Sufiyana 228

ताजवाला मेरा सनम है

हज़रत बाबा ताजुद्दीनؓ

ताजाबाद नागपूर

खानदान

बाबा ताजुद्दीन औलियाؓ का सिलसिला नसब इमाम हसन असकरी से मिलता है। इमाम हसन असकरी की औलादें फुज़ैल मेहदी अब्दुल्लाह हिन्दुस्तान तशरीफ लाए और ज़नूबी हिन्द के साहिली इलाके मद्रास में कयाम किया। हज़रत फुज़ैल मेहदी अब्दुल्लाह के दो साहबजादे हसन मेहदी जलालुद्दीन और हसन मेहदी रुकनुद्दीन थे।
बाबा ताजुद्दीन हसन मेहदी जलालुद्दीन की औलाद में से है। बाबा साहब बुजुर्गों में जनाब सअदुद्दीन मेहदी मुगलिया दौर में फौजी अफसर होकर देहली आये। बादशाह देहली की तरफ़ से अहार नाम का एक मौजअ बतौर जागीर उन्हें दिया गया। बाद में गर्वनर नवाब मलागढ़ ने नाराज होकर हकुके जागीरदारी ज़ब्त कर ली। सिर्फ काश्तकारी की हैसियत बाकी रह गयी।
बाबा ताजुद्दीन के दादा का नाम जमालुद्दीन था। बाबा साहब के वालिद जनाब बदरुद्दीन मेहदी थे, जो सागर (मध्यप्रदेश) डिपो में सूबेदार थे। बाबा साहब की वालिदा का नाम मरियम बी था।

पैदाइश

बाबा साहब की वालिदा ने एक ख्वाब देखा कि चांद आसमान पर पूरी आबो ताब से चमक रहा है और सारी फिज़ा चान्दनी से भर गई है। अचानक चांद आसमान से गेन्द की तरह लुढ़क कर आपकी गोद में आ गिरा और कायनात इसकी रोशनी से मुनव्वर हो गयी। इस ख्वाब की ताबीर बाबा ताजुद्दीनؓ की पैदाइश की सूरत में सामने आयी। आम रवायत के मुताबिक बाबा साहब 5 रजब 1277 हि. (27 जनवरी 1861) को पैदा हुए। आप की पैदाइश पीर के दिन फज़र के वक्त मुक़ाम कामटी (नागपूर) में हुई। कलन्दर बाबा औलियाؓ(बाबा ताजुद्दीनؓ के नवासे) ने किताब तज़किरा ताजुद्दीन बाबा में लिखा है:.
बड़ी छानबीन के बाद भी नाना ताजुद्दीनؓ का साल पैदाइश मालूम नहीं हो सका। बड़े नाना (बाबा साहब के भाई) की हयात में मुझे ज़्यादा होश नहीं था और वालिद साहब को इन बातों से कोई दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन मैंने बड़े नाना की ज़ुबानी सुना है कि ताजुद्दीनؓ की उमर गदर में (यानि 1857हि. में) कुछ साल ही थी।
इन दिनों रिवायतों को सामने रखा जा रहे तो भी बाबा साहब के सन् पैदाइश में चन्द साल का फर्क पड़ा है।
आम बच्चों के तरह बाबा साहब पैदाईश के वक्त रोये नहीं बल्कि आप की आंख बन्द थी और जिस्म सख्त था। यह देख कर वहां मौजुद ख्वातीन को शक हुआ कि शायद बच्चा मुर्दा पैदा हुआ है। चुनान्चे कदीम कायदे के मुताल्लिक किसी चीज को गरम करके पेशानी और तलवों को दागा गया। बाबा साहब ने आंख खोली और रोए, फिर खामोश होकर चारो तरफ़ टक टक देखने लगे।

