Namaz e Janaza ka tarika

Namaz e Janaza ka Tarika in Hindi

नमाज़े जनाज़ा का तरीका

नमाज़े जनाज़ा फ़र्ज किफ़ाया है

नमाज़े जनाज़ा “फ़र्ज किफ़ाया” है यानी कोई एक भी अदा कर ले तो सब जिम्‍मेदारी से बरी हो गए वरना जिन जिन को ख़बर पहुंची थी और नहीं आए वो सब गुनहगार होंगे। इस के लिये जमाअ़त शर्त नहीं एक शख़्स भी पढ़ ले तो फ़र्ज़ अदा हो गया। इस की फ़िर्ज़य्यत का इन्कार कुफ़्र है। (बहारे शरीअ़त, जि. 1, स. 825)

 

नमाज़े जनाज़ा में दो रुक्न और तीन सुन्नतें हैं

दो रुक्न यह हैं : 1. चार बार “अल्‍लाहो अकबर” कहना और 2. कि़याम।

तीन सुन्नते मुअक्कदा यह हैं : 1. सना 2. दुरूद शरीफ़ 3. मय्यित के लिये दुआ। (बहारे शरीअ़त, जि. 1, स. 829)

 

नमाज़े जनाज़ा का त़रीक़ा (ह़नफ़ी)

मुक़्तदी इस त़रह़ निय्यत करे : “मैं निय्यत करता हूं इस जनाज़े की नमाज़ की वास्‍ते अल्लाह के, दुआ इस मय्यित के लिये, पीछे इस इमाम के”

  1. पहली तकबीर

अल्‍लाहो अकबर कहते हुए अब इमाम व मुक़्तदी कानों तक हाथ उठाएं और फिर नाफ़ के नीचे बांध लें और सना पढ़ें।

سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ وَ تَبَاْرَكَ اسْمُكَ وَتَعَالَئ جَدُّكَ وَجَلَّ ثَناءٌكَ وَلَااِلَه غَيْرُكَ

सना में ध्‍यान रखें कि “वताला जद्दोका ” के बाद “वजल्‍ला सनाओका वलाइलाहा ग़ैरोका” पढ़ें

 

  1. दूसरी तकबीर

फिर बिग़ैर हाथ उठाए “अल्‍लाहो अकबर” कहें,

फिर दुरूदे इब्राहीम पढ़ें,

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ، وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ

 

  1. तीसरी तकबीर

फिर बिग़ैर हाथ उठाए “अल्‍लाहो अकबर” कहें और दुआ पढ़ें (इमाम तक्बीरें बुलन्द आवाज़ से कहे और मुक़्तदी आहिस्ता। बाक़ी तमाम अज़्कार इमाम व मुक़्तदी सब आहिस्ता पढ़ें)

 

  1. चौथी तकबीर

दुआ के बाद फिर “अल्‍लाहो अकबर” कहें और हाथ लटका दें फिर दोनों त़रफ़ सलाम फैर दें। सलाम में मय्यित और फि़रिश्तों और ह़ाजि़रीने नमाज़ की निय्यत करे, उसी त़रह़ जैसे और नमाज़ों के सलाम में निय्यत की जाती है यहां इतनी बात ज्‍़यादा है कि मय्यित की भी निय्यत करे। (बहारे शरीअ़त, जि. 1, स. 829, 835 माख़ूज़न)

 

जनाज़े की दुआ

 

बालिग़ मर्द व औरत के जनाज़े की दुआ

اَللّهُمَّ اغْفِرْ لِحَيِّنَا وَمَيِّتِنَا وَ شَاهِدِنَا وَ غَائِبِنَا وَ صَغِيْرِنَا وَكَبِيْرِنَا وَ ذَكَرِنَا وَاُنْثَانَاؕ اَللّهُمَّ مَنْ اَحْيَيْتَهُ مِنَّا فَاَحْيِهِ عَلَي الاِسْلَامِؕ وَمَنْ تَوَفَّيْتَهُ مِنَّا فَتَوَفَّهُ عَلَي الاِيْمَانِؕ

इलाही! बख़्श दे हमारे हर जि़न्दा को और हमारे हर फ़ौत शुदा को और हमारे हर ह़ाजि़र को और हमारे हर ग़ाइब को और हमारे हर छोटे को और हमारे हर बड़े को और हमारे हर मर्द को और हमारी हर औरत को। इलाही! तू हम में से जिस को जि़न्दा रखे तो उस को इस्लाम पर जि़न्दा रख और हम में से जिस को मौत दे तो उस को ईमान पर मौत दे। (अल मुस्‍तदरक लिलहाकिम हदीस 1366)

 

ना बालिग़ लड़के की दुआ

اَللّهُمَّ اجْعَلْهُ لَنَا فَرَطًا وَّاجْعَلْهُ لَنَا اَجْرًا وَّ ذُخْرًا وَّ اجْعَلْهُ لَنَا شَافِعًا وَّ مُشَفَّعًاؕ

इलाही! इस (लड़के) को हमारे लिये आगे पहुंच कर सामान करने वाला बना दे और इस को हमारे लिये अज्र (का मूजिब) और वक़्त पर काम आने वाला बना दे और इस को हमारी सिफ़ारिश करने वाला बना दे और वो जिस की सिफ़ारिश मन्ज़ूर हो जाए।

 

ना बालिग़ लड़की की दुआ

اَللّهُمَّ اجْعَلْهَا لَنَا فَرَطًا وَّاجْعَلْهَا لَنَا اَجْرًا وَّذُخْرًا وَّاجْعَلْهَا لَنَا شَافِعَةً وَّمُشَفَّعَةًؕ

इलाही! इस (लड़की) को हमारे लिये आगे पहुंच कर सामान करने वाली बना दे और इस को हमारे लिये अज्र (का मूजिब) और वक़्त पर काम आने वाली बना दे और इस को हमारी सिफ़ारिश करने वाली बना दे और वो जिस की सिफ़ारिश मन्ज़ूर हो जाए।

 

नमाज़े जनाज़ा की फ़जी़लत

 

क़ब्र में पहला तोह़फ़ा

सरकारे दोआलमﷺ से किसी ने पूछा : मोमिन जब क़ब्र में दाखि़ल होता है तो उस को सब से पहला तोह़फ़ा क्या दिया जाता है? तो इर्शाद फ़रमाया : उस की नमाज़े जनाज़ा पढ़ने वालों की मगि़्फ़रत कर दी जाती है।

 

उह़ुद पहाड़ जितना सवाब

ह़ज़रते सय्यिदुना अबू हुरैरा रजिअल्‍लाह अन्‍हो से रिवायत है कि हुज़ूरﷺ फरमाते है : जो शख़्स (ईमान का तक़ाज़ा समझ कर और ह़ुसूले सवाब की निय्यत से) अपने घर से जनाज़े के साथ चले, नमाज़े जनाज़ा पढ़े और दफ़्न होने तक जनाज़े के साथ रहे उस के लिये दो क़ीरात़ सवाब है जिस में से हर क़ीरात़ उह़ुद (पहाड़) के बराबर है और जो शख़्स सिर्फ़ जनाज़े की नमाज़ पढ़ कर वापस आ जाए तो उस के लिये एक क़ीरात़ सवाब है।

 

नमाज़े जनाज़ा बाइ़से इ़ब्रत है

ह़ज़रते सय्यिदुना अबू ज़र गि़फ़ारी रजिअल्‍लाह अन्‍हो का इर्शाद है : मुझ से सरकारे दो आलम ﷺ ने फ़रमाया : क़ब्रों की जि़यारत करो ताकि आखि़रत की याद आए और मुर्दे को नहलाओ कि फ़ानी जिस्म (यानी मुर्दा जिस्म) का छूना बहुत बड़ी नसीह़त है और नमाज़े जनाज़ा पढ़ो ताकि यह तुम्हें ग़मगीन करे क्यूं कि ग़मगीन इन्सान अल्लाह के साए में होता है और नेकी का काम करता है।

 

मय्यित को नहलाने वग़ैरा की फ़ज़ीलत

मौलाए काएनात, ह़ज़रते सय्यिदुना अ़लिय्युल मुर्तज़ा शेरे ख़ुदा अलैहिस्‍सलाम से रिवायत है कि हुज़ूरﷺ ने इर्शाद फ़रमाया कि जो किसी मय्यित को नहलाए, कफ़न पहनाए, ख़ुश्बू लगाए, जनाज़ा उठाए, नमाज़ पढ़े और जो नाकि़स बात नज़र आए उसे छुपाए वो अपने गुनाहों से ऐसा पाक हो जाता है जैसा जिस दिन मां के पेट से पैदा हुवा था।

 

जनाज़ा देख कर पढ़ने का विर्द

ह़ज़रते सय्यिदुना मालिक बिन अनस रजिअल्‍लाह अन्‍हो को बादे वफ़ात किसी ने ख़्वाब में देख कर पूछा : अल्लाह ने आप के साथ क्या सुलूक फ़रमाया? कहा : एक कलिमे की वज्ह से बख़्श दिया जो ह़ज़रते सय्यिदुना उ़स्माने ग़नी रजिअल्‍लाह अन्‍हो जनाज़े को देख कर कहा करते थे- ”सुब्‍हानल हय्यिल्‍लज़ी यालमुतो” (वो ज़ात पाक है जो जि़न्दा है उसे कभी मौत नहीं आएगी)। लिहाज़ा मैं भी जनाज़ा देख कर यही कहा करता था यह कलिमा कहने के सबब अल्लाह ने मुझे बख़्श दिया। (अहयाउल उलूम)

 

नमाज़े जनाज़ा के मसाएल

 

तकबीर के वक्‍त सर उठाना

नमाज़े जनाज़ा में तकबीर के वक्‍त सर उठाकर आसमान की तरफ देखना ज़रूरी नहीं है, बल्कि ग़लत है।

 

जूते पर खड़े हो कर जनाज़ा पढ़ना

जूता पहन कर अगर नमाज़े जनाज़ा पढ़ें तो जूते और ज़मीन दोनों का पाक होना ज़रूरी है और जूता उतार कर उस पर खड़े हो कर पढ़ें तो जूते के तले और ज़मीन का पाक होना ज़रूरी नहीं।

एह़तियात़ यही है कि जूता उतार कर उस पर पाउं रख कर नमाज़ पढ़ी जाए ताकि ज़मीन या तला अगर नापाक हो तो नमाज़ में ख़लल न आए।” (फ़तावा रज़विय्या मुख़र्रजा, जि. 9, स. 188)

 

ग़ाइबाना नमाज़े जनाज़ा नहीं हो सकती

मय्यित का सामने होना ज़रूरी है, ग़ाइबाना नमाज़े जनाज़ा नहीं हो सकती। मुस्तह़ब यह है कि इमाम मय्यित के सीने के सामने खड़ा हो।

 

चन्द जनाज़ों की इकठ्ठी नमाज़ का त़रीक़ा

चन्द जनाज़े एक साथ भी पढ़े जा सकते हैं, इस में इखि़्तयार है कि सब को आगे पीछे रखें यानी सब का सीना इमाम के सामने हो या कि़त़ार बन्द। यानी एक के पाउं की सीध में दूसरे का सिरहाना और दूसरे के पाउं की सीध में तीसरे का सिरहाना (यानी इसी पर कि़यास कीजिये)। (बहारे शरीअ़त, जि. 1, स. 839,)

 

जनाज़े में कितनी सफ़ें हों?

बेहतर यह है कि जनाज़े में तीन सफ़ें हों कि ह़दीसे पाक में है : “जिस की नमाज़ (जनाज़ा) तीन सफ़ों ने पढ़ी उस की मगि़्फ़रत हो जाएगी।” अगर कुल सात ही आदमी हों तो एक इमाम बन जाए अब पहली सफ़ में तीन खड़े हो जाएं दूसरी में दो और तीसरी में एक। जनाज़े में पिछली सफ़ तमाम सफ़ों से अफ़्ज़ल है।

 

जनाज़े की पूरी जमाअ़त न मिले तो?

