Sufiyana 227

ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ का नसब नामा

पांच चिश्त

हेरात के पास एक कस्बे का नाम चिश्त है। हज़रत अबू इसहाक़ शामी चिश्तीؓ की रूहानी मौजूदगी से ये कस्बा रूहानियत का मरकज़ बन गया। आप पहले बुजूर्ग हैं जिनके नाम के आगे चिश्ती लगा। आपके बाद इस सिलसिले आलिया के पांच जलीलुल कद्र मशायख, चिश्त ही में रहे। इन्हें पांच चिश्त कहा जाता है। ये हैं. हज़रत सैय्यद अहमद अब्दाल चिश्तीؓ, हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मोहर्रम चिश्तीؓ, हज़रत नासीरुद्दीन अबूयूसफु चिश्तीؓ, हज़रत ख़्वाजा सैय्यद मौदूद चिश्तीؓ व हज़रत सैय्यद शरीफ़ ज़न्दनीؓ। लेकिन सिलसिलए चिश्ती को हज़रत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्तीؓ के नाम से जाना जाता है।

चिश्ती निस्बत की खासियत

निस्बते चिश्तिया यानी निस्बते इशि्क़या। बिल्कुल इन्सानी फि़तरत के मुताबिक है। यही इसकी कामयाबी व उरुजि़यत की वजह है। क्योंकि क़ल्ब में ‘‘मैंने इन्सान में अपनी रूह फूंकी (कुरान 38:82)’’ और ‘‘मोमीन वो है जो शिद्दत से अल्लाह से मुहब्बत करता है (कुरान 2:165)’’ के मुताबिक़, इश्क़े इलाही कूट कूट कर भरा हुआ है। इसी वजह से चिश्ती लोग अक्सर केसरिया रंग के कपड़े पहनते हैं, जो आग का रंग है, इश्क़ की आग का। आज चिश्ती सिलसिले की बुलंदी किसी से छिपी नहीं। बल्कि दिगर सिलसिलों में ‘चिश्ती रंग’ साफ तौर पर देखा जा सकता है। और ये सब ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ की रूहानियत की वजह से है।

सिलसिल ए तरीक़त

हज़रत ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ
हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनीؓ
हज़रत सैय्यद शरीफ़ जि़न्दनीؓ
हज़रत ख़्वाजा सैय्यद मौदूद चिश्तीؓ
हज़रत नासीरुद्दीन अबूयूसफु चिश्तीؓ
हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मोहर्रम चिश्तीؓ
हज़रत सैय्यद अहमद अब्दाल चिश्तीؓ
हज़रत अबू इसहाक़ शामी चिश्तीؓ
हज़रत मुमशाद अली दीनवरी चिश्तीؓ
हज़रत अमीनुद्दीन अबू हबीरा बसरीؓ
हज़रत ख़्वाजा सैय्यद हुज़फै़ा मरअ़शीؓ
हज़रत सुल्तान इब्राहीम अदहम बल्ख़ीؓ
हज़रत जमालुद्दीन फुज़ैल बिन अयाज़ؓ
हज़रत ख़्वाजा वाहिद बिन ज़ैदؓ
हज़रत ख़्वाजा हसन बसरीؓ
हज़रत इमाम मौला अलीؓ
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ाﷺ

नस्ब नामा पिदरी (पैतृक वंशावली)

हज़रत ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ
हज़रत ग़यासुद्दीनؓ
हज़रत नजमुद्दीन ताहिरؓ
हज़रत सय्यद इब्राहीमؓ
हज़रत सय्यद इदरीसؓ
हज़रत इमाम काजि़मؓ
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ؓ
हज़रत इमाम बाक़रؓ
हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीनؓ
हज़रत इमाम हुसैनؓ
हज़रत इमाम मौला अलीؓ

नस्ब नामा मादरी (मातृक वंशावली)

हज़रत ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ
हज़रत बीबी उम्मुल विदाअؓ
हज़रत सय्यद दाउदؓ
हज़रत सय्यद अब्दुल्लाहؓ
हज़रत सय्यद ज़ाहिदؓ
हज़रत मुहम्मद मोरिसؓ
हज़रत सय्यद दाउदؓ
हज़रत सय्यद मूसाؓ
हज़रत अब्दुल्लाह मख़्फ़ीؓ
हज़रत हसन मसनीؓ
हज़रत इमाम हसनؓ
हज़रत इमाम मौला अलीؓ

