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इश्क़ (दर्से मसनवी)

मसनवी मौलाना रूमी- सूफ़ीयाना हिकायात, अख़्लाकी तालीमात और आरिफ़ाना मकाशिफ़ात का वो नमूना है, जिसकी मिसाल नहीं मिलती। ख़ुद मौलाना रूमीؓ कहते हैं कि इसमें कुरान के राज़ छिपे हैं। जिस शख़्स की जान में मसनवी का नूर होगा, बाक़ी हिस्सा उसके दिल में ख़ुद ब ख़ुद उतर जाएगा। फि़क़्ह शरीअ़त मुकद्दसा के लिए, जिस तरह इमाम अबूहनीफ़ाؓ व इमाम शाफ़ईؓ पैदा किए गए हैं, उसी तरह फि़क़्हे तरीक़े इश्क़ के लिए हक़ तआला ने मौलाना रूमीؓ को पैदा फ़रमाया।
 मौलवी हरिग़ज़ नशुद मौलाए रूम
 ता ग़ुलामी शम्स तबरेज़ी नशुद
 (मौलाना रूमी, मौलाना नहीं बन पाता अगर हज़रत शम्स तबरेज़ؓ का ग़ुलाम नहीं होता।)
 - मौलाना जलालुद्दीन रूमीؓ

बाकस नगिरम उल्फ़ते, अज़ ख़्ल्क़ दारम वहशते।

मस्ताना रक़्सम दम बदम, अज़ दस्त इश्क़ अज़ दस्त इश्क़।

-ग़ौसपाक मोहीयुद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानीؓ

(मैं किसी से वाकि़फ़ नहीं हूं, दुनियादारी से मुझे डर है। मैं तो हरदम इश्क़ में मस्ताना हो कर रक़्स कर रहा हूं, ये भी इश्क़ ही की सौग़ात है, ये सब इश्क़ ने किया है।)

जब इश्क़ में अपनी हस्ती का, एहसास मिटाया जाता है।
फिर जिसकी तमन्ना होती है, हर शै में वो पाया जाता है।

ऐ राहे मुहब्बत के रहरौ, अफ़सोस न कर नाकामी का।
मंज़िल तो मिल ही जाती है, जब ख़ुद को मिटाया जाता है।

हम लाख छिपाएं ग़म अपना, लेकिन ये कहां तक मुमकिन है।
सूरत में नुमायां होता है, जो ग़म भी छिपाया जाता है।

जब नक़्शे दूई मिट जाती है, वो सामने ख़ुद आ जाते हैं।
मेराजे मुहब्बत होती है, दीदार कराया जाता है।

वो जिस पे करम फ़रमाते हैं, वो जिस पे इनायत करते हैं।
दुनिया ए मुहब्बत का उसको, दस्तूर बनाया जाता है।

उस बाद ए ग़म के सागर की, मुझ को भी तमन्ना है साक़ी।
जो बाद ए ग़म दीवानों की, तक़दीर बनाया जाता है।

इतना ही समझ में आया है, दस्तूर ए मुहब्बत, ऐ ‘सादिक़’।
राज़ी ब रज़ा हो जाने से, महबूब को पाया जाता है।

-हज़रत यासीन सादिक़ देहलवीؓ

 

इश्क़ एक आग है और आशिक़ की हर सांस एक शोला है। और ये शोला महबूब के अलावा हर शय को जला देता है।

आतिशस्त ईं बांगे नाए व नेस्त बाद।
हर के ईं आतिश नदारद नेस्त बाद।

इश्क़ आं शोला अस्त के चॅूं बर फ़रोख़्त।
हर चे जुज़ माशूक़ बाक़ी जुमला सोख़्त।

आदमी की क्या हक़ीक़त है, इश्क़ ने समन्दरों को उबालकर रख दिया है, पहाड़ों को रेत कर दिया है, आसमानों के टुकड़े टुकड़े कर दिया है, ज़मीनों को लरज़ा दिया है। ये ऐसा सौदा है, जिसके बाद कोई सौदा नहीं रहता। न जिस्मानी न नफ्सानी, सबको जलाकर भस्म कर दिया है।

गिरया व ज़ारी, इस मर्ज़ की ख़ास पहचान है। आखें नहीं इस बीमारी में दिल रोता है।

आशिक़ी पैदास्त अज़ ज़ारीए दिल।
नेस्त बीमारी चू बीमारिए दिल।

आम बीमारियों के उलट इसकी खासियत असरारे इलाही है। और ये वो चीज़ है, जो इश्क़ की बेहोशी में ही महसूस हो सकता है। इसे समझना होशवालों के बस की बात नहीं।

