Sufiyana 143

प्रेरक प्रसंग

जीवन दर्शन

मनुष्य के प्रकार

परमहंस जी अपने शिष्यों के साथ टहल रहे थे। देखा कि एक मछुआरा जाल फेंककर मछली पकड़ रहा है। आप वहां ठहर गए और अपने शिष्यों से कहा कि ध्यान से इन मछलियों को देखो। कुछ मछलियां जाल में निश्चल पड़ी हैं, तो कुछ जाल से निकलने की कोशिश कर रही हैं लेकिन कामयाब नहीं हो पा रही हैं। कुछ उस जाल से निकलने में कामयाब हो गई और आज़ादी से घुमने लगी। लेकिन कुछ मछलियां तो जाल में फंसी ही नहीं।
जिस तरह मछलियां चार किस्म की होती है, ठीक उसी तरह मनुष्य भी चार तरह के होते हैं। एक मनुष्य वो जो अपनी इंद्रियों के जाल में फंस चुका है और हार मान चुका है। वो इससे निकलने की कोशिश भी नहीं करता। दूसरा मनुष्य वो जो इंद्रियों के जाल में फंसा तो है लेकिन उससे निकलने की कोशिश कर रहा। ये अलग बात है कि कामयाब नहीं हो पा रहा। तीसरा मनुष्य वो है, जो इंद्रियों के जाल में फंसा भी और उससे निकल भी गया। अब आज़ादी से अपने अस्ल की तरफ लौट आया है। चौथा मनुष्य वो है जो अपना अस्ल जानता है। वो ये भी जानता है कि इन इंद्रियों का जाल कितना भयावह है और इससे कैसे बचा जाए। वो इस जाल में फंसता ही नहीं और खुद को इससे हमेशा आज़ाद रखता है। इस तरह वो रब को पाने में अग्रसर है।

गुरू की ज़रूरत

एक संत से मिलने अक्सर देव आया करते थे। संत बड़े आदर से उनका इस्तेकबाल करते, उनके साथ बैठते, बातचीत करते। लेकिन जब देव चले जाते तो उनकी बैठी हुई मिट्टी को उठाकर दूर फिकवा देते थे।
ये बात जब देव को पता चली तो वो बहुत गुस्सा हुए और संत के पास पहुंचकर सवाल किया- ‘ऐ संत! मैं कौन हूं, ये आप जानते हैं, मैं किनका पुत्र हूं, ये भी आप जानते हैं, मेरा ज्ञान और महिमा किसी से छुपी नहीं है। फिर मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यूं किया जा रहा है? पहले इतने अच्छे से मिला जा रहा है फिर मेरा इतना अपमान। ऐसा तो कोई दुश्मनों के साथ भी नहीं करता।’
संत ने कहा ‘हे देव! आपसे अच्छे से मिलना तो मेरा व्यवहार है और आपके ज्ञान व शान में मुझे कोई शक नहीं है। लेकिन आपमें एक कमी भी है, वो ये कि आप किसी गुरू से नहीं जुड़े हैं। इसलिए मेरे लिए आपका ज्ञान व शान किसी काम की नहीं। बिना गुरू के वो छुत समान है। मैं नहीं चाहता कि जो गुरू से जुड़ा न हो उसका साया भी यहां की मिट्टी पर पड़े।’

ईश्वर कहां है?

संत नामदेव से एक जिज्ञासु प्रश्न किया-‘गुरूदेव, कहा जाता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है, तो उसे अनुभव कैसे किया जा सकता है? क्या आप उसकी प्राप्ति का कोई उपाय बता सकते हैं?’ नामदेव यह सुनकर मुस्कराए। फिर उन्होंने उसे एक लोटा पानी और थोड़ा सा नमक लाने को कहा। वहां उपस्थित शिष्यों की उत्सुकता बढ़ गई।
नमक और पानी के आ जाने पर संत ने नमक को पानी में छोड़ देने को कहा। जब नमक पानी में घुल गया तो संत ने पूछा- ‘बताओ, क्या तुम्हें इसमें नमक दिख रहा है?’ जिज्ञासु बोला- ‘नहीं गुरूदेव, नमक तो इसमें पूरी तरह घुल-मिल गया है।’ संत ने पानी चखने को कहा। उसने चखकर कहा- ‘जी, इसमें नमक उपस्थित है, पर वह दिखाई नहीं दे रहा।’ अब संत ने उसे जल उबालने को कहा। पूरा जल जब भाप बन गया तो संत ने पूछा- ‘क्या इसमें वह दिखता है?’ जिज्ञासु ने गौर से लोटे को देखा और कहा-‘हां, अब इसमें नमक दिख रहा है।’ तब संत ने समझाया-‘जिस तरह नमक पानी में होते हुए भी दिखता नहीं, उसी तरह ईश्वर भी हर जगह अनुभव किया जा सकता है, मगर वह दिखता नहीं। जिस तरह जल को गर्म करके तुमने नमक पा लिया, उसी प्रकार तुम भी उचित तप और कर्म करके ईश्वर को प्राप्त कर सकते हो।’

Sufiyana 142

लकड़हारा और कौवां

एक गांव में एक ग़रीब लकड़हारा रहता था, वह हर रोज जंगल से लकड़ी काट कर लाता और उन्हें बेचकर अपना और अपने परिवार का पेट पालता था। लकड़हारा, था तो बहुत गरीब लेकिन ईमानदार, दयालु और अच्छे अख्लाक वाला इन्सान था। वह हमेशा दूसरों के काम आता और यहां तक कि बेज़बान जानवरों का भी खयाल रखता था।

एक दिन जंगल में लकड़ी काटते काटते थक गया तो एक छाया दार पेड़ के नीचे सुस्ताने लगा। तभी उसने देखा कि एक सांप पेड़ पर बने हुए घोंसले की ओर बढ़ रहा था, इस घोंसले में कौवे के बच्चे थे जो सांप के डर से चिल्ला रहे थे। बच्चों के मां बाप कौवे दाना चुगने कहीं दूर गए थे। लकड़हारे को उन बच्चों पर दया आ गयी, वो अपनी थकान भूल कर फ़ौरन उठ बैठा और कौवे के बच्चों को सांप से बचाने के लिये पेड़ पर चढ़ने लगा। सांप खतरा देखकर भागने लगा और घोंसले से दूर जाने लगा। उसी बीच कौवे भी लौट आए, लकड़हारे को पेड़ पर चढ़ा देखा तो वह समझे कि ज़रूर उसने बच्चों को मार दिया होगा। वह गुस्से में काओं काओं चिल्लाने लगे और लकड़हारे को चोंच मार मार कर अधमरा कर दिया। बेचारा लकड़हारा किसी तरह जान बचाकर नीचे उतरा और चैन की सांस ली।

लेकिन जब कव्वे अपने घोंसले में गए तो बच्चे वहां दुबके हुए बैठे थे, बच्चों ने मां बाप को सारी बात बता दी और उन्होंने देखा कि सांप पेड़ से उतर कर भाग रहा है। अब कौवों को अपनी गलती का एहसास हुआ। वे बहुत शर्मिन्दा हुए। कौवे लकड़हारे का शुक्रिया अदा करना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने घोंसले में रखा मोती का क़ीमती हार जो उन्हें कुछ ही दिन पहले गांव के तालाब के किनारे मिला था, उठा कर लकड़हारे के आगे डाल दिया और थोड़ी दूर हटकर काओं काओं करने लगे। इस तरह कव्वे अपने प्यारे बच्चों की जान बचाने पर दयालु लकड़हारे को धन्यवाद कर रहे थे, ग़रीब लकड़हारा भी कीमती हार पाकर बहुत खुश हुआ और उसने मन ही मन में अल्लाह का शुक्र अदा किया।

जब लकड़हारा लकडियों का गट्ठर सिर पर उठा कर अपने गांव की ओर चलने लगा तो कव्वे भी उसके ऊपर कांव कांव करते उड़ रहे थे, लेकिन अब चोंच मारने के लिये नहीं बल्कि अलविदा कहने के लिये।

सबक़-

  • हमें इंसानों के साथ साथ जानवरों और चिड़ियों पर भी रहम करना चाहिये और बुरे समय में उनके काम आना चाहिये।
  • सही जानकारी हासिल किये बिना जल्दबाज़ी में कोई फैसला नहीं करना चाहिए।
  • अपनी ग़ल्ती का एहसास हो जाने पर सामने वाले से माफ़ी मांग लेना चाहिए।
  • अगर किसी ने हमारे साथ भलाई की, तो उसका शुक्रिया ज़रूर अदा करना चाहिए।
Sufiyana 141

डिसिप्लिन

डिसिप्लिन मतलब वक्त क़ी पाबंदी, अनुशासन। अपने मक़सद में लगन लगाए रखना। एक चीज़ को दूसरी बड़ी चीज के लिए छोड़ देना। बाद की ज्यादा बड़ी खुशी के लिए आज की छोटी खुशी को कुरबान कर देना।

ज़ाहिरी तौर पर इसमें मजबूरी दिखाई देती है कि करना ही पड़ेगा। बिना किये काम नहीं चलेगा। लेकिन असल आज़ादी इसी में होती है। जैसे लिखना पढ़ना हमारी एक खूबी है, इसके बगैर जिंदगी को हम सोच भी नहीं सकते। लेकिन अगर बचपन में अनुशासित होकर इसे नहीं सीखते तो क्या लिख पढ़ पाते। इसी लिखने पढ़ने की आज़ादी के लिए ही हमने घूमना फिरना खेलना कूदना छोड़ दिया था।

जो डिसिप्लिन में नहीं रहते वो दरअसल आज़ादी को नहीं जानते। वो छोटी छोटी खुशियों में ही खोए रहते हैं, बड़ी खुशियां तो उन्हें मालूम ही नहीं। वो खुशी के बारे में उसी तरह जानते हैं जिस तरह अंधा रंगों के बारे में जानता है।

कारण तो हमेशा रहते हैं, बहाना कभी नहीं रहता। फिर भी वो अक्सर बहाने बनाने में अपना वक्त जाया करते रहते हैं। ऐसे लोग अक्सर नाकामयाब होते हैं। ऐसे लोग जिन कामों को बहाना बना कर छोड़ देते हैं अक्सर कामयाब लोग उसी काम को करके कामयाब होते हैं। चाहे पसंद हो या नापसंद हो।

सबसे पहले अपने मक़सद को पहचाने फिर उसे हासिल करने में लग जाएं। परेशानी आ सकती है लेकिन नाउम्मीद न हो। इसे इस तरह पकड़े रहें कि इसके लिए बाक़ी सब छोड़ दें। चाहे आपकी पसंद का हो या न हो। इसमें कोई दो राय नहीं कि कामयाबी हर किसी को पसंद होती है और डिसिप्लिन में ही कामयाबी छुपी हुई है।

शैख सादी रज़ी. फ़रमाते हैं-

‘धीरे धीरे ही सही, लेकिन डिसिप्लिन व लगन से लगातार चलने वाले की कामयाबी तय है।’

लगातार गिरता पानी, पत्थर को भी चीर देता है।

Sufiyana 140

लिबास

ऐ इन्सान! हमने तुम्हें ऐसा लिबास दिया है जिससे तुम खुद को ढको और खुबसूरत दिखो। (लेकिन इसके साथ ही तुम्हें छुपा हुआ लिबास भी दिया है और वही) तक़वा (परहेज़गारी) का लिबास ही बेहतर है।…

(क़ुरान 7:26)

 

अक्सर हम किसी इन्सान को उसके हुलिए उसके लिबास से पहनावे से पहचानते हैं और ये सोचते हैं कि वो वैसा ही होगा। हम पहले से तय कर लेते हैं कि फटे कपड़े पहना होगा तो ग़रीब होगा, अच्छे कपड़े पहना होगा तो अमीर होगा, धोती पहना होगा तो पंडित होगा, सर में साफ़ा पहना होगा तो मौलाना होगा, सफेद कुर्ता पायजामा पहना होगा तो नेता होगा वगैरह वगैरह।

आप भी इससे बच नहीं सकते, आपको भी कोई आपके लिबास की वजह से पहचानता होगा, तो क्या वो आपके बारे में अच्छी तरह जान पाएगा, क्या वो जान पाएगा कि आपमें क्या खूबियां हैं और क्या बुराईयां हैं। हो सकता है इसी वजह से आप अपने बाप दादाओं की तरह कपड़े पहनना छोड़ दिए हों। अपने बुजूगों के पहनावे को सिर्फ इसलिए छोड़ देना कि ‘लोग क्या कहेंगे?’, बहुत बड़ी नादानी और शर्म की बात है। इन्सान की पहचान उसके दिल से, उसके अख्लाक़ व किरदार से होती है।

मिस्र में एक सूफ़ी हज़रत ज़ुन्नुन मिस्री रज़ी. रहते थे। एक नौजवान ने उनसे पूछा, मुझे समझ में नहीं आता कि आप लोग सिर्फ एक चोगा ही क्यों पहने रहते हैं? बदलते वक्त क़े साथ यह ज़रूरी है कि लोग ऐसे लिबास पहने जिनसे उनकी शख्सियत सबसे अलग दिखे और देखने वाले वाहवाही करें। ज़ुन्नुन मुस्कुराए और अपनी उंगली से एक अंगूठी निकालकर बोले, ‘बेटे, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब ज़रूर दूंगा लेकिन पहले तुम इस अंगूठी को सामने बाज़ार में एक अशर्फी में बेच आओ’। नौजवान ने ज़ुन्नुन की साधारण सी दिखने वाली अंगूठी को देखकर कहा ‘इसके लिए सोने की एक अशर्फी तो क्या कोई चांदी का एक सिक्का भी न दे’।

