Sufiyana 216

ज़िक्र अज़कार

यहां हम सूफ़ी जलालुद्दीन खि़ज़्र रूमीؓ की तालीमात से फ़ैज़ हासिल करेंगे।

आप ज़िक्र की बहुत तालीम फ़रमाते हैं। इसका पहला हिस्‍सा हम पढ़ चुके हैं, पेश है इसका दुसरा हिस्‍सा...

इक़रा कुल्बा बिस्मिल्लाह

सल्लल्लाहो वलहम्दोलिल्लाह

हसबी रब्बी जल्लल्लाह

मा फ़ी क़ल्बी ग़ैरुल्लाह

नूर मुहम्मद सल्लल्लाह

ला इलाहा इल्लल्लाह

मुहम्मदुर्रसुलल्लाह

सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम

 

दस्त ब कार, दिल ब यार।

हाथ को काम में लगाए रखो और दिल को यार में लगाए रखो।

 

 

अलीफ़ अल्लाह चन्बे दी बूटी मुर्शिद मन मेरे विच लाई हू

नफ़ी असबात दा पानी मिलया हर रगें हरजाई हू

अन्दर बूटी मशक मचाया जान फलन पराई हू

जेवे मुर्शिद कामिल बाहू जैं इहया बूटी लाई हू

सुल्तान बाहूؓ

 

हज़रत अबूदरदाؓ से मरवी है कि हज़रत मुहम्मदﷺ  ने फ़रमाया कि ‘‘अल्लाह के नज़दीक सबसे बेहतरीन अमल ज़िक्र है। ज़िक्र सबसे ज्यादा पाकीज़ा और रूहानी दरजात को बुलन्द करने वाला है। ये सोना चांदी ख़ैरात करने से और जिहाद करने से भी अफ़ज़ल अमल है।’’

(तिरमिजी:3377, इब्नेमाजा:379)

 

 

‘ऐ ईमानवालो! अल्लाह का ज़िक्र बहुत बहुत किया करो।’

(कुरान 41:33)

‘उस (अल्लाह) का ज़िक्र किया करो, जैसे (तरीक़े) उसने तुम्हें हिदायत फ़रमाई है।’

(कुरान 2:198)

 

ज़िक्र की बरकतों और अज़मतों की कोई हद नहीं है। जो जितनी यकसूई (ध्यान से) और तड़प से इसे अदा करेगा उसे उतना ही फ़ैज और फ़ायदा हासिल होगा। ज़िक्र, दिल की वो आग है जो ख़ुदा की याद के अलावा बाक़ी सब जला देती है। सिफ़ाते बशरीया का पहाड़ इसी ‘लाईलाहा इल्लल्लाह’ के ‘ला’ से तोड़ा जा सकता है और यही ‘ला’ ही सारे माबूदाने बातिल की नफ़ी करता है।

ख़्वाजा बन्दानवाज़ गेसूदराज़ؓ फ़रमाते हैं- जो भी ज़िक्र अज़कार, सूफ़ीयों की बारगाह में अदा किए जाते हैं, वो सब हज़रत मुहम्मदﷺ  से सीना ब सीना पहुंचे हैं। आपﷺ  ने सहाबा को ज़िक्र की तालीम फ़रमाई और करने का तरीक़ा व क़ाएदा बताया। बिल्कुल वही क़ायदा व तरीक़ा, खुलफाए राशिदीन से सहाबी, फिर उनसे ताबेईन, उनसे सिलसिले के बुजूर्गों से होता हुआ, सीना ब सीना हम तक पहुंचा है।

हुज़ूरﷺ  ने फ़रमाया- ऐ अलीؓ! आओ हम तुम्हें वो राह बताएं, जिससे तुम अल्लाह को देख सकोगे। फिर फ़रमाया- कहो ‘लाइलाहा इल्लल्लाह’। तो हज़रत अलीؓ ने फ़रमाया- या रसुलल्लाह! इसे तो हम हमेशा पढ़ते हैं। तो आपने फ़रमाया- जैसा मैं कहता हूं और जैसा करता हूं, वैसा करो। और इसी तरह आगे भी किया करो। और लोगों को भी बताया करो।