महरुम ईं होश जुज़ बेहोश नेस्त।
मज़र्बान रा मश्तरी जुज़ गोश नेस्त।

इश्क़ शरह व बयान की चीज़ नहीं हैं। जो कुछ कहा जाए, हक़ीक़त उससे कहीं उंचाई पर होती है। इश्क़ की बेजुबानी हर जुबान पर भारी है। ये अपनी गहराईयों व फैलाव की वजह से कहने सुनने के पैमानों में समा नहीं सकता।

दर नगुन्जद इश्क़ दर गुफ़्तो शनीद।
इश्क़ दरया हस्त क़अरश नापदीद।

आशिक़ की ज़िन्दगी ये है कि दिन रात ग़म-ए-इश्क़ में खिलता जाता है। दिन रात ख़त्म हो जातें हैं, लेकिन इश्क़ की आग खत्म नहीं होती। आशिक़ की दवा सिर्फ इश्क़ है, उसके लिए इश्क़ ही क़ीमती है, ख़ुद की हस्ती कुछ नहीं।

इश्क़ नां बे नां गि़ज़ाए आशिक़स्त।
बन्द हस्ती नेस्त हर को सादिक़स्त।

उन्हें अपनी हस्ती से कोई सरोकार नहीं। इश्क़ की ज़ाहिरी कोई हस्ती नहीं, लेकिन यहां सिर्फ उसी की हस्ती है। इश्क़ का पहला मुतालबा सिर का नज़राना है। हज़रत इस्माईलؓ की तरह सिर पेश है, हंसी खुशी कुरबान होने को। महबूब के हाथों ‘मैं’ का क़त्ल हो जाए तो इससे बड़ी खुशी की बात क्या होगी।

हमचू इस्माईल पेशश सर नबा।
शादो खन्दां पेश तेग़श जां बदा।
आशिकां जामे फरह अंगा कुशन्द।
के बुदस्त खवैश खूबां शान कुशन्द।

इश्क़ का एक दरजा ये है कि ख़ुद के अक्स में महबूब नज़र आए। फिर उस दरजे से गुज़र जाएं तो फिर इश्क़ ही इश्क़ बाकी रह जाता है। मानो पूरी कायनात इश्क़ में समा गयी हो। इसके बाद सिर्फ महबूब ही रह जाता है। उसके अलावा हर शय फ़ना हो जाती है। हक़ के सिवा हर माबूद हर मौजूद मिट जाता है।

तेग़ ला दर क़त्ल ग़ैर हक़ बरान्द।
दर निगर, ज़ां पस के बाद ला चे मान्द।।
मान्द, इल्लल्लाह बाक़ी जुम्ला सोख़्त।
शाद बाश ऐ इश्क़, शिरकत शोज़ रफ़्त।।

आशिक़ की सूरत तो एक परदा है, दरअस्ल वो सरापा महबूब हो चुका है। आशिक़ की ज़ात, महबूब की ज़ात में फ़ना हो चुकी है। आशिक़ की जुबान से महबूब बोल रहा है।

जुम्ला माशूक़स्त व आशिक़ पर्दा।
ज़िन्दा माशूक़स्त व आशिक़ मुर्दा।।
चूं नबा शुद इश्क़ रा पर वाए ऊ।
ऊ चू मरग़े मांद बे पर, वाए ऊ।।

Masnavi Maulana Rome

तलब (मसनवी मौलाना रूमी)

 

मसनवी मौलाना रूमी- सूफ़ीयाना हिकायात, अख्लाकी तालिमात और आरिफ़ाना मकाशिफ़ात का वो नमूना है, जिसकी मिसाल नहीं मिलती।

ख़ुद मौलाना रूमी रज़ी. कहते हैं कि इसमें क़ुरान के राज़ छिपे हैं। जिस शख्स की जान में मसनवी का नूर होगा, बाक़ी हिस्सा उसके दिल में ख़ुद ब ख़ुद उतर जाएगा।

मौलवी हरग़िज़ नशुद मौलाए रोम

ता ग़ुलामी ए शम्स तबरेज़ी नशुद

(मौलाना रूमी, मौलाना नहीं बन पाता, अगर हज़रत शम्स तबरेज़ रज़ी. का ग़ुलाम नहीं होता।)

- मौलाना जलालुद्दीन रूमी रज़ी.

 

तलब, रब की राह की पहली ज़रूरत है। ढुंढने और खटखटाने के बगैर हक़ का दरवाजा न मिलता है न खुलता है। और इस दरवाजे की कुन्जी हिम्मत है।

चूं दर मअनी ज़नी बाज़त कुनन्द

पर्र फिकरत ज़न के शहबाज़त कुनन्द

बुराई या खुबी हो या फिर बेवकूफी हो, किसी पर यहां रोक नहीं। अगर एक मक़सद हो, उसके लिए दिल की लगन हो और हिम्मत हो तो बस फिर कामयाबी ही कामयाबी है।