‘कोशिश करके देखो, शायद तुम्हें वाकई कोई ख़रीदार मिल जाए’ ज़ुन्नुन ने कहा। नौजवान तुरंत ही बाज़ार को रवाना हो गया। उसने वह अंगूठी बहुत से सौदागरों, परचूनियों, साहूकारों, यहां तक कि हज्जाम और क़साई को भी दिखाई पर उनमें से कोई भी उस अंगूठी के लिए एक अशर्फी देने को तैयार नहीं हुआ। थक हार कर वो वापस आया और कहा, ‘कोई भी इसके लिए चांदी के एक सिक्के से ज्यादा देने के लिए तैयार नहीं है’।

ज़ुन्नुन मुस्कुराए और कहा, ‘अब तुम इस सड़क के पीछे सुनार की दुकान पर जाकर उसे यह अंगूठी दिखाओ। लेकिन तुम उसे अपना मोल मत बताना, बस यही देखना कि वह इसकी क्या क़ीमत लगाता है’। नौजवान बताई गयी दुकान तक गया और वहां से लौटते वक्त उसके चेहरे से कुछ और ही बयान हो रहा था। उसने ज़ुन्नुन से कहा, आप सही थे। बाज़ार में किसी को भी इस अंगूठी की सही क़ीमत का अंदाजा नहीं है। सुनार ने इस अंगूठी के लिए सोने की एक हज़ार अशर्फियों की पेशकश की है। यह तो आपकी मांगी क़ीमत से भी हज़ार गुना है।

ज़ुन्नुन ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘और वही तुम्हारे सवाल का जवाब है। किसी भी इन्सान की क़ीमत उसके लिबास से नहीं आंको, नहीं तो तुम बाज़ार के उन सौदागरों की मानिंद बेशक़ीमती नगीनों से हाथ धो बैठोगे। अगर तुम उस सुनार की आंखों से चीज़ों को परखोगे तो तुम्हें मिट्टी और पत्थरों में भी सोना और जवाहरात दिखाई देंगे। इसके लिए तुम्हें दुनियावी नज़र पर पर्दा डालना होगा और दिल की निगाह से देखने की कोशिश करनी होगी। बाहरी दिखावे से हट कर देखो, तुम्हें हर तरफ हीरे-मोती ही नज़र आएंगे’।

Sufiyana 139

पाकी (स्‍वच्‍छता)

‘उसमें वो लोग हैं जो खूब पाक होना चाहते हैं और पाक (साफ सूथरे) लोग अल्लाह को प्यारे हैं।’

(क़ुरान 9:108)

‘अल्लाह नहीं चाहता कि तुम पर कुछ तंगी रखे, हां ये चाहता है कि तुम्हें साफ सूथरा (पाक) कर दे।’

(क़ुरान 5:6)

‘पाकीज़गी आधा ईमान है।’

(तिरमिज़ी 3530)

‘दीन की बुनियाद पाकीज़गी पर है।’

(अश-शिफा 1:61, इहयाउल उलूम 396)

 

पाकी के मायने हैं- खुद को बुराईयों और गंदगी से पाक रखना। पाकी दो तरह की होती है- एक ज़ाहिरी और दूसरा बातिनी। दोनों पाकी ज़रूरी है। बातिनी यानी दिल की पाकी भी और ज़ाहिरी यानी जिस्म की पाकी भी। किसी भी तरह की इबादत व अमल के लिए जिस्म का पाक होना ज़रूरी होता है। साथ जगह और कपड़े भी पाक हो।

गुस्ल

पाकी हासिल करने के लिए गुस्ल करना पड़ता है। गुस्ल करना और सिर्फ नहाने में फ़र्क होता है। गुस्ल करने का ये तरीक़ा है-

  • गुस्ल करने की नियत करें
  • गंदगी से तमाम जिस्म को पाक कर लें
  • वजू करें
  • कुल्ली करें व अच्छी तरह मुंह साफ करें
  • नाक में पानी डालें
  • पूरे बदन में तीन बार पानी बहाएं, इस तरह कि कोई हिस्सा बाकी न रहे
  • साफ व पाक कपड़े पहनें।

वजू

गुस्ल करने से पाक तो हो जाते हैं, लेकिन किसी भी इबादत व अमल के लिए या क़ुरान की तिलावत के लिए या मज़ार में हाजिरी के लिए या पीर की सोहबत के लिए सिर्फ पाक होना काफ़ी नहीं है। इसके लिए वजू करना भी ज़रूरी है। बल्कि कोशिश करें कि हमेशा ही वजू से रहें। वजू का ये तरीक़ा है-

 

  • ख़ुदा की खुशनूदी व आखिरत के अजर के साथ वजू की नीयत करें
  • बिस्मिल्लाह पढ़ कर गट्टो सहित हाथ धोएं
  • तीन बार कुल्ली करके मुंह साफ करें, (ज़रूरत पड़े तो मिसवाक करें)
  • तीन बार नाक में पानी डालें
  • तीन बार पूरा चेहरा अच्छी तरह धोएं (दाढ़ी में खिलाल करें)
  • तीन बार हाथों कोहनी समेत अच्छी तरह धोएं (उंगलियों में खिलाल करें)
  • पूरे सर का और गर्दन व कान का मसा करें
  • पैर के पंजों को टखनों समेत अच्छी तरह धोएं

गुस्ल नहीं रहता

कुछ बातों से गुस्ल नहीं रहता (टूट जाता है)। जैसे- जिस्म में सिक्के के बराबर गंदगी (नजासत) लगने, मनी निकलने, शहवत/सोहबत, हैज व निफास वगैरह से।

वजू नहीं रहता

कुछ बातों से वजू नहीं रहता (टूट जाता है) और फिर से वजू बनाना ज़रूरी हो जाता है। वो बातें जिससे गुस्ल टूट जाता है, उससे वजू भी टूट जाता है।

कुछ बातें ऐसी हैं जिससे वजू तो टूट जाता है लेकिन गुस्ल नहीं टूटता। जैसे- हवा खारिज होने से, पेशाब या गंदे पानी के छिंटे से, खून या मवाद निकलने से, उल्टी होने से, चीत या पट लेटने से, नशा चढ़ने से, बेहोश होने से वगैरह वगैरह।

वजू पर वजू करना अच्छी बात है। नए काम के लिए फिर से ताजा वजू करना अच्छा है।

Sufiyana 138

ह. अबुबक्र सिददीक़ रज़ी. और तसव्वुफ

और (ख़ुदाए) रहमान के ख़ास बन्दे तो वह हैं जो ज़मीन पर अख्लाक व इन्केसारी के साथ चलते हैं और जब जाहिल उनसे (जिहालत की) बात करते हैं तो वो उनको सलाम करते हैं।

(क़ुरान25:63)

हुजूरे अकरम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि

जो सूफियों की आवाज़ सुने और उनकी दुआ पर आमीन न कहे तो वो अल्लाह के नज़दीक ग़ाफ़िलों में शुमार होगा।

कशफुल महजुब में हज़रत दाता गंजबख्श अली हजवेरी रज़ी. फ़रमाते हैं कि अगर तुम सूफ़ी बनना चाहते हो तो जान लो कि सूफ़ी होना हज़रत अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. की सिफ़त है। सफ़ाए बातिन के लिए कुछ उसूल और फ़रोअ हैं। एक असल तो ये है दिल को ग़ैर-अल्लाह से खाली करे और फ़रोअ ये है कि मकरो फरेब से भरपूर दुनिया से दिल को खाली कर दे। ये दोनों सिफ़तें अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. की हैं। इसलिए आप तरीक़त के रहनुमाओं के इमाम हैं।

हुजूरे अकरम ﷺ के विसाल के बाद जब तमाम सहाबा बारगाहे मुअल्ला में दिल शिकस्ता होकर जमा हुए तो हज़रत उमर फारूक़ रज़ी. अपनी तलवार निकाल कर खड़े हो गये और फ़रमाने लगे कि जिसने भी ये कहा कि अल्लाह के रसूल ﷺ का इन्तेकाल हो गया है, मैं उसका सर कलम कर दूंगा। ऐसे वक्त में अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. तशरीफ लाए और बुलन्द आवाज़ में खुत्बा दिया कि – ”खबरदार,जो हुजूर ﷺ की परसतिश करता था, वो जान ले कि हुजूर ﷺ का विसाल हो चुका है और जो उनके रब की इबादत करता है तो वो आगाह हो कि वो ज़िन्दा है, उसे मौत नहीं है।”

फिर क़ुरान की आयत तिलावत फ़रमाई-

(फिर लड़ाई से जी क्यों चुराते हो) और मुहम्मद ﷺ तो सिर्फ रसूल हैं, उनसे पहले कई पैग़म्बर गुज़र चुके हैं। फिर क्या अगर मुहम्मद ﷺ का विसाल हो जाए या शहीद कर दिये जाएं तो तुम उलटे पॉव (कुफ्र की तरफ़) पलट जाओगे। और (ये जान लो कि) जो उलटे पांव फिरेगा तो हरगिज़ ख़ुदा का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा और जल्द ही ख़ुदा शुक्र करने वालों को अच्छा बदला देगा

(क़ुरान 3:144)

मतलब ये था कि अगर कोई ये समझे बैठा था कि हुजूर ﷺ मअबूद थे तो जान ले कि हुजूर ﷺ का विसाल हो चुका है और अगर वो हुजूर ﷺ के रब की इबादत करता था तो वो ज़िन्दा है हरग़िज़ उस पर मौत नहीं आनी है। हकीकत ये है कि जिसने हज़रत मुहम्मद ﷺ को बशरीयत की आंख से देखा (और आपको अपने जैसा आम इन्सान समझा) तो जब आप दुनिया से तशरीफ ले जाएंगे तो आपकी वो ताज़ीम जो उसके दिल में है जाती रहेगी और जिसने आप को हक़ीक़त की आंख से देखा तो उसके लिए आपका तशरीफ़ ले जाना व मौजूद रहना, दोनों बराबर है।

जिसने मख़लूक़ पर नज़र डाली वो हलाक हुआ और जिसने हक की तरफ रूजूअ किया वो मालिक हुआ।

जिसका दिल फ़ानी (नश्वर) से जुड़ा होता है, उसके मिटने से वो भी मिट जाता है। लेकिन जिसका दिल रब (ईश्वर) से जुड़ा होता है, वो नफ्स को मिटाकर अपने रब के साथ बाक़ी रह जाता है।

Sufiyana 136

रब के ख़ास बंदे (पार्ट 1)

रिजालुल्लाह

यहां हम ख़ुदा के उन खास बंदों के बारे में बात करेंगे जिन्हें रिजालुल्लाह या रिजालुल ग़ैब कहा जाता है। इन्हीं में से कुतूब अब्दाल होते हैं। 
वो न तो पहचाने जा सकते हैं और न ही उनके बारे में बयान किया जा सकता है, जबकि वो आम इन्सानों की शक्ल में ही रहते हैं और आम लोगों की तरह ही काम में मसरूफ़ रहते हैं।

इन्सानी मुआशरे (समाज) को एक बेहतर और अच्छी जिंदगी देने के लिए ख़ुदा के कुछ खास बंदे हर दौर में रहे हैं। उन्होंने हमेशा इन्सान की इस्लाह और फ़लाह के लिए काम किया। मौलाना रूमी रज़ी. फ़रमाते हैं कि खामोशी अल्लाह की आवाज़ है। इसी खामोशी से ये खास बंदे अपना काम करते हैं। ये कभी अपने काम से ग़ाफ़िल नहीं रहते। इनके हाथों कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचा। इन खास बंदों को रिजालुल्लाह या मर्दाने ख़ुदा या मर्दाने हक़ कहते हैं। इनके लिए क़ुरान में आया है-

वो मर्दाने ख़ुदा जिन्हें तिजारत और खरीद फरोख्त, यादे ख़ुदा से ग़ाफिल नहीं करती।

(क़ुरान:24:37)

इनका वजूद हज़रत आदम रज़ी. से लेकर हुजूर अकरम ﷺ तक और उनसे लेकर ताकयामत रहेगा। कायनात का क़याम व निज़ाम का दारोमदार इन्हीं मर्दाने ख़ुदा पर है। रब और बंदे के दर्मियान का रिश्ता इन्हीं की तालिमात व हिदायत पर क़ायम है। इन्हीं की बरकत से बारिश होती है, पेड़ पौधे हरे होते हैं। कायनात के किस्म किस्म के जीवों की जिंदगी इन्हीं की निगाहे करम की एहसानमंद है। शहरी व गांव की जिंदगी, बादशाहों का जीतना हारना, सुलह व लड़ाइयां, अमीरी व ग़रीबी के हालात, अच्छाइयां व बुराईयां, गरज़ कि अल्लाह की दी हुई करोड़ों ताकतों का मुज़ाहेरा इन्हीं के इख्तियार में है। अल्लाह अपने ग़ैबुल ग़ैब से इनको नूर अता करता है, जिससे ये लोगों की इस्लाह करते रहते हैं।