मस्बूक़ (यानी जिस की बाज़ तक्बीरें फ़ौत हो गइंर् वोह) अपनी बाक़ी तक्बीरें इमाम के सलाम फेरने के बाद कहे और अगर यह अन्देशा हो कि दुआ वग़ैरा पढ़ेगा तो पूरी करने से क़ब्ल लोग जनाज़े को कन्धे तक उठा लेंगे तो सिर्फ़ तक्बीरें कह ले दुआ वग़ैरा छोड़ दे।

चौथी तक्बीर के बाद जो शख़्स आया तो जब तक इमाम ने सलाम नहीं फेरा शामिल हो जाए और इमाम के सलाम के बाद तीन बार “अल्‍लाहो अकबर” कहे। फिर सलाम फेर दे।

 

पागल या ख़ुदकुशी वाले का जनाज़ा

जो पैदाइशी पागल हो या बालिग़ होने से पहले पागल हो गया हो और इसी पागल पन में मौत वाक़ेअ़ हुई तो उस की नमाज़े जनाज़ा में ना बालिग़ की दुआ पढ़ेंगे। जिस ने ख़ुदकुशी की उस की नमाज़े जनाज़ा पढ़ी जाएगी।

 

मुर्दा बच्चे के अह़काम

मुसल्मान का बच्चा जि़न्दा पैदा हुवा यानी अक्सर हि़स्सा बाहर होने के वक़्त जि़न्दा था फिर मर गया तो उस को ग़ुस्ल व कफ़न देंगे और उस की नमाज़ पढ़ेंगे, वरना उसे वैसे ही नहला कर एक कपड़े में लपेट कर दफ़्न कर देंगे। इस के लिये सुन्नत के मुत़ाबिक़ ग़ुस्ल व कफ़न नहीं है और नमाज़ भी इस की नहीं पढ़ी जाएगी। सर की त़रफ़ से अक्सर की मिक़्दार सर से ले कर सीने तक है। लिहाज़ा अगर इस का सर बाहर हुवा था और चीख़ता था मगर सीने तक निकलने से पहले ही फ़ौत हो गया तो उस की नमाज़ नहीं पढ़ेंगे। पाउं की जानिब से अक्सर की मिक़्दार कमर तक है। बच्चा जि़न्दा पैदा हुवा या मुर्दा या कच्चा गिर गया उस का नाम रखा जाए और वो कि़यामत के दिन उठाया जाएगा। (बहारे शरीअ़त, जि. 1, स. 841)

 

जनाज़े को कन्धा देने का सवाब

ह़दीसे पाक में है : “जो जनाज़े को चालीस क़दम ले कर चले उस के चालीस कबीरा गुनाह मिटा दिये जाएंगे।” नीज़ ह़दीस शरीफ़ में है : जो जनाज़े के चारों पायों को कन्धा दे अल्लाह उस की ह़त्मी (यानी मुस्तकि़ल) मगि़्फ़रत फ़रमा देगा। (बहारे शरीअ़त, जि. 1, स. 823)

 

जनाज़े को कन्धा देने का त़रीक़ा

जनाज़े को कन्धा देना इ़बादत है। सुन्नत यह है कि यके बाद दीगरे चारों पायों को कन्धा दे और हर बार दस दस क़दम चले। पूरी सुन्नत यह है कि पहले सीधे सिरहाने कन्धा दे फिर सीधी पाइंती (यानी सीधे पाउं की त़रफ़) फिर उलटे सिरहाने फिर उलटी पाइंती और दस दस क़दम चले तो कुल चालीस क़दम हुए। (, बहारे शरीअ़त, जि. 1, स. 822) बाज़ लोग जनाज़े के जुलूस में एलान करते रहते हैं, दो दो क़दम चलो! उन को चाहिये कि इस त़रह़ एलान किया करें : “दस दस क़दम चलो।”

 

बच्चे का जनाज़ा उठाने का त़रीक़ा

छोटे बच्चे के जनाज़े को अगर एक शख़्स हाथ पर उठा कर ले चले तो ह़रज नहीं और यके बाद दीगरे लोग हाथों हाथ लेते रहें। औरतों को (बच्चा हो या बड़ा किसी के भी) जनाज़े के साथ जाना ना जाइज़ व मम्नूअ़ है। (बहारे शरीअ़त, जि. 1, स. 823,)

 

नमाज़े जनाज़ा के बाद वापसी के मसाइल

जो शख़्स जनाज़े के साथ हो उसे बिग़ैर नमाज़ पढ़े वापस न होना चाहिये और नमाज़ के बाद औलियाए मय्यित (यानी मरने वाले के सर परस्तों) से इजाज़त ले कर वापस हो सकता है और दफ़्न के बाद इजाज़त की ह़ाजत नहीं।

 

क्या शोहर बीवी के जनाज़े को कन्धा दे सकता है?

शोहर अपनी बीवी के जनाज़े को कन्धा भी दे सकता है, क़ब्र में भी उतार सकता है और मुंह भी देख सकता है। सिर्फ़ ग़ुस्ल देने और बिला ह़ाइल बदन को छूने की मुमानअ़त है। औरत अपने शोहर को ग़ुस्ल दे सकती है। (बहारे शरीअ़त, जि. 1, स. 812, 813)

 

बालिग़ की नमाज़े जनाज़ा से क़ब्ल

यह एलान कीजिये मह़ूर्म के अ़ज़ीज़ व अह़बाब तवज्जोह फ़रमाएं! मह़ूर्म ने अगर जि़न्दगी में कभी आप की दिल आज़ारी या ह़क़ तलफ़ी की हो या आप के मक़्रूज़ हों तो इन को रिज़ाए इलाही के लिये मुआफ़ कर दीजिये, मह़ूर्म का भी भला होगा और आप को भी सवाब मिलेगा।

src:dawateislami.net

ramazan ke gunahgar

Ramadan ke Gunahgar

रमज़ान का गुनाहगार

 

रमज़ान में अ़लल ए’लान खाने की दुनियावी सज़ा :

रमज़ानुल मुबारक की ता’जीम के सबब एक आतश परस्त को अल्लाह ने न सि़र्फ़ दौलते ईमान से नवाज़ दिया बल्कि उस को जन्नत की ला ज़वाल ने’मतों से भी मालामाल फ़रमा दिया। इस वाकि़ए़ से खु़स़ूस़न हमारे उन ग़ाफि़ल इस्लामी भाइयों को दर्से इ़ब्रत ह़ासि़ल करना चाहिये जो मुसल्मान होने के बावुजूद रमज़ानुल मुबारक का बिल्कुल एह़तिराम नहीं करते। अव्वल तो वो रोज़ा नहीं रखते, फिर चोरी और सीना ज़ोरी यूं कि रोज़ादारों के सामने ही सरे आम पानी पीते बल्कि खाना खाते भी नहीं शरमाते।

फु़क़हाए किराम फ़रमाते हैं, “जो शख़्स़ रमज़ानुल मुबारक में दिन के वक़्त बग़ैर किसी मजबूरी के अ़लल ए’लान जान बूझ कर खाए पिये उस को (बादशाहे इस्लाम की त़रफ़ से) क़त्ल कर दिया जाए।” (दुर्रे मुख़्तार मअ़ रद्दुल मुह़्तार, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:392)

 

साल भर की नेकियां बरबाद :

ह़ज़रते सय्यिदुना अ़ब्दुल्लाह इब्ने अ़ब्बास रजि से मरवी है कि हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं, “बेशक जन्नत माहे रमज़ान के लिये एक साल से दूसरे साल तक सजाई जाती है, पस जब माहे रमज़ान आता है तो जन्नत कहती है, “ऐ अल्लाह! मुझे इस महीने में अपने बन्दों में से (मेरे अन्दर) रहने वाले अ़त़ा फ़रमा दे।” और हू़रेई़न कहती हैं, “ऐ अल्लाह! इस महीने में हमें अपने बन्दों में से शौहर अ़त़ा फ़रमा” फिर सरकारे मदीना ने इर्शाद फ़रमाया, “जिस ने इस माह में अपने नफ़्स की हि़फ़ाज़त की कि न तो कोई नशा आवर शय पी और न ही किसी मो’मिन पर बोहतान लगाया और न ही इस माह में कोई गुनाह किया तो अल्लाह हर रात के बदले इस का सौ ह़ूरों से निकाह़ फ़रमाएगा और उस के लिये जन्नत में सोने, चांदी, याकू़त और ज़बरजद का ऐसा मह़ल बनाएगा कि अगर सारी दुनिया जम्अ़ हो जाए और इस मह़ल में आ जाए तो इस मह़ल की उतनी ही जगह घेरेगी जितना बकरियों का एक बाड़ा दुनिया की जगह घेरता है और जिस ने इस माह में कोई नशा आवर शय पी या किसी मो’मिन पर बोहतान बांधा या इस माह में कोई गुनाह किया तो अल्लाह उस के एक साल के आ’माल बरबाद फ़रमा देगा। पस तुम माहे रमज़ान (के ह़क़) में कोताही करने से डरो क्यूंकि यह अल्लाह का महीना है। अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिये ग्यारह महीने कर दिये कि इन में ने’मतों से लुत़्फ़ अन्दोज़ हो और तलज़्ज़ुज़ (लज़्ज़त) ह़ासि़ल करो और अपने लिये एक महीना ख़ास़ कर लिया है। पस तुम माहे रमज़ान के मु-आमले में डरो।” (अल मु’जमुल अवसत़, जिल्द:2, स़-फ़ह़ा:141, ह़दीस़:3688)

 

रमज़ान में गुनाह करने वाला :

सय्यिदतुना उम्मे हानी रजि से रिवायत है हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं, “मेरी उम्मत ज़लील व रुस्वा न होगी जब तक वो माहे रमज़ान का ह़क़ अदा करती रहेगी।” अ़र्ज़ की गई, या रसूलल्लाह रमज़ान के ह़क़ को ज़ाएअ़ करने में उन का ज़लील व रुस्वा होना क्या है ? फ़रमाया, “इस माह में उन का ह़राम कामों का करना। फिर फ़रमाया, जिस ने इस माह में जि़ना किया या शराब पी तो अगले रमज़ान तक अल्लाह और जितने आस्मानी फ़रिश्ते हैं सब उस पर ला’नत करते हैं। पस अगर यह शख़्स़ अगले माहे रमज़ान को पाने से पहले ही मर गया तो उस के पास कोई ऐसी नेकी न होगी जो उसे जहन्नम की आग से बचा सके। पस तुम माहे रमज़ान के मामले में डरो क्यूंकि जिस त़रह़ इस माह में और महीनों के मुक़ाबले में नेकियां बढ़ा दी जाती हैं इसी त़रह़ गुनाहों का भी मामला है।” (अल मु’जमुस़्स़ग़ीर लित्‍त़बरानी, जिल्द:9, स़-फ़ह़ा:60, ह़दीस़:1488)

 

दिल की सियाही का इ़लाज :

इस सियाह क़ल्बी का इ़लाज ज़रूरी है और इस के इ़लाज का एक मुअसि़्स़र ज़रीआ पीरे कामिल भी है यानी किसी ऐसे बुजु़र्ग के हाथ में हाथ दे दिया जाए जो परहेज़गार और मुत्‍त़बेए़ सुन्नत हो, जिस की जि़यारत खु़दा व मुस़्त़फ़ा की याद दिलाए, जिस की बातें स़लातो सुन्नत का शौक़ उभारने वाली हों, जिस की स़ोह़बत मौतो आखि़रत की तैयारी का जज़्बा बढ़ाती हो। अगर खु़श कि़स्मती से ऐसा पीरे कामिल मुयस्सर आ गया तो दिल की सियाही का ज़रूर इ़लाज हो जाएगा।

लेकिन किसी मुअ़य्यन गुनहगार मुसल्मान के बारे में यह कहने की इजाज़त नहीं कि इस के दिल पर मुहर लग गई या उस का दिल सियाह हो गया जभी नेकी की दा’वत इस पर अस़र नहीं करती। यक़ीनन अल्लाह इस बात पर क़ादिर है कि उसे तौबा की तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमा दे जिस से वो राहे रास्त पर आ जाए। अल्लाह हमारे दिल की सियाही को दूर फ़रमाए।

देखिये – मुरीद का मतलब

 

अफ़्ज़ल इ़बादत कौन सी ?