Sufiyana 226

फ़रमाने पीर

यहां हम ख़्वाजा ए चिश्तिया के मल्फूज़ात से फ़ैज़ हासिल करेंगे। मल्फूज़ात, सूफ़ीयों की जि़ंदगी के उस वक़्त के हालात और तालीमात का ख़जाना होती है। जिसे कोई ऐसे मुरीद ही लिख सकते है, जो ज़्यादा से ज़्यादा पीर की सोहबत से फ़ैज़याब हुए हों। इस बार हम हज़रत ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेरीؓ के मल्फूज़ात ‘‘दलील उल आरेफि़न’’ में से कुछ हिस्सा नकल कर रहे हैं, जिसे उनके मुरीद व ख़लीफ़ा हज़रत कुतुबुद्दीन बिख़्तयार काकीؓ ने लिखा है।

बतारीख़ 5 रजब 814हिजरी को इस दरवेश कुतबुद्दीन बख्तियार को सुल्तानुस सालेकिन हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती संजरी अजमेरीؓ की क़दमबोसी का शर्फ हासिल हुआ। आपने मुझे शर्फे बैअ़त से नवाज़ा और चहारतरकीताज मेरे सर पर रखी। अल्हमदोलिल्लाह अला ज़ालेका। उस दिन वहां आपके साथ शहाबुद्दीन सोहरवर्दी, शैख दाउद करमानी, शैख बुरहानुद्दीन चिश्ती व शैख ताजुद्दीन सफाहानी एक ही जगह मौजूद थे और नमाज़ के बारे में गुफ्तगू हो रही थी।

आपने फ़रमाया. नमाज़ में सरे निगाहे इज़्ज़त से लोग नज़दीक हो सकते हैं। इस वास्ते कि नमाज़ मोमीन की मेराज़ है। तमाम मक़ामों से बढ़कर यही नमाज़ है। रब से मिलना इसी से शुरू होता है। नमाज़ एक राज़ है जो बंदा अपने परवरदिगार से बयान करता है। राज़ कहने के लिए मिलने की ज़रुरत होती है और रब के नज़दीक वही जा सकता है, जो इसके लायक़ हो।

फिर मुझ नाचीज़ (कुतबुद्दीन बख्तियार) की तरफ़ रूख करके फ़रमाने लगे. मैं जब सुल्तानुल मशायख ख्वाजा उस्मान हारूनीؓ से मुरीद हुआ तो मुसलसल आठ साल आपकी खि़दमत में रहा, एक दम भी आराम न किया, न दिन देखा न रात। जहां आप सफ़र को जाते तो आपका सामान उठाकर आपके साथ चलता। इस खि़दमत व मेहनत को देख ऐसी नेअमत से नवाज़ा कि जिसकी कोई इन्तेहा नहीं।

जिसने कुछ पाया खि़दमत से पाया। मुरीद को लाजि़म है कि पीर के फ़रमान से ज़र्रा बराबर भी न हटे। जो भी अमल (अवराद नमाज़ तस्बीह व दीगर इबादात) उससे फ़रमाया जाए पुरे होश से सुने और उसे ठीक ठीक अदा करे। क्योंकि पीर मुरीद का संवारनेवाला है। पीर जो कुछ भी फ़रमाएगा वो मुरीद के कमाल के लिए ही फ़रमाएगा।

Sufiyana 126

चार तरकी ताज

 

यहां हम ख्वाजा ए चिश्तिया के मल्फूज़ात से फ़ैज़ हासिल करेंगे। मल्फूज़ात, सूफ़ीयों की ज़िंदगी के उस वक्त क़े हालात और तालिमात का ख़जाना होता है। जिसे कोई ऐसे मुरीद ही लिख सकते है, जो ज्यादा से ज्यादा पीर की सोहबत से फ़ैज़याब हुए हो। इस बार हम हज़रत ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया रज़ी. के मल्फूज़ात ''अफ़ज़ल उल फ़वाएद'' (यानी ''राहत उल मुहिब्बिन'') में से कुछ हिस्सा नकल कर रहे हैं जिसे उनके मुरीद हज़रत अमीर खुसरो रज़ी. ने लिखा है।