ये आम लोगों में भी रहते हैं, आम जिंदगी जीते हैं, खाना खाते हैं, चलते फिरते बोलते हैं, बीमार होते हैं, इलाज कराते हैं, शादी करते हैं, रिश्तेदारी निभाते हैं, लेन देन करते हैं, हत्ता कि जिंदगी के सारे जायज़ काम में हिस्सा लेते हैं। ये न पहचाने जा सकते हैं न ही उनकी ताकत बयान की जा सकती है, जबकि ये आम लोगों के दर्मियान होते हैं। लेकिन जब लोग दुनियादारी में डूबे रहते हैं तो ये ख़ुदा की याद में मश्गूल रहते हैं। और ख़ुदा के हुक्म से हर काम को अन्जाम देते हैं। लोग इनको बुरी नीयत से या हसद से नुकसान पहुचाने की कोशिश करते हैं तो ये अपने विलायत की ताकत से बच जाते हैं। इनकी खासियत लोगों से छिपी हुई होती है। इनमें से कोई पहाड़ों विरानों पर रहता है तो कोई आबादी में रहते हैं।

चन्द लम्हों में ये दूसरे देश तक का सफ़र तय कर सकते हैं। पानी पर चल सकते हैं। जब चाहें तब गायब हो सकते हैं। जिसकी चाहें सूरत इख्तियार कर सकते हैं। ग़ैब की ख़बर रखते हैं। छोटी सी जगह में हज़ारों की तादाद में इकट्ठा हो सकते हैं। महफ़िले सिमा में रक्स करते हैं और किसी को नज़र नहीं आते। रोते हैं गिरयावोजारी करते हैं लेकिन किसी को सुनाई नहीं देता। पत्थर को सोना बना सकते हैं।

इनके पास ख़ुदा की दी हुई असीम ताकत होती है लेकिन ये खुद के लिए इस्तेमाल नहीं करते। जैसा अल्लाह का हुक्म होता है वैसा करते हैं। लोगों की परेशानियां दूर करते हैं। लोगों की मदद करते हैं।

रिजालुल्लाह अपने वक्त के नबी के उम्मती होते हैं और उन्हीं का कलमा पढ़ते हैं। इन्हीं के बारे में हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि- मेरे वली मेरे क़बा के नीचे होते हैं और मेरे अलावा उन्हें कोई नहीं पहचानता। यानी आम लोगों इनको नहीं जानते।

दुनिया के सारे रिजालुल्लाह साल में दो बार आपस में मुलाकात करते हैं, एक बार आराफात के मैदान में और दुसरी बार रजब के महिने में किसी ऐसी जगह जहां रब का हुक्म होता है।

अल्लाह ने दुनिया को इन खास औलिया के क़ब्ज़े में दे दिया है, यहां तक कि ये तन्हा रब के काम के लिए वक्फ़ हो गए हैं।

मख्दुम अशरफ सिमनानी रज़ी. फ़रमाते हैं- अल्लाह ने कुछ औलिया को बाक़ी का सरदार बनाया है और मख्लूक की इस्लाह व हाजत रवाई का काम इनके सुपुर्द किया है। ये हज़रात अपने काम को करते हैं, इसके लिए एक दुसरे की मदद भी लेते हैं। ये रब के काम से कभी ग़ाफ़िल नहीं होते।

इनके बारह ओहदे (या क़िस्में) होते हैं-

1.कुतुब, 2.ग़ौस, 3.अमामा, 4.अवताद, 5.अब्दाल, 6.अख्यार, 7.अबरार, 8.नक़बा, 9.नजबा, 10.उमदा, 11.मक्तूमान, 12.मफ़रदान।

…जारी है पार्ट 2 में…

Sufiyana 134

महफिल ए समा – 1

क़ालल अशरफ़:

अस्सिमाअ तवाजिद उस सूफिया फि तफहिमुल मआनी अल्लज़ी यतसव्वूर मन अला सवात अल मुख्तलेफ़ा

हज़रत सैय्यद मख्दूम अशरफ़ सिमनानी रज़‍िअल्‍लाह अन्‍हो, ‘लताएफ अशरफ़ी’ में फ़रमाते हैं कि मुख्तलिफ़ आवाज़ों को सुनकर फ़हम में जो मअानी पैदा होती हैं, उनके असर से सूफ़ियों का वज्द करना सिमा है।

सुल्तानुल मशाएख़ फ़रमाते हैं कि जब तक ये इल्म न हो जाए कि सिमा क्या है और सुनने वाला कौन है, तब तक सिमा न हराम है न हलाल है।

सिमा इ बिरादर बगोयम के चिस्त

अगर उसतमा रा बदानम के किस्त

मैं इसी वक्त बता सकता हूं कि सिमा क्या है जबकि मुझे ये मालूम हो जाए कि सुननेवाला कौन है।

आगे फ़रमाते हैं कि जिस मसले में हिल्लत व हुरमत मुख्तलिफ़ फ़िया हो उसमें दिलेराना और बेबाकाना गुफ्तगू नहीं करना चाहिए, बल्कि ग़ौरो तातिल के बाद इस सिलसिले में बात करना चाहिए। ऐसे ही मुख्तलिफ़ फ़िया मसला है, महफ़िले सिमा। इसको न तो मुतलक़न हराम कहा जा सकता है और न बग़ैर क़ैद के हलाल कहा जा सकता है।

सिमा, ख़ुदा के छिपे हुए भेदों में एक भेद है और उसके नूर में से एक नूर है। वही खुशनसीब व नेक है, जिसका दिल सिमा का आफ़ताब बन जाए यानी सिमा का हक़ीक़ी ज़ौक़ व शौक़ हो।

इश्क़ दर परदा मी नवाज़द साज

आशिक़ी को के बशनूद आवाज़

हमा आलम सदाए नग़मए उस्त

के शनेद इब्न चुनैन सदाए दराज़

इश्क़ ने दरपरदा साज़ छेड़ रखा है, वो आशिक़ कहां है जो इस आवाज़ को सुनें। ये तमाम कायनात इसी नग़मए ‘कुन’ की आवाज़ है, किसी ने इतनी लंबी तान कभी सुनी है।

तालिब और इसके राज़ को जानने वाले आलिम को चाहिए कि सिमा की तरफ तवज्जो करें। सिमा की तारिफ़ बुजुर्गाने दीन ने इस तरह की है – ”बेशक सिमा एक अमरे मख्फ़ी, एक नूरे जली और सिर्रुन अलियुन है। इस राज़ से वही आगाह हो सकते हैं, जो अहले तहक़ीक़ हैं और इल्म में मज़बूत हैं और अल्लाहवाले हैं। साहिबाने मारेफत हैं, हक़ से जुड़े हुए हैं और ख़ुदा के साथ हैं। जिनके लिए इब्तेदा में ज़ौक़ है और इन्तहा में शुरब है।”

मतरब बराह परदा दरासाजे उदरा

दर दा बगोश होश दर्दो सरूद रा

अज़ नग़मए सरूद के गोयन्द फ़ैज़ उस्त

दरपर्दाए सिमा दरआवर हसूद रा

ऐ मतरब साज़े ओर को परदा के रास्ते से अन्दर ले आ और दर्दो सोज़ की मौसिक़ी को गोशए होश से सुन। नग़माए मौसिक़ी को इसका फ़ैज़ कहते हैं, सिमा के परदे में इसे हासिदीन ले आए हैं।

और कुछ लोग वो हैं जो सिमा से मअज़ दिल कर दिए गए हैं। ”वो सुनने की जगह से दूर कर दिए गए हैं” (क़ुरान 26:212)। अगर अल्लाह उनमें खूबी पाता तो उन को ज़रूर सुनाता अगर उनको सुनवा भी दिया जाता, तब भी वो पीठ फेर लेते। ये वही लोग हैं जो ‘अरबाबे सिमा’ के मुन्किर हैं, इनमें कुछ तो सिमा को फासिक़ कहते हैं और कुछ कुफ्र का फतवा भी लगा देते हैं, और कुछ लोग इन्हें बिदअती भी कहते हैं। बहरहाल उनके दर्मियान असहाबे सिमा पर फतवों और इल्ज़ामात पर एक राय नहीं है।

ख्वाह खलक़ी गबरख्वान वख्वाह तरसा ख्वाहमुग़

सज्दागाहे क़िब्लए अब्रो बतो नतवान गुज़ाश्त

अज़ हमा दरबगुज़रम नगज़ारमश मारा बाव

अज़ जहान बतवान गुज़शतन रूई तू नतवान गुज़ाश्त

लोग मुझे गबर बहे ख्वाह तरसा ख्वाह मुग़ कहे, कुछ भी कहे, मैं तेरे क़िब्ल ए अबरू को, जो मेरी सज्दागाह है, नहीं छोड़ सकता। मैं सब को छोड़ दूंगा और सब से मुंह फेर लूंगा। दुनिया को भी तर्क कर दूंगा, लेकिन तुझे नहीं छोड़ सकता।

सिमा के बारे में आसारे पाक और अक़वाले सहीहिया ये हैं कि सिमा नफ्सुल अम्र में मुबाह है। सिमा की तारीफ ये है कि

अस्सिमा सूत तय्येबा मौज़ून मफहूमुलमअनी महरकुल कुलूब

सिमा ऐसी पाकीज़ा और मौजून आवाज़ को कहते हैं जिसको समझा जा सके और दिलों को हरकत में लाने वाली हो।

पस इसके अन्दर कोई वजहए हुरमत नहीं है। ‘हराम’ वो चीज़ है जिसका तर्क दलील क़तई से साबित हो चुका हो और जिसके सबूते तर्क में कोई शको शुब्ह न हो और हमने सिमा की जो तारीफ बयान की है उस में कोई ऐसी चीज़ नहीं है। जो लोग दरवेशों की बज्मे सिमा के मुन्किर हैं और महफिले सिमा से इन्कार करते हैं उनके लिए ये रूबाई

दुनिया तलब जहान बकामत बादा

दाइन जेफए मुरदार ब दामत बादा

गुफ्ती के ब नज्द मन हराम अस्त सिमा

गर बर तू हराम अस्त हरामत बादा

ऐ दुनिया के तालिब, दुनिया तुझे मुबारक हो, ये तो मुरदार है, ये मुरदार तेरे दाम ही में रहे। अच्छा है तू कहता है कि सिमा मेरे लिए हराम है।

अगर महफिले समा तुझ पर हराम है तो हराम ही रहे।

Sufiyana 133

किरपा करो सरकार…

मैं मली, तन मेरा मैला, किरपा करो सरकार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

सरपे उठाकर पाप की गठरी, आई हूं तुम्हरे द्वार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

मेरे खिवइया बीच भंवर में, कश्ती डूब न जाए।

तेरा हूं, तू मेरी खबर ले, कौन लगाए पार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

मुझ मंगते की बात ही क्या है, वो हैं बड़े लजपाल।

उनकी किरपा और दया से, पलता है सब संसार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

उनकी अता के गुन गाओ, उनसे ही फरियाद करो।

सबसे बड़े दाता हैं वो, सबसे बड़ी सरकार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

उनकी याद ईमान बना लो, ख़ुद को ही क़ुरान बना लो।

उनकी याद से मिट जाते हैं, सारे ही आज़ार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

उसके लिए तो सरमाया है, प्यारे मदिने वाले का।

सोचें समझें कहने वाले, ‘खालिद’ को नादार।

नज़रे करम सरकार, या मुहम्मद ﷺ…

 

आज़ार=बीमार, सरमाया=असल दौलत, नादार=ग़रीब

 

 

Sufiyana 131

मुरीद का मतलब क्‍या?