ऐ जन्नत के त़लबगार रोज़ादार इस्लामी भाइयो! रमज़ानुल मुबारक के मुक़द्दस लम्ह़ात को फु़ज़ूलियात व खु़राफ़ात में बरबाद होने से बचाइये! जि़न्दगी बेह़द मुख़्तस़र है इस को ग़नीमत जानिये, वक़्त “पास” (बल्कि बरबाद) करने के बजाए तिलावते कु़रआन और जि़क्रो दुरूद में वक़्त गुज़ारने की कोशिश फ़रमाइये। भूक प्यास की शिद्दत जिस क़दर ज्‍़यादा मह़सूस होगी स़ब्र करने पर स़वाब भी उसी क़दर ज़ाइद मिलेगा। जैसा कि मन्कू़ल है, “यानी अफ़्ज़ल इ़बादत वो है जिस में ज़ह़मत (तकलीफ़) ज्‍़यादा है।” (कश्फ़ुल खि़फ़ा व मुज़ीलुल इल्बास, जिल्द:1, स़-फ़ह़ा:141, ह़दीस़:459)

इमाम शरफु़द्दीन नववी फ़रमाते हैं, “यानी इ़बादात में मशक़्क़त और ख़र्च ज्‍़यादा होने से स़वाब और फ़ज़ीलत ज्‍़यादा हो जाती है। (शरह़े स़ह़ीह़ मुस्लिम लिन्न-ववी, जिल्द:1, स़-फ़ह़ा:390)

ह़ज़रते सय्यिदुना इब्राहीम बिन अद्हम का फ़रमाने मुअ़ज़्ज़म है, “दुनिया में जो नेक अ़मल जितना दुश्वार होगा कि़यामत के रोज़ नेकियों के पलडे़ में उतना ही ज्‍़यादा वज़्नदार होगा।” (तजि़्क-रतुल औलिया, स़-फ़ह़ा:95)

इन रिवायात से स़ाफ़ ज़ाहिर हुआ कि हमारे लिये रोज़ा रखना जितना दुश्वार और नफ़्से बदकार के लिये जिस क़दर ना गवार होगा। बरोज़े शुमार मीज़ाने अ़मल में उतना ही ज्‍़यादा वज़्न-दार होगा।

 

रोज़े में ज्‍़यादा सोना :

हु़ज्जतुल इस्लाम ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम मुह़म्मद ग़ज़ाली कीमियाए सआदत में फ़रमाते हैं, “रोज़ादार के लिये सुन्नत यह है कि दिन के वक़्त ज्‍़यादा देर न सोए बल्कि जागता रहे ताकि भूक और ज़ो’फ़ (यानी कमज़ोरी) का अस़र मह़सूस हो।” (कीमियाए सआदत, स़-फ़ह़ा:185)

(अगर्चे अफ़्ज़ल कम सोना ही है फिर भी अगर ज़रूरी इ़बादात के इ़लावा कोई शख़्स़ सोया रहे तो गुनहगार न होगा) स़ाफ़ ज़ाहिर है कि जो दिन भर रोज़े में सो कर वक़्त गुज़ार दे उस को रोज़े का पता ही क्या चलेगा ? ज़रा सोचो तो सही! ह़ुज्जतुल इस्लाम ह़ज़रत सय्यिदुना इमाम मुह़म्मद ग़ज़ाली तो ज्‍़यादा सोने से भी मन्अ़ फ़रमाते हैं कि इस त़रह़ भी वक़्त फालतू गुजर जाएगा। तो जो लोग खेल तमाशों में और हराम कामों में वक़्त बरबाद करते हैं वो किस क़दर मह़रूम व बद नस़ीब हैं। इस मुबारक महीने की क़द्र कीजिये, इस का एह़तिराम बजा लाइये, इस में ख़ुशदिली के साथ रोज़े रखिये और अल्लाह की रज़ा ह़ासि़ल कीजिये। ऐ अल्लाह फै़ज़ाने रमज़ान से हर मुसल्मान को मालामाल फ़रमा। इस माहे मुबारक की हमें क़द्र व मन्जि़लत नस़ीब कर और इस की बेअदबी से बचा।

 

देखिये – रमज़ान की अज़मत

shaitan qaid

Ramzan me Shaitan Qaid ho jata hai

रमज़ान में शैतान कैद कर दिया जाता है

 

माहे रमज़ान तो क्या आता है रह़मत व जन्नत के दरवाजे़ खुल जाते, दोज़ख़ को ताले पड़ जाते और शयात़ीन क़ैद कर लिये जाते हैं। चुनान्चे ह़ज़रते सय्यिदुना अबू हुरैरा रजि फ़रमाते हैं कि हुज़ूरे अकरमﷺ अपने स़ह़ाबए किराम को ख़ुश ख़बरी सुनाते हुए इर्शाद फ़रमाते हैं “रमज़ान का महीना आ गया है जो कि बहुत ही बा बरकत है। अल्लाह तआला ने इस के रोज़े तुम पर फ़र्ज़ किये हैं, इस में आस्मान के दरवाजे़ खोल दिये जाते हैं। और जहन्नम के दरवाज़े बन्द कर दिये जाते हैं। सरकश शैत़ानों को क़ैद कर लिया जाता है। इस में अल्लाह तआला की एक रात शबे क़द्र है, जो हज़ार महीनों से बढ़ कर है जो इस की भलाई से मह़रूम हुआ वोही मह़रूम है।” (सु-नने नसाई, जिल्द:4, स़-फ़ह़ा:129)

ह़ज़रते सय्यिदुना अबू हुरैरा रजि फ़रमाते हैं: हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं: जब रमज़ान आता है तो आस्मान के दरवाजे़ खोल दिये जाते हैं। (स़ह़ीह़ुल बुख़ारी, जिल्द अव्वल, स़-फ़ह़ा:626, ह़दीस़:1899)

और एक रिवायत में है कि जन्नत के दरवाज़े खोल दिये जाते हैं और दोज़ख़ के दरवाज़े बन्द कर दिये जाते हैं शयात़ीन जन्ज़ीरों में जकड़ दिये जाते हैं। एक रिवायत में है कि रह़मत के दरवाजे़ खोले जाते हैं। (स़ह़ीह़ मुस्लिम, स़-फ़ह़ा:543, ह़दीस़:1079)

 

शैत़ान क़ैद में होने के बा वुजूद गुनाह क्यूं होते हैं ? :

ह़ज़रते मुफ़्ती अह़मद यार ख़ान फ़रमाते हैं: ह़क़ यह है कि माहे रमज़ान में आस्मानों के दरवाज़े भी खुलते हैं जिन से अल्लाह की ख़ास़ रहमतें ज़मीन पर उतरती हैं और जन्नतों के दरवाज़े भी जिस की वजह से जन्नत वाले हू़रो गि़ल्मान को ख़बर हो जाती है कि दुनिया में रमज़ान आ गया और वो रोज़ा दारों के लिये दुआओं में मश्ग़ूल हो जाते हैं।

माहे रमज़ान में वाक़ेई दोज़ख़ के दरवाजे़ ही बन्द हो जाते हैं जिस की वजह से इस महीने में गुनहगारों बल्कि काफि़रों की क़ब्रों पर भी दोज़ख़ की गरमी नहीं पहुंचती। वो जो मुसल्मानों में मश्हूर है कि रमज़ान में अ़ज़ाबे क़ब्र नहीं होता इस का येही मत़लब है और ह़क़ीक़त में इब्लीस मअ़ अपनी जु़िर्रय्यतों (यानी औलाद) के क़ैद कर दिया जाता है। इस महीने में जो कोई भी गुनाह करता है वो अपने नफ़्से अम्मारा की शरारत से करता है न शैत़ान के बहकाने से। (मिआर्तुल मनाजीह़, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:133)

 

गुनाहों में कमी तो आ ही जाती है :

रमज़ानुल मुबारक में हमारी मसाजिद ग़ैरे रमज़ान के मुक़ाबले में ज्‍़यादा आबाद हो जाती हैं। नेकियां करने में आसानियां रहती हैं और इतना ज़रूर है कि माहे रमज़ान में गुनाहों का सिल्सिला कुछ न कुछ कम हो जाता है।

 

आगे देखिये रमज़ान का गुनाहगार

ramzan ki fazilat

Ramzan ki Fazilat in hindi

रमज़ान की फ़ज़ीलत

 

हज़ार गुना स़वाब :

माहे रमज़ानुल मुबारक में नेकियों का अज्र बहुत बढ़ जाता है लिहाज़ा कोशिश कर के ज्‍़यादा से ज्‍़यादा नेकियां इस माह में जमा कर लेनी चाहियें। चुनान्चे ह़ज़रते सय्यिदुना इब्राहीम नख़्इ़र् फ़रमाते हैं: माहे रमज़ान में एक दिन का रोज़ा रखना एक हज़ार दिन के रोज़ों से अफ़्ज़ल है और माहे रमज़ान में एक मरतबा तस्बीह़ करना (यानी कहना) इस माह के इ़लावा एक हज़ार मरतबा तस्बीह़ करने (यानी ) कहने से अफ़्ज़ल है और माहे रमज़ान में एक रक्अ़त पढ़ना गै़रे रमज़ान की एक हज़ार रक्अ़तों से अफ़्ज़ल है। (अद्दुर्रुल मन्स़ूर, जिल्द:1, स़-फ़ह़ा:454)

 

रमज़ान में जि़क्र की फ़ज़ीलत :

अमीरुल मुअ्मिनीन ह़ज़रते सय्यिदुना उ़मर फ़ारूक़े आ’ज़म रजि से रिवायत है कि हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं: (तर्जमा) “रमज़ान में जि़क्रुल्लाह करने वाले को बख़्श दिया जाता है और इस महीने में अल्लाह तआला से मांगने वाला मह़रूम नहीं रहता।” (शुअ़बुल ईमान, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:311, ह़दीस़:3627)

देखिये – जिक्र कैसे करें

 

माहे रमज़ान में मरने की फ़ज़ीलत :

जो खु़श नस़ीब मुसल्मान माहे रमज़ान में इन्तिक़ाल करता है उस को सुवालाते क़ब्र से अमान मिल जाती, अ़ज़ाबे क़ब्र से बच जाता और जन्नत का ह़क़दार क़रार पाता है। चुनान्चे ह़ज़राते मुह़द्दिस़ीने किराम का क़ौल है, “जो मो’मिन इस महीने में मरता है वो सीधा जन्नत में जाता है, गोया उस के लिये दोज़ख़ का दरवाज़ा बन्द है।” (अनीसुल वाइ़ज़ीन, स़-फ़ह़ा:25)

 

तीन3 अफ़राद के लिये जन्नत की बशारत :

ह़ज़रते सय्यिदुना अ़ब्दुल्लाह इब्ने मस्ऊ़द रजि से रिवायत है, हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं: “जिस को रमज़ान के इखि़्तताम के वक़्त मौत आई वो जन्नत में दाखि़ल होगा और जिस की मौत अ़रफ़ा के दिन (यानी 9 ज़ुल हि़ज्जतुल ह़राम) के ख़त्म होते वक़्त आई वो भी जन्नत में दाखि़ल होगा और जिस की मौत स़दक़ा देने की ह़ालत में आई वो भी दाखि़ले जन्नत होगा।” (हि़ल्यतुल औलिया, जिल्द:5, स़-फ़ह़ा:26, ह़दीस़:6187)

 

कि़यामत तक के रोज़ों का स़वाब :

उम्मुल मुअ्मिनीन सय्यि-दतुना आइशा सि़द्दीक़ा रजि से रिवायत है, हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं: “जिस का रोज़े की ह़ालत में इन्तिक़ाल हुआ, अल्लाह उस को कि़यामत तक के रोज़ों का स़वाब अ़त़ा फ़रमाता है।” (अल फि़रदौस बिमअूसरिल खि़त़ाब, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:504, ह़दीस़:5557)

रोज़ादार किस क़दर नस़ीबदार है कि अगर रोज़़े की ह़ालत में मौत से हम-कनार हुआ तो कि़यामत तक के रोज़़ों के स़वाब का ह़क़दार क़रार पाएगा।

 

जन्नत के दरवाजे़ खुल जाते हैं :

ह़ज़रते सय्यिदुना अनस बिन मालिक फ़रमाते हैं कि हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं, “यह रमज़ान तुम्हारे पास आ गया है, इस में जन्नत के दरवाज़े खोल दिये जाते हैं और जहन्नम के दरवाजे़ बन्द कर दिये जाते हैं और शयात़ीन को कै़द कर दिया जाता है, मह़रूम है वो शख़्स़ जिस ने रमज़ान को पाया और उस की मगि़्फ़रत न हुई कि जब इस की रमज़ान में मगि़्फ़रत न हुई तो फिर कब होगी ?” (मज्मउज़्ज़वाइद, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:345, ह़दीस़:4788)

 

आगे देखिये – रमज़ान में शैतान क़ैद हो जाता है

ramadan me sunnate nabavi

Ramadan me Sunnate Nabavi in Hindi

रमज़ान में सुन्‍नते नबवी

आक़ा इ़बादत पर कमर बस्ता हो जाते :

माहे रमज़ान में हमें अल्लाह की खू़ब खू़ब इ़बादत करनी चाहिये और हर वो काम करना चाहिये जिस में अल्लाह और उस के मह़बूब, दानाए गु़यूब, मुनज़्ज़हुन अ़निल उ़यूबﷺ की रज़ा हो। अगर इस पाकीज़ा महीने में भी कोई अपनी बखि़्शश न करवा सका तो फिर कब करवाएगा ? हमारे आक़ा इस मुबारक महीने की आमद के साथ ही इ़बादते इलाही में बहुत ज्‍़यादा मगन हो जाया करते। चुनान्चे उम्मुल मुअ्मिनीन ह़ज़रते सय्यिदतुना आइशा सि़द्दीक़ा रजि फ़रमाती हैं, “जब माहे रमज़ान आता तो मेरे सरताज, स़ाहि़बे मे’राज अल्लाह की इ़बादत के लिये कमर बस्ता हो जाते और सारा महीना अपने बिस्तरे मुनव्वर पर तशरीफ़ न लाते।” (अद्दुर्रुल मन्स़ूर, जिल्द:1, स़-फ़ह़ा:449)

 

आक़ा रमज़ान में खू़ब दुआएं मांगते :

मज़ीद फ़रमाती हैं कि जब माहे रमज़ान तशरीफ़ लाता तो हु़ज़ूरे अकरमﷺ का रंग मुबारक मु-तग़य्यर हो जाता और आप नमाज़ की कस़रत फ़रमाते और खू़ब गिड़गिड़ा कर दुआएं मांगते और अल्लाह का ख़ौफ़ आप पर त़ारी रहता। (शुअ़बुल ईमान, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:310, ह़दीस़:3625)

देखिये – दुआ की फ़ज़ीलत

 

आक़ा रमज़ान में खू़ब ख़ैरात करते :

इस माहे मुबारक में खू़ब स़दक़ा व ख़ैरात करना भी सुन्नत है। चुनान्चे सय्यिदुना अ़ब्दुल्लाह इब्ने अ़ब्बास रजि फ़रमाते हैं, “जब माहे रमज़ान आता तो सरकारे मदीना हर कै़दी को रिहा कर देते और हर साइल को अ़त़ा फ़रमाते।” (अद्दुर्रुल मन्स़ूर, जिल्द:1, स़-फ़ह़ा:449)

 

सब से बढ़ कर सख़ी :

सय्यिदुना अ़ब्दुल्लाह इब्ने अ़ब्बास रजि फ़रमाते हैं: “रसूलुल्लाह लोगों में सब से बढ़ कर सख़ी हैं और सख़ावत का दरया सब से ज्‍़यादा उस वक़्त जोश पर होता जब रमज़ान में आप से जिब्रईले अमीन मुलाक़ात के लिये ह़ाजि़र होते, जिब्रईले अमीन (रमज़ानुल मुबारक की) हर रात में मुलाक़ात के लिये ह़ाजि़र होते और रसूले करीम उन के साथ कु़रआने अ़ज़ीम का दौर फ़रमाते।” पस रसूलुल्लाह तेज़ चलने वाली हवा से भी ज्‍़यादा खै़र के मामले में सख़ावत फ़रमाते। (स़ह़ीह़ बुख़ारी, जिल्द:1, स़-फ़ह़ा:9, ह़दीस़:6)

 

आगे देखिये – रमज़ान की फ़ज़ीलत

ramadan 2018

Ramzan me kya karein

रमज़ान में क्‍या करें ?