बचपन और जवानी

बाबा ताजुद्दीनؓ की उमर अभी एक बरस थी की उनके वालिद का इन्तकाल हो गया। और जब आप 9 साल के हुए तो वालिदा का साया भी सर से उठ गया। वालिदैन के इन्तकाल के बाद नाना नानी और मामू ने बाबा साहब को अपनी सरपरस्ती में ले लिया।
छ: साल की उमर में बाबा साहब को मकतब में दाखिल कर दिया गया था। एक दिन मकतबे में बैठे दर्स सुन रहे थे, कि उस ज़माने के एक वलीउल्लाह हजरत अबदुल्लाह शाह कादरीؓ मदरसे में आए और उस्ताद से मुख़ातिब होकर कहा. यह लड़का पढ़ा पढ़ाया है, इसे पढ़ाने की ज़रूरत नहीं है।
लड़कपन में बाबा को पढ़ने के आलावा कोई शौक न था। आप खेलकूद के बजाए तन्हाई को ज़्यादा पसन्द करते थे। पन्द्रह साल की उमर तक आप ने नाजरह कुरआन पाक, उर्दू, फारसी और अंग्रेजी की तालीम हासिल की।

फौज में

एक मरतबा नागपूर की कनहान नदी में बहुत बड़ा सैलाब आया जिसमें बाबा साहब के सरपरस्तों का सारा सामान बह गया। मजबूरी में बाबा साहब ने फौज में नौकरी कर ली और नागपूर की रेजीमेन्ट नंबर 8 (मदरासी प्लाटून) में शामिल कर लिए गये। उस वक्त आपकी उम्र 18 साल थी।
बाबा साहब के नवासे कलन्दर बाबा औलिया लिखते है. नाना (बाबा साहब) फौज में भरती होने के बाद सागर डिपो में तैनात किये गये थे। रात को गिनती से फारिग होकर आप हज़रत दाउद मक्कीؓ की मज़ार पर तशरीफ़ ले जाते। वहां सुबह तक मुराकबा व मुशाहेदा में मशरुफ़ रहते और सुबह सवेरे परेड के वक़्त डिपो में पहुंच जाते। यह दौर मुसलसल पूरे दो साल तक जारी रहा। उसके बाद भी हफ्ते में एक दो बार वहां हाजिरी ज़रूर दिया करते थे। जब तक सागर में रहे, ऐसा करते रहे।
कामटी में बाबा की नानी को जब इस बात की खबर मिली की नवासा रातों को गायब रहता है तो बहुत चिंता हुई। नानी ने खुद पीछा किया तो पाया कि बाबा साहब जि़क्र व फि़क्र में मशगूल थे। नवासे को इस तरह इबादत में डुबा हुआ देख कर नानी के दिल का बोझ उतर गया। उन्होंने बाबा साहब को बहुत दुआ दी और खामोशी से वापस लौट आयी।
बाबा साहब सुबह नानी के पास आये तो उनके हाथों में छोटे छोटे पत्थर थे। नानी ने नाश्ता पेश किया तो बाबा साहब ने पत्थर दिखाते हुये कहा . नानी मेरे लिए तो ये पत्थर ही लड्डू पेड़े हैं। यह कहकर बाबा साहब ने पत्थरों को खाना शुरू किया जैसे कोई मिठाई खाता है। नवासे की यह कैफियत देख नानी को कुछ कहने कि हिम्मत नहीं हुई।

दो नौकरिया नहीं करते

रफ़्ता रफ़्ता बाबा साहब ख़ुदा की याद में डूबने लगे। इन ही दिनों एक ऐसा वाक्या हुआ, जिसने बाबा साहब की जि़न्दगी के अगले दौर की बुनियाद डाली। बाबा साहब की ड्यूटी औज़ारों की देखरेख पर लगायी गयी थी। एक रात दो बजे बाबा साहब पहरा दे रहे थे, तो अंग्रेज कैप्टन अचानक मुआयने के लिए आ गया। मुआयने के बाद जब वापस होने लगा, कुछ दूरी पर एक मस्जिद में क्या देखता है कि जिस सिपाही को पहरा देते देख कर आया था, वो मस्जिद में नमाज़ अदा कर रहा है। उसे सख्त गुस्सा आया। वह वापिस लौटा। लेकिन क्या देखता है कि सिपाही (बाबा साहब) अपनी जगह पर मौजूद है। कैप्टन ने दोबारा मस्जिद में देखा और वही पाया।
दूसरे रोज उसने अपने बड़े अफसर के सामने बाबा साहब को तलब किया और कहा हमने तुमको रात दो दो जगह देखा है। हमको लगता है कि तुम ख़ुदा का कोई खास बन्दा है। यह सुनना था कि बाबा साहब को कैफियत तारी हो जाती है और आप उस जलाल व कैफियत के आलम में अपने मखसूस मद्रासी लहजे में फ़रमाया. लो जी हज़रत अब दो दो नौकरिया नहीं करते जी हज़रत।
यह कहकर बाबा साहब जज़्बो जलाल में फौजी अहाते से बाहर निकल आये। कामटी में रिश्तेदारों को ख़बर मिली कि बाबा साहब पर पागल पन का दौरा पड़ गया है और उन्होंने नौकरी छोड़ दी। नानी ने बेताब होकर सागर आयी और देखा की नवासे पर बेखुदी तारी है। वह बाबा साहब को कामटी ले गयी और दिमागी मरीज़ समझ कर उन का इलाज शुरू किया। लेकिन कोई मज़्र होता तो इलाज कारगर होता। चार साल तक बाबा साहब को वही सुरूर व कैफियत तारी थी। लोग आपको पागल समझकर छेड़ते और तंग करते थे, लेकिन कुछ लोग एहतराम भी करते थे।