मीम मुर्शिद से मिला, हमको मुहब्बत का सबक़,

रे से राहत मिली, और रहे हमारे मुतलक,

शीन से शिर्क़ हुआ दूर दिल से,

दाल से दस्त मिला और मिला दिल दिल से।

हज़रत मुहम्मद ﷺ को देखकर जो ईमान लाए उसे सहाबी कहते हैं। सहाबी के मायने होते हैं ”शरफे सहाबियत” यानि सोहबत हासिल करना। जो हुजूर ﷺ की सोहबत में रहे वो सहाबी हुए। आलातरीन निसबत के एतबार से सहाबी अपने आप में अकेले हैं जिन्हें हुजूर ﷺ की कुरबत नसीब हुई, यहां ग़ैर की समाई नहीं। तसव्वुफ़ में सूफ़ीयों ने इसी इरादत को ‘मुरीदी’ का नाम दिया है। मुरीदी का मफ़हूम भी यही है कि जिस मुर्शिद कामिल से लगाव व ताल्लुक़ पैदा हो जाए और सच्चे दिल से उनकी तरफ़ माएल हो जाए तो उनकी ख़िदमत में आख़िरत सवांरने के लिए इताअत व नियाजमंदी के साथ फ़रमाबरदार हो जाए। ये हुक्मे ख़ुदा की ऐन तामील है-

ऐ ईमानवालों ख़ुदा से डरो और सच्चों के साथ रहा करो।

(कुरआन-9.सूरे तौबा-119)

इस आयात में तीन बातें कही गयी हैं एक ईमान-बिल्लाह, दुसरा तकवा-अल्लाह और तीसरा सोहबत-औलियाअल्लाह। सबसे पहले ईमान के बारे में कहा गया है कि ईमान को अव्वलियत हासिल है। फिर तकवा के बारे में कहा गया है। तकवा की जामे तारीफ में सूफ़ियों ने कहा कि- ‘ख़ुदा तुझे उस जगह न देखे जहां जाने से तूझे रोका है और उस जगह से कभी गैर हाजिर न पाए जहां जाने का हुक्म दिया है।’ फिर कहा गया कि सिर्फ हुसूले ईमान और वसूले तक़वा व तहारत ही काफी नहीं है बल्कि इसके बाद भी एक मरतबा है जिसे एहसान की तकमील कहते हैं, जो शैख़ की सोहबत से हासिल होता है।

यहां सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात ये है कि अल्लाह ईमानवालों से बात कर रहा है। ये नहीं फ़रमा रहा कि सच्चों के साथ हो जाओ और ईमान ले आओ, बल्कि ये फ़रमा रहा है कि ईमान लाने के बाद भी अल्लाह से डरना और सच्चों की सोहबत ज़रूरी है।

हाजी इमदादुल्ला शाह महाजर मक्की रज़ी. और इमाम ग़ज़ाली रज़ी. फ़रमाते हैं कि हुजूर ﷺ फ़रमाते हैं- शैख़ अपने हल्कए मुरीदैन में इस तरह होता है, जिस तरह नबी अपनी उम्मत में होता है। (तसफिया-तुल-कुलूब:4) (इहयाउल उलूम)

हज़रत अबुतालिब मक्की रज़ी. फ़रमाते हैं कि बुजुरगाने दीन ने फ़रमाया – ‘जो नबी के साथ बैठना चाहे उसे चाहिए अहले तसव्वुफ़ की मजलिस व सोहबत इख्तियार करे। जिस तरह वहां नबी की सोहबत ज़रूरी है यहां भी इस के लिए शेख़ का होना ज़रूरी है। अगर शैखे कामिल की नज़र में हो और हर अमल फ़रमान के मुताबिक करे और अपने तमाम इख्तियार व इरादों को अपने शेख़ के दस्ते इख्तियार में दे दे तो बहुत जल्द मंजिले मकसूद व मकबूलियत हासिल होगी।’ (कुतुल कुलूब)

ग़ौसे आज़म अब्दुल क़ादिर जिलानी रज़ी. फ़रमाते हैं- ‘बेशक हक़ीक़त यही है कि अल्लाह की आदते जारिया है कि ज़मीन पर शैख़ भी हो और मुरीद भी, हाकिम भी हो और महकूम भी, ताबेअ भी हो और मतबूअ भी (इन्सान इस बात पर पुख्ता यक़ीन रखे) कि ये सिलसिला आदम अलैहिस्सलाम से क़यामत तक के लिए है’। (गुनियातुत तालेबीन:840)

शाह वलीउल्लाह मोहद्दिस देहलवी रज़ी. फ़रमाते हैं- ‘ज़ाहिरी तौर पर बिना मां-बाप के बच्चा नहीं हो सकता, ठीक उसी तरह बातिनी में बिना पीर के अल्लाह की राह मुश्किल है।’ और फ़रमाते हैं – ‘जिसका कोई पीर नहीं उसका पीर, शैतान है।‘  (अलइन्तेबाह:33)

‘हर मुरीद ये यकीन रखे कि बेशक तुम्हारा पीरे कामिल ही वो है जो अल्लाह से मिलाता है। तुम्हारा ताल्लुक अपने ही पीर के साथ पक्का हो, किसी दुसरे की तरफ न हो।’

शैख़ अब्दुल हक़ मोहद्दिस देहलवी रज़ी. फ़रमाते हैं-‘अपने पीर से मदद मांगना, हजरत मुहम्मद ﷺ से मदद मांगना है, क्योंकि ये उनके नाएब और जानशीन हैं। इस अक़ीदे को पूरे यक़ीन से अपने पल्लु बांध लो।’

हक़ीक़ी निजात के लिए अपने इबादत व मुजाहिदे से पहले मुर्शिद ज़रूरी है और सुननत-अल्लाह भी इसी तर्ज़ पर जारी है। इसी रहबरी में कामयाबी है।

 

क़ुरान में बैअत की अहमियत

बैअत की अहमियत के बारे में क़ुरान में है-

‘ऐ ईमानवालों! तुम अल्लाह से डरते रहो और उस तक पहुंचने का वसीला तलाश करो और उसकी राह में जिहाद करो ताकि तुम फलाहो कामयाब हो जाओ’ (क़ुरान-5:35)

इस आयत में पूरा तसव्वुफ़ ही सिमट आया है, यहां फलाहो कामयाबी के लिए चार बातें कही गयी हैं-

ईमान–  जुबान से इकरार करना और दिल से तस्दीक़ करना कि अल्लाह एक है और हुजूर ﷺ अल्लाह के रसूल हैं।

तक़वा–  अल्लाह ने जिस काम का हुक्म दिया उसे करना और जिस से मना किया है उस से परहेज़ करना।

वसीला–  अल्लाह के नेक बंदों की सोहबत इख्तियार करना और उनसे रहबरी हासिल करना।

जिहाद–  अपने नफ्स और अना (मैं) को अल्लाह की राह में मिटा देना।

Sufiyana 128

हज़रत राबिया बसरी

हज़रत राबिया बसरी रज़ी. ख़ुदा की खास बंदी, पर्दानशीनों में मख्दूमा, ईश्क़ में डूबी हुई, इबादत गुज़ार, वो पाक़िज़ा औरत हैं जिन्हें आलमे सूफ़िया में ”दूसरी मरयम” कहा गया।

यहां छोटे बड़े का कोई फ़र्क नहीं, यहां मर्द व ज़न (औरत) का कोई फ़र्क नहीं, क्योंकि अल्लाह सूरत नहीं देखता, वो तो दिल देखता है और जब आख़िरत में हिसाब होगा तो नियत को देखकर होगा। लिहाजा जो औरत इबादत व रियाज़त में मर्दों के मुकाबिल हो तो उसे मर्दों की सफ़ में ही शुमार किया जाए क्योंकि रोज़े महशर जब मर्दों को पुकारा जाएगा तो सबसे पहले हज़रत मरयम रज़ी. आगे बढ़ेंगी।

विलादत

जिस रात हज़रत राबिया बसरी रज़ी. पैदा होने वाली थीं तो घर में इतना तेल भी न था कि नाफ की मालिश की जाए या चिराग़ जलाया जाए और इतना कपड़ा भी न था कि आपको लपेटा जा सके। आपका नाम राबिया (चौथी) रखा गया क्योंकि आप तीन बहनों के बाद पैदा हुईं थीं। आपके वालिद (अब्बा) का ये हाल था कि ख़ुदा के अलावा किसी से कुछ नहीं मांगते यहां तक कि पड़ोसियों से भी कुछ न लेते। इसी परेशानी के आलम में पैगम्बर मुहम्मद ﷺ ने ख्वाब में बशारत दी और तसल्ली देते हुए फ़रमाया कि ये लड़की बहुत मक़बूलियत हासिल करेगी और इसकी शफ़ाअत से हज़ारों लोग बख्श दिए जाएंगे। आगे हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि इस शहर (बसरा) के हाकिम के पास जाओ और कहो कि वो हर रोज़ 100 मरतबा और जुमा को 400 मरतबा मुझ पर दरूद भेजता है, लेकिन आज भेजना भूल गया। तो इसी की कफ्फ़ारे के तौर पर तुम्हें 400 दीनार दे दे। ये जानकर हाकिम ने इस बशारत पर बतौर शुक़राना 1000 दीनार फ़क़ीरों में तक़सीम करा दिए और हज़रत राबिया रज़ी. के वालिद को 400 दिनार दिए और ताज़ीमन ख़ुद आकर कहा किसी भी ज़रूरत पर याद किजिए। इस तरह आपकी विलादत की तमाम ज़रूरतें पूरी की गई।

आपने जब होश संभाला तो वालिद का साया सर से उठ गया और बहनें भी जुदा हो गयीं। एक जालिम ने आपको जबरन कनीज़ बना लिया और कम दाम में आपको बेच भी दिया। वहां आपसे बहुत ज्यादा काम लिया जाता। एक बार नामहरम को सामने देखकर गिर गईं, जिससे आपका हाथ टूट गया। आपने ख़ुदा की बारगाह में सर-ब-सुजूद होकर अर्ज़ किया कि या अल्लाह! बेमददगार पहले से ही थी, अब लाचार भी हो गई। इसके बावजूद तेरी रज़ा चाहती हूं। इस पर ग़ैब से आवाज़ आई ‘ऐ राबिया! ग़म न कर। कल तुझे वो मरतबा हासिल होगा जिस पर फ़रिश्ते भी रश्क करेंगे।’ ये सुन कर आप बहुत खुश हुईं।

आपका मामूल था कि दिन में रोज़ा रखतीं और रात भर इबादत करतीं। एक रात आपके मालिक की नींद खुली तो क्या देखता है कि आप इबादत में मश्गूल हैं और ख़ुदा से अर्ज़ कर रहीं है ‘या ख़ुदा, मैं हर वक्त तेरी इबादत करना चाहती हूं लेकिन तूने मुझे किसी की कनीज़ बनाया है इसलिए दिन को तेरी बारगाह में हाज़िर नहीं हो पाती।’ ये सुनकर मालिक परेशान हो गया और सोचने लगा इससे ख़िदमत लेने के बजाय मुझे इसकी ख़िदमत करनी चाहिए। अगले दिन उसने आपसे कहा ‘आप आज से आज़ाद हैं, आप चाहें तो यहीं रहें या कहीं और जाएं’। इसके बाद आप दिन रात ख़ुदा की इबादत में ही मशगूल रहने लगीं और कभी कभी हज़रत हसन बसरी रज़ी. (जो उस वक्त के बहुत बड़े सूफ़ी थे।) की महफिल में भी शिरकत करतीं।

सफरे हज

एक बार आप हज करने गईं। काबे में पहुंच कर आपने ख़ुदा से दर्याफ्त किया मैं खाक से बनी हूं और काबा पत्थर का। मैं बिला वास्ते तुझसे मिलना चाहती हूं। इस पर निदा आई ‘ऐ राबिया! क्या तू दुनिया के निज़ाम को बदलना चाहती है? क्या इस जहां में रहने वालों के खून अपने सर लेना चाहती है? क्या तूझे मालूम नहीं जब मूसा रज़ी. ने दीदार की ख्वाहिश की तो एक तजल्ली को तूर का पहाड़ बर्दाश्त नहीं कर पाया?’

काफी अर्से बाद आप जब दोबारा हज करने गयीं तो देखा कि काबा ख़ुद आपके दीदार को चला आ रहा है। आपने फ़रमाया मुझे हुस्ने काबा से ज्यादा, जमाले ख़ुदावन्दी की तमन्ना है। हज़रत इब्राहीम अदहम रज़ी. जगह जगह नमाज अदा करते हुए पूरे 14 साल में जब हज करने मक्का पहुंचे तो देखते हैं कि काबा गायब है। ख़ुदा की बारगाह में गिरयावोज़ारी करने लगे इन आंखों से क्या गुनाह हो गया है। तब निदा आई वो किसी ज़ईफ़ा के इस्तेकबाल के लिए गया है। कुछ देर बाद काबा अपनी जगह पर था और एक बुढ़िया लाठी टेकते हुए चली आ रही है। हज़रत अदहम रज़ी. ने कहा ये निज़ाम के ख़िलाफ़ काम क्यूं कर रही हो? तब हज़रत राबिया रज़ी. फ़रमाती हैं तुम नमाज़ पढ़ते पढ़ते यहां पहुंचे हो और मैं इज्ज़ इंकिसारी के साथ यहां पहुंची हूँ।

यक़ीन

दो भूखे लोग हज़रत राबिया रज़ी. से मुलाकात करने हाज़िर हुए और दौराने गुफ्तगू खाने की इच्छा जाहिर की। आपके पास दो रोटियां थीं लेकिन तभी एक भीखारी मांगता हुआ पहुंचा तो आपने दोनों रोटियां उसे दे दी। अब आप लोगों के लिए कुछ न था।

थोड़ी देर ही गुजरा था कि एक कनीज़ आपकी ख़िदमत में कुछ रोटियां लेकर हाजिर हुईं। आपने उन रोटियों को गिना तो वो 18 थीं, आपने वापस कर दीं। कनीज़ के बहुत मनाने पर भी आप नहीं मानी। कुछ देर बाद वो कनीज फिर आई और इस बार 20 रोटियां लेकर। आपने कुबूल कर लीं और उन दोनों के सामने रख दीं।

