tauba astaghfar

तौबा और अस्तग़फ़ार

मगर जिसने तौबा कर ली और ईमान ले आया और अच्छे काम किया, तो अल्लाह ऐसे लोगों की बुराईयों को नेकियों में बदल देगा, और अल्लाह बड़ा बख्शनेवाला व बहुत मेहरबान है।

(कुरान 25:70)

मगर जिसने तौबा कर ली और ईमान ले आया और अच्छे काम किया, तो यक़ीनन वो फ़लाह व कामयाबी पाने वालों में से है।

(कुरान 28:49)

और तुम अपने रब से मग़फि़रत मांगो, फिर उसकी बारगाह में (सच्चे दिल से) तौबा करो, बेशक रब बहुत मेहरबान मुहब्बत करनेवाला है।

(कुरान 11:90)

अल्लाह ने सिर्फ़ उन्हीं लोगों की तौबा कुबूल करने का वादा किया है, जो नादानी या अन्जाने में बुराई कर बैठते हैं, फिर जल्द ही तौबा कर लेते हैं। ऐसे लोगों पर ख़ुदा अपनी रहमत के साथ रूजूअ करेगा।

(कुरान 4:17)

अरबी में तौबा का मतलब- रुजूअ के होता है। यानी बुराई से अच्छाई की तरफ़ लौटना। जिस तरह इबादत के लिए पहला क़दम तहारत है, उसी तरह राहे हक़ में पहला क़दम तौबा है। तौबा, सालेकीन की पहली मंज़िल और तालेबीन का पहला मुक़ाम है। तौबा, ईमान व इबादतों की जड़ है।

हुज़ूरﷺ  फ़रमाते हैं-

अन्निदामतुत तौबतुन यानी नदामत (पछतावा) ही तौबा है।

इसमें तीन बातें शामिल होती हैं-

1.ग़लत काम करने का अफ़सोस,

2.उस ग़लत काम से बचना,

3.ज़िन्दगी में दोबारा वो ग़लती नहीं करने का इरादा।

तौबा करने की शुरुआत, बुरे काम व बुरे लोगों का साथ से होती है। सबसे बुरा तो वो है जिसे अपने अपने बुरे होने का एहसास नहीं होता और ऐसे की संगती से फिर उस गुनाह में मुब्तेला होने का डर रहता है। अगर तौबा करने के बाद भी उन बुरों से दोस्ती रखा जाए, तो इसमें कोई शक़ नहीं कि तौबा सिर्फ दिखावा है, आज नहीं कल फिर वही गुनाह होना है।

सच्ची तौबा

हज़रत सिर्री सक्तीؓ फ़रमाते हैं- सच्ची तौबा करनेवाला, तौबा नहीं करनेवाले नाफ़रमानों या गुनाहगारों से कोई ताल्लुक नहीं रखता (और न ही उनकी इज़्ज़त करता है)।

सच्ची तौबा यानी दोबारा ग़लती न करने का पक्का इरादा। जिसके दिल में गुनाह की मिठास बाक़ी है, उसकी तौबा कुबूल नहीं होती।

गुनाह की वजह

तौबा नहीं करने की अक्सर ये वजह होती है कि गुनाहगार, गुनाह को छोटा समझता है। ये समझता है कि सब तो करते हैं, मैं कर लिया तो क्या ग़लत किया। हुज़ूरﷺ  फ़रमाते हैं- मोमीन अपने (छोटे से) गुनाह को ऐसा समझता है, मानो पहाड़ टूट पड़ा हो और मुनाफि़क अपने (बड़े) गुनाह को एक मक्खी की तरह (मामूली) समझता है।

ये कितनी अजीब बात है कि जिसके लिए गुनाह बड़ी चीज़ है, वो तौबा करके उससे बच जाता है और जो उसे मामूली समझता है, वो इसमें फंसता ही चला जाता है। हज़रत बिलाल बिन सअदؓ फ़रमाते हैं- गुनाह के छोटेपन को न देख, बल्कि ये देख कि तूने किसकी नाफ़रमानी की है।