ताज मोहीउद्दीन ताज मोईनुद्दीन

सुनने में आया है कि आपके पीरो मुर्शिद, मद्रास में आराम फ़रमां हैं। लेकिन ये भी माना जाता है कि बाबा ताजुद्दीन ने ज़ाहिरी तौर पर किसी के हाथों पर बैअत नहीं की।
आपकी जि़न्दगी में हज़रत अब्दुल्लाह शाह कादरीؓ (कामठी) और बाबा दाउद मक्की चिश्तीؓ (सागर) का बहुत असर रहा। हज़रत अब्दुल्लाह शाह कादरीؓ, वही बुजूर्ग हैं जो मदरसे में आपको पहचान लिए थे। बाद में जवानी के आलम में भी बाबा साहब आपकी खि़दमत में हाजि़र हुआ करते थे। आप अपना झूठा शरबत बाबा साहब को पिलाया करते थे। आपका मज़ार मुबारक कामठी में है।
हज़रत बाबा दाउद मक्कीؓ को हज़रत ख़्वाजा शम्सुद्दीन तुर्क पानीपतीؓ (जो हज़रत अलाउद्दीन साबिर कलियरीؓ के खलीफ़ा हैं) से खिलाफ़त थी। आप पीर के हुक्म से सागर आ गए और वहीं आपका मज़ार मुबारक है। वही मज़ार, जहां बाबा साहब दो साल तक शब्बेदारी किया करते थे।
क़लन्दर बाबा औलियाؓ फ़रमाते हैं. बाबा ताजुद्दीनؓ को हज़रत अब्दुल्लाह क़ादरी कामठीؓ से कुरबत हासिल हुई और बाबा दाउद मक्की चिश्तीؓ से उवैसिया निसबत हासिल हुई। बाबा ताजुद्दीनؓ अक्सर कहा करते. हमारा नाम ‘‘ताज मोहीउद्दीन ताज मोईनुद्दीन’’ है।

Sufiyana 128

हज़रत राबिया बसरी

हज़रत राबिया बसरी रज़ी. ख़ुदा की खास बंदी, पर्दानशीनों में मख्दूमा, ईश्क़ में डूबी हुई, इबादत गुज़ार, वो पाक़िज़ा औरत हैं जिन्हें आलमे सूफ़िया में ”दूसरी मरयम” कहा गया।

यहां छोटे बड़े का कोई फ़र्क नहीं, यहां मर्द व ज़न (औरत) का कोई फ़र्क नहीं, क्योंकि अल्लाह सूरत नहीं देखता, वो तो दिल देखता है और जब आख़िरत में हिसाब होगा तो नियत को देखकर होगा। लिहाजा जो औरत इबादत व रियाज़त में मर्दों के मुकाबिल हो तो उसे मर्दों की सफ़ में ही शुमार किया जाए क्योंकि रोज़े महशर जब मर्दों को पुकारा जाएगा तो सबसे पहले हज़रत मरयम रज़ी. आगे बढ़ेंगी।