बतारीख़ 24 माह ज़िलहिज्जा 713 हिजरी, इस बन्दए नाचीज़ खुसरो वल्द हुसैन को हज़रत निज़ामुद्दीन महबूबे इलाही रज़ी. की क़दमबोसी का शरफ़ हासिल हुआ। जिस रोज़ मैं उनकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ तो मेरे दिल में ये नियत थी कि पहले मैं आपकी बारगाह में बैठ जाउंगा और अगर आप मुझे ख़ुद बुलाएंगे तो ही मैं बैअत होउंगा। मैंने ऐसा ही किया, आस्ताने पर जा कर बैठ गया। थोड़ी ही देर में आपके एक खादिम बशीर मियां ने आकर सलाम किया और फ़रमाया कि हुजूर आपको याद फ़रमा रहे हैं, उन्होंने कहा कि बाहर एक तुर्क बैठा है, जाओ उसे बुला लाओ। मैं फौरन आपकी खि़दमत में हाजिर होकर सर ज़मीन पर रख दिया। आपने कहा सर उठाओ, अच्छे मौके पर आए हो, खुश आए हो। फिर निहायत इनायत व शफ़क़त से मेरे हाल पर दुआ फ़रमाई और मुझे शरफ़े बैअत अता फ़रमाई। ”खास बारानी” और चारतरकीताज इनायत फ़रमाई।

फिर पीर की खि़दमत में मुरीद होने के बारे में गुफ्तगू शुरू हुई। हज़रत निज़ामुद्दीन रज़ी. ने फ़रमाया कि जिस रोज़ मैं बाबा फ़रीद गंजशकर रज़ी. का मुरीद हुआ तो आपने फ़रमाया कि ऐ मौलाना निज़ामुद्दीन! मैं किसी और को विलायत ए हिन्दुस्तान का सज्जादा देना चाहता था लेकिन ग़ैब से आवाज़ आई कि ये नेअमत हमने निजामुद्दीन बदायूंनी के लिए रखी है, ये उसी को मिलेगी।

फिर निहायत रहमत व शफ़क़त मेरे हाल पर फ़रमाई और चारतरकीताज मेरे सर पर रखी और ये हिकायत बयान फ़रमाई – इस ताज के चार खाने होते हैं, पहला शरीअत का, दूसरा तरीक़त का, तीसरा मारेफ़त का और चौथा हक़ीक़त का। पस जो इनमें इस्तेकामत से काम ले उसके सर पर इस ताज का रखना वाजिब है।

आप ये बयान फ़रमा ही रहे थे कि मौलाना शम्सूद्दीन यहया, मौलाना बुरहानुद्दीन ग़रीब और मौलाना फ़खरूद्दीन कदमबोस हुए। हुजूर आगे फ़रमाते हुए कहते हैं कि एक टोपी एकतरकी, दूसरी टोपी दोतरकी, तीसरी टोपी तीनतरकी और चौथी टोपी चारतरकी।

फिर ताज के असल में फ़रमाते हैं कि मैंने अपने पीरो मुर्शिद से सुना है कि ख्वाजा अबुल लैस समरकन्दी रज़ी. की किताब में हज़रत हसन बसरी रज़ी. की रवायत लिखी है कि एक रोज़ पैगम्बरे ख़ुदा हज़रत मुहम्मद ﷺ बैठे थे और आसपास सहाबी बैठे थे कि तभी हज़रत जिबरईल रज़ी. चार ताज लेकर तशरीफ लाए और फ़रमाया कि ख़ुदा का हुक्म है कि ये चार ताज जन्नती हैं, इनको आप अपने सर पर रखें। बाद अजान आप जिसे चाहे इनायत फ़रमाएं और अपना खलिफा बनाएं। हजरत मुहम्मद ﷺ एकतरकीताज अपने सर पर रखे, फिर उतार कर हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ रज़ी. के सर पर रखे, इसी तरह दोतरकीताज हज़रत उमर रज़ी. के सर पर रखे, तीनतरकीताज हज़रत उस्मान ग़नी रज़ी. के सर पर रखे और चारतरकीताज हज़रत मौला अली रज़ी. के सर पर रखे और फ़रमाए कि ये आपका ताज है।

बाद अज़ान फ़रमाते हैं कि तबक़ात के मशाएख और जुनैदिया तबका ने फ़रमाया – हमें इस तरह मालूम हुआ कि चारतरकीताज की असल क्या है। पहले ख़ुदा से हुजूर ﷺ को अता हुआ और उनसे हमको मिला। बिलकुल वैसे ही जैसे ख़रक़ा, मेराज की रात अता हुआ था।