 

जन्‍नत सजाई जाती है

रमज़ानुल मुबारक के इस्तिक़्बाल के लिये सारा साल जन्नत को सजाया जाता है। चुनान्चे ह़ज़रते सय्यिदुना अ़ब्दुल्लाह इब्ने उ़मर रजि से रिवायत है कि हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं, “बेशक जन्नत इब्तिदाई साल से आइन्दा साल तक रमज़ानुल मुबारक के लिये सजाई जाती है और फ़रमाया रमज़ान शरीफ़ के पहले दिन जन्नत के दरख़्तों के नीचे से बड़ी बड़ी आंखों वाली हू़रों पर हवा चलती है और वो अ़र्ज़ करती हैं, “ऐ परवर्द गार! अपने बन्दों में से ऐसे बन्दों को हमारा शौहर बना जिन को देख कर हमारी आंखें ठन्डी हों और जब वो हमें देखें तो उन की आंखें भी ठन्डी हों।” (शुअ़बुल ईमान, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:312, ह़दीस़:3633)

हर शब साठ हज़ार की बखि़्शश :

ह़ज़रते सय्यिदुना अ़ब्दुल्लाह इब्ने मस्ऊ़द से रिवायत है कि शहन्शाहे ज़ीशान, मक्की म-दनी सुल्त़ान, रह़्मते आ-लमियान, मह़बूबे रह़मान का फ़रमाने रह़मत निशान है, “रमज़ान शरीफ़ की हर शब आस्मानों में सुब्ह़े स़ादिक़ तक एक मुनादी यह निदा करता है, “ऐ अच्छाई मांगने वाले! मुकम्मल कर (यानी अल्लाह तआला की इत़ाअ़त की त़रफ़ आगे बढ़) और ख़ुश हो जा। और ऐ शरीर! शर से बाज़ आ जा और इ़ब्रत ह़ासि़ल कर। है कोई मगि़्फ़रत का त़ालिब! कि उस की त़लब पूरी की जाए। है कोई तौबा करने वाला! कि उस की तौबा क़बूल की जाए। है कोई दुआ मांगने वाला! कि उस की दुआ क़बूल की जाए। है कोई साइल! कि उस का सुवाल पूरा किया जाए। अल्लाह तआला रमज़ानुल मुबारक की हर शब में इफ़्त़ार के वक़्त साठ हज़ार गुनाहगारों को दोज़ख़ से आज़ाद फ़रमा देता है। और ई़द के दिन सारे महीने के बराबर गुनाहगारों की बखि़्शश की जाती है।” (अद्दुर्रुल मन्सू़र, जिल्द:1, स़-फ़ह़ा:146)

देखिये – रमज़ान की फ़ज़ीलत

 

रोज़ाना दस लाख गुनहगारों की दोज़ख़ से रिहाई :

अल्लाह तआला की इ़नायतों, रहमतों और बखि़्शशों का तजि़्करा करते हुए एक मौक़े पर हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं: “जब रमज़ान की पहली रात होती है तो अल्लाह तआला अपनी मख़्लूक़ की त़रफ़ नज़र फ़रमाता है और जब अल्लाह किसी बन्दे की त़रफ़ नज़र फ़रमाए तो उसे कभी अ़ज़ाब न देगा। और हर रोज़ दस लाख (गुनहगारों) को जहन्नम से आज़ाद फ़रमाता है और जब उन्तीसवीं रात होती है तो महीने भर में जितने आज़ाद किये उन के मज्मूए़ के बराबर उस एक रात में आज़ाद फ़रमाता है। फिर जब ई़दुल फि़त्र की रात आती है। मलाइका खु़शी करते हैं और अल्लाह अपने नूर की ख़ास़ तजल्ली फ़रमाता है और फरिश्तों से फ़रमाता है, “ऐ गुरोहे मलाइका! उस मज़्दूर का क्या बदला है जिस ने काम पूरा कर लिया ?” फ़रिश्ते अ़र्ज़ करते हैं, “उस को पूरा पूरा अज्र दिया जाए।” अल्लाह तआला फ़रमाता है, “मैं तुम्हें गवाह करता हूं कि मैं ने उन सब को बख़्श दिया।” (कन्जु़ल उ़म्माल, जिल्द:8, स़-फ़ह़ा:219, ह़दीस़:23702)

 

भलाई ही भलाई :

अमीरुल मुअ्मिनीन ह़ज़रते सय्यिदुना उ़मर फ़ारूक़े आ’ज़म रजि फ़रमाया करते: “उस महीने को ख़ुश आमदीद है जो हमें पाक करने वाला है। पूरा रमज़ान ख़ैर ही खै़र है दिन का रोज़ा हो या रात का कि़याम। इस महीने में ख़र्च करना जिहाद में ख़र्च करने का दरजा रखता है।” (तम्बीहुल ग़ाफि़लीन, स़-फ़ह़ा:176)

 

ख़र्च में कुशादगी करो :

ह़ज़रते सय्यिदुना ज़मुरह रजि से मरवी है कि हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं: “माहे रमज़ान में घर वालों के ख़र्च में कुशादगी करो क्यूंकि माहे रमज़ान में ख़र्च करना अल्लाह तआला की राह में ख़र्च करने की त़रह़ है।” (अल जामिउ़स़्स़ग़ीर, स़-फ़ह़ा:162, ह़दीस़:2716)

 

बड़ी बड़ी आंख वाली ह़ूरें :

ह़ज़रते सय्यिदुना अ़ब्दुल्लाह इब्ने अ़ब्बास रजि से मरवी है कि हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं: “जब रमज़ान शरीफ़ की पहली तारीख़ आती है तो अ़र्शे अ़ज़ीम के नीचे से मस़ीरा नामी हवा चलती है जो जन्नत के दरख़्तों के पत्‍तों को हिलाती है। इस हवा के चलने से ऐसी दिलकश आवाज़ बुलन्द होती है कि इस से बेहतर आवाज़ आज तक किसी ने नहीं सुनी। इस आवाज़ को सुन कर बड़ी बड़ी आंखों वाली हू़रें ज़ाहिर होती हैं यहां तक कि जन्नत के बुलन्द मह़ल्लों पर खड़ी हो जाती हैं और कहती हैं: “है कोई जो हम को अल्लाह तआला से मांग ले कि हमारा निकाह़ उस से हो ?” फिर वो ह़ूरें दारोग़ए जन्नत (ह़ज़रते) रिज़वान से पूछती हैं: “आज यह कैसी रात है ?” (ह़ज़रते) रिज़वान जवाबन तल्बियह (यानी लब्बैक) कहते हैं, फिर कहते हैं: “यह माहे रमज़ान की पहली रात है, जन्नत के दरवाजे़ उम्मते मुह़म्मदिय्या के रोज़ेदारों के लिये खोल दिये गए हैं।” (अत्‍तरग़ीब वत्‍तरहीब, जिल्द:2, स़-फ़ह़ा:60, ह़दीस़:23)

 

दो2 अंधेरे दूर :

मन्क़ूल है कि अल्लाह तआला ने ह़ज़रते सय्यिदुना मूसा कलीमुल्लाह से फ़रमाया कि मैं ने उम्मते मुह़म्मदिय्या को दो2 नूर अ़त़ा किये हैं ताकि वो दो2 अंधेरों के ज़रर (यानी नुक़्स़ान) से मह़फ़ूज़ रहें। सय्यिदुना मूसा कलीमुल्लाह ने अ़र्ज़ की या अल्लाह! वो दो2 नूर कौन कौन से हैं ? इर्शाद हुआ, “नूरे रमज़ान और नूरे कु़रआन”। सय्यिदुना मूसा कलीमुल्लाह ने अ़र्ज़ की: दो2 अंधेरे कौन कौन से हैं ? फ़रमाया, “एक क़ब्र का और दूसरा कि़यामत का।” (दुर्रतुन्नासि़ह़ीन, स़-फ़ह़ा:9)

खु़दा माहे रमज़ान के क़द्रदान पर किस दरजा मेहरबान है। पेशकर्दा दोनों रिवायतों में माहे रमज़ान की किस क़दर अ़ज़ीम रहमतों और बरकतों का जि़क्र किया गया है। माहे रमज़ान का क़द्रदान रोज़े रख कर खु़दाए रह़मान की रिज़ा ह़ासि़ल कर के जन्नतों की अबदी और सरमदी ने’मतें ह़ासि़ल करता है। नीज़ दूसरी हि़कायत में दो2 नूर और दो2 अंधेंरों का जि़क्र किया गया है। अंधेरों को दूर करने के लिये रौशनी का वुजूद ना गुज़ीर है। खु़दाए रह़मान के इस अ़ज़ीम एह़सान पर कु़रबान! कि इस ने हमें क़ुरआन व रमज़ान के दो2 नूर अ़त़ा कर दिये ताकि क़ब्रो कि़यामत के हौलनाक अंधेरे दूर हों और नूर ही नूर हो जाए।

 

रोज़ा व क़ुरआन शफ़ाअ़त करेंगे :

रोज़ा और क़ुरआन रोज़े मह़शर मुसल्मान के लिये शफ़ाअ़त का सामान भी फ़राहम करेंगे। चुनान्चे हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं, “रोज़ा और कु़रआन बन्दे के लिये कि़यामत के दिन शफ़ाअ़त करेंगे। रोज़ा अ़र्ज़ करेगा, ऐ रब्बे करीम! मैं ने खाने और ख़्वाहिशों से दिन में इसे रोक दिया, मेरी शफ़ाअ़त इस के ह़क़ में क़बूल फ़रमा। क़ुरआन कहेगा, मैं ने इसे रात में सोने से बाज़ रखा, मेरी शफ़ाअ़त इस के लिये क़बूल कर। पस दोनों2 की शफ़ाअ़तें क़बूल होंगी।” (मुस्नदे इमाम अह़मद, जिल्द:2, स़-फ़ह़ा:586, ह़दीस़:6637)

 

बखि़्शश का बहाना :

अमीरुल मुअ्मिनीन ह़ज़रते मौलाए काइनात, अ़लिय्युल मुर्तज़ा शेरे खु़दा फ़रमाते हैं, “अगर अल्लाह को उम्मते मुह़म्मदी पर अ़ज़ाब करना मक़्स़ूद होता तो उन को रमज़ान और सूरए शरीफ़ हरगिज़ इ़नायत न फ़रमाता।” (नुज़्हतुल मजालिस, जिल्द:1, स़-फ़ह़ा:216)

 

लाख रमज़ान का स़वाब :

ह़ज़रते सय्यिदुना अ़ब्दुल्लाह इब्ने अ़ब्बास रजि से रिवायत है कि हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं “जिस ने मक्कए मुकर्रमा में माहे रमज़ान पाया और रोज़ा रखा और रात में जितना मुयस्सर आया कि़याम किया तो अल्लाह उस के लिये और जगह के एक लाख रमज़ान का स़वाब लिखेगा और हर दिन एक गु़लाम आज़ाद करने का स़वाब और हर रात एक ग़ुलाम आज़ाद करने का स़वाब और हर रोज़ जिहाद में घौड़े पर सुवार कर देने का स़वाब और हर दिन में नेकी और हर रात में नेकी लिखेगा।” (इब्ने माजह, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:523, ह़दीस़:3117)

 

इन बातों का रखें ख्‍याल:

  • रमजान का चांद देखते ही पूरे महीने के रोजे की नियत कर लें.
  • सारी फ़र्ज़ नमाज़ें अपने वक्‍़त पर बाजमात अदा करें
  • सलातुत तस्‍बीह पढें  (देखिये – सलातुत तस्‍बीह का तरीक़ा )
  • कुरान का तर्जुमा पढ़ें (देखिये – कुरान हिन्‍दी तर्जुमा )
  • सेहरी में ज्‍यादा तला, मसालेदार, मीठा खाना न खाएं, इससे प्‍यास ज्‍यादा लगेगी.
  • इफ्तार हल्‍के खाने से शुरु करें. खजूर से इफ्तार करना बेहतर है. इफ्तार में पानी, सलाद, फल, जूस और सूप ज्‍यादा खाएं और पीएं.
  • इफ्तार के बाद ज्‍यादा से ज्‍यादा पानी पीयें. दिनभर के रोजे के बाद शरीर में पानी की काफी कमी हो जाती है. मर्दों को कम से 5 लीटर और औरतों को कम से कम 2 लीटर पानी जरूर पीना चाहिए.
  • ज्‍यादा से ज्‍यादा इबादत करें क्‍यूंकि इस महीने में कर नेक काम का सवाब बढ़ा दिया जाता है.
  • रमजान में ज्‍यादा से ज्‍यादा कुरान की तिलावत, नमाज की पाबंदी, जकात, सदका खैरात और अल्‍लाह का जिक्र करें.
  • नमाज के बाद कुरान पाक की तिलावत की आदत डालें. आनलाईन कुरान भी सुन सकते हैं
  • कोशिश करें कि हर वक्‍त बा-वजू रहें. रात को जल्‍दी सोने की आदत डालें ताकि आप फज्र की नमाज के लिए उठ सकें.
  • हर रात सोने से पहले अपने किए हुए आमाल के बारे में जरूर सोचें. अपने नेक आमाल पर अल्‍लाह का शुक्र अदा कीजिए और अपनी गलतियों और कोताहियों के लिए अल्‍लाह से माफी मांगिये और तौबा कीजिए.
  • रमजान में अपने पड़ोसियों को हमेशा याद रखें और उनका ख्‍याल रखें.
  • नफ्ल नमाजों को भी जरूरी समझें.
  • ज्‍यादा से ज्‍यादा वक्‍त कुरान और हदीथ, फिकह और इस्‍लामी किताबों के मुताले में गुजारें.
  • तमाम बुरी आदतों को छोड़ दें और इस बा-बरकत महीने का इस्‍तेमाल नेक कामों में करें.

 

आगे देखिये – रमज़ान में सुन्‍नते नबवी

ramadan ke 13 huruf

Ramadan ke 13 Huruf

“माहे रमज़ानुल मुबारक” के 13 ह़ुरूफ़

1

का’बए मुअ़ज़्ज़मा मुसल्मानों को बुला कर देता है और यह आ कर रहमतें बांटता है। गोया वो (यानी काबा) कुंवां है और यह (यानी रमज़ान शरीफ़) दरया, या वो (यानी काबा) दरया है और यह (यानी रमज़ान) बारिश।

2

हर महीने में ख़ास़ तारीखें और तारीख़ों में भी ख़ास़ वक़्त में इ़बादत होती है। मस़लन बक़र ईद की चन्द (मख़्स़ूस़) तारीख़ों में ह़ज, मुह़र्रम की दस्वीं तारीख़ अफ़्ज़ल, मगर माहे रमज़ान में हर दिन और हर वक़्त इ़बादत होती है। रोज़ा इ़बादत, इफ़्त़ार इ़बादत, इफ़्त़ार के बाद तरावीह़ का इन्तिज़ार इ़बादत, तरावीह़ पढ़ कर सेहरी के इन्तिज़ार में सोना इ़बादत, फिर सेहरी खाना भी इ़बादत अल ग़रज़ हर आन में खु़दा की शान नज़र आती है।

3

रमज़ान एक भट्टी है जैसे कि भट्टी गन्दे लोहे को स़ाफ़ और स़ाफ़ लोहे को मशीन का पुर्जा बना कर क़ीमती कर देती है और सोने को ज़ेवर बना कर इस्ते’माल के लाइक़ कर देती है। ऐसे ही माहे रमज़ान गुनहगारों को पाक करता और नेक लोगों के दरजे बढ़ाता है।

4

रमज़ान में नफ़्ल का स़वाब फ़र्ज़ के बराबर और फ़र्ज़ का स़वाब सत्‍तर गुना मिलता है।

5

बा’ज़ उ़-लमा फ़रमाते हैं कि जो रमज़ान में मर जाए उस से सुवालाते क़ब्र भी नहीं होते।

6

इस महीने में शबे क़द्र है। गुज़श्ता आयत से मालूम हुआ कि कु़रआन रमज़ान में आया और दूसरी जगह फ़रमाया:- बेशक हम ने इसे शबे क़द्र में उतारा। (पारह 30, अल क़द्र:1) दोनों आयतों के मिलाने से मालूम हुआ कि शबे क़द्र रमज़ान में ही है और वो ग़ालिबन सत्‍ताईस्वीं शब है। क्यूंकि लैलतुल क़द्र में नौ हु़रूफ़ है और यह लफ़्ज़ सूरए क़द्र में तीन बार आया। जिस से सत्‍ताईस ह़ासि़ल हुए मालूम हुआ कि वो सत्‍ताईस्वीं शब है।

देखिये – कुरान हिन्‍दी तर्जुमा

7

रमज़ान में इब्लीस कै़द कर लिया जाता है और दोज़ख़ के दरवाजे़ बन्द हो जाते हैं जन्नत आरास्ता की जाती है इस के दरवाज़े खोल दिये जाते हैं। इसी लिये इन दिनों में नेकियों की जि़यादती और गुनाहों की कमी होती है जो लोग गुनाह करते भी हैं वो नफ़्से अम्मारा या अपने साथी शैत़ान (क़रीन) के बहकाने से करते हैं।

8

रमज़ान के खाने पीने का हि़साब नहीं।

9

कि़यामत में रमज़ान व कु़रआन रोज़ादार की शफ़ाअ़त करेंगे कि रमज़ान तो कहेगा, मौला! मैं ने इसे दिन में खाने पीने से रोका था और कु़रआन अ़र्ज़ करेगा कि या रब! मैं ने इसे रात में तिलावत व तरावीह़ के ज़रीए़ सोने से रोका।

10

हुज़ूरे अकरमﷺ रमज़ानुल मुबारक में हर कै़दी को छोड़ देते थे और हर साइल को अ़त़ा फ़रमाते थे। रब भी रमज़ान में जहन्नमियों को छोड़ता है। लिहाज़ा चाहिये कि रमज़ान में नेक काम किये जाएं और गुनाहों से बचा जाए।

11

कु़रआने करीम में सि़र्फ रमज़ान शरीफ़ ही का नाम लिया गया और इसी के फ़ज़ाइल बयान हुए। किसी दूसरे महीने का न स़रा-ह़तन नाम है न ऐसे फ़ज़ाइल। महीनों में सि़र्फ माहे रमज़ान का नाम क़ुरआन शरीफ़ में लिया गया। औरतों में सि़र्फ बीबी मरयम का नाम क़ुरआन में आया। स़ह़ाबा में सि़र्फ हज़रते सय्यिदुना ज़ैद इब्ने हारिसा रजि का नाम कु़रआन में लिया गया जिस से इन तीनों की अ़ज़मत मालूम हुई।

12

रमज़ान में इफ़्त़ार और सेहरी के वक़्त दुआ क़बूल होती है । यानी इफ़्त़ार करते वक़्त और सेहरी खा कर। यह मरतबा किसी और महीने को ह़ासि़ल नहीं।

13

रमज़ान में पांच हु़रूफ़ हैं से मुराद “रह़्मते इलाही , से मुराद मह़ब्बते इलाही , से मुराद ज़माने इलाही , से अमाने इलाही , से नूरे इलाही। और रमज़ान में पांच इ़बादात ख़ुस़ूस़ी होती हैं। रोज़ा, तरावीह़, तिलावते कु़रआन, ए’तिकाफ़, शबे क़द्र में इ़बादात। तो जो कोई सि़द्क़े दिल से यह पांच इ़बादात करे वो उन पांच इन्आमों का मुस्तह़क़ है।” (तफ़्सीरे नइ़र्मी, जिल्द:2, स़-फ़ह़ा:208)

आगे दखिये – रमज़ान में क्‍या करें ?

ramzan ki azmat

Ramzan ki Azmat

रमज़ान की अज़मत

इ़बादत का दरवाज़ा :

रोज़ा बाति़नी इ़बादत है, क्यूंकि हमारे बताए बग़ैर किसी को यह इ़ल्म नहीं हो सकता है कि हमारा रोज़ा है और अल्लाह बाति़नी इ़बादत को ज्‍़यादा पसन्द फ़रमाता है। एक ह़दीसे़ पाक के मुत़ाबिक़, “रोज़ा इ़बादत का दरवाज़ा है।” (अल जामिउ़स़्स़ग़ीर, स़-फ़हा:146, ह़दीस़:2415)

नुज़ूले कु़रआन :

इस माहे मुबारक की एक ख़ुस़ूसि़य्यत यह भी है कि अल्लाह ने इस में क़ुरआने पाक नाजि़ल फ़रमाया है। चुनान्चे मुक़द्दस क़ुरआन में खु़दाए रह़मान का नुजू़ले क़ुरआन और माहे रमज़ान के बारे में फ़रमाने आलीशान है :

रमज़ान का महीना, जिस में क़ुरआन उतरा, लोगों के लिये हिदायत और रहनुमाई और फ़ैस़ले की रौशन बातें, तो तुम में जो कोई यह महीना पाए ज़रूर इस के रोज़े रखे और जो बीमार या सफ़र में हो, तो उतने रोज़े और दिनों में। अल्लाह तुम पर आसानी चाहता है और तुम पर दुश्वारी नहीं चाहता और इसलिये कि तुम गिनती पूरी करो और अल्लाह की बड़ाई बोलो इस पर कि उस ने तुम्हें हिदायत की और कहीं तुम ह़क़ गुज़ार हो। (कंजुल ईमान पारह:2, अल ब-क़रह:185)

रमज़ान की तारीफ़ :

इस आयते मुक़द्दसा के इब्तिदाई हि़स़्स़े के तह़्त ह़ज़रत मुफ़्ती अह़मद यार ख़ान र.अ. तफ़्सीरे नइ़र्मी में फ़रमाते हैं :

“रमज़ान” या तो “रह़मान” की त़रह़ अल्लाह का नाम है, चूंकि इस महीने में दिन रात अल्लाह की इ़बादत होती है। लिहाज़ा इसे शहरे रमज़ान यानी अल्लाह का महीना कहा जाता है। जैसे मस्जिद व काबा को अल्लाह का घर कहते हैं कि वहां अल्लाह के ही काम होते हैं। ऐसे ही रमज़ान अल्लाह का महीना है कि इस महीने में अल्लाह के ही काम होते हैं। रोज़ा तरावीह़ वगै़रा तो हैं ही अल्लाह के। मगर ब ह़ालते रोज़ा जो जाइज़ नौकरी और जाइज़ तिजारत वगै़रा की जाती है वो भी अल्लाह के काम क़रार पाते हैं। इसलिये इस माह का नाम रमज़ान यानी अल्लाह का महीना है। या यह “रमज़ाअ” से मुश्तक़ है।

रमज़ाअ, मौसिमे ख़रीफ़ की बारिश को कहते हैं, जिस से ज़मीन धुल जाती है और “रबीअ़” की फ़स़्ल खू़ब होती है। चूंकि यह महीना भी दिल के गर्दो ग़ुबार धो देता है और इस से आ’माल की खेती हरी भरी रहती है इसलिये इसे रमज़ान कहते हैं। “सावन” में रोज़ाना बारिशें चाहियें और “भादों” में चार। फिर “असाड़” में एक। इस एक से खेतियां पक जाती हैं। तो इसी त़रह़ ग्यारह महीने बराबर नेकियां की जाती रहीं। फिर रमज़ान के रोज़ों ने इन नेकियों की खेती को पका दिया। या यह “रम्ज़” से बना जिस के मायने हैं “गरमी या जलना।” चूंकि इस में मुसल्मान भूक प्यास की तपिश बरदाश्त करते हैं या यह गुनाहों को जला डालता है, इसलिये इसे रमज़ान कहा जाता है।

(कन्जु़ल उ़म्माल की आठवीं जिल्द के स़-फ़ह़ा नम्बर दो सौ सत्‍तरह पर ह़ज़रते सय्यिदुना अनस रजि़. से रिवायत नक़्ल की गई है कि नबीए करीमﷺ ने इर्शाद फ़रमाया, “इस महीने का नाम रमज़ान रखा गया है क्यूंकि यह गुनाहों को जला देता है।”)

महीनों के नाम की वजह :