विलादत

जिस रात हज़रत राबिया बसरी रज़ी. पैदा होने वाली थीं तो घर में इतना तेल भी न था कि नाफ की मालिश की जाए या चिराग़ जलाया जाए और इतना कपड़ा भी न था कि आपको लपेटा जा सके। आपका नाम राबिया (चौथी) रखा गया क्योंकि आप तीन बहनों के बाद पैदा हुईं थीं। आपके वालिद (अब्बा) का ये हाल था कि ख़ुदा के अलावा किसी से कुछ नहीं मांगते यहां तक कि पड़ोसियों से भी कुछ न लेते। इसी परेशानी के आलम में पैगम्बर मुहम्मद ﷺ ने ख्वाब में बशारत दी और तसल्ली देते हुए फ़रमाया कि ये लड़की बहुत मक़बूलियत हासिल करेगी और इसकी शफ़ाअत से हज़ारों लोग बख्श दिए जाएंगे। आगे हुजूर ﷺ ने फ़रमाया कि इस शहर (बसरा) के हाकिम के पास जाओ और कहो कि वो हर रोज़ 100 मरतबा और जुमा को 400 मरतबा मुझ पर दरूद भेजता है, लेकिन आज भेजना भूल गया। तो इसी की कफ्फ़ारे के तौर पर तुम्हें 400 दीनार दे दे। ये जानकर हाकिम ने इस बशारत पर बतौर शुक़राना 1000 दीनार फ़क़ीरों में तक़सीम करा दिए और हज़रत राबिया रज़ी. के वालिद को 400 दिनार दिए और ताज़ीमन ख़ुद आकर कहा किसी भी ज़रूरत पर याद किजिए। इस तरह आपकी विलादत की तमाम ज़रूरतें पूरी की गई।

आपने जब होश संभाला तो वालिद का साया सर से उठ गया और बहनें भी जुदा हो गयीं। एक जालिम ने आपको जबरन कनीज़ बना लिया और कम दाम में आपको बेच भी दिया। वहां आपसे बहुत ज्यादा काम लिया जाता। एक बार नामहरम को सामने देखकर गिर गईं, जिससे आपका हाथ टूट गया। आपने ख़ुदा की बारगाह में सर-ब-सुजूद होकर अर्ज़ किया कि या अल्लाह! बेमददगार पहले से ही थी, अब लाचार भी हो गई। इसके बावजूद तेरी रज़ा चाहती हूं। इस पर ग़ैब से आवाज़ आई ‘ऐ राबिया! ग़म न कर। कल तुझे वो मरतबा हासिल होगा जिस पर फ़रिश्ते भी रश्क करेंगे।’ ये सुन कर आप बहुत खुश हुईं।

आपका मामूल था कि दिन में रोज़ा रखतीं और रात भर इबादत करतीं। एक रात आपके मालिक की नींद खुली तो क्या देखता है कि आप इबादत में मश्गूल हैं और ख़ुदा से अर्ज़ कर रहीं है ‘या ख़ुदा, मैं हर वक्त तेरी इबादत करना चाहती हूं लेकिन तूने मुझे किसी की कनीज़ बनाया है इसलिए दिन को तेरी बारगाह में हाज़िर नहीं हो पाती।’ ये सुनकर मालिक परेशान हो गया और सोचने लगा इससे ख़िदमत लेने के बजाय मुझे इसकी ख़िदमत करनी चाहिए। अगले दिन उसने आपसे कहा ‘आप आज से आज़ाद हैं, आप चाहें तो यहीं रहें या कहीं और जाएं’। इसके बाद आप दिन रात ख़ुदा की इबादत में ही मशगूल रहने लगीं और कभी कभी हज़रत हसन बसरी रज़ी. (जो उस वक्त के बहुत बड़े सूफ़ी थे।) की महफिल में भी शिरकत करतीं।

सफरे हज

एक बार आप हज करने गईं। काबे में पहुंच कर आपने ख़ुदा से दर्याफ्त किया मैं खाक से बनी हूं और काबा पत्थर का। मैं बिला वास्ते तुझसे मिलना चाहती हूं। इस पर निदा आई ‘ऐ राबिया! क्या तू दुनिया के निज़ाम को बदलना चाहती है? क्या इस जहां में रहने वालों के खून अपने सर लेना चाहती है? क्या तूझे मालूम नहीं जब मूसा रज़ी. ने दीदार की ख्वाहिश की तो एक तजल्ली को तूर का पहाड़ बर्दाश्त नहीं कर पाया?’