ये सब देखकर उनमें से एक ने आपसे पूछा ये सब क्या माजरा है। तो आपने बताया कि मेरे पास दो ही रोटी थी जो आपको देना चाहती थी, लेकिन तभी भिखारी आ गया। मैंने ख़ुदा से दर्याफ्त किया कि ‘या ख़ुदा! तेरा वादा है कि तू एक के बदले 10 देता है।’ फिर मैने दो रोटियां उस भिखारी को दे दी। अब रब के वादे के मुताबिक मुझे 20 रोटियां मिलनी चाहिए, तो कम क्यूं लूं? मुझे अपने रब पर और उसके वादे पर पूरा यक़ीन है।

चादरवाली

एक बार आप इबादत करते करते सो गईं, तभी एक चोर आया आपकी चादर लेकर भागने लगा। लेकिन उसे बाहर जाने का रास्ता नज़र नहीं आया। वो चादर रखकर जैसे ही पलटा, रास्ता दिखने लगा। उसने फिर चादर उठा ली, लेकिन फिर क्या। रास्ता गायब हो गया। उसने कई बार ऐसा किया और हर बार ऐसा ही हुआ। ग़ैब से आवाज़ आई- ‘तू ख़ुद पर आफ़त क्यों ला रहा है? इस चादरवाली (राबिया रज़ी.) ने ख़ुद को ख़ुदा के हवाले कर दिया है। इसके पास शैतान भी नहीं फटकता तो किसी और की क्या मजाल जो इसे नुकसान पहुंचा सके? एक दोस्त सो रहा है लेकिन दूसरा तो जाग रहा है।’

हवा पर मुसल्ला

हज़रत हसन बसरी रज़ी. दरिया में मुसल्ला बिछाकर कहा आइए यहां नमाज अदा कीजिए। आपने कहा- क्या ये लोगों के दिखाने के लिए है। अगर नहीं तो फिर इसकी क्या ज़रूरत है। आपने हवा पर इतने उपर मुसल्ला बिछाया कि किसी को न दिख सके और फ़रमाया आईए यहां इबादत करते हैं। फिर आपने फ़रमाया पानी में इबादत एक मछली भी कर सकती है और हवा में एक मक्खी भी नमाज़ पढ़ सकती है। इसका हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं।

एक मजलिस में आपने फ़रमाया कि जो हज़रत मुहम्मद ﷺ को सच्चे दिल से मानता है उसे उनके मोजज़ात में से कुछ हिस्सा ज़रूर मिलता है। ये अलग बात है कि नबीयों के मोजज़ा को वलियों के लिए करामत कहते हैं।

निकाह

आपसे पूछा गया कि क्या आपको निकाह की ख्वाहिश नहीं होती। तो आपने फ़रमाया कि निकाह का ताल्लूक तो जिस्म व वजूद से है, जिसका वजूद ही रब में गुम हो गया हो उसे निकाह की क्या हाजत।

मारफ़त

मारफ़त तवज्जह का नाम है और आरिफ़ की पहचान यह है कि वो ख़ुदा से पाकीज़ा दिल तलब करे। जब दिया जाए तो फौरन ख़ुदा के हवाले कर दे ताकि बुराईयों से बचा रहे।

अपने रब को खुश करने के लिए मेहनत के वक्त ऌस तरह शुक्र अदा करो जिस तरह नेअमत के वक्त करते हो। तौबा की दौलत भी रब की मर्जी से ही मिलती है वरना लोग तो अपने गुनाहों पर फ़ख्र करते हैं। अपनी बुराईयों से, गुनाहों से इस तरह तौबा की जाए फिर से तौबा करने की ज़रूरत न पड़े।

आप अक्सर मरीज़ों की तरह सूरत बनाकर इबादत में गिड़गिड़ाती रोती। किसी ने पूछा तो आपने फ़रमाया कि मेरे सीने में ‘ख़ुदा का दर्द’ छिपा है। जिसका इलाज किसी हकीम के पास नहीं और न ही तुम्हें वो दिख सकता है। इसका इलाज सिर्फ ‘रब से मिलना’ ही है।

 

ख़ुदा की बंदगी

एक रोज़ एक मजलिस में ‘ख़ुदा की बंदगी’ यानि इबादत के बारे में बातचीत हो रही थी। आप भी उसमें मौजूद थीं। एक ने कहा कि मैं इबादत इसलिए करता हूं कि जहन्नम से महफूज़ रहूं। एक ने कहा इबादत करने से मुझे जन्नत में आला मकाम हासिल होगा। तब आपने फ़रमाया कि अगर मैं जहन्नम के डर से इबादत करू तो ख़ुदा मुझे उसी जहन्नम में डाल दे और अगर जन्नत के लालच में इबादत करूं तो ख़ुदा मुझ पर जन्नत हराम कर दे। ऐसी इबादत भी कोई इबादत है। ख़ुदा की बंदगी तो हम पर ऐन फ़र्ज़ है, हमें तो हर हाल में करना है, चाहे उसका हमें सिला मिले या न मिले। अगर ख़ुदा जन्नत या दोज़ख़ नहीं बनाता तो क्या हम उसकी बंदगी नहीं करते। उसकी बंदगी बिना मतलब के करनी चाहिए।

आज़माईश

किसी ने आज़माईश के लिए पूछा कि ऐसा क्यूं कि नबूव्वत सिर्फ़ मर्दों को ही मिली फिर भी औरतों को ख़ुद पर नाज़ क्यूं। आपने जवाब में कहा- क्या किसी औरत ने कभी ख़ुदाई का दावा किया है। नहीं किया। अल्लाह की मर्ज़ी जिसे चाहे नबूव्वत दे न दे। हम कौन होते हैं उसके ख़िलाफ़ जाने वाले। हमें ख़ुद पर नहीं ख़ुदा की बंदगी पर नाज़ है।

एक शख्स आपसे दुनिया की बहुत शिकायत करने लगा तो अपने फ़रमाया लगता है तुम्हें उसी दुनिया से बहुत लगाव है। तुम जब से आए हो उसी दुनिया का ज़िक्र कर रहे हो। जिससे बहुत ज्यादा मुहब्बत होती है, इन्सान उसी का ज़िक्र करता रहता है। अगर नफ़रत है तो उसकी बात ही मत करो।

विसाल

विसाल के वक्त आपने हाजिर लोगों से कहा यहां से चले जाएं फरिश्तों के आने का वक्त हो गया है। सब बाहर चले गए। फरिश्ते आए, आपसे दरयाफ्त किया ऐ मुतमईन नफ्स! अपने मौला की जानिब लौट चल। इस तरह आपका विसाल हुआ। आपने न किसी से कभी कुछ मांगा और न ही अपने रब से ही कुछ तलब किया और अनोखी शान के साथ दुनिया से रूख्सत हुईं।

Sufiyana 126

चार तरकी ताज

 

यहां हम ख्वाजा ए चिश्तिया के मल्फूज़ात से फ़ैज़ हासिल करेंगे। मल्फूज़ात, सूफ़ीयों की ज़िंदगी के उस वक्त क़े हालात और तालिमात का ख़जाना होता है। जिसे कोई ऐसे मुरीद ही लिख सकते है, जो ज्यादा से ज्यादा पीर की सोहबत से फ़ैज़याब हुए हो। इस बार हम हज़रत ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया रज़ी. के मल्फूज़ात ''अफ़ज़ल उल फ़वाएद'' (यानी ''राहत उल मुहिब्बिन'') में से कुछ हिस्सा नकल कर रहे हैं जिसे उनके मुरीद हज़रत अमीर खुसरो रज़ी. ने लिखा है।

बतारीख़ 24 माह ज़िलहिज्जा 713 हिजरी, इस बन्दए नाचीज़ खुसरो वल्द हुसैन को हज़रत निज़ामुद्दीन महबूबे इलाही रज़ी. की क़दमबोसी का शरफ़ हासिल हुआ। जिस रोज़ मैं उनकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ तो मेरे दिल में ये नियत थी कि पहले मैं आपकी बारगाह में बैठ जाउंगा और अगर आप मुझे ख़ुद बुलाएंगे तो ही मैं बैअत होउंगा। मैंने ऐसा ही किया, आस्ताने पर जा कर बैठ गया। थोड़ी ही देर में आपके एक खादिम बशीर मियां ने आकर सलाम किया और फ़रमाया कि हुजूर आपको याद फ़रमा रहे हैं, उन्होंने कहा कि बाहर एक तुर्क बैठा है, जाओ उसे बुला लाओ। मैं फौरन आपकी खि़दमत में हाजिर होकर सर ज़मीन पर रख दिया। आपने कहा सर उठाओ, अच्छे मौके पर आए हो, खुश आए हो। फिर निहायत इनायत व शफ़क़त से मेरे हाल पर दुआ फ़रमाई और मुझे शरफ़े बैअत अता फ़रमाई। ”खास बारानी” और चारतरकीताज इनायत फ़रमाई।

फिर पीर की खि़दमत में मुरीद होने के बारे में गुफ्तगू शुरू हुई। हज़रत निज़ामुद्दीन रज़ी. ने फ़रमाया कि जिस रोज़ मैं बाबा फ़रीद गंजशकर रज़ी. का मुरीद हुआ तो आपने फ़रमाया कि ऐ मौलाना निज़ामुद्दीन! मैं किसी और को विलायत ए हिन्दुस्तान का सज्जादा देना चाहता था लेकिन ग़ैब से आवाज़ आई कि ये नेअमत हमने निजामुद्दीन बदायूंनी के लिए रखी है, ये उसी को मिलेगी।

फिर निहायत रहमत व शफ़क़त मेरे हाल पर फ़रमाई और चारतरकीताज मेरे सर पर रखी और ये हिकायत बयान फ़रमाई – इस ताज के चार खाने होते हैं, पहला शरीअत का, दूसरा तरीक़त का, तीसरा मारेफ़त का और चौथा हक़ीक़त का। पस जो इनमें इस्तेकामत से काम ले उसके सर पर इस ताज का रखना वाजिब है।

आप ये बयान फ़रमा ही रहे थे कि मौलाना शम्सूद्दीन यहया, मौलाना बुरहानुद्दीन ग़रीब और मौलाना फ़खरूद्दीन कदमबोस हुए। हुजूर आगे फ़रमाते हुए कहते हैं कि एक टोपी एकतरकी, दूसरी टोपी दोतरकी, तीसरी टोपी तीनतरकी और चौथी टोपी चारतरकी।

फिर ताज के असल में फ़रमाते हैं कि मैंने अपने पीरो मुर्शिद से सुना है कि ख्वाजा अबुल लैस समरकन्दी रज़ी. की किताब में हज़रत हसन बसरी रज़ी. की रवायत लिखी है कि एक रोज़ पैगम्बरे ख़ुदा हज़रत मुहम्मद ﷺ बैठे थे और आसपास सहाबी बैठे थे कि तभी हज़रत जिबरईल रज़ी. चार ताज लेकर तशरीफ लाए और फ़रमाया कि ख़ुदा का हुक्म है कि ये चार ताज जन्नती हैं, इनको आप अपने सर पर रखें। बाद अजान आप जिसे चाहे इनायत फ़रमाएं और अपना खलिफा बनाएं। हजरत मुहम्मद ﷺ एकतरकीताज अपने सर पर रखे, फिर उतार कर हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ रज़ी. के सर पर रखे, इसी तरह दोतरकीताज हज़रत उमर रज़ी. के सर पर रखे, तीनतरकीताज हज़रत उस्मान ग़नी रज़ी. के सर पर रखे और चारतरकीताज हज़रत मौला अली रज़ी. के सर पर रखे और फ़रमाए कि ये आपका ताज है।

बाद अज़ान फ़रमाते हैं कि तबक़ात के मशाएख और जुनैदिया तबका ने फ़रमाया – हमें इस तरह मालूम हुआ कि चारतरकीताज की असल क्या है। पहले ख़ुदा से हुजूर ﷺ को अता हुआ और उनसे हमको मिला। बिलकुल वैसे ही जैसे ख़रक़ा, मेराज की रात अता हुआ था।

आगे हज़रत निजामुद्दीन रज़ी. फ़रमाते हैं कि एकतरकीताज, जो हज़रत अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. को पहनाई गई थी, वो अब्दाल व सिद्दीक़ीन के सर पर रखा जाता है। अल्लाह के सिवा किसी का ख्याल दिल में न हो और तमाम दुनिया के कामों से दूर रहें तो फिर वो शख्स इस ताज के काबिल हैं। इस ताज का हक़ उनके बारे में ये है कि इनके बातिन मुसलसल जिक्र की वजह से नूरे मारफ़त से मुनव्वर होते हैं और इन्हें ज़ाहिरी व बातिनी मक़सूद हासिल होते हैं। अगर साहिबे ताज दुनिया का तालिब हो जाए तो वो इस ताज के लायक नहीं रहता।

दोतरकीताज जो हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ी. के सर रखी गयी थी, उसे आबिद, अवताद और कुछ मनसूरी भी पहनते हैं। इसका मकसद ये है कि जब इन्सान इसे सर पर रखे तो दुनिया को तर्क कर दे और ज़िक्र करने वाला बन जाए। सिवाए यादे इलाही के किसी और चीज़ में मशगूल न रहे। यहां तक कि अगर हलाल चीज़ उसे मिल जाए तो शाम तक न बचाए, खर्च कर दे और दुनियादारी के पास भी न भटके। ऐसे शख्स को दोतरकीताज पहनना वाजिब है वरना गुमराह न हो जाए।