ख़्वाजा बन्दानवाज़ؓ ने ज़िक्र अज़कार करने के तरीक़े के बारे में, हज़रत अलीؓ, हज़रत सिद्दीक़ؓ, हज़रत बिलालؓ, हज़रत सलमानؓ जैसे सहाबियों से और बड़े बड़े मशायखों से मरवी तकरीबन 54 रिवायतें, अपने रिसाले में दर्ज किए हैं।

ज़िक्र ज़र्ब ख़फ़ी का तरीक़ा

अच्छी तरह पाकसाफ व बावजू होकर, पीर के सामने दोजानू होकर बैठें। अगर पीर साहब हाज़िर न हों तो उनका तसव्वुर कर, उन्हें शामिले हयात समझें। दोजानू इस तरह बैठें कि सीधे पैर का पंजा खड़ा हो और दूसरा लेटा हो, और हाथ जानू पर रखें। पहले दरूद शरीफ़ पढ़ें।

फिर सिर को बाएं घुटने की तरफ़ (दिल की तरफ) झुका लें और ‘ला’ कहते हुए दाहिने घुटने तक ले आएं। फिर ‘इलाहा’ कहते हुए, सिर को दाहिने कंधे से थोड़ा पीछे की तरफ़ ले जाएं। और ये ख़्याल करें कि ‘रब के सिवा दिल में जो कुछ भी है, उसे दूर फेंकता हूं।’ फिर ‘इल्लल्लाह’ कहते हुए सिर को सामने, दिल की तरफ़ ज़ोर से ज़र्ब लगाएं। और ये ख़्याल करें कि ‘सिर्फ उस एक ज़ात को अपने दिल में बसाता हूं।’ इसे ‘चार ज़रबी’ भी कहते हैं, क्योंकि इसमें चार ज़र्ब हैं। 1.बाएं घुटने पर, 2.दाएं घुटने पर, 3.दाएं कंधे पर और 4.दिल पर।

ज़िक्र पास अनफ़ास ख़फ़ी

इसके लिए सांस बाहर छोड़ते वक़्त ‘ला ईलाहा’ दिल में पढ़ते हुए ये तसव्वुर करें कि ‘रब के सिवा दिल में जो कुछ भी है, उसे दूर फेंकता हूं।’ और सांस लेते वक़्त ‘इल्लल्लाह’ ख्याल करते हुए, दिल पर ज़र्ब करें। और ये तसव्वुर करें कि ‘सिर्फ उस एक ज़ात को अपने दिल में बसाता हूं।’ इस ज़िक्र में जुबान से कुछ नहीं कहते और न ही सर या हाथ वगैरह हिलाते हैं। और न ही बहुत ज़ोर ज़ोर से सांस की आवाज़ निकालें। इस ज़िक्र को चलते, फिरते, काम करते हुए भी कर सकते हैं।

 

यहां ये याद रखें कि ज़िक्र का पूरा तरीका लिखकर नहीं समझाया जा सकता।

इसे अपने पीरो मुर्शिद से सीख कर और उनकी इजाज़त से ही, सहीं तौर पर अदा किया जा सकता है।
Sufiyana 116

खुदा का ज़िक्र

यहां हम सूफ़ी जलालुद्दीन ख़िज़्र रूमी रज़ी. की तालिमात से फ़ैज़ हासिल करेंगे।

आप ज़िक्र की बहुत तालीम फ़रमाते हैं इसलिए आईए सबसे पहले इसी के बारे में बात करते हैं...

शौक़ है गर, हक़ परस्ती का,

तो सुन, ऐ बेखबर!

कर परस्तिश ज़ाते मौला,

देख सूरत पीर की।

जुबां से ख़ुदा के नाम का विर्द करें

और दिल को जमाले मुर्शिद से रौशन रखें।

तुम मुझे याद करो मैं तुम्हें याद करूंगा…

क़ुरान 2:151

…अल्लाह ही के ज़िक्र से दिल को इत्मीनान मिलता है।

क़ुरान 13:28

हज़रत अबूहुरैरा रज़ी. से रिवायत है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया कि ”जो लोग अल्लाह का ज़िक्र करने बैठते हैं तो उनके चारों तरफ फरिश्ते भी आकर बैठ जाते हैं। अल्लाह की रहमतें बरसने लगती हैं। उन (ज़िक्र करनेवालों) को सुकून व चैन नसीब होता है। अल्लाह अपनी मजलीस में (फरिश्तों व पैगम्बरों की रूहों से) उनका ज़िक्र करता है।”