काफी अर्से बाद आप जब दोबारा हज करने गयीं तो देखा कि काबा ख़ुद आपके दीदार को चला आ रहा है। आपने फ़रमाया मुझे हुस्ने काबा से ज्यादा, जमाले ख़ुदावन्दी की तमन्ना है। हज़रत इब्राहीम अदहम रज़ी. जगह जगह नमाज अदा करते हुए पूरे 14 साल में जब हज करने मक्का पहुंचे तो देखते हैं कि काबा गायब है। ख़ुदा की बारगाह में गिरयावोज़ारी करने लगे इन आंखों से क्या गुनाह हो गया है। तब निदा आई वो किसी ज़ईफ़ा के इस्तेकबाल के लिए गया है। कुछ देर बाद काबा अपनी जगह पर था और एक बुढ़िया लाठी टेकते हुए चली आ रही है। हज़रत अदहम रज़ी. ने कहा ये निज़ाम के ख़िलाफ़ काम क्यूं कर रही हो? तब हज़रत राबिया रज़ी. फ़रमाती हैं तुम नमाज़ पढ़ते पढ़ते यहां पहुंचे हो और मैं इज्ज़ इंकिसारी के साथ यहां पहुंची हूँ।

यक़ीन

दो भूखे लोग हज़रत राबिया रज़ी. से मुलाकात करने हाज़िर हुए और दौराने गुफ्तगू खाने की इच्छा जाहिर की। आपके पास दो रोटियां थीं लेकिन तभी एक भीखारी मांगता हुआ पहुंचा तो आपने दोनों रोटियां उसे दे दी। अब आप लोगों के लिए कुछ न था।

थोड़ी देर ही गुजरा था कि एक कनीज़ आपकी ख़िदमत में कुछ रोटियां लेकर हाजिर हुईं। आपने उन रोटियों को गिना तो वो 18 थीं, आपने वापस कर दीं। कनीज़ के बहुत मनाने पर भी आप नहीं मानी। कुछ देर बाद वो कनीज फिर आई और इस बार 20 रोटियां लेकर। आपने कुबूल कर लीं और उन दोनों के सामने रख दीं।

ये सब देखकर उनमें से एक ने आपसे पूछा ये सब क्या माजरा है। तो आपने बताया कि मेरे पास दो ही रोटी थी जो आपको देना चाहती थी, लेकिन तभी भिखारी आ गया। मैंने ख़ुदा से दर्याफ्त किया कि ‘या ख़ुदा! तेरा वादा है कि तू एक के बदले 10 देता है।’ फिर मैने दो रोटियां उस भिखारी को दे दी। अब रब के वादे के मुताबिक मुझे 20 रोटियां मिलनी चाहिए, तो कम क्यूं लूं? मुझे अपने रब पर और उसके वादे पर पूरा यक़ीन है।

चादरवाली

एक बार आप इबादत करते करते सो गईं, तभी एक चोर आया आपकी चादर लेकर भागने लगा। लेकिन उसे बाहर जाने का रास्ता नज़र नहीं आया। वो चादर रखकर जैसे ही पलटा, रास्ता दिखने लगा। उसने फिर चादर उठा ली, लेकिन फिर क्या। रास्ता गायब हो गया। उसने कई बार ऐसा किया और हर बार ऐसा ही हुआ। ग़ैब से आवाज़ आई- ‘तू ख़ुद पर आफ़त क्यों ला रहा है? इस चादरवाली (राबिया रज़ी.) ने ख़ुद को ख़ुदा के हवाले कर दिया है। इसके पास शैतान भी नहीं फटकता तो किसी और की क्या मजाल जो इसे नुकसान पहुंचा सके? एक दोस्त सो रहा है लेकिन दूसरा तो जाग रहा है।’

हवा पर मुसल्ला

हज़रत हसन बसरी रज़ी. दरिया में मुसल्ला बिछाकर कहा आइए यहां नमाज अदा कीजिए। आपने कहा- क्या ये लोगों के दिखाने के लिए है। अगर नहीं तो फिर इसकी क्या ज़रूरत है। आपने हवा पर इतने उपर मुसल्ला बिछाया कि किसी को न दिख सके और फ़रमाया आईए यहां इबादत करते हैं। फिर आपने फ़रमाया पानी में इबादत एक मछली भी कर सकती है और हवा में एक मक्खी भी नमाज़ पढ़ सकती है। इसका हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं।

एक मजलिस में आपने फ़रमाया कि जो हज़रत मुहम्मद ﷺ को सच्चे दिल से मानता है उसे उनके मोजज़ात में से कुछ हिस्सा ज़रूर मिलता है। ये अलग बात है कि नबीयों के मोजज़ा को वलियों के लिए करामत कहते हैं।