ह़ज़रते मुफ़्ती अह़मद यार ख़ान र.अ. फ़रमाते हैं: बा’ज़ मुफ़स्सिरीन ने फ़रमाया कि जब महीनों के नाम रखे गए तो जिस मौसिम में जो महीना था उसी से उस का नाम हुआ। जो महीना गरमी में था उसे रमज़ान कह दिया गया और जो मौसिमे बहार में था उसे रबीउ़ल अव्वल और जो सर्दी में था जब पानी जम रहा था उसे जुमादिल ऊला कहा गया। इस्लाम में हर नाम की कोई न कोई वजह होती है और नाम काम के मुत़ाबिक़ रखा जाता है। रमज़ान बहुत ख़ूबियों का जामेअ़ था इसी लिये उस का नाम रमज़ान हुआ। (तफ़्सीरे नइ़र्मी, जिल्द:2, स़-फ़ह़ा:205)

सोने के दरवाज़े वाला मह़ल :

सय्यिदुना अबू सई़द खु़दरी रजि़. से रिवायत है, हुजूरﷺ फ़रमाते हैं :

“जब माहे रमज़ान की पहली रात आती है तो आस्मानों और जन्नत के दरवाजे़ खोल दिय जाते हैं और आखि़र रात तक बन्द नहीं होते। जो कोई बन्दा इस माहे मुबारक की किसी भी रात में नमाज़ पढ़ता है तो अल्लाह उस के हर सज्दे के एवज़ (यानी बदले में) उस के लिये पन्द्रह सौ1500 नेकियां लिखता है और उस के लिये जन्नत में सुर्ख याक़ूत का घर बनाता है। जिस में साठ हजार 60000 दरवाज़े होंगे। और हर दरवाजे़ के पट सोने के बने होंगे जिन में याकू़ते सुर्ख़ जड़े होंगे। पस जो कोई माहे रमज़ान का पहला रोज़ा रखता है तो अल्लाह महीने के आखि़र दिन तक उस के गुनाह माफ़ फ़रमा देता है, और उस के लिये सु़ब्ह़ से शाम तक सत्‍तर हज़ार फ़रिश्ते दुआए मगि़्फ़रत करते रहते हैं। रात और दिन में जब भी वो सज्दा करता है उस के हर सज्दे के एवज़ (यानी बदले) उसे (जन्नत में) एक एक ऐसा दरख़्त अ़त़ा किया जाता है कि उस के साए में घौड़े सुवार पांच सौ बरस तक चलता रहे।” (शुउ़बुल ईमान, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:314, ह़दीस़:3635)

खु़दा का किस क़दर अ़ज़ीम एह़सान है कि उस ने हमें अपने ह़बीबﷺ के तुफ़ैल ऐसा माहे रमज़ान अ़त़ा फ़रमाया कि इस माहे मुकर्रम में जन्नत के तमाम दरवाजे़ खुल जाते हैं। और नेकियों का अज्र खू़ब खू़ब बढ़ जाता है। बयान कर्दा ह़दीस़ के मुत़ाबिक़ रमज़ानुल मुबारक की रातों में नमाज़ अदा करने वाले को हर एक सज्दे के बदले में पन्दरह सौ नेकियां अ़त़ा की जाती हैं नीज़ जन्नत का अ़ज़ीमुश्शान मह़ल मज़ीद बर आं। इस ह़दीस़े मुबारक में रोज़ादारों के लिये यह बिशारते उ़ज़्मा भी मौजूद है कि सु़ब्ह़ ता शाम सत्‍तर हज़ार फ़रिश्ते उन के लिये दुआए मगि़्फ़रत करते रहते हैं।

पांच5 ख़ुस़ूस़ी करम :

ह़ज़रते सय्यिदुना जाबिर बिन अ़ब्दुल्लाह रजि़. से रिवायत है कि हुजूरﷺ फरमाते हैं : “मेरी उम्मत को माहे रमज़ान में पांच चीज़ें ऐसी अ़त़ा की गईं जो मुझ से पहले किसी नबी को न मिलीं :

(1) जब रमज़ानुल मुबारक की पहली रात होती है तो अल्लाह उन की त़रफ़ रह़मत की नज़र फ़रमाता है और जिस की त़रफ़ अल्लाह नज़रे रह़मत फ़रमाए उसे कभी भी अ़ज़ाब न देगा

(2) शाम के वक़्त उन के मुंह की बू (जो भूक की वजह से होती है) अल्लाह तआला के नज़्दीक मुश्क की खु़श्बू से भी बेहतर है

(3) फ़रिश्ते हर रात और दिन उन के लिये मगि़्फ़रत की दुआएं करते रहते हैं

(4) अल्लाह तआला जन्नत को हु़क्म फ़रमाता है, “मेरे (नेक) बन्दों के लिये मुज़य्यन (यानी आरास्ता) हो जा अ़न क़रीब वो दुनिया की मशक़्क़त से मेरे घर और करम में राह़त पाएंगे

(5) जब माहे रमज़ान की आखि़री रात आती है तो अल्लाह सब की मगि़्फ़रत फ़रमा देता है। क़ौम में से एक शख़्स़ ने खडे़ हो कर अ़र्ज़ की, या रसूलल्लाह क्या यह लैलतुल क़द्र है ? इर्शाद फ़रमाया: “नहीं क्या तुम नहीं देखते कि मज़्दूर जब अपने कामों से फ़ारिग़ हो जाते हैं तो उन्हें उजरत दी जाती है।” (अत्‍तरग़ीब वत्‍तरहीब, जिल्द:2, स़-फ़ह़ा:56, ह़दीस़:7)

स़ग़ीरा गुनाहों का कफ़्फ़ारा :

ह़ज़रते सय्यिदुना अबू हुरैरा रजि़. से मरवी है, हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं, “पांचों नमाज़ें, और जुमा अगले जुमा तक और माहे रमज़ान अगले माहे रमज़ान तक गुनाहों का कफ़्फ़ारा हैं जब तक कि कबीरा गुनाहों से बचा जाए।” (स़ह़ीह़ मुस्लिम, स़-फ़ह़ा:144, ह़दीस़:233)

तौबा का त़रीक़ा :

रमज़ानुल मुबारक में रहमतों की झमाझम बारिशें और गुनाहे स़ग़ीरा के कफ़्फ़ारे क सामान हो जाता है। गुनाहे कबीरा तौबा से माफ़ होते हैं। तौबा करने का त़रीक़ा यह है कि जो गुनाह हुआ ख़ास़ उस गुनाह का जि़क्र कर के दिल की बेज़ारी और आइन्दा उस से बचने का अ़ह्द कर के तौबा करे। म-स़लन झूट बोला, तो बारगाहे खु़दावन्दी में अ़र्ज़ करे, या अल्लाह! मैं ने जो यह झूट बोला इस से तौबा करता हूं और आइन्दा नहीं बोलूंगा। तौबा के दौरान दिल में झूट से नफ़रत हो और “आइन्दा नहीं बोलूंगा” कहते वक़्त दिल में यह इरादा भी हो कि जो कुछ कह रहा हूं ऐसा ही करूंगा जभी तौबा है। अगर बन्दे की ह़क़ तलफ़ी की है तो तौबा के साथ साथ उस बन्दे से माफ़ करवाना भी ज़रूरी है।

देखिये – तौबा और अस्‍तग़फ़ार

फरमाने मुस्‍तफाﷺ

माहे रमज़ान के फ़ज़ाइल से कुतुबे अह़ादीस़ मालामाल हैं। रमज़ानुल मुबारक में इस क़दर बरकतें और रहमतें हैं कि हमारे हुज़ूरे अकरमﷺ फरमाते हैं, “अगर बन्दों को मालूम होता कि रमज़ान क्या है तो मेरी उम्मत तमन्ना करती कि काश! पूरा साल रमज़ान ही हो।” (स़ह़ीह़ इब्ने खु़जै़मा, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:190, ह़दीस़:1886)

ह़ज़रते सय्यिदुना सलमान फ़ारसी रजि फ़रमाते हैं कि हुज़ूरे अकरमﷺ ने माहे शा’बान के आखि़री दिन बयान फ़रमाया : “ऐ लोगो! तुम्हारे पास अ़ज़मत वाला बरकत वाला महीना आया, वो महीना जिस में एक रात (ऐसी भी है जो) हज़ार महीनों से बेहतर है, इस (माहे मुबारक) के रोज़े अल्लाह ने फ़र्ज़ किये और इस की रात में कि़याम1 ततव्वुअ़ (यानी सुन्नत) है, जो इस में नेकी का काम करे तो ऐसा है जैसे और किसी महीने में फ़र्ज़ अदा किया और इस में जिस ने फ़र्ज़ अदा किया तो ऐसा है जैसे और दिनों में सत्‍तर फ़र्ज़ अदा किये। यह महीना स़ब्र का है और स़ब्र का स़वाब जन्नत है और यह महीना मुआसात (यानी ग़म ख़्वारी और भलाई) का है और इस महीने में मोमिन का रिज़्क़ बढ़ाया जाता है। जो इस में रोज़ादार को इफ़्त़ार कराए उस के गुनाहों के लिये मगि़्फ़रत है और उस की गरदन आग से आज़ाद कर दी जाएगी। और इस इफ़्त़ार कराने वाले को वैसा ही स़वाब मिलेगा जैसा रोज़ा रखने वाले को मिलेगा। बग़ैर इस के कि उस के अज्र में कुछ कमी हो।”

हम ने अ़र्ज़ की, या रसूलल्लाह हम में से हर शख़्स़ वो चीज़ नहीं पाता जिस से रोज़ा इफ़्त़ार करवाए। आप ने इर्शाद फ़रमाया: अल्लाह तआला यह स़वाब (तो) उस (शख़्स़) को देगा जो एक घूंट दूध या एक खजूर या एक घूंट पानी से रोज़ा इफ़्त़ार करवाए और जिस ने रोज़ादार को पेट भर कर खिलाया, उस को अल्लाह तआला मेरे ह़ौज़ से पिलाएगा कि कभी प्यासा न होगा। यहां तक कि जन्नत में दाखि़ल हो जाए।

यह वो महीना है कि

इस का इब्तिदाई दस दिन रह़मत है और

दरमियानी दस दिन मगि़्फ़रत है और

आखि़री दस दिन जहन्नम से आज़ादी है।

जो अपने गु़लाम पर इस महीने में तख़्फ़ीफ़ करे (यानी काम कम ले) अल्लाह तआला उसे बख़्श देगा और जहन्नम से आज़ाद फ़रमा देगा

इस महीने में चार बातों की कस़रत करो। इन में से दो2 ऐसी हैं जिन के ज़रीए़ तुम अपने रब को राज़ी करोगे और बकि़य्या दो से तुम्हें बे नियाज़ी नहीं। पस वो दो बातें जिन के ज़रीए़ तुम अपने रब को राज़ी करोगे वो यह हैं: (1) की गवाही देना (2) इस्तिग़्फ़ार करना। जब कि वो दो बातें जिन से तुम्हें ग़ना (बे नियाज़ी) नहीं वो यह हैं: (1) अल्लाह तआला से जन्नत त़लब करना (2) जहन्नम से अल्लाह की पनाह त़लब करना।” (स़ह़ीह़ इब्ने ख़ुज़ैमा, जिल्द:3, स़-फ़ह़ा:1887)

अभी जो ह़दीस़े पाक बयान की गई इस में माहे रमज़ानुल मुबारक की रहमतों, बरकतों और अ़ज़मतों का खू़ब तजि़्करा है। इस माहे मुबारक में कलमा शरीफ़ ज्‍़यादा ता’दाद में पढ़ कर और बार बार इस्तिग़्फ़ार यानी खू़ब तौबा के ज़रीए़ अल्लाह तआला को राज़ी करने की कोशश करनी है। और इन दो बातों से तो किसी स़ूरत में भी लापरवाही नहीं होनी चाहिये यानी अल्लाह तआला से जन्नत में दाखि़ला और जहन्नम से पनाह की बहुत ज्‍़यादा इल्तिजाएं करनी हैं।

रमज़ानुल मुबारक के चार नाम :

माहे रमज़ान का भी क्या खू़ब फै़ज़ान है! ह़ज़रत मुफ़्ती अह़मद यार ख़ान र.अ. तफ़्सीरे नई़मी में फ़रमाते हैं: “इस माहे मुबारक के कुल चार नाम हैं (1) माहे रमज़ान (2) माहे स़ब्र (3) माहे मुआसात और (4) माहे वुस्अ़ते रिज़्क़।” मज़ीद फ़रमाते हैं, रोज़ा स़ब्र है जिस की जज़ा रब है और वो इसी महीने में रखा जाता है। इसलिये इसे माहे स़ब्र कहते हैं। मुआसात के मायने हैं भलाई करना। चूंकि इस महीने में सारे मुसल्मानों से ख़ास़ कर अहले क़राबत से भलाई करना ज्‍़यादा स़वाब है इसलिये इसे माहे मुआसात कहते हैं इस में रिज़्क़ की फ़राख़ी भी होती है कि ग़रीब भी ने’मतें खा लेते हैं, इसी लिये इस का नाम माहे वुस्अ़ते रिज़्क़ भी है।” (तफ़्सीरे नई़मी, जिल्द:2, स़-फ़ह़ा:208)