मगर अन्दर खूब व ज़श्ते खवैश

बगर अन्दर इश्क व बर मतलूब खवैश

मगर आं के तो हक़ीरी या ज़ईफ़

बगर अंदर रहमत ख़ुदाए शरीफ़

इस सफर के लिए किसी साज़ो सामान की ज़रूरत नहीं। बिना किसी काबिलियत वाला गरीब अदना भी इस राह में उड़ने के काबिल है। यानि बेबस भी उड़ान भर सकता है। पानी पर पहुंचने के लिए लबों की खुश्की ख़ुद गवाह है कि ज़रूर मिलेगा। तेरी प्यास ही तेरी रहनुमा है। प्यास से होंठों का सुख जाना दरअस्ल ख़ुद पानी की तरफ से इशारा है कि ये परेशानी, पानी तक पहुंचा कर रहेगी।

जुस्तजू और जद्दो जहद मत छोड़ो क्योंकि पानी के बग़ैर प्यास का बुझना मुमकीन नहीं। और इतमिनान रखो कि पानी तक पहुंचोगे ही, क्योंकि तुम ही नहीं ढुंढ रहे हो उसे, पानी को भी तुम्हारी प्यास है।

खुश्की लब हस्त पैग़ामे ज़ आब

के बमाअत आरद यक़ीन इं इज़तेराब

तिश्नगां गर आब जवेन्दा ज़ जहां

आब हम जवेद बआलम तिश्नगां

जुस्तजू हर क़िस्म की रूकावटों को दूर कर देती है। यही आपकी लावलश्कर है और यही आपके जीत की ज़मानत भी है। ये इत्तेफ़ाक़ और क़िस्मत की बात है कि कभी कभी बेतलब भी खज़ाना मिल जाता है लेकिन इस वजह से जुस्तजू छोड़ना बेवकूफी है।

ज़ौक़े तलब पैदा करने के लिए तालिबों से दोस्ती रखना दवा का काम करती है। तलब सोच समझकर हो या किसी की नकल कर के हो, कभी बेकार नहीं जाती। ये भी सच है कि नकल करने वालों के लिए खतरा ज्यादा है अंदरूनी भी और बाहरी भी। लेकिन हक़ की रौशनी उसे सहारा देती है और शको शुब्ह के बादल छट जाते हैं।

जुस्तजू, किसी ग़रज से हो या बेग़रज हो, हक़ की कशिश ख़ुद ब ख़ुद खिंच लेती है। तलब की वजह कुछ भी हो उसकी अहमियत नहीं, सिर्फ सच्ची तलब ही ज़रूरी है। जो गिरफतार करने वाला है वही तलब पैदा करता है।

गर मोहिब्ब हक़ बूद लेग़ैरा, के नयाल दायमन मन खैरा।

नूरे हक़ बर नूरे हुस्न राकिब शूद, वआं गहे जां सूए हक़ राग़िब शूद।

लयक पैदा नेस्त आं राकिब बरो, जुज़ बआसार व बेगुफ्तार नको।

ताक़त की अहमियत नहीं है। मक़सद कितना ही बड़ा क्यूं न हो और तुम कितने ही छोटे क्यों न हो, जुस्तजू होनी चाहिए। तेज़ चलें या धीरे चलें, दोनों ही मंज़िल पर पहुंचते हैं, कोई जल्दी तो कोई देर से। तुम्हारा काम तो ये है कि अपनी तमाम ताक़तों को लगा दो और अपनी सोच को एक जगह केन्द्रित कर दो। इस संजीदा जद्दो जहद और सच्ची तलब के लिए पहली शर्त सच्ची लगन और दिली तड़प है। और इसके लिए अपनी ख्वाहिशात को रब के हवाले कर देना ज़रूरी है। हक़ के ताबेअ हो जाने की पहचान ये है कि आमाल व अक़वाल (कथनी करनी) में नेकी ज़ाहिर होने लगती है।

और ये तो सोचो ही मत कि उस बारगाह में कैसे हमें जगह मिल सकती है, हम उसके लायक़ नहीं हैं क्योंकि वो बारगाह बड़े रहीम व करीम का है। इतना लिहाज़ रखो कि उस वादी में हर तालिब (तलब करने वाला) का एक मक़ाम है और जहां से इजाज़त व दस्तूर के बग़ैर आगे जाना मुमकिन नहीं। तुम तो तलब और जुस्तजू से काम रखो, यही तुम्हे मंज़िले मक्सूद तक पहुंचाएगी।

दर तलब ज़न दाएमा तू हर दो दस्त

के तलब दर राह नेको रहबरस्त

 

ख़ुद तो मिट लूं, उनके पाने की नहीं मुश्किल मुझे।

मिल ही जाएगा मुझी में, वो संगे दरे महफिल मुझे।

इश्क की गर्मी से पैदा, दिल में होगी जब खलिश,

खैंच लेगी अपनी जानिब, देखना मंज़िल मुझे।

(ख़िज्र रूमी रहमतुल्‍लाह अलैह)

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