तीनतरकीताज, जो हज़रत उस्मान ग़नी रज़ी. के सर रखी गई। वो ज़ाहिद, अहले तहीर, मशाएख तबक़ात और अक्सर अक्लमंद लोग भी पहनते हैं। इससे मक़सूद ये है कि अव्वल गैरूल्लाह से किनारा करे और तमाम लज्ज़तों शहवतों का लालच छोड़ दे। दूसरे, दिल को हसद (जलन), किना, बुग्ज़, फ़हश व रिया (दिखावा) जैसे बूरी आदतों से पाक करे। तीसरे सिर्फ और सिर्फ अल्लाह से रिश्ता जोड़े। जब ये हालत पर पहुंचे तो सर पर इस ताज का रखना जाएज़ है वरना जुनैदी तबक़ा में छोटा ठहरेगा।

चारतरकीताज, जो हज़रत मौला अली रज़ी. के सरे मुबारक पर रखा गया, वो सूफ़ी, सादात और मशाएख बुजूर्ग पहनते हैं। इससे मुराद दौलते सआदत है और जो अठारह हज़ार आलम में है, सबके सब इसमें रखा गया है। लेकिन इसके सर पर रख कर चार चीज़ों को दूर रखें ताकि इस चारतरकीताज को रखना दुरूस्त हो। वो चार चीज़ें हैं- अव्वल, दुनिया व दौलत को तर्क करें। दूसरा, ”तर्क उल लिसान अन नख्मर उल तज़ामा बज़िक्रुल्लाह” यानि अल्लाह की याद के सिवा और कोई बात न रहे। तीसरा ”तर्क उल बसरा मन ग़ैरूल करामा” यानि ग़ैर की तरफ़ नज़र करने से दूर रहे और ग़ैर का न रहे ताकि ग़ैर के लिए अन्धा हो जाए। जब ख्वाजा साहब इस बात पर पहुंचे तो इस क़दर रोए कि सभी हाजिरीन भी रोने लगे, आपने ये शेर इरशाद फ़रमाया-

अगर बग़ैर रख्त दीदा अम बक्स बयन्द

कश्म बरून बान्गश्त चूं सज़ाश ईं अस्त

फिर फ़रमाया चौथा ये कि ”तहारतुल क़ल्ब मिन हुब्बुल दुनिया” यानि दिल को दुनिया की मुहब्बत से पाक कर ले। पस जब दुनियावी मुहब्बत का जंग, दिल से साफ करके अल्लाह को शामिले हयात कर ले तो ग़ैर, दरमियान से उठ जाएगा और अल्लाह से यगाना हो जाएगा। इस वक्त ये चारतरकीताज सर पर रखने का उसको हक़ होगा।

फिर फ़रमाते हैं कि क्या ही अच्छा हो अगर पर्दा दरमियान से उठ जाए और सारे भेद खुल जाएं और ग़ैरियत दूर हो जाए और ये आवाज़ दी- ”बी यबसरो अवबी यबसरो अव यसमा वबी यनतक़” मुझ ही से देखता है, मुझ ही से सुनता है और मुझ ही से बोलता है।

Sufiyana 124

दुआ (Prayer)

और तुम्हारा परवरदिगार इरशाद फ़रमाता है कि तुम मुझसे दुआएं मांगो,

मैं तुम्हारी (दुआ ज़रूर) क़ुबूल करूंगा। (कुरआन-60:40)

 

ख़ुदा तक न तो (कुरबानी के) गोश्त ही पहुंचेंगे और न ही खून,

(हां) मगर उस तक तुम्हारी (नेकी व) परहेज़गारी (ज़रूर) पहुंचेगी।

(कुरआन -37:22)

 

पस तुम अल्लाह को ईख्लास के साथ पुकारो

अगरचे काफिरों को नागवार गुजरे। (कुरआन-14:40)

 

अल्लाह के नज़दीक दुआ से ज्यादा कोई चीज़ मुकर्रम नहीं।

(इब्ने माजा-280, मिश्कारत-194.11)

दुआ इबादत की अस्ल है।  (तिरमिजी2.173ए मिश्कात-194.10)

अल्लाह से उसका फ़ज़ल मांगा करो क्योंकि अल्लाह सवाल और हाजत तलबी को पसंद फ़रमाता है और सबसे बड़ी इबादत ये है कि इन्सान सख्ती के वक्त फ़राख़ी का इंतेज़ार करे।  (मिश्कात-195.15)

जो शख्स अल्लाह से अपनी हाजत का सवाल नहीं करता, अल्लाह का उस पे गज़ब होता है। (यानी दुआ नहीं करने वाले से ख़ुदा नाराज़ होता है।)

(मिश्कात-195.16, हाकिम-491)

दुआ मोमिन का हथियार है और दीन का सुतून और आसमान व ज़मीन का नूर है। (हाकिम)

जिस शख्स के लिए दुआ के दरवाजे खोल दिए गये, उसके वास्ते रहमत के दरवाजे खुल गये और अल्लाह से कोई दुआ इससे ज्यादा महबूब नहीं मांगी गयी कि इन्सान उससे आफियत (सेहत, सलामती, अमन, हिफाजत) का सवाल करे। (तिरमिजी, हाकिम, मिश्कात-195.17)

गुनाह या रिश्ता तोड़ने की दुआ मांगना हराम है और ऐसी दुआ अल्लाह कुबूल नहीं करता।

(मिश्कात-196.35)

कुबूलियत का यकीन कामिल रखते हुए अल्लाह से दुआ मांगो (ज़रूर कुबूल होगी)। अल्लाह लापरवाही की दुआ कुबूल नहीं करता। (मिश्कात 2.195)

दुआ से नाउम्मीद न हो क्योंकि दुआ के साथ कोई हलाक नहीं होता।

(हाकिम-494)

जो भी दुआ की जाती है वो कुबूल होती है बशर्ते कि उसमें किसी गुनाह या नफ़रत की दुआ न हो। दुआ कुबूल होने की तीन सूरतें हैं –

  1. जो मांगी जाए वही मिल जाए
  2. मांगी हुई चीज़ के बदले आख़िरत का अज्र व सवाब दे दिया जाए
  3. मांगी हुई चीज़ तो न मिले मगर कोई आफ़त या मुसीबत जो आने वाली थी टल जाए।

(मुस्नद अहमद-10709)

जो चाहता है कि मुसीबत व परेशानी के वक्त उसकी दुआ कुबूल हो तो उसे चाहिए कि आराम व फ़राख़ी के वक्त दुआ करता रहे। (तिरमिजी 2.175, मिश्कात1.195)

और दुआ निजात दिलाती उस बला से जो आ चुकी है और (उससे भी) जो बला आने वाली है। जब बला व मुसीबत आती है तो दुआ उसे दूर करती है और जो बला व मुसीबत आने वाली होती है उससे दुआ लड़ने लगती है। उस वक्त तक जब तक कि उससे निजात न मिल जाए।

(मिश्कात-195)

दुआ के लिए न कोई वक्त शर्त है न तहारत न वजू। दुआ में किसी मख्सूस अल्फ़ाज़ की कैद नहीं। दुआ के लिए हाथ उठाना भी ज़रूरी नहीं।

दुआ में ज़ाहिरी तौर पर कोई शर्त नहीं है, मगर यक़ीन व इख्लास का होना ज़रूरी है। यकीन ये रहे कि ज़मीन व आसमान के सारे ख़जाने अल्लाह के पास है, वो चाहेगा तो ही अता होगा और उसे अता होगा, जो मांगेगा।

इख्लास ये रहे कि मांगना दिल की गहराइयों से हो, उसमें शिद्दत (तड़प) हो, सख्त मोहताजी हो, कामिल बेबसी हो। कुरआन में इसे ”इजतेराब” लफ्ज़ से ताबीर किया गया है। यही यक़ीन दरअस्ल, दुआ की रूह है। ”इन्नमल- आमालो- बिन्नियात”  सब कामों का दारोमदार नियत पर है। दुआ आजिज़ी व इन्केसारी के साथ की जाए, ग़फ़लत बेपरवाई से की गई दुआ कुबूल नहीं होती।

अपने परवरदिगार से गिड़गिड़ाकर और चुपके- चुपके दुआ करो।

(कुरआन-55.7)

 

दुआ कुबूल क्यूं नहीं होती?

हज़रत इब्राहीम अदहम रज़ी. से किसी ने पूछा कि क्या वजह है कि हमारी दुआएं कुबूल नहीं होती। इस पर आपने फ़रमाया-‘तुम हज़रत मुहम्मद ﷺ को पहचानते हो लेकिन उनके बताए रास्ते पर नहीं चलते, क़ुरान को पढ़ते हो मगर उस पर अमल नहीं करते, ख़ुदा की दी हुए नेअमत खाते हो लेकिन उसका शुक्र अदा नहीं करते, शैतान को जानते हो मगर शैतानियत से नहीं बचते, मौत से आगाह हो मगर उसकी तैय्यारी नहीं करते, मुर्दे को दफन करते हो मगर इबरत हासिल नहीं करते। तुम अपने ऐबो बुराईयों को सुधारना छोड़ दिया और दूसरों के ऐब गिनने में लगे हो। असल व सहीं काम करने के बजाय ग़लत व बुरे कामों में लगे हो और पूछते हो कि दुआ क्यों कुबूल नहीं होती।’

हर किसी के लिए दुआ करते रहें,

हो सकता है आपकी दुआ से किसी का काम बन जाए।

 

Sufiyana 123

अक्लमंद इन्सान – शेख़ सादी

शेख सादी रज़ी. फ़रमाते हैं-

न गोयद अज सरे बाजीचा हर्फे।
कर्जा पन्दे नगीरद साहबे होश॥
व गर सद बाबे हिकमत पेशे नादां।
बख्बानन्द आयदश बाजीचह दरगोश॥

तर्जुमा- अक्लमन्द इन्सान खेल खेल में भी अच्छी बातें सीख लेता है जबकि बेवकूफ इन्सान बड़ी बड़ी किताबों के सौ पाठ पढ़ने के बाद भी बेवकूफी ही सीखता है।
लुकमान हकीम से किसी ने पूछा आपने अदब और तमीज किससे सीखी?, तो अपने फ़रमाया ‘बेअदबों से’, ‘वो कैसे’ पूछा गया तो जवाब मिला ‘मैंने उनकी बेवकूफी और बूरी आदतों से परहेज किया। मैं उनकी बेअदबी व बदतमीजी से दूर रहा, खुद ब खुद अदबवाला बन गया। अक्लमन्द इन्सान खेल खेल में भी अच्छी तालीम हासिल कर लेता है जबकि बेवकूफ बड़े बड़े ग्रंथ पढ़कर भी बेवकूफी ही सीखता है।

Sufiyana 123

बारिश की बूंद – शेख़ सादी

शेख़ सादी रज़ी. फ़रमाते हैं-
बारिश की बूंद, बादल से टपकने लगी। टपकते हुए सोचने लगी कि न जाने मेरा क्या हश्र होना है। मैं पथरीली ज़मीन पर गिरूंगी कि उफान मारते पानी में। कांटे पर गिरूंगी या फूल पर। कुछ देर बाद उसने नीचे समंदर के जोश व फैलाव को देखा। वो शरमिन्दा सी हो गई और खुद को बहुत अदना छोटा समझने लगी। सोचने लगी कि इतने बड़े समंदर के सामने मेरी क्या हक़ीक़त। मेरी क्या बिसात।
तभी सीप ने अपना मुंह खोल दिया कुदरत ने उस कतरे (पानी की बूंद) को सीप में महफूज कर दिया। वो बूंद खुद को मिटाकर, मोती बन गई और बादशाह के ताज में सजी।

छोड़ अपनी बुलन्दी, ईख्लास कर इख्तियार
रूतबा मस्जिद के मीनार का है कम, मेहराब से

ख़ुदा ने इन्सान को मिट्टी से बनाया और शैतान को आग से। शैतान ने अपने आग होने पर घमंड किया और हमेशा के लिए दूत्कारा हुआ मरदूद हो गया। जबकि आदम रज़ी. ने अपनी चूक को माना, ख़ुदा की बारगाह में आजिज़ी से खुद को छोटा समझकर गिरयावोज़ारी किया। इसके ईनाम में ख़ुदा ने आदम को तमाम इन्सानों का जद्दे आला यानी पितामह बना दिया।

तकब्बुर अज़ाज़ील राख्वार करद
बज़िन्दाने लअनत गिरफतार करद

Sufiyana 122

फ़ना व बक़ा – मौलाना जामी

मौलाना जामी रज़ी. फ़रमाते हैं-
ख़ुदाए बुलन्द बरतर के मासिवा (सूफ़ी, अल्लाह के अलावा जो कुछ भी है उसे मासिवा कहते हैं) जो कुछ भी है वो आनी व फ़ानी (नश्वर) है। दुनिया की हक़ीक़त एक गुमान है जिसका कोई वजूद नहीं और ज़ाहिरी सूरत इसकी महज एक वहमी (झूटी) वजूदसी है। कल इसका कोई वजूद न था, न आगे रहने वाला है। ज़ाहिर है कि कल इसका एक अन्जाम होगा। तो उम्मीदों आरजूओं का ग़ुलाम क्यों बना हुआ है। छोड़ झूठी चमक दमक रखने वाली नापाएदार चीज़ों को और उस हमेशा रहने वाले रब से जुड़ जा। वक़्झत के कांटों से उसकी बंदगी का चेहरा कभी घायल नहीं हो सकता।