देखिये – रमज़ान के 13 हुरूफ़

Shabe Barat

Shabe Barat ki Fazilat

शबे बरात और ग़ौसपाक रहमतुल्लाह अलैह

अल्लाह फ़रमाता है-

इस (रात) में हर हिकमत वाला काम बांट दिया जाता है। (क़ुरान 44:4)

और तुम्हारा रब जिस चीज़ को चाहे पैदा करता है और चुन लेता है। (क़ुरान 28:68)

शबे बरात और माहे शाबान से मुताल्लिक, ग़ौसपाक हज़रत अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं-

रब ने तमाम चीज़ों में चार को बेहतर किया और उन चार में से एक को मुख़्तार किया। फ़रिश्तों में चार यानी हज़रत जिबरईल, मीकाईल, इसराफिल व अज़़ाज़ील अलैहिस्सलाम को मुन्तख़ब किया और उनमें से हज़रत जिबरईल रज़िअल्लाह अन्हो का इंतेख़ाब किया। अंबिया में चार यानी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम, मूसा अलैहिस्सलाम, ईसा अलैहिस्सलाम और मुह़म्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को चुना और उनमें से हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को चुन लिया। दिनों में चार दिनों यानी ईदुल फितर, ईदुल अज़़हा, यौमे अरफ़ा (9 ज़िलहिज्जा) और यौमे आशूरा (10 मुहर्रम) को मुन्तख़ब फ़रमाया। फिर उनमें से यौमे अरफ़ा को बुर्गज़िदा किया। इसी तरह रातों में चार रातों यानी शबे बरात, शबे क़दर, शबे जुमा और ईद की रात को बेहतरीन क़रार दिया। फिर इनमें से शबे क़दर को फ़ज़ीलत बख़्शी। महीनों में चार यानी रजब, शाबान, रमज़ान व मुहर्रम को मुन्तख़ब किया और उनमें से शाबान को मुख़्तार बनाया।

हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि शाबान मेरा महीना है, रजब अल्लाह का महीना है और रमज़ान मेरी उम्मत का महीना है। शाबान, रजब व रमज़ान के बीच आता है और लोग उससे ग़ाफ़िल हैं। इसमें बंदो के आमाल, परवरदिगार की बारगाह में उठाए जाते हैं। लिहाज़ा मैं चाहता हूं कि जब मेरे आमाल उठाए जाएं तो मैं रोज़े की हालत में रहूं।

हज़रत अनस बिन मालिक रज़ि. फ़रमाते हैं कि शाबान का चांद देखते ही सहाबा किराम तिलावते क़ुरान में मशग़ूल हो जाते और अपने मालों की ज़कात निकालते ताकि कमज़ोर व मोहताज लोग रमज़ान के रोज़े रखने पर क़ादिर हो सके। हुक्मरां, कैदियों को रिहा करते। ताजिर, सफ़र करते ताकि क़र्ज़ अदा कर सके और रमज़ान में एतेकाफ़ कर सके।

लफ़्ज़ शाबान

लफ़्ज़ शाबान में पांच हर्फ़ है- शीन, ऐन, बे, अलिफ़ और नून। शीन से शर्फ़, ऐन से अलू (बुलंदी), बे से बादबिर (नेकी), अलिफ़ से उल्फ़त और नून से नूर। इस महीने में अल्लाह की तरफ़ से बंदों को ये चीज़ें अ़ता होती हैं। इस महीने में नेकियों के दरवाज़े खुल जाते हैं और बरकतों को नुजूल होता है। गुनाह झड़ते हैं और बुराईयां मिटा दी जाती है। तमाम मख़्लूक़ में बेहतरीन शख़्सियत, नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बारगाह बेकस पनाह में कसरत से हदिया ए दरूद व सलाम भेजा जाता है। ये महीना हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर दरूद व सलाम पढ़ने का महीना है। अल्लाह फ़रमाता है-

बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर दरूद शरीफ़ भेजते हैं और ऐ इमानवालों! तुम भी उन पर दरूद और खूब सलाम भेजो।(क़ुरान 33:56)

अल्लाह की तरफ़ से दरूद का मतलब रह़मत भेजना है। फ़रिश्तों की तरफ़ से दरूद का मतलब शफ़ाअ़त व इस्तग़फ़ार और मोमिन की तरफ़ से दरूद, दुआ व सना है।

हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम फ़रमाते हैं- जो शख़्स मुझ पर एक बार दरूद भेजता है, अल्लाह उस पर दस रहमतें नाज़िल फ़रमाता है। लिहाज़ा हर अक्लमंद मोमिन को चाहिये कि इस महीने में ग़ाफ़िल न हो और रमज़ान मुबारक की तैय्यारी करे। इसका तरीक़ा ये है कि अगले गुनाहों से बाज़ आ जाए, पिछले गुनाहों से तौबा करे और बारगाहे खुदावंदी में आजिज़ी का इज़हार करे।

और जिस ज़ात की तरफ़ ये महीना मन्सूब है यानी नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम, उनके वसीले से बारगाहे खुदावंदी तक रसाई हासिल करे ताकि उसके दिल का फ़साद दूर हो और क़ल्बी बीमारी का इलाज हो जाए। इस काम को कल कि लिए न छोड़ो।

क्योंकि कल का दिन गुज़र चुका है और आने वाले दिन पर तेरे बस में नहीं, इसलिए आज का दिन अमल का है। जो गुज़र गया वो नसीहत है और जो आने वाला है उस पर तेरी क़ुदरत नहीं। आज का दिन ग़नीमत है। इसी तरह रजब का महीना गुज़र गया है और रमज़ान का इंतेज़ार है, पता नहीं नसीब होगा या नहीं, लेकिन शाबान तेरे पास है, लिहाज़ा इसे ग़नीमत जान और इताअत व फ़रमाबरदारी में लग जा।

हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने एक शख़्स (हज़रत उमर रज़िअल्लाह अन्हो) को नसीहत करते हैं कि 5 चीज़ों को 5 चीज़ों से पहले ग़नीमत जानो- 1. जवानी को बुढापे से पहले, सेहत को बीमारी से पहले, मालदारी को मोहताजी से पहले, फुरसत को मशगूलियत से पहले और ज़िन्दगी को मौत से पहले ग़नीमत जानो।

शबे बरात की दुआ

हज़रत उमर रज़िअल्लाह अन्हो से मरवी है कि हज़रत आईशा रज़िअल्लाह अन्हा फ़रमाती हैं-

15 शाबान की रात हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम सजदे में ये दुआ मांगी-

سَجَدَ لَکَ سَواَدِیْ وَجَنَانِیْ وَاٰمَنَ بِکَ فُوَادِیْ اَبُوْئُ لَکَ بِالنِّعَمِ وَاَعْتَرِفُ لَکَ بِالذُّنُوْبِ ظَلَمْتُ نَفْسِیْ فَاغْفِرْلِیْ اِنَّہٗ لَایَغْفِرُ الذُّنُوْبَ اِلَّا اَنْتَ اَعُوْذُ بِعَفُوِکَ مِنْ عَقُرْ بَتِکَ وَاَعُوْذُ بِرَحْمَتِکَ مِنْ نِّعْمَتِکَ وَاَعُوْذُ بِرِضَاکَ مَنْ سَخَطِکَ وَاَعُوْذُ بِکَ مِنْکَ لَا اُحْصِیْ ثَنَائً عَلَیْکَ اَنْتَ کَمَا اَثْنَیْتَ عَلٰی نَفْسِکَ

(या अल्लाह) मेरे जा़हिर व बातिन ने तेरे लिए सजदा किया और मेरा दिल तुझ पर ईमान लाया, मैं तेरे इनाम का मोअतरिफ़ हूं और गुनाहों का भी इक़रार करता हूं, पस मुझे बख़्श दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई बख़्शने वाला नहीं। मैं तेरे अफ़ू के साथ तेरे अज़ाब से पनाह चाहता हूं। तेरी रह़मत के साथ तेरे अज़ाब से पनाह का तालिब हूं। तेरी रज़ा के साथ तेरे ग़ज़ब से पनाह चाहता हूं। मैं कमा हक्कहू तेरी तारीफ़ नहीं कर सकता। तू ऐसा है जैसे तूने खुद अपनी तारीफ़ बयान फ़रमाई है।

शबे बरात की वजह तसमिया

इस रात को शबे बरात (बरअ़त) इसलिए कहते हैं कि इस में दो बरअ़तें (बेज़ारियां) हैं। बदबख़्त, रहमान से और सूफ़ीया किराम, ज़िल्लत व रुसवाई से बेज़ार होते हैं।

हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम फ़रमाते हैं- जब 15 शाबान की रात होती है तो अल्लाह तबारक व तआला की अपने मख़्लूक़ पर खुसूसी तवज्जो फ़रमाता है। मोमीनों को बख़्श देता है और काफ़िरों को मोहलत देता है। किना करने वालों को उसी हालत में रहने देता है, यहां तक कि वे इसे ख़ुद छोड़ दें।

फ़रिश्तों की आसमान में ईद की दो रातें हैं जिस तरह मुसलमानों के लिए ज़मीन पर दो ईदें हैं। फ़रिश्तों की ईदें शबे बरात और लैलतुल क़दर हैं और मोमिनों की ईदें, ईदुल फितर व ईदुल अज़़हा हैं। फ़रिश्तों के लिए ईदें रात को इसलिए हैं कि वो सोते नहीं है और इंसानों की ईदें दिन में इस लिए हैं कि वो रात को सोते हैं।

शबे बरात को जा़हिर करने की हिकमत

अल्लाह ने शबे बरात को जा़हिर किया और लैलतुल क़दर को पोशीदा रखा। इसकी हिकमत के बारे में कहा गया है कि लैलतुल क़दर रह़मत, बख़्शिश और जहन्नम से आज़ादी की रात है (इसमें अज़ाब नहीं)। अल्लाह ने इसे मख़्फ़ी रखा ताकि लोग सिर्फ़ इसी पर भरोसा न कर बैठे। जबकि शबे बरात को जा़हिर किया क्योंकि वो फैसले, क़ज़ा, क़हरो रज़ा, क़ुबूलो रद्द, नज़दीको दूरी, सअ़ादतो शफ़ाअ़त और परहेज़गारी की रात है। शबे बरात में कोई नेकबख़्ती हासिल करता है तो कोई मरदूद हो जाता है, एक सवाब पाता है तो दूसरा ज़लील होता है। एक मौत से बच जाता है तो दूसरा ज़िन्दगी से हाथ दो बैठता है। शबे क़दर में रह़मत ही रह़मत है, अज़ाब नहीं है। जबकि शबे बरात में रह़मत भी है और अज़ाब भी।

हज़रत हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह निस्फ़ शाबान की रात को घर से निकले तो उनका चेहरा ऐसा था कि जैसे क़ब्र से दफ़न के बाद निकाला गया हो। आपसे सबब पूछा गया तो फ़रमाया- मुझसे ज़्यादा मुसीबत में कोई नहीं। मेरे गुनाह यक़ीनी हैं, लेकिन नेकियों पर भरोसा नहीं कि वो क़ुबूल होगी या रद्द होगी।

शबे बरात में इबादत

उम्मुल मोमेनीन हज़रत आईशा रज़िअल्लाह अन्हा फ़रमाते हैं- हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम सुबह तक मुसलसल क़याम व कअदा की हालत में रहे। हालांकि आपके पांव मुबारक फुल गए। मैंने अर्ज़ किया- आप पर मेरे मां-बाप कुरबान, आपको अल्लाह वो मुक़ाम व एजाज अ़ता फ़रमाया है कि आपके सदक़े आपके पहलूओं व बच्चों के गुनाह भी माफ़ कर दिए। (तो फिर इतनी मशक्कत करने की क्या ज़रूरत) तो आपने फ़रमाया- ऐ आईशा! तो क्या मैं अल्लाह का शुक्र अदा न करूं। क्या तुम जानती हो इस रात की क्या फ़ज़ीलत है। मैंने कहा- इस रात में क्या है? आपने फ़रमाया- आइन्दा साल में होने वाले हर बच्चे का नाम, इस रात लिखा जाता है और इसी रात आइन्दा साल मरने वालों के नाम भी लिखे जाते हैं। इसी रात बंदों के रिज़्क उतरते हैं और इसी रात लोगों आमाल व अफआल उठाए जाते हैं।

हज़रत आईशा रज़िअल्लाह अन्हा फ़रमाते हैं- हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम (शबे बरात में) नमाज़ पढ़ने लगे, मुख़्तसर क़याम किया, सूरे फ़ातेहा व छोटी सूरे पढ़ी और (रूकू के बाद) आधी रात तक सजदारेज़ रहे। फिर दूसरी रकात में खड़े हुए और पहली रकात की तरह सूरे फ़ातेहा व छोटी सूरे पढ़कर (रूकू के बाद) फ़जर तक सजदारेज़ रहे। (यानी पूरी रात में दो रकात)।