(मुस्लिम)

हज़रत अनस रज़ी. से रवायत है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया कि

”अल्लाह अल्लाह कहनेवाले किसी शख्स पर कयामत नहीं आएगी

यानि कयामत तब तक नहीं आएगी जब तक कि

एक भी अल्लाह अल्लाह कहनेवाला दुनिया में मौजूद है।”

(मुस्लिम:148, अहमद:12682, तिरमिजी:2207)

सूफ़ीयों के नज़दीक ज़िक्र के मायने है ख़ुदा को याद करना। अज़कार, ज़िक्र का बहुवचन है। सारे सिलसिलों में ज़िक्र पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। क्योंकि रूहानियत के आला से आला मुकाम व मरतबा हासिल करने के लिए ज़िक्र ज़रूरी है। रब की राह में सारा दारोमदार ज़िक्र पर है, इसके बग़ैर कोई उस तक नहीं पहुंच सकता।

हज़रत अब्दुल हई शाह रज़ी. फ़रमाते हैं कि ज़िक्र ज्यादा से ज्यादा होने से, रहमते मौला होती है और मुरीद, सुलूक में तरक्की करते हुए, उंचे से उंचा मरतबा हासिल करता है। ज़िक्र मकामे क़ल्ब से मकामे रूह तक पहुंच जाता है। यानि मलकूत से ज़िक्र तरक्की करते हुए जबरूत में असर करेगा और ज़ाकिर (ज़िक्र करनेवाले) के क़ल्ब में ‘अल्लाहू’ ज़िक्र इस्म ज़ात जारी होगा। इसके बाद मुरीद और तरक्की करके क़ल्बे मुदव्वर यानि उम्मुद्दिमाग़, जिसको मकामे लाहूत कहते हैं, में पहुंचेगा तो ज़िक्र ”हू” खुद ब खुद जारी होने लगेगा।

गैर हक़ की तरफ मशगुल रहना दिल की एक बीमारी है। ये तीन तरह के होती है- पहला नफसानी (इन्द्रिय), जिसमें आपका नफ्स हमेशा आपको बहकाता रहता है, दूसरा वो जो अचानक दिल में आ जाता है, तीसरा वो जिसकी वजह से दिल को सुकून नहीं रहता।

रूह की सही हालत ये है कि वो अपने रब से निसबत रखे और कोई चीज उससे दूर करने वाली न हो। अगर निसबत कायम न हो या इससे दूर करने वाली चीज मौजूद हो या दोनों हो तो ये मरज़े दिल की निशानी है।

इसका सबसे अच्छा इलाज ज़िक्र है। लेकिन ज़िक्र का मतलब सिर्फ जबानी शोरगुल नहीं है बल्कि दिलो दिमाग बदन में एक कैफ़ियत तारी होना चाहिए। इसके लिए एक सूनी व साफ़ जगह पर दोजानू बैठ जाएं और बड़े ही अक़ीदत व मुहब्बत से ख़ुदा के नाम का विर्द करें और दिल को जमाले मुर्शिद से रौशन रखें। ऐसा तब तक करें जब तक कि इस ज़िक्र की गर्मी पूरे बदन में रोएं रोएं में महसूस न होने लगे। इसी वक्त मकाशिफात व अनवार की आंख खुलती है और इन्सान इससे फैज़याब होता है।

ज़िक्र से खुद के कुछ न होने का और ख़ुदा का सबकुछ होने का एहसास होता है।

हज़रत मौलाना अब्दुल हई रज़ी. फ़रमाते हैं कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ को ज़िक्र नफ़ी व असबात कहते हैं। इसके चार तरीक़े हैं-

1.क़दिरिया जली,

2.ज़र्ब ख़फ़ी,

3.पासन्फ़ास ख़फ़ी और

4.हबस-ए-दम ख़फी।

 

नोट- ज़िक्र का पूरा तरीका लिखकर नहीं समझाया जा सकता। इसे अपने शैख़ की सरपरस्ती में ही पूरी तरह से अदा किया जा सकता है।

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