हर शक्ले हसीन, तुझको लगी है जो भली,
वो ज़ेरे फलक से जल्द रूपोश हुई।
दिल उस से लगा जो जि़न्दा व पाइन्दान है,
वो ज़ात रहेगी और हमेशा से रही॥
दिल जाके सनमखानों में शरमिन्दा है,
क्या इश्के बुतां से कोई दिल जिन्दा है।
मुझको है जमाले जावेदानी की तलाश,
उस हुस्न का तालिब हूं जो पाइन्दा है॥
जो शै तुझे देती नहीं पैगामें बका,
आखिर वही लाएगी तेरे सर पे बला।
जिन चीजों से होना है जुदा, बादुल मौत,
बेहतर है कि जीते जी रहो उनसे जुदा॥

Sufiyana 122

एक वली एक रूई – मौलाना जामी

मौलाना जामी रज़ी. फ़रमाते हैं-

अल्लाह ने इन्सान को ऐसा नहीं बनाया कि उसके पहलू में दो दिल हों। जिसने तूझे जिन्दगी की नेअमत दी है उसी ने तेरे पहलू में एक दिल भी रख दिया है। ताकि उस वाहिद-अल्लाह (एक-ईश्वर) की मुहब्बत में तुझे यक वली (एक मक़सद) व यक रूई (एकाग्रता) हासिल हो। उसके अलावा किसी और से तुझे कोई वास्ता न हो और तू अपने आप को उसी की इबादत के लिए वक्फ़ कर (छोड़) दे। ये मुमकीन नहीं कि एक दिल के टुकड़े टुकड़े करके अलग अलग कामों में लगा दिया जाए-

रूख तेरा है कि़बलाए वफ़ा की जानिब।
तन परदा है क्यूं ज़हन रसा की जानिब॥
बेहतर है कि दिल को न बहुत रोग लगाए।
एक दिल है, लगा उसको ख़ुदा की जानिब॥

Sufiyana 120

तसवफ़ – तसव्‍वुफ़ क्‍या है?

 

सूफ़ी, शरीअत के ज़ाहिरी अरकान के साथ साथ बातिनी अरकान भी अदा करते हैं। इस ज़ाहिरी और बातिनी शरीअत के मेल को ही तसव्वुफ़ कहते हैं। यही पूरे तौर पर इस्लाम है, यही हुजूर ﷺ की मुकम्मल शरीअत है। क्योंकि इसमें दिखावा नहीं है, फरेब नहीं है। इसमें वो सच्चाई वो हक़ीक़त वो रूहानियत समाई हुई है जो हज़रत मुहम्मद ﷺ को रब से अता हुई, जो हर पैगम्बर अपने सीने में लिए हुए है। इसी तसव्वुफ़ को सीना ब सीना, सिलसिला ब सिलसिला, सूफ़ी अपने मुरीदों को अता करते हैं। और रब से मिलाने का काम करते हैं। यहां हम उसी तसव्वुफ़ के बारे में बुजुर्गों के क़ौल का तज़किरा कर रहे हैं।

 

ग़ौसपाक अब्दुल क़ादिर जिलानी रज़ी. फ़रमाते हैं-

तसव्वुफ़ تصوف   चार हर्फ से मिल कर बना है-

फ़
ت ص و ف
ते स्‍वाद वाव फ़े

लफ्ज़ ‘ते’ (त)
ये तौबा को ज़ाहिर करती है। इसकी दो किस्में हैं एक ज़ाहिरी और दुसरी बातिनी (छिपी हुई)। जाहिरी तौबा ये है कि इन्सान अपने तमाम जाहिरी बदन के साथ गुनाहों और बुरे अख्लाक से बंदगी व फ़रमाबरदारी की तरफ लौट आए और बुरे चाल चलन को छोड़कर अच्छाई को अपना ले।

बातिनी तौबा ये है कि इन्सान अपने छिपे हुए तमाम बूरी आदतों को छोड़कर अच्छी आदतों की तरफ आजाए और दिल को साफ कर ले। जब दिल की सारी बुराई, अच्छाई में तब्दील हो जाए तो ‘ताअ’ का मुकाम पूरा हो जाता है और ऐसे शख्स को ताएब कहते हैं।

लफ्ज़ ‘स्वाद’ स

ये सफा (पाक) को ज़ाहिर करता है। सफा की दो किस्में  हैं – कल्बी और सिर्री। सफा ए कल्बी, ये है कि इन्सान नफ्सानियत से दिल को साफ कर ले, दुनिया व दौलत के लालच से बचे और अल्लाह से दूर करनेवाली तमाम चीजों से परहेज़ करे।

इन सारी दुनियावी चीजों को दिल से दूर करना बगैर जिक्रुल्लाह के मुमकीन नहीं। शुरू में जिक्रबिलजहर किया जाए ताकि मुक़ामे हक़ीक़त तक पहुंचा जा सके जैसा कि रब ने फ़रमाया –

सच्चे ईमानदार तो बस वही लोग हैं कि जब (उनके सामने) ख़ुदा का ज़िक्र किया जाता है तो उनके दिल मचल जाते हैं। (क़ुरान 8:2)

यानि उनके दिलों में अल्लाह का खौफ पैदा हो जाए। ज़ाहिर है ये खौफ सिर्फ तभी पैदा हो सकता है जब दिल लापरवाही की नींद से जाग जाए और ज़िक्रे ख़ुदा से दिल का जंग उतार ले।

खशियत (खौफ़) के बाद अच्छाई और बुराई जो अभी तक छिपी होती है, उसकी सूरते दिल पर नक्श हो जाती है जैसा कि कहा जाता है कि आलिम नक्श बिठाता है और आरिफ चमकाता है।

सफाई सिर्री का मतलब ये है कि इन्सान मासिवा अल्लाह को देखने से परहेज़ करे और गैरूल्लाह को दिल में जगह न दे। और ये वस्फ असमा-ए-तौहीद का लिसान बातिन से मुसलसल विर्द करने से हासिल होता है। जब ये तसफिया हासिल हो जाए तो ‘साद’ का मकाम पूरा हो जाता है।

लफ्ज़ ‘वाव’ (व)

ये विलायत को जाहिर करता है और तसफिया पर मुरत्तब होती है।

बेशक अल्लाह के वलियों पर न कुछ ख़ौफ़ है न कुछ ग़म। (क़ुरान 10:62)

विलायत के नतीजे में इन्सान अख्लाके ख़ुदावन्दी के रंग में रंग जाता है। हुजूर ﷺ ने फ़रमाया – अख्लाके ख़ुदावन्दी को अपनाओ।

यानी सिफाते ख़ुदावन्दी से मुतस्सिफ हो जाओ। विलायत में इन्सान सिफाते बशरी का चोला उतार फेंकने के बाद सिफाते ख़ुदावन्दी की खिलअत पहन लेता है।

हदीसे कुदसी में है-

‘जब मैं किसी बन्दे को महबूब बना लेता हूं तो उसके कान बन जाता हूं, उसकी आंख बन जाता हूं, उसके हाथ बन जाता हूं और उसकी जबान बन जाता हूं। (इस तरह) वो मेरे कानों से सुनता है, वो मेरी आखों से देखता है, मेरी ताकत से पकड़ता है, वो मेरी जुबान से बोलता है और मेरे पांव से चलता है।’

जो इस मकाम पर फाएज़ हो जाता है वो गैर-अल्लाह से कट जाता है।

‘और आप (ऐलान) फ़रमा दीजिए, आ गया है हक़ और मिट गया है बातिल। बेशक बातिल था ही मिटने के लिए’ (क़ुरान 17:81)

यहां ‘वाव’ का मुकाम मुकम्मल हो जाता है।

लफ्ज़ ‘फ़े’ (फ़)

ये फ़नाफिल्लाह को ज़ाहिर करता है। यानि ग़ैर से अल्लाह में फ़ना हो जाना। जब बशरी सिफ़ात फ़ना हो जाती है तो ख़ुदाई सिफ़ात बाक़ी रह जाती है। और ख़ुदाई सिफ़ात न फ़ना होती है और न फ़साद का शिकार।

हर चीज हलाक होने वाली है सिवाए उसकी ज़ात के। (क़ुरान 28:88)

पस अब्दे फानी-रब-बाक़ी

(रब की रज़ा के साथ बाक़ी रह जाता है।)

बंदा-फानी-का-दिल-सरबानी

(रब की नजर के साथ बाक़ी हो जाता है।)

सारी चीजें फ़ानी है सिवाए उन आमाले सालेहा के जिनको सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए किया जाए। रब का राज़ी-ब-रज़ा होना ही मकामे बक़ा है।

उसकी बारगाह तक अच्छी बातें (बुलन्द होकर) पहुंचतीं हैं और अच्छे काम को वह खुद बुलन्द फ़रमाता है। (क़ुरान 35:10)

जब इन्सान फ़नाफ़िल्लाह के मकाम पर फ़ाएज़ हो जाता है तो उसे आलमे कुरबत में बक़ा हासिल होती है। आलमे लाहूत में, यही अंबिया व औलिया के ठहरने की जगह है। पसन्दीदा मक़ाम में उस सारी कुदरत रखने वाले बादशाह की बारगाह में (क़रीब) होंगे। (क़ुरान 54:55)

ऐ ईमानदारों ख़ुदा से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ। (क़ुरान 9:119)

जब कतरा समंदर से मिल जाता है तो कतरे का अपना वजूद नहीं रहता। किसी शायर ने क्या खूब कहा है- अल्लाह की तमाम सिफ़ात व अफ़आल कदीम में है, जो ज़वाल पज़ीर होने से महफूज़ है। मक़ामे फ़नाहियत में सूफ़ी हक के साथ हमेशा के लिए बाक़ी हो जाता है।

वही लोग जन्नती हैं कि हमेशा उसमें रहेंगे। (क़ुरान 2:82)

Sufiyana 112

नमाज़ ए इश्क़

यहां हम सूफ़ी मख्दूम यहया मुनीरी रज़ी. के उन तालीमात का ज़िक्र करेंगे, जो आपने अपने खास मुरीद क़ाज़ी शम्सुद्दीन रज़ी. को खत की शक्ल में अता की। दरअस्ल काजी साहब आपकी खि़दमत में हाजिर नहीं हो सकते थे इसलिए आपसे इस तरह से (यानी खतो किताबत के ज़रिए) तालिम की दरख्वास्त की थी।

ये भी बुजूर्गों का एक हिकमत भरा अंदाज़ ही है कि काजी साहब के साथ-साथ हम लोगों को भी तालिम मिल रही है।

शुक्र है उन सूफ़ीयों, आलिमों और जांनिसारों का जिनके जरिए ये सूफियाना बातें हम तक पहुंच रही है और दुआ है कि ताकयामत इससे लोग फैजयाब होते रहे।

ऐ मेरे दोस्त शम्सुद्दीन! रब तुम्हे हमेशा की नेकबख्ती नसीब करे। सुनो, यूं तो मुरीद का तरीका ये है कि जो भी तालीम दी जाए उस पर साफ दिल से अमल करे और नफ्सानियत से दूर रहे। और नवाफ़िल, तिलावते क़ुरान, ज़िक्र व फ़िक्र करता रहे। लेकिन याद रहे पीर की बगैर इज़ाज़त कोई नफ़ली इबादत दुरूस्त नहीं।

सारी आमाल व इबादतों में नमाज़ की बात ही कुछ और है। इसमें असरार (छिपे हुए भेद) हैं और असरारे-मामलात दर मामलात हैं। वो भी ऐसे कि बयान करना ही मुश्किल है। बुजूर्गों ने कहा है जिसने इस मज़े को चखा नहीं, उसने इसे जाना नहीं।

पांच वक्त क़ी नमाज़ें दरअस्ल शबे मेराज की यादगार हैं। हमारे आक़ा हज़रत मुहम्मद ﷺ ने काबा कौसेन से इस तोहफे को हमारे लिए लाए हैं। देखो इससे कितनी मज़ेदार बात निकलती है। हमारी औकात कुछ भी नहीं और न ही कोई रूतबा है। हमें जिस्मानी मेराज होना तो दूर, इतना दम भी नहीं कि बुराक पर बैठकर सैरे मलकूत के लिए जाएं। तो फिर क्या वजह थी कि इस उम्मत को ये दौलते अज़ीम नसीब हुई। और उस पर हुजूर ﷺ का ये फ़रमाना कि ”नमाज़ मोमीन की मेराज है”।

अब देखो तुम्हें ये मेराज किस तरह नसीब हुई। पहले तुमने तहारत की, पाक साफ कपड़े पहने। फिर धीरे धीरे मस्जिद की तरफ चले और अपने जैसे लोगों के साथ ख़ुदा की बंदगी के लिए खड़े हो गए। फिर हुक्म के मुताबिक नमाज़ अदा की। क्या इतनी आसान है मेराज?

