shah ast hussain

2nd सूफ़ीयाना मैगज़ीन शाया हुई

शाह अस्त हुसैन

बादशाह अस्त हुसैनؑ

दीन अस्त हुसैनؑ

दीन पनाह अस्त हुसैनؑ

सर दाद न दाद

दस्त दर दस्ते यज़ीद

हक्का के बिनाए

लाइलाह अस्त हुसैनؑ

(ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ؓ)

 

हज़रत हुसैनؑ रूहानी शाह हैं और दुनिया के बादशाह भी हैं। इमाम हुसैनؑ दीन हैं और दीन के संरक्षक भी हैं। जब करबला में आपको परिवार सहित घेर लिया गया, और यज़ीद के हाथों बैअ़त की ज़बरदस्ती होने लगी, तो आपने, अपना सर दे दिया, लेकिन वो हाथ न दिया, जिस हाथ पर बैअ़त हुए थे। इसी कुरबानी की वजह से, आज हमारा दीन ज़िन्दा है। हक़ तो ये है कि ‘ला इलाहा’ की बुनियाद हुसैनؑ हैं। अगर यज़ीद के हाथों बैअ़त ले ली जाती, तो इमाम हुसैनؑ और उनके परिवार की जान तो बच जाती, लेकिन धर्म न बचता, सत्य न बचता और हज़रत मुहम्मदﷺ  की शिक्षाएं नहीं बचती। आप जंग हार गये, मगर दीन जीत गया। और इस तरह असत्य पर सत्य की जीत हुई।

हज़रत मुहम्मदﷺ  फ़रमाते हैं- हुसैन मुझसे हैं और मैं हुसैन से हूं।

 

सुनते हैं, सर बचाने को उठते हैं पहले हाथ।

सर देकर, अपना हाथ बचाया हुसैनؑ ने।

(पंडित गयाप्रसाद रूमवी)

 

क़त्ले हुसैनؑ अस्ल में मर्गे़ यज़ीद है।

इस्लाम ज़िन्दा होता है, हर करबला के बाद।

(मुहम्मद अली जौहर)

 

इन्सान को बेदार तो हो लेने दो,

हर क़ौम पुकारेगी, हमारे हैं हुसैन।

(जोश मलीहाबादी)

 

वो हुसैनؑ जिसने छिड़क के खून,

चमने वफ़ा को हरा किया।

(मौलाना एजाज़ कामठी)

 

मैंने हुसैन से सीखा कि मजलूमियत में किस तरह जीत हासिल की जा सकती है। इस्लाम की बढ़ोतरी तलवार पर निर्भर नहीं करती, बल्कि हुसैन के बलिदान का एक नतीजा है, जो एक महान संत थे।

-महात्मा गांधी

इमाम हुसैन की कुरबानी तमाम गिरोहों और सारे समाज के लिए है और यह कुरबानी इंसानियत की भलाई की एक अनमोल मिसाल है।

-पंडित जवाहर लाल नेहरू

यह इमाम हुसैन की कुरबानियों का नतीजा है कि आज इस्लाम का नाम बाक़ी है। नहीं तो दुनिया में कोई नाम लेने वाला भी नहीं होता।

-स्वामी शंकराचार्य

इस बहादुर और निडर लोगों में सभी औरतें और बच्चे इस बात को अच्छी तरह से जानते और समझते थे कि दुश्मन की फौजों ने उनका घिराव किया हुआ है और दुश्मन सिर्फ लड़ने नहीं बल्कि उनको क़त्ल करने के लिए आए हैं। जलती रेत, तपता सूरज और बच्चों की प्यास भी उनके क़दम नहीं डगमगा पाई। सारी मुश्किलों का सामना करते हुए भी उन्होंने अपनी सत्यता का कारनामा कर दिखाया।

-चार्लस डिकेन्स

मानवता के वर्तमान और अतीत के इतिहास में कोई भी युद्ध ऐसा नहीं है, जिसने इतनी मात्रा में सहानुभूति और प्रशंसा हासिल की हो और सारी मानवजाति की इतनी अधिक उपदेश व उदाहरण दिया हो, जितनी इमाम हुसैन की शहादत ने करबला के युद्ध से दी है।

-अंटोनी बारा

Sufiyana 101

1st सूफ़ीयाना मैगजीन शाया हुई

सूफ़ी, हमेशा से लोगों में मुहब्‍बत व अमन के साथ साथ उस एक ख़ुदा की इबादत का दर्स देते रहे हैं और दिलों को रूहानियत का मर्कज़ बनाते रहे हैं। इस काम के लिए वो हर तरह की तकलीफ़ें बर्दाश्‍त किए। सफ़र करना पड़ा तो सफ़र किए, भूखा रहना पड़ा तो भूखे रहे, गरज़ के इस राह में अपना सब कुछ सौंप दिया, यहां तक कि ज़रूरत पड़ी तो अपनी जान भी न्‍यौछावर कर दिए।

पुराने वक़्त में लोगों को घूम घूम कर अपनी बात बताया करते थे और जब ज़रूरत पड़ी तो काग़ज़ या कपड़े पर लिख कर भी लोगों को अपना संदेश दिया करते थे। इसी सिलसिले में कई सूफ़ीयों ने किताबें और रिसाले भी लिखे। इन्‍हीं क़दीम और बेशकिमती किताबों रिसाले की शक्‍ल में शाया करने का जिम्‍मा सूफ़ीयाना मैगज़ीन ने उठाया है।
बरसों से सूफ़ीज्‍़म पर बेस्‍ड इस मैगज़ीन का ख्‍़वाब देखा जा रहा था। जो आज के मग़रिबी मुआशरे (पश्चिमी सभ्‍यता) की बुराईयों से निकालकर रूहानियत (अध्‍यात्‍म) की तरफ ले जाए। इसी ख्‍़वाब की ताबीर, सूफ़ीयाना की शक्‍़ल में हुई।

खानकाहे रूमी हसनी में जुलाई 2014 (शव्‍वाल 1435हि.) को ईद की खुशी के साथ, जश्‍ने चरागां के मौके पर, तमाम सूफ़ीयों और हज़रत ख्‍़वाजा जलालुद्दीन खि़ज़्र रूमी शाह रहमतुल्‍लाह अलैह के साए में और सूफ़ी सफ़ीउद्दीन सादी मद्देजि़ल्‍लहू (सज्‍जदानशीन ख़ानक़ाहे रूमी हसनी) की सरपरस्‍ती, सूफ़ी कमालुद्दीन जामी मद्देजिल्‍लहू की क़यादत और मौलवी अब्‍दुल ग़फ़ूर अशरफ़ी, सूफ़ी इकरामुद्दीन आरीफ़, सूफ़ी इनामुद्दीन सूफ़ी, सूफ़ी इक़बाल अहमद, हाफिज़ ज़करिया, सूफ़ी जिलानी ख़ान, सूफ़ी अज़ीमुद्दीन शरीफ़ की निगरानी और तमाम वाबस्‍तगाने सिलासिल की मौजूदगी में सूफ़ीयाना मैगज़ीन शाया हुई।

ये रिसाला एक तिमाही रिसाला है और पूरा मल्‍टीकलर व माडर्न इंटरनेशनल डिज़ाईन पर तैयार किया गया है। यानि सूफ़ीयाना मगज़ीन पूरी तरह से तालिब को मुहब्‍बत-ईबादत-रूहानियत से मालामाल करने वाली है।

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