तौबा की तकमील, अपने लोगों को खुश करने पर होती है। यानी आपके वो सबसे करीब लोग, जिनको आपके ग़लत काम करने से सबसे ज़्यादा तकलीफ़ हुई हो। अगर वो आपसे खुश हों जाएं, तो ये मान लें कि आपकी तौबा मुकम्मल हो गई। क्या खूब हो कि आप पर जिनके हुकूक़ हैं, वो आपकी आजिज़ी व इन्केसारी को देखते हुए, आपसे राज़ी हो जाएं और आपको माफ़ कर दें।

गुनाह को भूल जाना

अपनी ग़लतियों को हमेशा याद करना भी ग़लत है। सच्ची तौबा करके, गुनाह या ग़लती को भूल जाएं, सिर्फ इतना याद रखें कि दोबारा न होने पाए। बार बार अपनी ग़लतियों या गुनाहों को याद नहीं करना चाहिए और न ही ऐसे लोगों के पास जाना चाहिए जो याद दिलाएं। ख़ुद को इन बेड़ियों से आज़ाद कर लें।

हज़रत मुहम्मदﷺ  फ़रमाते हैं- सच्ची तौबा करनेवाला ऐसा है, जैसे उसने कभी गुनाह किया ही न हो।

(इब्ने माजा:30)

तौबा की बरकत

तौबा में बड़ी बरकत भी होती है। जैसे अगर एक गुनाह से तौबा कर ली जाए तो दूसरा गुनाह उसकी बरकत से ख़ुद ब ख़ुद छुट जाता है।

सूफ़ी की तौबा

तौबा के लिए ये ज़रूरी नहीं कि आप गुनाहगार ही हों। तौबा मोमीन की सिफ़त है। तौबा सिर्फ़ गुनाहों या ग़लतियों से ही नहीं की जाती है, बल्कि किसी अच्छे काम से, उससे भी अच्छे काम के लिए भी तौबा की जाती है। जैसे जैसे हमारा इल्म व अमल बेहतर होता जाता है, वैसे वैसे सोच व अंदाज़ भी बेहतर होता जाता है।

सूफ़ीयों का यही तरीक़ा है- ‘बेहतर’ के लिए ‘कमतर’ से तौबा करें और ‘ज़्यादा बेहतर’ के लिए ‘कुछ बेहतर’ से तौबा करें। इस तरह बेहतर से बेहतर मुक़ाम हासिल करते जाएं। हुज़ूरﷺ  शबो रोज़ अस्तग़फ़ार किया करते थे। जबकि वो मासूम हैं, उनसे कभी कोई गुनाह हुआ ही नहीं।

हज़रत जुन्नून मिस्रीؓ फ़रमाते हैं- अवाम की तौबा गुनाह से होती है और खास की तौबा ग़फ़लत से। ग़फ़लत वो नींद है, जो हमें मालूम ही नहीं होता कि हम नींद में हैं। हम समझते ज़रूर हैं कि हम जाग रहे हैं, लेकिन दरअस्ल हम सो रहे होते हैं। इस नींद से बेदार होने के लिए मुर्शिदे बरहक़ की ज़रूरत होती है, सिर्फ वही इस नींद से उठा सकता है और रब के नूर से दिल को रौशन कर सकता है।

मारफ़ते इलाही के लिए सच्ची तौबा बगैर मुर्शिद की तलक़ीन के मुमकिन नहीं हो सकती। आम तौबा वो है कि घांस काट दी, लेकिन जड़ बच गयी। जबकि तलक़ीने मुर्शिद की तौबा, ऐसी होती है मानो जड़ सहित उखाड़ फेंकी हो।

तौबा कई तरह की होती है। कोई अपने गुनाहों से तौबा करता है, कोई अपनी नादानियों से, कोई ग़फलत से। तो कोई अपनी अच्छाईयों को देखने से तौबा करता है, ताकि ख़ुद में अच्छा होने की बुराई पैदा न हो जाए। हज़रत नूरीؓ फ़रमाते हैं- तौबा ये है कि तू हक़ के सिवा हर शै से तौबा कर ले।