हज़रत अकरमा रज़िअल्लाह अन्हो से मरवी है कि इस रात को हर हिकमत दाए काम का फैसला होता है। अल्लाह पूरे साल के उमूर की तदबीर फ़रमाता है। (यहां तक कि) हज करने वालों के नाम भी लिखे जाते हैं।

हज़रत हकीम बिन कीसान रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि शबे बरात में अल्लाह उन लोगों पर तवज्जो करता है जो इस रात अपने आप को पाक रखते हैं। अल्लाह उसे आइन्दा शबे बरात तक पाक रखता है।

हज़रत अबूहुरैरा रज़िअल्लाह अन्हो से मरवी है कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया- हज़रत जिबरईल रज़िअल्लाह अन्हो शाबान की 15वीं रात को मेरे पास आए और कहा- ऐ मुह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम! आसमान की तरफ़ सर उठाएं। मैंने पूछा ये रात क्या है? फ़रमाया- ये वो रात है जिसमें अल्लाह रह़मत के दरवाज़ों में से 300 दरवाज़े खोलता है और हर उस शख़्स को बख़्श देता है, जो मुशरिक न हो, अलबत्ता जादूगर, काहिन, आदीशराबी, बार बार सूद खाने वाला और ज़िना करने वाले की बख़्शिश नहीं होगी जब तक वो तौबा न कर ले।

जब रात का चौथा हिस्सा हुआ तो हज़रत जिबरईल रज़िअल्लाह अन्हो ने अर्ज़ किया- ऐ मुह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम! अपना सर उठाइये। आपने सर उठाया तो देखा कि जन्नत के दरवाज़े खुले थे और पहले दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता निदा दे रहा है- इस रात को रूकू करने वालों के लिए खुशखबरी है। दूसरे दरवाज़े पर फ़रिश्ता पुकार रहा है- इस रात में सजदा करने वालों के लिए खुशखबरी है। तीसरे दरवाज़े पर निदा हो रही है- इस रात में दुआ करने वालों के लिए खुशखबरी है। चौथे दरवाज़े पर खड़ा फ़रिश्ता निदा दे रहा था- इस रात में ज़िक्रे खुदावंदी करने वालों के लिए खुशखबरी है। पांचवे दरवाज़े से फ़रिश्ता पुकार रहा था- अल्लाह के ख़ौफ़ से रोने वाले के लिए खुशखबरी है। छठे दरवाज़े पर फ़रिश्ता कह रहा था- इस रात तमाम मुसलमानों के लिए खुशख़बरी है। सातवें दरवाज़े पर मौजूद फ़रिश्ता की ये निदा थी कि क्या कोई साएल है जिसके सवाल के मुताबिक़ अ़ता किया जाए। आठवें दरवाज़े पर फ़रिश्ता कह रहा था- क्या कोई बख़्शिश का तालिब है जिसको बख़्श दिया जाए। हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने पूछा- ऐ जिबरईल रज़िअल्लाह अन्हो! ये दरवाज़े कब तक खुले रहेंगे। उन्होंने कहा- रात के शुरू से तुलूअ आफ़ताब तक। फिर कहा- ऐ मुह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम! इस रात अल्लाह कबीला बनू कलब की बकरियों के बालों के बराबर लोगों को (जहन्नम) से आज़ाद करता है।

हज़रत अ़ली रज़िअल्लाह अन्हो फ़रमाते हैं- मुझे ये बात पसंद है कि इन 4 रातों में आदमी ख़ुद को (तमाम दुनियावी मसरूफ़ियात से इबादते इलाही के लिए) फ़ारिग़ रखे। (वो चार रातें हैं) 1. इदुल फितर की रात, 2. ईदुल इज़हा की रात, 3. शाबान की पंद्रहवीं रात (शबे बरात) और 4. रजब की पहली रात। (इब्ने जौज़ी, अत्तबस्सुरा, 21/2)

हज़रत ताउस यमानी फ़रमाते हैं कि मैंने हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम से शबे बरात व उसमें अमल के बारे पूछा तो आपने फ़रमाया- मैं इस रात को तीन हिस्सों में तक़सीम करता हूं। एक हिस्से में नाना जान (हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) पर दरूद पढ़ता हूं। दूसरे हिस्से में अपने रब से इस्तग़फ़ार करता हूं और तीसरे हिस्से में नमाज़ पढ़ता हूं। मैंने अर्ज़ किया कि जो शख़्स ये अमल करे उसके लिए क्या सवाब है। आपने फ़रमाया मैंने वालिद माजिद (हज़रत अ़ली रज़िअल्लाह अन्हो) से सुना और उन्होंने हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से सुना- ये अमल करने वालों को मुक़र्रेबीन लोगों में लिख दिया जाता है।

एक रवायत में है कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि जो शख़्स शबे बरात की मग़रिब से पहले 40 मरतबा ‘लाहौल वला कुव्वता इल्ला बिल्ला हिल अलिय्यिल अज़ीम’ और 100 मरतबा दरूद शरीफ़ पढ़े तो अल्लाह उसके 40 बरस के गुनाह माफ़ फ़रमा देता है।

6 रकात नफ़िल और सूरे यासीन की तिलावत

बाद नमाज़ मग़रिब 6 रकात नफ़िल इस तरह पढ़ें-

  1. 2 रकात नमाज़ नफ़िल दराज़िये उम्र (उम्र में बरकत) के लिए
  2. 2 रकात नमाज़ नफ़िल कुशादगीये रिज़्क (कारोबार व आमदनी में बरकत) के लिए
  3. 2 रकात नमाज़ नफ़िल दाफए अमरोज व बलियात (आफ़तों से बचने) के लिए

हर सलाम के बाद सूरे यासीन की तिलावत करें।

फिर दुआए निस्फ़ शाबान पढ़ें।

दुआए निस्फ़़ शाबान

हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि जो कोई ये दुआ शबे बरात में पढ़ेगा, हक़ तआला उसे बुरी मौत से महफ़ूज़ रखेगा।

dua shabaan

Dua Nisf Shaban

 

शबे बरात की नमाज़ें

सलातुल ख़ैर

सौ रकात इस तरह पढ़ी जाए कि 1000 मरतबा सूरे इख़्लास पढ़ी जाए, यानी हर रकात में 10-10 मरतबा। इस नमाज़ से बरकत फैल जाती है। पहले के दौर में बुज़ुर्ग इस नमाज़ के लिए जमा होते और बाजमाअत अदा करते। इसकी फ़ज़ीलत ज़्यादा और सवाब बेशुमार है।

हज़रत हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह से मरवी है, आपने फ़रमाया- मुझे 30 सहाबा ने बयान किया कि जो शख़्स इस शबे बरात में ये नमाज़ पढ़े, तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त 70 मरतबा नज़रे रह़मत फ़रमाता है और हर नज़र के बदले उसकी 70 हाजात पूरी करता है। सबसे कम दरजे की हाजत मग़फ़िरत है। 14वीं को ये नमाज़ पढ़ना भी मुस्तहब है। क्योंकि इस रात को (इ़बादत के साथ) ज़िंदा रखना भी मुस्तहसन है।

सलातुत तस्‍बीह

सलातुत तस्‍बीह पढें  (देखिये – सलातुत तस्‍बीह का तरीक़ा )

 

दीगर

ऽ   4 रकात नमाज़ 1 सलाम से इस तरह पढ़ें कि सूरे फ़ातेहा के बाद सूरे इख़्लास (कुलहो वल्लाहो अहद) 50 मरतबा पढ़ें। फ़ायदा- गुनाहों से मग़फ़िरत।

ऽ   2 रकात नमाज़ में सूरे फा़तेहा के बाद 1 मरतबा आयतल कुर्सी (अल्लाहो लाइलाहा इल्ला) और 15 बार सूरे इख़्लास पढ़ें और सलाम फरने के बाद 100 मरतबा दरूद शरीफ़ पढ़ें। फ़ायदा- रिज़्क में कुशादगी, मुसीबत से निजात और गनाहों से मग़फ़िरत।

ऽ   2-2 करके 14 रकात नमाज़ पढें। उसके बाद 100 बार दरूद पढ़ें। फ़ायदा- दुआ की मकबुलियत।

ऽ   2-2 करके 8 रकात नमाज़ नफ़िल पढ़ें, हर रकात में सूरे फ़ातेहा के बाद सूरे क़दर (इन्ना अन्ज़लना) 1 बार और सूरे इख़्लास 25 बार पढ़ें। फ़ायदा- गुनाह से मग़फ़िरत व बख़्शिश।

Salatut Tasbeeh Infographic

Salat ut Tasbih ka Asaan Tariqa

salatul tasbeeh ka tarika

salatul tasbeeh ka tarika

सलातुत तस्‍बीह का आसान तरीका

तस्‍बीह
”सुब्‍हानअल्‍लाहे
वलहम्‍दोलिल्‍लाहे
वलाइलाहाइल्‍लल्‍लाहो
वल्‍लाहोअकबर”

سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ

1. सबसे पहले सलातुत तस्‍बीह की नियत करें (चार रकअत एक सलाम से)

Niyat in Hindi:
नीयत की मैंने 4 रकअत सलातुत तस्‍बीह, वास्‍ते अल्‍लाह तआला के, मुंह मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़।

Niyat in Urdu:
نیت کی میں نے چار رکعت صلوٰۃ التسبیح کی، واسطے اللہ تعالیٰ کے منھ میرا کعبہ شریف کی طرف۔

Niyat in Arabic:
نَوَايْتُ اَنْ اُصَلِّىَ لِلَّهِ تَعَالَى ارْبَعَ رَكَعَاتِ صَلَوةِ التَّسْبِيْحِ سُنَّةُ رَسُوْلِ اللَّهِ تَعَالَى مُتَوَجِّهًا اِلَى جِهَةِ الْكَعْبَةِ الشَّرِيْفَةِ اَللَّهُ اَكْبَرُ

फिर

सना (सुब्‍हानाकल्‍लाहुम्‍मा…) के बाद 15 मरतबा तस्‍बीह पढ़ें। फिर

2. आउजोबिल्‍लाहे मिनश्‍शैतानिर्रजिम
बिस्मिल्‍लाहीर्रहमानिर्रहिम
सूरे फ़ातिहा (अल्‍हम्‍दोलिल्‍लाहे रब्बिल आलमीन….)
सूरे मिलाइये (कुरआन की कम से कम तीन आयतें या जो चाहें)

सूरे मिलाने के बाद 10 मरतबा
फिर

3. रुकूअ् में 10 मरतबा (सुब्‍हानरब्बिलअज़ीम के बाद) पढ़ें। फिर

4. (रुकूअ् से खड़े होकर)
क़याम में 10 मरतबा (समिअल्‍लाहोलेमनहमेदा रब्‍बनालकलहम्‍द के बाद) पढ़ें। फिर

5. सज्‍दे में 10 मरतबा (सुब्‍हान रब्बिल आला के बाद) पढ़ें। फिर

6. (सज्‍दे के दर‍मियान)
जल्‍सा में 10 मरतबा पढ़ें। फिर

7. दूसरे सज्‍दे में 10 मरतबा (सुब्‍हान रब्बिल आला के बाद) पढ़ें।

फिर अगली रकअत के लिए खड़े हो जाएं।

इस तरह पहली रकअत में 75 मरतबा पढ़ें,

दूसरी रकअ्त में 75 मरतबा पढ़ें। यानी
खड़े होते ही पहले 15 बार
फिर सूरे मिलाने के बाद 10 बार
फिर रुकूअ् में 10 बार
फिर क़याम में 10 बार
फिर सजदे में 10 बार
फिर जलसा में 10 बार
फिर दूसरे सजदे में 10 बार।

दूसरी रकात में कअ्दा में बैठकर अत्‍तहियात पढ़ें और फिर तीसरी रकात के लिए खड़े हो जाएं।

तीसरी रकअ्त में 75 मरतबा और

चौथी रकअ्त में 75 मरतबा तस्‍बीह पढ़ें।

चौथी रकात में कअदा में बैठकर अत्‍तहियात, दरूद इब्राहिम और दुआ पढ़कर नमाज़ मुकम्‍मल करें।

इस तरह चार रकअत में कुल 300 मरतबा तस्‍बीह पढ़ी जाएगी।

 

 

Subscribe via Email

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

Cart

Contact us...

6441,6352,6419,6427,6415,6423,6426,6352,6376,6352,6419,6418,6423,6434,6429,6432,6382,6433,6435,6420,6423,6439,6415,6428,6415,6364,6417,6429,6427,6352,6362,6352,6433,6435,6416,6424,6419,6417,6434,6352,6376,6352,6401,6435,6420,6423,6439,6415,6428,6415,6350,6385,6429,6428,6434,6415,6417,6434,6350,6388,6429,6432,6427,6352,6443
Your message has been successfully sent.
Oops! Something went wrong.

Contact Info

Near Dargah, Kelabadi, Durg (Chhattisgarh) 491001

+91 8878 335522
editor@sufiyana.com

Copyright 2018 SUFIYANA ©  All Rights Reserved

error: Content is protected !!