आगे हज़रत निजामुद्दीन रज़ी. फ़रमाते हैं कि एकतरकीताज, जो हज़रत अबुबक्र सिद्दीक़ रज़ी. को पहनाई गई थी, वो अब्दाल व सिद्दीक़ीन के सर पर रखा जाता है। अल्लाह के सिवा किसी का ख्याल दिल में न हो और तमाम दुनिया के कामों से दूर रहें तो फिर वो शख्स इस ताज के काबिल हैं। इस ताज का हक़ उनके बारे में ये है कि इनके बातिन मुसलसल जिक्र की वजह से नूरे मारफ़त से मुनव्वर होते हैं और इन्हें ज़ाहिरी व बातिनी मक़सूद हासिल होते हैं। अगर साहिबे ताज दुनिया का तालिब हो जाए तो वो इस ताज के लायक नहीं रहता।

दोतरकीताज जो हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ी. के सर रखी गयी थी, उसे आबिद, अवताद और कुछ मनसूरी भी पहनते हैं। इसका मकसद ये है कि जब इन्सान इसे सर पर रखे तो दुनिया को तर्क कर दे और ज़िक्र करने वाला बन जाए। सिवाए यादे इलाही के किसी और चीज़ में मशगूल न रहे। यहां तक कि अगर हलाल चीज़ उसे मिल जाए तो शाम तक न बचाए, खर्च कर दे और दुनियादारी के पास भी न भटके। ऐसे शख्स को दोतरकीताज पहनना वाजिब है वरना गुमराह न हो जाए।

तीनतरकीताज, जो हज़रत उस्मान ग़नी रज़ी. के सर रखी गई। वो ज़ाहिद, अहले तहीर, मशाएख तबक़ात और अक्सर अक्लमंद लोग भी पहनते हैं। इससे मक़सूद ये है कि अव्वल गैरूल्लाह से किनारा करे और तमाम लज्ज़तों शहवतों का लालच छोड़ दे। दूसरे, दिल को हसद (जलन), किना, बुग्ज़, फ़हश व रिया (दिखावा) जैसे बूरी आदतों से पाक करे। तीसरे सिर्फ और सिर्फ अल्लाह से रिश्ता जोड़े। जब ये हालत पर पहुंचे तो सर पर इस ताज का रखना जाएज़ है वरना जुनैदी तबक़ा में छोटा ठहरेगा।

चारतरकीताज, जो हज़रत मौला अली रज़ी. के सरे मुबारक पर रखा गया, वो सूफ़ी, सादात और मशाएख बुजूर्ग पहनते हैं। इससे मुराद दौलते सआदत है और जो अठारह हज़ार आलम में है, सबके सब इसमें रखा गया है। लेकिन इसके सर पर रख कर चार चीज़ों को दूर रखें ताकि इस चारतरकीताज को रखना दुरूस्त हो। वो चार चीज़ें हैं- अव्वल, दुनिया व दौलत को तर्क करें। दूसरा, ”तर्क उल लिसान अन नख्मर उल तज़ामा बज़िक्रुल्लाह” यानि अल्लाह की याद के सिवा और कोई बात न रहे। तीसरा ”तर्क उल बसरा मन ग़ैरूल करामा” यानि ग़ैर की तरफ़ नज़र करने से दूर रहे और ग़ैर का न रहे ताकि ग़ैर के लिए अन्धा हो जाए। जब ख्वाजा साहब इस बात पर पहुंचे तो इस क़दर रोए कि सभी हाजिरीन भी रोने लगे, आपने ये शेर इरशाद फ़रमाया-

अगर बग़ैर रख्त दीदा अम बक्स बयन्द

कश्म बरून बान्गश्त चूं सज़ाश ईं अस्त

फिर फ़रमाया चौथा ये कि ”तहारतुल क़ल्ब मिन हुब्बुल दुनिया” यानि दिल को दुनिया की मुहब्बत से पाक कर ले। पस जब दुनियावी मुहब्बत का जंग, दिल से साफ करके अल्लाह को शामिले हयात कर ले तो ग़ैर, दरमियान से उठ जाएगा और अल्लाह से यगाना हो जाएगा। इस वक्त ये चारतरकीताज सर पर रखने का उसको हक़ होगा।

फिर फ़रमाते हैं कि क्या ही अच्छा हो अगर पर्दा दरमियान से उठ जाए और सारे भेद खुल जाएं और ग़ैरियत दूर हो जाए और ये आवाज़ दी- ”बी यबसरो अवबी यबसरो अव यसमा वबी यनतक़” मुझ ही से देखता है, मुझ ही से सुनता है और मुझ ही से बोलता है।

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