाले।

गिरते हैं तेरे दर पर, सब आन बान वाले।

बेशक़ रहीम है तू, रहमत निशान वाले।

 

यौमुल जज़ा के मालिक, ख़ालिक़ हमारा तू है।

करते हैं तुझको सजदे, तेरी ही जुस्तजू है।

इमदाद तुझसे चाहें, सबका सहारा तू है।

दीदार हो मयस्सर, ये दिल की आरजू है।

रस्ता दिखा दे सीधा, ऐ आसमान वाले।

 

रस्ता दिखा दे हमको, परवर दिगारे आलम!

जिस पर चला किए हैं, परहेज़गारे आलम!

नियामत है जिनको मिलती, तुझसे निगारे आलम!

है यादगार जिनकी, अब यादगारे आलम,

तेरी नज़र में ठहरे जो इज्ज़ोशान वाले।

 

मातूब जो है तेरी, ऐ ख़ालिक़े यगाना!

गुमराह हुए जो तुझसे, ऐ साहिबे ज़माना!

आजिज़ हबीब को तू, न उनकी राह चलाना।

इतना करम हो हम पर, ऐ क़ादिरे तवाना!

मकबूल ये दुआ हो, मुर्शिद निशान वाले।

Sufiyana 103

राहे हक़ में कोशिश – Editor

हमारी तहज़ीब एक पेड़ की तरह है। ये जितना हरा भरा रहेगा, हम उतने ही खुशहाल रहेंगे और तरक्क़ी करेंगे। लेकिन आज, ये मग़रिबी बिमारी में मुबतेला (ग्रस्त) है। जिसकी वजह से ये बहुत कमज़ोर हो चला है, दिन ब दिन सूखता जा रहा है और अंदर से खोखला भी होता जा रहा है।

हम में से बड़े ओहदेवालों, बुजूर्गों और आलिमों की ख़ासतौर पर ज़िम्मेदारी है कि इसकी हिफ़ाज़त करें। लेकिन बहुत से ज़िम्मेदार इससे बचते हैं, बल्कि कुछ तो इसकी हक़ीक़त से भी बेख़बर हैं। वो इसकी मज़बूती के लिए काम चलाऊ तरीका बताते हैं, मानो कमज़ोर पेड़ में लकड़ियों बल्लियों का टेक लगाने कह रहे हों और बहाना ये है कि कम से कम ये खड़ा तो रहे। जबकि सहीं मायने में इसकी मज़बूती के लिए, इसकी जड़ों पर ध्यान देना होता है, उसकी असल पर काम करना होता है।

अब अगर इस पेड़ को फिर से मज़बूत होना है तो इसे रूहानियत का पानी चाहिए, तरीक़त की खाद चाहिए और बड़े-बड़े किसानों यानी सूफ़ी बुजूर्गों की हिकमत चाहिए। तभी और सिर्फ तभी ये पेड़ बच सकता है, फिर से हरा भरा हो सकता है। फिर से इसमें अच्छाई की पत्तियां उगेंगी, फिर से मुहब्बत के फल लगेंगे और फिर से अमन के फूल खिलेंगे। इसके साथ ही साथ, ज़ात-पात की बेकार टहनियां टूट जाएगी, नफ़रत की सूखी पत्तियां झड़ जाएगी और सारे इन्सान खुशहाली व तरक्क़ी के उस मुक़ाम पर पहुंच जाएंगे जहां हक़ीक़त में उन्हें पहुंचना है। अब सवाल ये उठता है कि इसे शुरू कैसे किया जाए, तो इसका जवाब ख़ुदा के इस कलाम में मिलता है।

 

”और जो राहे हक़ में कोशिश करते हैं,(तो) ख़ुदा उन्हें सही रास्ता दिखा देता है और बेशक ख़ुदा नेक व साहिबे एहसान (सूफ़ीयों) के साथ है।”

(क़ुरान 29:69)

 

ये रिसाला (पत्रिका), उसी राहे हक़ में एक कोशिश है।

रब हमें उन सूफ़ीयों के नक्शे क़दम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और अपने खास कुर्बत व इनामात से नवाज़े।

आमीन!

 

(सैफुद्दीन अयाज़)

Sufiyana 101

1st सूफ़ीयाना मैगजीन शाया हुई

सूफ़ी, हमेशा से लोगों में मुहब्‍बत व अमन के साथ साथ उस एक ख़ुदा की इबादत का दर्स देते रहे हैं और दिलों को रूहानियत का मर्कज़ बनाते रहे हैं। इस काम के लिए वो हर तरह की तकलीफ़ें बर्दाश्‍त किए। सफ़र करना पड़ा तो सफ़र किए, भूखा रहना पड़ा तो भूखे रहे, गरज़ के इस राह में अपना सब कुछ सौंप दिया, यहां तक कि ज़रूरत पड़ी तो अपनी जान भी न्‍यौछावर कर दिए।

पुराने वक़्त में लोगों को घूम घूम कर अपनी बात बताया करते थे और जब ज़रूरत पड़ी तो काग़ज़ या कपड़े पर लिख कर भी लोगों को अपना संदेश दिया करते थे। इसी सिलसिले में कई सूफ़ीयों ने किताबें और रिसाले भी लिखे। इन्‍हीं क़दीम और बेशकिमती किताबों रिसाले की शक्‍ल में शाया करने का जिम्‍मा सूफ़ीयाना मैगज़ीन ने उठाया है।
बरसों से सूफ़ीज्‍़म पर बेस्‍ड इस मैगज़ीन का ख्‍़वाब देखा जा रहा था। जो आज के मग़रिबी मुआशरे (पश्चिमी सभ्‍यता) की बुराईयों से निकालकर रूहानियत (अध्‍यात्‍म) की तरफ ले जाए। इसी ख्‍़वाब की ताबीर, सूफ़ीयाना की शक्‍़ल में हुई।

खानकाहे रूमी हसनी में जुलाई 2014 (शव्‍वाल 1435हि.) को ईद की खुशी के साथ, जश्‍ने चरागां के मौके पर, तमाम सूफ़ीयों और हज़रत ख्‍़वाजा जलालुद्दीन खि़ज़्र रूमी शाह रहमतुल्‍लाह अलैह के साए में और सूफ़ी सफ़ीउद्दीन सादी मद्देजि़ल्‍लहू (सज्‍जदानशीन ख़ानक़ाहे रूमी हसनी) की सरपरस्‍ती, सूफ़ी कमालुद्दीन जामी मद्देजिल्‍लहू की क़यादत और मौलवी अब्‍दुल ग़फ़ूर अशरफ़ी, सूफ़ी इकरामुद्दीन आरीफ़, सूफ़ी इनामुद्दीन सूफ़ी, सूफ़ी इक़बाल अहमद, हाफिज़ ज़करिया, सूफ़ी जिलानी ख़ान, सूफ़ी अज़ीमुद्दीन शरीफ़ की निगरानी और तमाम वाबस्‍तगाने सिलासिल की मौजूदगी में सूफ़ीयाना मैगज़ीन शाया हुई।

ये रिसाला एक तिमाही रिसाला है और पूरा मल्‍टीकलर व माडर्न इंटरनेशनल डिज़ाईन पर तैयार किया गया है। यानि सूफ़ीयाना मगज़ीन पूरी तरह से तालिब को मुहब्‍बत-ईबादत-रूहानियत से मालामाल करने वाली है।

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