हज़रत अलीؓ फ़रमाते हैं- जो अंधा हुआ वो ज़िक्र भूल गया, उसने बदगुमानी की शुरूआत की और बगैर तौबा व आजिज़ी के मग़फि़रत तलब करने लगा। तौबा उस वक़्त सच्ची हो सकती है कि गुनाह का इक़रार करे, जुल्म का एतराफ़ करे, नफ़्सानियत से नफ़रत करे और बुराईयों से दूर रहे।

अल्लाह किसी कौम की हालत तब तक नहीं बदलता, जब तक कि वो लोग ख़ुद बदलना नहीं चाहते।

(कुरान 13:11)

हुज़ूरﷺ  फ़रमाते हैं- जब बुरा अमल कर बैठो, तो इसके बाद एक अच्छा अमल करो। अगर गुनाह छिप कर किए हो तो नेकी भी छिपकर करो और अगर गुनाह ऐलानिया सबके सामने किए हो तो नेकी भी सबके सामने करो। और फ़रमाते हैं- बुराई को अच्छाई मिटा देती है।

सच्चे दिल से तौबा करनेवालों की बड़ी इज़्ज़त बयान की गयी है। हज़रत मुहम्मदﷺ  फ़रमाते हैं- सच्ची तौबा करनेवालों से मेल जोल रखा करो, क्योंकि उनके दिल सबसे ज़्यादा नर्म होते हैं।

और नेक व अच्छे आमाल का क्या फ़ायदा होता है, कुरान की इस आयत से पता चलता है-

और जो लोग ईमान लाए और नेक व अच्छे काम करते रहे, तो हम उन्हें यक़ीनन सालेहीन (नेक बंदों) में दाखिल करेंगे।

(कुरान 9:29)
Sufiyana 124

दुआ (Prayer)

और तुम्हारा परवरदिगार इरशाद फ़रमाता है कि तुम मुझसे दुआएं मांगो,

मैं तुम्हारी (दुआ ज़रूर) क़ुबूल करूंगा। (कुरआन-60:40)

 

ख़ुदा तक न तो (कुरबानी के) गोश्त ही पहुंचेंगे और न ही खून,

(हां) मगर उस तक तुम्हारी (नेकी व) परहेज़गारी (ज़रूर) पहुंचेगी।

(कुरआन -37:22)

 

पस तुम अल्लाह को ईख्लास के साथ पुकारो

अगरचे काफिरों को नागवार गुजरे। (कुरआन-14:40)

 

अल्लाह के नज़दीक दुआ से ज्यादा कोई चीज़ मुकर्रम नहीं।

(इब्ने माजा-280, मिश्कारत-194.11)

दुआ इबादत की अस्ल है।  (तिरमिजी2.173ए मिश्कात-194.10)

अल्लाह से उसका फ़ज़ल मांगा करो क्योंकि अल्लाह सवाल और हाजत तलबी को पसंद फ़रमाता है और सबसे बड़ी इबादत ये है कि इन्सान सख्ती के वक्त फ़राख़ी का इंतेज़ार करे।  (मिश्कात-195.15)

जो शख्स अल्लाह से अपनी हाजत का सवाल नहीं करता, अल्लाह का उस पे गज़ब होता है। (यानी दुआ नहीं करने वाले से ख़ुदा नाराज़ होता है।)

(मिश्कात-195.16, हाकिम-491)

दुआ मोमिन का हथियार है और दीन का सुतून और आसमान व ज़मीन का नूर है। (हाकिम)

जिस शख्स के लिए दुआ के दरवाजे खोल दिए गये, उसके वास्ते रहमत के दरवाजे खुल गये और अल्लाह से कोई दुआ इससे ज्यादा महबूब नहीं मांगी गयी कि इन्सान उससे आफियत (सेहत, सलामती, अमन, हिफाजत) का सवाल करे। (तिरमिजी, हाकिम, मिश्कात-195.17)

गुनाह या रिश्ता तोड़ने की दुआ मांगना हराम है और ऐसी दुआ अल्लाह कुबूल नहीं करता।

(मिश्कात-196.35)