अल्लाह ने नमाज़ में सारे अरकान डाल दिए हैं। तौहीद ऐसे कि नमाज़ अल्लाह की हम्द से शुरू होकर, हुजूर ﷺ पर दरूद पर खत्म होती है। नमाज़ में तुम हुजूर ﷺ की अदाओं की नकल करते हुए ख़ुदा की हम्दो सना करते हो। रोज़ा ऐसे कि रोज़ा में कुछ खाते पीते नहीं है और नमाज़ में भी कुछ खाया पिया नहीं जाता। बल्कि रोज़ा में सोने की चलने फिरने की इज़ाज़त है जबकि नमाज़ में नहीं है। यानि रोज़ा से बढ़कर नमाज़ में रोज़ा होता है।

ज़कात ऐसे कि जब नमाज़ में ये पढ़ा जाता है ”ऐ अल्लाह! तू मुझे बख्श दे और मेरे मां बाप को और मेरे नस्ल को और सारे ईमानवालों को बख्श दे”, तो तुम खुद भी ख़ुदा की रहमत से मालामाल होते हो और लोगों को भी उसमें से बांट रहे होते हो। हज ऐसे कि जिस तरह हज में एहराम व इहलाल है, उसी तरह नमाज़ में तहरीमा व तहलीला है। इसमें जिहाद भी है। जिहाद ऐसे कि नमाज़ की हालत में तुम अपनी नफ्स को मार कर पहुंचते हो। तुमने वजू किया गोया जिरह पहन ली, सफ़ में खड़े हुए गोया लश्कर में खड़े हुए और सब लोग इमाम यानि सेनापती की अगुवाई में जंग छेड़ दी है। अपने दुश्मन यानि नफ्स के खिलाफ़।

नतीजा ये हुआ कि जिस मोमीनीन व मुख्लिसीन ने नमाज़ अदा की, उसने जकात भी अदा की चाहे उसकी हैसियत हो न हो, उसने हज भी किया चाहे उसके लायक हो न हो, उसने रोजा भी रखा चाहे ताकत हो न हो। इससे समझ में आता है कि नमाज़ क्या चीज़ है और इसमें कितने राज़ छिपे हुए हैं।

इसलिए इसमें अदब रखना बेहद ज़रूरी है। हरग़िज़ हरग़िज़ बेबाकी या बेअदबी से इसकी जगह में कदम भी न रखें। ये जान लो कि पैगम्बरों व बड़े बड़े ख़ुदा-रसीदा बंदों की उम्र बसर हो गई इस आरजू में कि किस तरह मेराजे कमाल तक पहुंचे। कुछ किसी तरह पहुंचे तो कुछ खाली ही रहे। दिलो जान से अदा की गई सत्रह रकात में अट्ठारह हजार आलम की मिल्कियत छिपी हुई है।

जब नमाज़ और नियाज़ एक हो जाती है तो बंदा हालते तफर्रका से निकल कर नूरे नमाज़ मकामे जमा पर पहुंचता है। अब उसकी ये हालत होती है कि बदन काबा के सामने होता है, दिल बराबर अर्शे आला होता है और उसका लतिफा-ए-सिर्र, मुशाहेदा-ए-रब में डूबा हुआ होता है। साहिबे शरह ने ऐसे लोगों की कुछ इस तरह तारीफ़ की है कि ‘उनके अनवार ने पर्दों को हटा दिए है और उनके असरार ने अर्श की सैर की’। जब हुजूर ﷺ नमाज़ की हालत में होते तो आपके दिल से बहुत जोर जोर से आवाज़ आया करती थी जिसे कुछ दूरी से भी साफ सुना जा सकता था। क्यों न हो, जिस वक्त आप इस शान से अबुदियत को मजबूत करके नमाज़ का तहरिमा बांधते तो जिस्म मुबारक दिल के महल में, दिल मंजिले रूह के मकाम में, रूह पुरफतुह सिर्र की मंजिल में पहुंचती और शानो अज़मत जलाल जुलजलाल कश्फ़ होती है।

गोया हक़ीक़त की रू से बदन ए नूरानी, मक़ाम ए फतदल्ला ख्फिर वो (रब अपने हबीब के) क़रीब हुआ फिर और ज्यादा क़रीब हुआ। (क़ुरान 53:8), में और रूह पाक मकामे क़ाबा क़ौसैन में होता है। आप जो कुछ मेराज में देख सुन चुके थे, उन सब बातों का नमाज़ के वक्त फ़िर से सामना होता है। इसलिए जो कैफ़ियत मेराज के वक्त थी, वही नमाज़ के वक्त हो जाती। वही कलाम वही नमाज़ वही कैफ़ियत वही मेराज बार बार हर बार तारी होती। जब भी आपके रब की मुहब्बत का शोला भड़कता, आपका दिल रब से मिलने को तड़प उठता तो इस बेदारी के आलम में हज़रत बिलाल रज़ी. से कहते- ‘ऐ बिलाल! नमाज़ से मुझको राहत पहुंचाओ। दिल मेरा जल रहा है, जल्दी करो, अज़ान दो और नमाज़ का सामान करो, कि दिल को राहत मिले’।

जानते हो नमाज़ में आशिकों का क़िबला क्या है। आशिकों का क़िब्ला जमाले बाकमाले दोस्त के सिवा कुछ नहीं। न काबा न सख़रा न अर्श। जो इस आलमे मिजाज़ी में होता है, वो हर वक्त इबादत में, हर वक्त कैफियत में, हर वक्त नमाज़ में होता है। जब जमाले महबूब सामने हो तो बेरुकूअ व बेसुजूद नमाज़ होती है। अब देखो, मस्जिद किब्लतैन में हुजूर ﷺ, ‘बैतुल मुक़द्दस’ की जानिब रूख करके नमाज़ पढ़ रहे हैं। सहाबी भी उनके पीछे नमाज़ पढ़ रहे हैं। हुज़ूर ﷺ को रब का हुक्म हुआ और आपने नमाज़ की हालत में ही किबला बदल लिया, यानी अपना रूख़ ‘बैतुल मुक़द्दस’ से ‘खानए काबा’ की तरफ कर लिया। उनके पीछे सहाबियों में, जो सिर्फ नमाज़ अदा कर रहे थे, जिनका किबला बैतुल मुक़द्दस ही रहा, वो उसी तरह नमाज़ पढ़ते रहे। लेकिन जो आशिके रसूल थे, जिनका किबला हुज़ूर ﷺ थे, जो उन्हें देखकर नमाज़ पढ़ रहे थे, वो हुज़ूर ﷺ की तरह अपना रूख काबा की जानिब कर लिए। यहां ये नहीं दिखाना था कि आपका किबला, काबा है कि नहीं बल्कि ये दिखाना था कि आपका किबला हुज़ूर ﷺ है कि नहीं?

ख्वाजा ए आलम ﷺ ने फ़रमाया कि ‘अगर नमाज़ी ये जान ले कि किसकी बारगाह में मुनाजात कर रहा है, तो हरग़िज़ किसी और की तरफ़ ख्याल नहीं जाएगा’। इसलिए जब नमाज़ की हालत में हज़रत अली रज़ी. के पैर से तीर निकाला गया तो आपको खबर भी न हुई। क्योंकि मुशाहिदे महबूब में उस मुकाम पर थे कि अपने अवसाफ़ से फ़ानी थे।

बंदा होना, ऐब से खाली नहीं, बुराईयों से खाली नहीं। इसलिए वो क्या उसकी तलब क्या? लेकिन उस रब का करम ही ऐसा है कि जब वो नवाज़ता है तो सबको नवाज़ता है, चाहे बादशाह हो या गुलाम, अमीर हो या गरीब। अगर सब मिल कर पूरी ताकत भी लगा दें तो रात में सूरज को नहीं उगा सकते। लेकिन जब सूरज निकल आता है तो उसकी रौशनी को रोक भी नहीं सकते। वो सब पर पड़ेगी। यही ख़ुदाई खसलत सूफ़ीयों में भी पाई जाती है। वस्सलाम।

‘वो उनको दोस्त रखता है और वो लोग उसको दोस्त रखते हैं

(क़ुरान-5:54)

 

Sufiyana 116

खुदा का ज़िक्र

यहां हम सूफ़ी जलालुद्दीन ख़िज़्र रूमी रज़ी. की तालिमात से फ़ैज़ हासिल करेंगे।

आप ज़िक्र की बहुत तालीम फ़रमाते हैं इसलिए आईए सबसे पहले इसी के बारे में बात करते हैं...

शौक़ है गर, हक़ परस्ती का,

तो सुन, ऐ बेखबर!

कर परस्तिश ज़ाते मौला,

देख सूरत पीर की।

जुबां से ख़ुदा के नाम का विर्द करें

और दिल को जमाले मुर्शिद से रौशन रखें।

तुम मुझे याद करो मैं तुम्हें याद करूंगा…

क़ुरान 2:151

…अल्लाह ही के ज़िक्र से दिल को इत्मीनान मिलता है।

क़ुरान 13:28

हज़रत अबूहुरैरा रज़ी. से रिवायत है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया कि ”जो लोग अल्लाह का ज़िक्र करने बैठते हैं तो उनके चारों तरफ फरिश्ते भी आकर बैठ जाते हैं। अल्लाह की रहमतें बरसने लगती हैं। उन (ज़िक्र करनेवालों) को सुकून व चैन नसीब होता है। अल्लाह अपनी मजलीस में (फरिश्तों व पैगम्बरों की रूहों से) उनका ज़िक्र करता है।”

(मुस्लिम)

हज़रत अनस रज़ी. से रवायत है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया कि

”अल्लाह अल्लाह कहनेवाले किसी शख्स पर कयामत नहीं आएगी

यानि कयामत तब तक नहीं आएगी जब तक कि

एक भी अल्लाह अल्लाह कहनेवाला दुनिया में मौजूद है।”

(मुस्लिम:148, अहमद:12682, तिरमिजी:2207)

सूफ़ीयों के नज़दीक ज़िक्र के मायने है ख़ुदा को याद करना। अज़कार, ज़िक्र का बहुवचन है। सारे सिलसिलों में ज़िक्र पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। क्योंकि रूहानियत के आला से आला मुकाम व मरतबा हासिल करने के लिए ज़िक्र ज़रूरी है। रब की राह में सारा दारोमदार ज़िक्र पर है, इसके बग़ैर कोई उस तक नहीं पहुंच सकता।

हज़रत अब्दुल हई शाह रज़ी. फ़रमाते हैं कि ज़िक्र ज्यादा से ज्यादा होने से, रहमते मौला होती है और मुरीद, सुलूक में तरक्की करते हुए, उंचे से उंचा मरतबा हासिल करता है। ज़िक्र मकामे क़ल्ब से मकामे रूह तक पहुंच जाता है। यानि मलकूत से ज़िक्र तरक्की करते हुए जबरूत में असर करेगा और ज़ाकिर (ज़िक्र करनेवाले) के क़ल्ब में ‘अल्लाहू’ ज़िक्र इस्म ज़ात जारी होगा। इसके बाद मुरीद और तरक्की करके क़ल्बे मुदव्वर यानि उम्मुद्दिमाग़, जिसको मकामे लाहूत कहते हैं, में पहुंचेगा तो ज़िक्र ”हू” खुद ब खुद जारी होने लगेगा।

गैर हक़ की तरफ मशगुल रहना दिल की एक बीमारी है। ये तीन तरह के होती है- पहला नफसानी (इन्द्रिय), जिसमें आपका नफ्स हमेशा आपको बहकाता रहता है, दूसरा वो जो अचानक दिल में आ जाता है, तीसरा वो जिसकी वजह से दिल को सुकून नहीं रहता।

रूह की सही हालत ये है कि वो अपने रब से निसबत रखे और कोई चीज उससे दूर करने वाली न हो। अगर निसबत कायम न हो या इससे दूर करने वाली चीज मौजूद हो या दोनों हो तो ये मरज़े दिल की निशानी है।

इसका सबसे अच्छा इलाज ज़िक्र है। लेकिन ज़िक्र का मतलब सिर्फ जबानी शोरगुल नहीं है बल्कि दिलो दिमाग बदन में एक कैफ़ियत तारी होना चाहिए। इसके लिए एक सूनी व साफ़ जगह पर दोजानू बैठ जाएं और बड़े ही अक़ीदत व मुहब्बत से ख़ुदा के नाम का विर्द करें और दिल को जमाले मुर्शिद से रौशन रखें। ऐसा तब तक करें जब तक कि इस ज़िक्र की गर्मी पूरे बदन में रोएं रोएं में महसूस न होने लगे। इसी वक्त मकाशिफात व अनवार की आंख खुलती है और इन्सान इससे फैज़याब होता है।

ज़िक्र से खुद के कुछ न होने का और ख़ुदा का सबकुछ होने का एहसास होता है।

हज़रत मौलाना अब्दुल हई रज़ी. फ़रमाते हैं कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ को ज़िक्र नफ़ी व असबात कहते हैं। इसके चार तरीक़े हैं-

1.क़दिरिया जली,

2.ज़र्ब ख़फ़ी,

3.पासन्फ़ास ख़फ़ी और

4.हबस-ए-दम ख़फी।

 

नोट- ज़िक्र का पूरा तरीका लिखकर नहीं समझाया जा सकता। इसे अपने शैख़ की सरपरस्ती में ही पूरी तरह से अदा किया जा सकता है।

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