निकाह

आपसे पूछा गया कि क्या आपको निकाह की ख्वाहिश नहीं होती। तो आपने फ़रमाया कि निकाह का ताल्लूक तो जिस्म व वजूद से है, जिसका वजूद ही रब में गुम हो गया हो उसे निकाह की क्या हाजत।

मारफ़त

मारफ़त तवज्जह का नाम है और आरिफ़ की पहचान यह है कि वो ख़ुदा से पाकीज़ा दिल तलब करे। जब दिया जाए तो फौरन ख़ुदा के हवाले कर दे ताकि बुराईयों से बचा रहे।

अपने रब को खुश करने के लिए मेहनत के वक्त ऌस तरह शुक्र अदा करो जिस तरह नेअमत के वक्त करते हो। तौबा की दौलत भी रब की मर्जी से ही मिलती है वरना लोग तो अपने गुनाहों पर फ़ख्र करते हैं। अपनी बुराईयों से, गुनाहों से इस तरह तौबा की जाए फिर से तौबा करने की ज़रूरत न पड़े।

आप अक्सर मरीज़ों की तरह सूरत बनाकर इबादत में गिड़गिड़ाती रोती। किसी ने पूछा तो आपने फ़रमाया कि मेरे सीने में ‘ख़ुदा का दर्द’ छिपा है। जिसका इलाज किसी हकीम के पास नहीं और न ही तुम्हें वो दिख सकता है। इसका इलाज सिर्फ ‘रब से मिलना’ ही है।

 

ख़ुदा की बंदगी

एक रोज़ एक मजलिस में ‘ख़ुदा की बंदगी’ यानि इबादत के बारे में बातचीत हो रही थी। आप भी उसमें मौजूद थीं। एक ने कहा कि मैं इबादत इसलिए करता हूं कि जहन्नम से महफूज़ रहूं। एक ने कहा इबादत करने से मुझे जन्नत में आला मकाम हासिल होगा। तब आपने फ़रमाया कि अगर मैं जहन्नम के डर से इबादत करू तो ख़ुदा मुझे उसी जहन्नम में डाल दे और अगर जन्नत के लालच में इबादत करूं तो ख़ुदा मुझ पर जन्नत हराम कर दे। ऐसी इबादत भी कोई इबादत है। ख़ुदा की बंदगी तो हम पर ऐन फ़र्ज़ है, हमें तो हर हाल में करना है, चाहे उसका हमें सिला मिले या न मिले। अगर ख़ुदा जन्नत या दोज़ख़ नहीं बनाता तो क्या हम उसकी बंदगी नहीं करते। उसकी बंदगी बिना मतलब के करनी चाहिए।

आज़माईश

किसी ने आज़माईश के लिए पूछा कि ऐसा क्यूं कि नबूव्वत सिर्फ़ मर्दों को ही मिली फिर भी औरतों को ख़ुद पर नाज़ क्यूं। आपने जवाब में कहा- क्या किसी औरत ने कभी ख़ुदाई का दावा किया है। नहीं किया। अल्लाह की मर्ज़ी जिसे चाहे नबूव्वत दे न दे। हम कौन होते हैं उसके ख़िलाफ़ जाने वाले। हमें ख़ुद पर नहीं ख़ुदा की बंदगी पर नाज़ है।

एक शख्स आपसे दुनिया की बहुत शिकायत करने लगा तो अपने फ़रमाया लगता है तुम्हें उसी दुनिया से बहुत लगाव है। तुम जब से आए हो उसी दुनिया का ज़िक्र कर रहे हो। जिससे बहुत ज्यादा मुहब्बत होती है, इन्सान उसी का ज़िक्र करता रहता है। अगर नफ़रत है तो उसकी बात ही मत करो।

विसाल

विसाल के वक्त आपने हाजिर लोगों से कहा यहां से चले जाएं फरिश्तों के आने का वक्त हो गया है। सब बाहर चले गए। फरिश्ते आए, आपसे दरयाफ्त किया ऐ मुतमईन नफ्स! अपने मौला की जानिब लौट चल। इस तरह आपका विसाल हुआ। आपने न किसी से कभी कुछ मांगा और न ही अपने रब से ही कुछ तलब किया और अनोखी शान के साथ दुनिया से रूख्सत हुईं।

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