कुबूलियत का यकीन कामिल रखते हुए अल्लाह से दुआ मांगो (ज़रूर कुबूल होगी)। अल्लाह लापरवाही की दुआ कुबूल नहीं करता। (मिश्कात 2.195)

दुआ से नाउम्मीद न हो क्योंकि दुआ के साथ कोई हलाक नहीं होता।

(हाकिम-494)

जो भी दुआ की जाती है वो कुबूल होती है बशर्ते कि उसमें किसी गुनाह या नफ़रत की दुआ न हो। दुआ कुबूल होने की तीन सूरतें हैं –

  1. जो मांगी जाए वही मिल जाए
  2. मांगी हुई चीज़ के बदले आख़िरत का अज्र व सवाब दे दिया जाए
  3. मांगी हुई चीज़ तो न मिले मगर कोई आफ़त या मुसीबत जो आने वाली थी टल जाए।

(मुस्नद अहमद-10709)

जो चाहता है कि मुसीबत व परेशानी के वक्त उसकी दुआ कुबूल हो तो उसे चाहिए कि आराम व फ़राख़ी के वक्त दुआ करता रहे। (तिरमिजी 2.175, मिश्कात1.195)

और दुआ निजात दिलाती उस बला से जो आ चुकी है और (उससे भी) जो बला आने वाली है। जब बला व मुसीबत आती है तो दुआ उसे दूर करती है और जो बला व मुसीबत आने वाली होती है उससे दुआ लड़ने लगती है। उस वक्त तक जब तक कि उससे निजात न मिल जाए।

(मिश्कात-195)

दुआ के लिए न कोई वक्त शर्त है न तहारत न वजू। दुआ में किसी मख्सूस अल्फ़ाज़ की कैद नहीं। दुआ के लिए हाथ उठाना भी ज़रूरी नहीं।

दुआ में ज़ाहिरी तौर पर कोई शर्त नहीं है, मगर यक़ीन व इख्लास का होना ज़रूरी है। यकीन ये रहे कि ज़मीन व आसमान के सारे ख़जाने अल्लाह के पास है, वो चाहेगा तो ही अता होगा और उसे अता होगा, जो मांगेगा।

इख्लास ये रहे कि मांगना दिल की गहराइयों से हो, उसमें शिद्दत (तड़प) हो, सख्त मोहताजी हो, कामिल बेबसी हो। कुरआन में इसे ”इजतेराब” लफ्ज़ से ताबीर किया गया है। यही यक़ीन दरअस्ल, दुआ की रूह है। ”इन्नमल- आमालो- बिन्नियात”  सब कामों का दारोमदार नियत पर है। दुआ आजिज़ी व इन्केसारी के साथ की जाए, ग़फ़लत बेपरवाई से की गई दुआ कुबूल नहीं होती।

अपने परवरदिगार से गिड़गिड़ाकर और चुपके- चुपके दुआ करो।

(कुरआन-55.7)

 

दुआ कुबूल क्यूं नहीं होती?

हज़रत इब्राहीम अदहम रज़ी. से किसी ने पूछा कि क्या वजह है कि हमारी दुआएं कुबूल नहीं होती। इस पर आपने फ़रमाया-‘तुम हज़रत मुहम्मद ﷺ को पहचानते हो लेकिन उनके बताए रास्ते पर नहीं चलते, क़ुरान को पढ़ते हो मगर उस पर अमल नहीं करते, ख़ुदा की दी हुए नेअमत खाते हो लेकिन उसका शुक्र अदा नहीं करते, शैतान को जानते हो मगर शैतानियत से नहीं बचते, मौत से आगाह हो मगर उसकी तैय्यारी नहीं करते, मुर्दे को दफन करते हो मगर इबरत हासिल नहीं करते। तुम अपने ऐबो बुराईयों को सुधारना छोड़ दिया और दूसरों के ऐब गिनने में लगे हो। असल व सहीं काम करने के बजाय ग़लत व बुरे कामों में लगे हो और पूछते हो कि दुआ क्यों कुबूल नहीं होती।’

हर किसी के लिए दुआ करते रहें,

हो सकता है आपकी दुआ से किसी का काम बन जाए।

 

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